बुद्धिवादी, नास्तिक आदि व्यक्ति हिन्दुओं के धर्मग्रंथ, देवी-देवता एवं महापुरुषों पर टीका-टिप्पणी कर हिन्दुओं को भ्रमित करते हैं । ऐसी टीका-टिप्पणियों का योग्य प्रतिवाद न करने से हिन्दुओं की श्रद्धा डगमगा जाती है और धर्महानि होती है । ‘अयोग्य टीका-टिप्पणियों का प्रतिवाद करना’, कालानुसार आवश्यक धर्मपालन ही है । इसी उद्देश्य से आगे ‘श्रीकृष्ण पर आक्षेप और उसका खंडन’ दिया है । प्रत्येक व्यक्ति का इसका अध्ययनपूर्वक मनन करना चाहिए । भगवान श्रीकृष्ण पर टीका ‘आक्षेप’ इस शीर्षक के अंतर्गत और तदुपरांत उस अयोग्य विचार का प्रतिवाद ‘आक्षेप का खंडन’ इस शीर्षक के अंतर्गत दिया है ।
लेखक : श्री. दुर्गेश ज. परुळकर, हिन्दुत्वनिष्ठ व्याख्याता एवं लेखक, डोंबिवली.

आक्षेप क्र. १
‘दया तिचे नाव भूतांचे पाळण ।’ (मराठी में) ऐसा संतवचन होते हुए भी श्रीकृष्ण ने दुर्याेधन आदि कौरवों पर दया नहीं की !
श्रीकृष्ण स्वयं को परमेश्वर का अवतार कहलवाते हैं । ऐसे में उन्होंने शांति प्रस्थापित करने के स्थान पर अर्जुन को भडकाया । अर्जुन को युद्ध नहीं करना था, तब भी श्रीकृष्ण ने उसे भ्रमित कर, उसे अपने सगे-संबंधियों के विरुद्ध लडने के लिए कहा । इस युद्ध में लाखों सैनिकों के प्राण चले गए । उनकी पत्नी विधवा हो गईं । इतना सब कुछ करने के पश्चात भी उसके नाम का कहीं भी उल्लेख नहीं आया ! हमारे देश की महान परंपरा है – “अहिंसा परमो धर्मः” अर्थात अहिंसा परम धर्म है ! इस परंपरा को चालाक और धूर्त श्रीकृष्ण ने धूल में मिला दिया । वास्तव में भारतीयों के अहिंसा धर्म को खरी बाधा इसने ही पहुंचाई है । अहिंसा अर्थात दया दिखाना ! श्रीकृष्ण को दुर्याेधनादि कौरवों पर दया करनी चाहिए थी । ऐसा संतवचन भी है ‘दया तिचे नाव भूतांचे पाळण ।’ (मराठी में) ।
आक्षेप का खंडन
अ. दया में दुष्टों का निर्दालन भी समाहित है !
भगवान श्रीकृष्ण पर आक्षेप लेनेवालों ने संतवचन का उल्लेख कर हमारा काम आसान कर दिया है । उन्होंने संतवचन का केवल आधा भाग ही बताया है । ‘दया तिचे नाव भूतांचे पाळण ।’ इस वचन का अगला भाग है, ‘आणिक निर्दाळण कंटकांचे ।।’, अर्थात ‘केवल प्राणिमात्र पर प्रेम करना ही दया नहीं है, अपितु ‘दुष्टों का निर्दालन’ भी दया ही है ।’ ‘दया’ अर्थात भूतों के (प्राणिमात्र का) पालन करना; तथापि दया का सूक्ष्म विचार करने से यह ध्यान में आता है कि दया में दुष्टों का निर्दालन भी समाहित है ! वास्तव में विचारक स्थूल एवं सूक्ष्म, इसप्रकार दोनों स्तरों पर विचार करते हैं; कारण धर्म के तत्त्व सूक्ष्म हैं । इसलिए किसी गहन विषय का सूक्ष्म विचार किए बिना मतप्रदर्शन करना, अर्थात बाह्यदृष्टि से सौंदर्यवान, परंतु मन से कलुषित मनुष्य की स्तुति करने समान है !
आ. कौरव ५ गांव भी पांडवों को देने के लिए तैयार नहीं थे, इसलिए श्रीकृष्ण ने युद्ध का निर्णय दिया !
‘भारतीय दंड विधान’की धारा ३०० में हत्या की व्याख्या में ‘दूसरे को जान से मार डालना’ केवल इतना ही स्थूल विचार नहीं किया गया है, अपितु ‘आत्मरक्षा के लिए यदि कोई दूसरे को मार डाले, तो उसे हत्या नहीं कहते’, यह सूक्ष्म विचार भी किया है । इसप्रकार सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने से ध्यान में आएगा कि ‘श्रीकृष्ण द्वारा युद्ध का निर्णय देना’, अहिंसा के विरुद्ध नहीं था ।
कौरवों ने पांडवों के साथ अत्यधिक अन्याय किए थे । छल-कपट से खेली गई द्युत क्रीडा में पांडवों के राज्य का हरण कर लिया । उन्हें १२ वर्ष वनवास और १ वर्ष अज्ञातवास भोगना पडा । इन १३ वर्षों के उपरांत जब उनका राज्य लौटाने का समय आया, तब कौरवों ने मना कर दिया । कौरवों और पांडवों में समझौता हो जाए, इसलिए श्रीकृष्ण शांतिदूत बनकर कौरवों की सभा में गए और प्रस्ताव रखा कि ‘कौरव यदि पांडवों को उनका संपूर्ण राज्य देने के लिए तैयार नहीं, तो कम से कम वे उन्हें ५ गांव ही दें ।’ इसके पीछे उनका यही उद्देश्य था कि किसीप्रकार युद्ध टल जाए । कौरवों ने इस प्रस्ताव को भी ठुकराते हुए कहा, ‘युद्ध किए बिना हम पांडवों को ५ गांव तो क्या सुई की नोक के बराबर भी भूमि नहीं देंगे ।’ ऐसी परिस्थिति में न्याय प्रस्थापित करने के लिए युद्ध के सिवाय और कोई पर्याय शेष नहीं था; इसलिए श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध करने का निर्णय दिया ।

आक्षेप क्र. २
कृष्ण ने अर्जुन के लिए अन्याय और अनैतिकता से ‘महात्मा’ कर्ण का वध करवाया !
श्रीकृष्ण अत्यंत कपटी था । न्याय, नीति एवं धर्म से उसे कोई लेना-देना नहीं था । उसके मन में कर्ण के प्रति द्वेषभावना थी । युद्ध के समय जब कर्ण का रथ भूमि में धंस गया और कर्ण रथ का पहिया बाहर निकालने का प्रयत्न कर रहा था, तब श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, ‘अर्जुन, तुम कर्ण पर धनुष्य बाण साधो । उसकी बातों पर ध्यान मत दो ।’ कर्ण के रथ का पहिया रणभूमि में धंस गया था, तब उस पर बाणों की वर्षा करवानेवाले कृष्ण अप्रत्यक्षरूप से कर्ण की हत्या में सहभागी थे । ऐसे कृष्ण ने ‘धर्मसंस्थापना के लिए अवतार धारण किया है !’, इस पर कौन विश्वास रखेगा ? अधर्मी कृष्ण ने महात्मा कर्ण को कपट से मारा है !
आक्षेप का खंडन
अ. द्रौपदी को भरी सभा में लाकर विवस्त्र करने की कल्पना कर्ण की थी !
वर्तमान में कर्ण को ‘महात्मा’ बनाने का प्रयत्न बडे जोर-शोर से हो रहा है । खलनायक को नायक बनाने की एक प्रथा ही चली है । ‘सभी सद्गुणों का रस एकत्र कर, उससे जो सद्गुणों की मूर्ति साकार हुई, वह मूर्ति अर्थात कर्ण !’, ऐसा बतानेवाली कुछ पुस्तकें आजकल उपलब्ध हैं । कर्ण की महिमा का गुणगान करनेवालों ने उनकी अच्छी वकीली की है; परंतु इन लोगों के बारे में यह नहीं कह सकते कि उनका महाभारत का अध्ययन अच्छा है ।
द्युत के समय धर्मराज युधिष्ठिर ने द्रौपदी को दांव पर लगाया । उसमें वे हार गए । द्रौपदी को दांव पर लगाते ही भीष्म, द्रोण, कृप और विदुर जैसे सभी सज्जनों की आत्मा दहल गई । महाभारत में व्यासजी ने इसका वर्णन इसप्रकार किया है – ‘धिग्धिगित्येव वृद्धानां सभ्यानां नि:सृता गिर: ।’ (महाभारत, पर्व २, अध्याय ५८, श्लोक ३८), अर्थात ‘धिक्कार है ! धिक्कार है !, ऐसे शब्द वृद्ध सभासदों के मुख से बाहर निकले ।’ परंतु कर्ण आनंदित हुआ । द्रौपदी को भरी सभा में लाकर विवस्त्र करने की कल्पना न दुर्याेधन की थी और न ही दु:शासन की ! ‘द्रौपदी एकवस्त्र में हो अथवा विवस्त्र, उसे सभा में लाया जाना चाहिए !’, यह कल्पना कर्ण की थी । दु:शासन रजस्वला और एकवस्त्रा द्रौपदी को राजसभा में लेकर आया । तब कर्ण ने जोर से चिल्लाकर कहा, ‘‘पांडवानां च वासांसि द्रौपद्याश्चाप्युपाहर ।’ (महाभारत, पर्व २, अध्याय ६१, श्लोक ३८), अर्थात ‘पांडवों और द्रौपदी, दोनों के ही वस्त्र खींच लो ।’’ द्रौपदी को भरी सभा में विवस्त्र करवानेवाला कर्ण ‘महात्मा’ कैसे हो सकता है ?
आ. कर्ण ने उसके लिए तैयार दूसरे रथ का उपयोग करने के स्थान पर जानबूझकर रथ का पहिया भूमि से निकालने का स्वांग किया !
कर्ण के रथ का पहिया भूमि में धंस गया था । तब कर्ण अर्जुन से बोला, ‘‘थोडी देर रुको । मैं अपने रथ का पहिया निकाल रहा हूं ।’’ तब श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले, ‘‘अर्जुन, युद्ध मत रोको । उसे शुरू रखो ।’’ युद्ध से पहले कर्ण ने दुर्याेधन से कहा था, ‘‘दुर्याेधन, ‘ मुझे शाप है कि ऐन युद्ध के समय मेरे रथ का पहिया भूमि में धंस जाएगा । इसलिए मेरे रथ के पीछे-पीछे उत्तम घोडों के साथ उत्कृष्ट रथ हमेशा साथ रहे ।’’
इसलिए दुर्याेधन ने उसके लिए वैसी तैयारी रखी थी । कर्ण ने अपने रथ के धंसे पहिये को निकालने के स्थान पर उसके लिए तैयार रखे गए अन्य रथों में से किसी एक रथ का उपयोग क्यों नहीं किया ? उस काल के युद्ध के नियमानुसार सूर्यास्त के पश्चात युद्ध रोक दिया जाता था । जब कर्ण के रथ का पहिया भूमि में धंस गया था तब सूर्यास्त का समय निकट आ गया था । उसने जानबूझकर सूर्यास्त होने की प्रतीक्षा में रथ का पहिया निकालने का ढोंग किया, जिससे अगले दिन वह पुन: उत्साह से युद्ध कर पाए । कर्ण की यह चालाकी श्रीकृष्ण भांप गए; इसलिए श्रीकृष्ण ने अर्जुन से युद्ध जारी रखने का निर्णय दिया । कर्ण ने पांडवों के साथ कभी भी न्याय – नीति से बर्ताव नहीं किया था । अन्याय औेर अनैतिकता से बर्ताव करनेवालों के साथ न्याय और नैतिकता से आचरण नहीं, अपितु ‘ठग के साथ महाठग’ बनकर बर्ताव करना चाहिए । इस न्याय से भगवान श्रीकृष्ण ने बर्ताव किया और वैसा ही अर्जुन से भी करने के लिए कहा !
आक्षेप क्र. ३
श्रीकृष्ण ने गीता से जातिवाद को बढावा दिया !
श्रीकृष्ण इस जगत का पहला मनुष्य है जिसने जातिव्यवस्था निर्माण कर समाज में अराजकता फैलाई । गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम् ।’ (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ४, श्लोक १३), अर्थात ‘मैंने चार वर्णों का (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र का) समूह निर्माण किया ।’ श्रीकृष्ण के इस कथन से ही ‘अस्पृश्यता का जन्म हुआ है’, यह नहीं भुलाया जा सकता । जातिवाद को बढावा देनेवाली गीता और उसे बतानेवाला कृष्ण, इन दोनों को ही नकारना चाहिए । मानव में फूट डालनेवाले श्रीकृष्ण को पूजनीय कैसे कह सकते हैं ।
आक्षेप का खंडन
अ. श्रीकृष्ण दोषी नहीं, अपितु चातुर्वर्ण्य का विपरीत अर्थ लगानेवाले दोषी हैं !
समाज की अस्पृश्यता दूर करने का महान कार्य करनेवाले समाजसुधारक वीर सावरकर ने ‘केसरी’ में २.१२.१९३० को ‘सनातन धर्म, जातिभेद नहीं !’ इस शीर्षक के अंतर्गत एक लेख लिखा था । इस लेख में वे कहते हैं, ‘चातुर्वर्ण्य अर्थात चार वर्ण, ये गुणकर्मविभागश: ऐसा गीता में स्पष्ट किया है, यानी वेे वर्ण जन्मजात नहीं हैं । अपितु उसमें गुणकर्मों का उल्लेख है और लेशमात्र भी वंशपरंपरा नहीं है । अस्पृश्यता से समाज की धारणा नहीं होती । ‘जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात् द्विज उच्यते ।’ (स्कन्दपुराण, नागरखण्ड, अध्याय २३९, श्लोक ३१), अर्थात ‘कोई भी मनुष्य जन्म से शूद्र ही होता है । उस पर उपनयनादि संस्कार होने पर उसे ‘द्विज’ कहते हैं ।’
‘चातुर्वर्ण्य से अस्पृश्यता निर्माण हुई’, इस कथन का सच्चाई से दूर-दूर तक नाता नहीं है । यदि केवल ये चार वर्ण अस्तित्व में थे, तो पांचवां ‘अस्पृश्य’ वर्ण कैसे निर्माण हो गया ? एक पुरातन वचन है –
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः ।
चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रो नास्ति तु पञ्चमः ॥ – मनुस्मृति, अध्याय १०, श्लोक ४
अर्थ : ब्राह्मण, क्षत्रिय ओैर वैश्य, ये तीन वर्ण ‘द्विज’ अर्थात ‘दो जन्म वाला’ (उपनयनादि संस्कार यह ‘दूसरा जन्म’ माना जाता है) है; चौथा शूद्रवर्ण यह एक जन्म वाला है । इसके अतिरिक्त पांचवां वर्ण नहीं है ।
दूसरा वचन है, ‘कर्मक्रियाविभेदेन चातुर्वर्ण्यं प्रतिष्ठितम् ।’, अर्थात ‘कर्मक्रिया के भेद से चार वर्ण प्रस्थापित हुए ।’ ‘मनुष्य ने किस जाति में जन्म लिया ?’, इसका महत्त्व नहीं, ‘उसके गुण क्या हैं ?’, इसका महत्त्व है । चातुर्वर्ण्य का विपरीत अर्थ लगाकर जिन्होंने समाज में स्पृश्य-अस्पृश्यता का वाद निर्माण किया, दोष उनका है । श्रीकृष्ण ने जो बताया, उसमें दोष नहीं !
आ. ‘गीता धर्म’ यह ‘विश्व धर्म’ होने से गीता और श्रीकृष्ण को दोष देना योग्य नहीं !
इस संदर्भ में भूतपूर्व न्यायमूर्ति राम केशव रानडे कहते हैं, ‘श्रीकृष्ण ने कहा है ‘गीता धर्म’ ही ‘विश्व धर्म’ है । वह मानव धर्म है । इस शुद्ध सात्त्विक धर्म में अस्पृश्यता का गंदा पानी छोड दिया गया है । इसलिए ‘श्रीकृष्ण की धर्मगंगा को नाम रखना’, यह आत्मघात है । इसकी अपेक्षा ‘वह गंदा पानी छोडना बंद करना’, यही खरा धर्म है ।’
किसी को दूध पच न रहा हो, तो दोष दूध का नहीं, अपितु क्षीण पचनशक्ति का है । उसीप्रकार आक्षेप लेनेवालों को श्रीकृष्ण के विचारों को दोष देने के स्थान पर अपनी आकलनक्षमता ओैर विवेकशक्ति परिपक्व करनी चाहिए !
आक्षेप क्र. ४
श्रीकृष्ण ने धर्म का सूक्ष्म विचार और धर्म का रहस्य का जैसा चाहिए वैसा अर्थ लगाकर प्रत्येक बार पांडवों का पक्ष लिया !
इसका एक उदाहरण देंगे । कौरव-पांडव युद्ध में कर्ण ने युधिष्ठिर को पराजित किया । युधिष्ठिर रणभूमि छोडकर शिविर में लौट आए । कुछ समय में अर्जुन उनसे मिलने आए । कर्ण द्वारा पराजित होने से अपमानित हुए युधिष्ठिर अर्जुन से क्रोध में बोले, ‘‘इस गांडीव धनुष्य का तुम क्या करोगे ? किसी को दे दो !’’ अर्जुन ने पहले एक प्रतिज्ञा की थी कि जो भी मुझसे कहेगा कि अपना गांडीव धनुष्य ‘दूसरे को दे दो’, उसका मैं वध कर दूंगा । अपनी प्रतिज्ञा अनुसार अर्जुन युधिष्ठिर का वध करने के लिए आगे बढा । श्रीकृष्ण ने उसे रोका ।
‘अर्जुन, अयोग्य बर्ताव करनेवाले कौरवों से युद्ध करो’, ऐसा कहनेवाले श्रीकृष्ण अर्जुन को अयोग्य बर्ताव करनेवाले युधिष्ठिर का वध करने से परावृत्त करते हैं । फिर कौन सा कृष्ण सत्य है ?
आक्षेप का खंडन
अ. दुर्याेधनादि कौरवों समान गंभीर अपराध युधिष्ठिर से नहीं हुआ था !
धर्म के तत्त्व सूक्ष्म हैं । अब ऐसी कल्पना करो कि हम सभी बैठकर गपशप कर रहे हैं । इतने में ही एक घबराया हुआ व्यक्ति दौडते हुए आता है और हमसे कहता है कि ‘‘कुछ गुंडे मेरे पीछे लगे हैं । मैंने उन्हें खून करते हुए देखा है; इसलिए वे मेरा भी खून करना चाहते हैं । कृपया मुझे आश्रय दें ।’ हम उसे छिपने के लिए जगह देते हैं । इतने में ही वे गुंडे उसे ढूंढते हुए वहां पहुंच जाते हैं । ऐसी परिस्थिति में उस निरपराध मनुष्य को गुंडे को सौंप देंगे या असत्य बोलकर उसके प्राण बचाएंगे ? ऐसे समय पर धर्म का सूक्ष्म विचार कर असत्य बोलना ही श्रेयस्कर होता है; कारण ‘जिसमें प्राणिमात्र का हित है, वही सत्य है !’, ऐसी सत्य की एक व्याख्या है । इसलिए ‘गुंडों से असत्य बोलना’, यह लौकिक अर्थ से भले ही असत्य हो, तब भी धर्म की सूक्ष्म दृष्टि से वह असत्य नहीं !
भगवान श्रीकृष्ण को धर्म की सूक्ष्म दृष्टि थी; इसलिए वे अर्जुन को सगे और चचेरे, दोनों भाईयों के संदर्भ में, अलग-अलग निर्णय दिया । इससे ध्यान में आएगा कि ‘श्रीकृष्ण नितांत सत्य के पक्ष में निर्णय लेनेवाले हैं ।’ दुर्याेधन ने अनैतिकता की और अन्याय के मार्ग से पांडवों के राज्य पर अपना अधिकार प्रस्थापित किया था । वैसा गंभीर अपराध युधिष्ठिर से नहीं हुआ था, यह ध्यान में रखना चाहिए । इसलिए दुर्याेधन और युधिष्ठिर के कर्मों को एक ही तराजू में नहीं तौल सकते ।
आ. धर्म की बारीकियां जाननेवाले श्रीकृष्ण ने अर्जुन से युधिष्ठिर की निर्भत्सना (निंदा करना) करवाकर एक प्रकार से युधिष्ठिर का वध ही करवाया !
गांडीव धनुष्य के विषय में युधिष्ठिर के उद्गारों के कारण संतप्त अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा का पालन किया होता, तो बहुत बडा अनर्थ हो गया होता । उस अनर्थ को टालने के लिए श्रीकृष्ण ने अर्जुन को धर्म की बारीकियां समझाईं । उन्होंने अर्जुन से कहा, ‘हमसे आयु में बडे और मान-सम्मान में श्रेष्ठ व्यक्ति की निर्भत्सना करना, यानी उस व्यक्ति का वध करने समान है ।’ तब अर्जुन ने धर्मराज युधिष्ठिर की निर्भत्सना कर, एक प्रकार से उनका वध ही किया । इसप्रकार श्रीकृष्ण ने अर्जुन से प्रतिज्ञा का पालन करवा लिया ।
इ. ‘युधिष्ठिर की अवहेलना करनेवाला का मैं वध कर दूंगा’, ऐसी प्रतिज्ञा करनेवाले अर्जुन से भी श्रीकृष्ण ने आत्मप्रशंसा करवाकर एक प्रकार से अर्जुन का वध ही करवा दिया !
अर्जुन द्वारा युधिष्ठिर की निर्भत्सना करने की घटना से और एक प्रसंग निर्माण हुआ । ‘जो कोई युधिष्ठिर की निर्भत्सना करेगा, उसका मैं वध कर दूंगा’, ऐसी अर्जुन की एक और प्रतिज्ञा थी । अर्जुन सज्जन है । प्राण गए, तो चलेगा; परंतु अपने वचन और अपनी प्रतिज्ञा से सज्जन कभी मुंह नहीं मोडते । युधिष्ठिर की निर्भत्सना करने से अर्जुन ने (अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने के उद्देश्य से) स्वयं पर ही वार करने के लिए अपना खड्ग निकाल लिया । तब आत्महत्या करने के लिए तैयार अर्जुन को श्रीकृष्ण ने धर्म का रहस्य खुलकर बताया । श्रीकृष्ण बोले, ‘‘सज्जन व्यक्ति द्वारा अपनी ही प्रशंसा, स्वयं का वध करना ही है । तुम सज्जन हो; इसलिए तुम अपनी प्रशंसा करो, जो कि वध समान होगी ।’’ अर्जुन ने उस अनुसार अपना गुणगान किया । इसप्रकार श्रीकृष्ण ने अर्जुन से प्रतिज्ञा का पालन करवा लिया और उसे आत्महत्या करने से रोक दिया ।
किसी भी कृत्य के पीछे उद्देश्य महत्त्वपूर्ण होता है । झूठ बोलने से यदि किसी का कल्याण हो रहा हो, तो उस समय ‘झूठ बोलना’, ही कर्तव्य होता है । ‘शाब्दिक सत्य’ और ‘धार्मिक सत्य’ में भेद है । लौकिक अर्थ से कृष्ण कई बार झूठ बोले हों, परंतु धर्म की सूक्ष्म दृष्टि से वह झूठ नहीं था ।
आक्षेप क्र. ५
श्रीकृष्ण ने युद्ध के लिए दुर्योधन एवं अर्जुन, इन दोनों को ही सहायता देकर भयवश दोहरी नीति अपनाई !
युद्ध का प्रसंग आते ही श्रीकृष्ण ने कौरवों को अपनी सेना दी और पांडवों के पक्ष में स्वयं अकेले खडे रहे । पांडवों से यदि उन्हें स्नेह था तो फिर उन्होंने पांडवों की सहायता अपनी सेना सहित क्यों नहीं की ? या वे कौरवों से भयभीत थे ? श्रीकृष्ण को लगा कि‘यदि युद्ध में कौरव विजयी हुए, तो मेरी खैर नहीं । इसलिए सेना देना ही उचित होगा !’ श्रीकृष्ण ने कौरव एवं पांडवों, दोनों की ही सहायता कर दुहरी भूमिका क्यों अपनाई ?
आक्षेप का खंडन
अ. दुर्याेधन को ‘शस्त्र न उठाने की शपथ लेनेवाले श्रीकृष्ण’ नहीं; अपितु ‘श्रीकृष्ण की सेना’ही चाहिए थी !
महाभारत के काल में युद्धनीति के अंतर्गत एक प्रथा थी । युद्ध में अपने पक्ष में रहकर लडने के लिए सहायता मांगनेवालों में जो पहले कृष्ण के पास गया, कृष्ण को उसके पास जाना था । दुर्याेधन श्रीकृष्ण से सहायता मांगने गया । उस समय श्रीकृष्ण सो रहे थे । दुर्याेधन श्रीकृष्ण के शयनकक्ष में पहुंचा और उनके सिरहाने बैठ गया । तत्पश्चात अर्जुन पहुंचा और जाकर श्रीकृष्ण के चरणों के पास बैठ गया । जब श्रीकृष्ण उठे तो प्रथम उनकी दृष्टि अर्जुन पर पडी । अर्जुन दुर्याेधन से छोटा था । श्रुति (वेदवाक्य) कहते हैं, ‘छोटों की इच्छा प्रथम पूर्ण करनी चाहिए’, श्रीकृष्ण ने अपनी सहायता के दो भाग किए, एक ओर उनकी ‘नारायणी’ सेना और दूसरी ओर ‘शस्त्र धारण न करनेवाले श्रीकृष्ण (वे स्वयं)’, उन्होंने अर्जुन से पूछा ‘इन दोनों में से क्या चाहिए ?’ अर्जुन ने श्रीकृष्ण का चयन किया । दुर्याेधन ने सेना मांगी । (यह कथाभाग ‘१ ग १०. विलक्षण बुद्धिमान एवं चतुर’ इस सूत्र में दिया है ।)
आ. श्रीकृष्ण को कौरवों से भय लगता, तो वे शिष्टाचार निभाने उनकी राजसभा में जाते ही नहीं !
श्रीकृष्ण जानते थे कि ‘दुर्याेधन और अन्य कौरव कपटी और नीच हैं’, इसलिए वे सावधान भी थे । शांतिदूत बनकर गए श्रीकृष्ण को दुर्याेधनादि कौरवों ने बंदी बनाने का षड्यंत्र रचा था । इस षडयंत्र का समाचार मिलने पर श्रीकृष्ण के साथ गए सात्यकी और कृतवर्मा ने श्रीकृष्ण की सहायता के लिए पूरी ‘नारायणी’ सेना कौरवों के विरोध में खडी कर दी । यादवों की वह ढाई लाख सैनिकों की सेना देख श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का षडयंत्र मिट्टी में मिल गया ।
आक्षेप क्र. ६
श्रीकृष्ण सोलह सहस्र एक सौ आठ (१६,१०८) स्त्रियों के पति थे !
नरकासुर द्वारा बंदी बनाई गईं सर्व स्त्रियों को श्रीकृष्ण ने मुक्त किया और फिर उन सभी से विवाह किया ।
आक्षेप का खंडन
अ. पारमार्थिक उत्तर !
अथर्ववेद में ऐसा कहा है कि वेद और उपनिषदों में जो मंत्र हैं, वे परमात्मा की स्त्रियां हैं । ऋग्वेद में १०,५८०, अन्य वेदों में ४,३४८ और उपनिषदों में १,१८० मंत्र हैं और इन सभी को मिलाकर कुल १६,१०८ मंत्र होते हैं । यही श्रीकृष्ण परमात्मा की स्त्रियां हैं । यह पारमार्थिक उत्तर है ।
आ. श्रीकृष्ण ने उन स्त्रियों के पिता का स्थान लिया, पति का नहीं !
महाभारत में श्रीकृष्ण की ‘सोलह सहस्र एक सौ आठ स्त्रियाें का पति’, ऐसा उल्लेख पाया जाता है । ‘पति’ इस शब्द के संस्कृत में दो अर्थ हैं । एक अर्थ है ‘पति’ और दूसरा अर्थ है ‘पालनकर्ता’ ! श्रीकृष्ण ने नरकासुर के बंदिवास से उस स्त्रियों को मुक्त करने के पश्चात जब उनके अभिभावकों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया, तो वे अनाथ हो गईं । लडकियों की रक्षा करने का दायित्व उनके अभिभावकों का होता है । अत: इन अनाथ बालाओं का दायित्व श्रीकृष्ण ने ले लिया और वे उन स्त्रियों के अभिभावक बन गए । उन्होंने उनके पिता की स्थान लिया था, पति का नहीं ! आज भी हम ‘सभापति’, ‘राष्ट्रपति’, ऐसा कहते हैं, तब वह व्यक्ति सभा का अथवा राष्ट्र का पति नहीं अपितु, अभिभावक होता है ।
आक्षेप क्र. ७
श्रीकृष्ण के गोकुल में गोपियों से अनैतिक संबंध थे !
आक्षेप का खंडन
श्रीकृष्ण का गोपियों से संबंध ‘पुत्र’ एवं ‘माता’ का था !
यह आक्षेप हास्याजनक है । श्रीकृष्ण ने अपनी आयु के १२ वें वर्ष तक ही गोकुल में वास्तव्य किया था । उस समय गोकुल की सभी गोपियां माता यशोदा की आयु की थीं । गोपियों ने अपने पुत्र की भांति श्रीकृष्ण से प्रेम किया । भक्तिमार्ग में नारद ने उसे वात्सल्यभक्ति’ कहा है । वात्सल्यभाव अनैतिकता में नहीं आता । इसलिए गोपियों से श्रीकृष्ण का ‘मां’ एवं ‘पुत्र’ का पवित्र नाता था । कंसवध के लिए गोकुल से बाहर निकलने के पश्चात अपने निजधाम लौटने तक श्रीकृष्ण कभी भी गोकुल नहीं गए !
आक्षेप क्र. ८
श्रीकृष्ण ने गोमंत पर्वत पर मद्यप्राशन किया था !
‘हरिवंश’में ऐसा उल्लेख है कि ‘जरासंध के मथुरा पर चढाई करने पर एक बार वे युद्ध के समय श्रीकृष्ण और बलराम मथुरा छोडकर गोमंत पर्वत पर गए । वहां श्रीकृष्ण ने मद्यप्राशन किया ।’
आक्षेप का खंडन
श्रीकृष्ण ने नहीं, अपितु बलराम ने ‘वारुणी’का प्राशन किया जो कि मद्य नहीं अपितु ‘अमृत की जननी’ है !
‘हरिवंश’के विष्णुपर्व के अध्याय १४० में ऐसा कहा है कि ‘गोमंत पर्वत के रमणीय शिखर पर अकेले ही टहलने निकल गए बलराम कदंब वृक्ष की छाया में बैठे थे । वर्षा के कारण कदंब वृक्ष पर फूलों की बहार आई थी । उस वृक्ष के कुछ फूल उसी वृक्ष के कोटर में गिरते हैं । उन फूलों पर वर्षा का पानी पडने से उसके संयोग से जो पेय बनता है, उसे ‘वारुणी’ कहते हैं । बलराम ने इसी वारुणी का प्राशन किया ।’
वारुणी को ‘अमृत की जननी’ भी कहते हैं । वारुणी शक्तिवर्धक है । यह वारुणी श्रीकृष्ण ने नहीं, अपितु बलराम ने प्राशन की थी । वारुणी प्राशन करने से बलराम के शरीर में प्रचंड बल निर्माण हो गया । तदुपरांत उन्होंने जरासंध और उसकी सेना से जोरदार युद्ध कर, उसे पराजित किया । मद्य पीने के पश्चात मनुष्य अपने शरीर का संतुलन खो देता है और यहां तो बलराम ने पराक्रम दिखाया । इसलिए वारुणी की तुलना मद्य से करना, अर्थात अपना ही बौद्धिक दीवालियापन सिद्ध करने समान है !
आक्षेप क्र. ९
श्रीकृष्ण ‘रणछोडदास (भगोडा)’ है !
श्रीकृष्ण शूरवीर नहीं, अपितु वह कायर और भगोडा है । मथुरा पर जरासंध ने चढाई की, तब वह भाग गया । कालयवन मारने के लिए आया, तब भी वह भाग गया । कृष्णभक्त भी उसे ‘रणछोडदास’ कहते हैं । इसलिए यह सिद्ध होता है कि ‘कृष्ण भगोडा था !’
आक्षेप का खंडन
अ. कृष्णभक्त भगवान श्रीकृष्ण को ‘रणछोडदास’ भक्तिवश और प्रेम से कहते हैं !
भगवान श्रीकृष्ण का चरित्र सभी धर्मोंका मायका, कर्तव्य की ससुराल, संतों का अंतःकरण और पंतों का (संस्कृत पंडितों के लिए) रत्नभंडार है ! द्वारका में द्वारकाधीश का मंदिर है । इस मंदिर में श्रीकृष्ण का भजन करते समय सभी भक्त ‘रणछोडदास की जय ।’ ऐसी जयजयकार भक्तिभाव से करते हैं ।
आ. रणभूमि छोडकर भागने के पीछे श्रीकृष्ण का कालयवन को युक्ति से मारने का उद्देश्य था !
जरासंध ने मथुरा पर १७ बार आक्रमण किया । प्रत्येक बार श्रीकृष्ण ने उसे पराजित किया । १८ वीं बार जरासंध ने कालयवन को लेकर मथुरा पर चढाई की । कालयवन को देख श्रीकृष्ण भागने लगे । कालयवन उनका पीछा करने लगा । श्रीकृष्ण एक गुफा में गए । वहां राजा मुचकुंद सोए थे । इंद्रदेव ने ‘मुचकुंद राजा का वरदान दिया था कि जो भी राजा की निद्रा में व्यवधान लाएगा, उस पर राजा मुचकुंद की दृष्टि पडते ही वह जलकर भस्म हो जाएगा । श्रीकृष्ण ने सोए हुए मुचकुंद राजा के शरीर पर अपना उपरण डाल दिया । श्रीकृष्ण का पीछा करते-करते कालयवन गुफा में घुस गया । वहां उसने श्रीकृष्ण समझकर सोए हुए मुचकुंद राजा को लात मारी । इससे राजा की नींद टूटी और वह उठकर बैठ गया । उसकी दृष्टि कालयवन पर पडी और तत्काल कालयवन भस्मसात हो गया । इस प्रकार विशिष्ट उद्देश्य रखकर अपने शत्रु को इच्छित स्थान पर ले जाकर, उसका नाश करने में श्रीकृष्ण सफल हुए । कालयवन को मारने के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी शक्ति नहीं खर्च की । रणभूमि छोडकर भागने के पीछे श्रीकृष्ण की दूरदर्शिता और कुशलता प्रकट होती है; इसीलिए ‘रणछोडदास’ की उपाधि उन पर अच्छी लगती है !
इ. जरासंध द्वारा मथुरा पर बारंबार किए जा रहे युद्धों के कारण प्रजा को कष्ट न हो; इसलिए श्रीकृष्ण ने मथुरा से द्वारका स्थानांतर किया !
जरासंध द्वारा मथुरापर बारंबार किए जा रहे आक्रमणों के कारण वहांं की प्रजा को भी सतत युद्धजन्य परिस्थिति का सामना करना पडता था । हमेशा के युद्धों के कारण प्रजा को अब और अधिक कष्ट न हो; इसलिए श्रीकृष्ण ने मथुरा से द्वारका स्थनांतर किया । उन्होंने द्वारा नगरी बसाई । उस द्वारका नगरी के प्रमुख पद का सम्मान अपने पिता वसुदेव को दिया । बडे भाई बलराम को युवराजपद दिया । शूरवीर मित्र सात्यकी को सेनापति बनाया । गुरु सांदिपनी ऋषि को राजपुरोहित के रूप में सम्मानित किया । सत्ता हाथ में न रखते हुए (‘किंगमेकर’ न बनते हुए) वे सभी के दास हो गए । ऐसे सभी के दास बने श्रीकृष्ण भक्तों के लिए उनके परमप्रिय ‘रणछोडदास’ हैं ।
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भगवान श्रीकृष्ण संबंधी आलोचनाएं अथवा अनुचित विचार एवं उनका खंडन
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