रासायनिक अथवा जैविक कृषि नहीं, अपितु प्राकृतिक कृषि अपनाइए ! (भाग ३)

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रासायनिक अथवा जैविक कृषि नहीं, अपितु प्राकृतिक कृषि अपनाइए ! (भाग २)

१६.१२.२०२१ को आणंद, गुजरात में प्राकृतिक कृषि के विषय पर राष्ट्रीय परिषद संपन्न हुई । इस परिषद में गुजरात के मा. राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने प्राकृतिक कृषि पर अपने अनुभवकथन किए । लेख के पहले भाग में आचार्य देवव्रत रासायनिक एवं जैविक इन कृषि पद्धतियों से प्राकृतिक खेती की ओर कैसे मुडे, इसके साथ ही रासायनिक खेती करने से उनकी बटाई पर दी हुई १०० एकड भूमि कैसे बंजर हो गई, यह देखा । तब वे जैविक (सेंद्रिय) इस खेती पद्धति से प्राकृतिक खेती की ओर मुडे । अब देखते हैं अगला भाग !

 

१७. भूमि की उर्वरता खेती के लिए उपयुक्त सूक्ष्म जीवाणुओं के कार्य पर आधारित होना

भूमि में फॉस्फरस, यशद (जिंक), पोटैश, तांबे समान अनेक खनिज घटक होते हैं; परंतु ये घटक स्वयं ही वनस्पति को अन्न के रूप में उपलब्ध नहीं होते । केंचुए, इसके साथ ही भूमि के सूक्ष्म जीवाणु उन घटकों से अन्न निर्माण करते हैं और वनस्पतियों की जडों को देते हैं । इसका अर्थ है खेती में जितने सूक्ष्म जीवाणु होंगे, उतना ही जैविक कार्बन बढेगा । जैविक कार्बन की मात्रा जितनी बढती है, उतना ही भूमि अच्छी रहती है । भूमि जितनी अच्छी, जितनी स्वस्थ रहेगी, उतनी ही उसकी उत्पन्नता में वृद्धि होगी । ऐसा एक सीधा-सरल सूत्र है ।

 

१८. जैविक (सेंद्रिय) खेती के विदेशी केंचुए एवं प्राकृतिक खेती के भारतीय केंचुओं में अंतर

यूरिया, डीएपी जैसे रासायनिक खतों के उपयोग के कारण केंचुए घबराते हैं और वे भूमि में १५ फुट नीचे जाकर छिप जाते हैं । जब मिट्टी में घनजीवामृत मिलाया जाता है, तब उसकी गंध भूमि में फैलती है । इससे वे केंचुए पुन: ऊपर आते हैं और अपना कार्य आरंभ करते हैं । भारतीय केंचुए गोबर, काष्ठ (काडी-कचरा), इसके साथ ही मिट्टी भी खाते हैं; मात्र जैविक (सेंद्रिय) खेती में विदेशी केंचुओं का उपयोग किया जाता है, जो मिट्टी नहीं खाते । केवल गोबर और काष्ठ खाते हैं । ये विदेशी केंचुए १६ अंश सेल्सिअस से अल्प एवं २८ अंश सेल्सिअस के ऊपर के तापमानों में जीवित नहीं रह सकते । भारतीय केंचुए मात्र हिमाच्छादित पहडियों से लेकर रेतीले टीलों तक, एकसमान काम करते हैं । यह सब भगवान की व्यवस्था है !

 

१९. भारतीय केंचुओं से खेती को होनेवाले लाभ

१९ अ. केंचुओं के कार्य के कारण भूमि के वृक्षों के लिए आवश्यक पोषक तत्त्वों में वृद्धि होना

केंचुए भूमि में एक छिद्र कर सीधे दस फुट तक अंदर जाते हैं और दूसरे छिद्र से ऊपर आते हैं । जाते समय वे इन छिद्रों को अपने पसीने से (शरीर से निकलनेवाले विशिष्ट द्रव पदार्थ से) लीपते जाते हैं । इससे छिद्र शीघ्र बंद नहीं होते । इन छिद्रों से भूमि को प्राणवायु (ऑक्सीजन) मिलता है । केंचुए भूमि में विद्यमान खनिज खाकर, विष्ठा के रूप में उन्हें वनस्पति की जडों को देते हैं । केंचुओं की विष्ठा में सामान्य मिट्टी की तुलना में ५ गुना अधिक नाइट्रोजन, ९ गुना अधिक भास्वर (फास्फोरस) और ११ गुना अधिक पोटाश होता है । (नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश (पोटेशियम) पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक भूमि के बुनियादी (मूलभूत) पोषक तत्व हैं । – संकलक)

१९ आ. केंचुओं के कार्य के कारण भूपृष्ठ के नीचे के पानी के स्तर में वृद्धि होना

जब खेतों में प्राकृतिक खेती होती है, तब उस खेत में एकरी लाखों की संख्या में केंचुए होते हैं । ‘ये केंचुए रात-दिन कार्यरत रहेंगे, तो किसानों के लिए नि:शुल्क कितनी खाद तैयार करते होंगे’, इसकी कल्पना करें ! विनोदपूर्ण बात यह है कि ये केंचुए भूमि में इतने छिद्र निर्माण करते हैं कि वे गिने भी नहीं जा सकते । वर्षा आने पर वह पानी इन छिद्रों से सीधे भूगर्भ में जाता है और प्राकृतिकरूप से जल संसाधन होता है । जल संसाधन के लिए हम करोडों रुपए खर्च करते हैं; परंतु केंचुए हमारे लिए यह कार्य नि:शुल्क करते हैं । यह प्राकृतिक खेती सभी स्थानों पर करने पर, वर्षा का पानी भूमि में भली-भांति एकत्र जमा हो जाएगा और भूपृष्ठ के नीचे पानी का स्तर अपने आप बढ जाएगा । यह एक आश्चर्य है !

 

२०. प्राकृतिक खेती के आच्छादन तंत्र और उसके लाभ

२० अ. आच्छादन के कारण पानी की बचत होती है !

प्राकृतिक खेती का एक महत्त्वपूर्ण भाग है, वह है ‘आच्छादन’। खेत में जो भी घास हो, उसे जलाएं नहीं । (उसके आच्छादन करें, अर्थात उसे काटकर खेत में फैला दें ।) आज हम (घास जलाकर) प्रदूषण फैलाते हैं । मैं एक घास का गुच्छा तक नहीं जलाता । मैं तो अपने खेत में अन्यों से घास लाकर उसका आच्छादन बनाता हूं । दो पौधों के बीच में खुली जगह न छोडें । उसमें घास फैलाएं । (इसे आच्छादन कहते हैं ।) यह घास का आच्छादन वातावरण से पानी का अंश खींच लेता है और भूमि की नमी बनाए रखता है । इससे प्राकृतिक खेती में ५० प्रतिशत पानी का उपयोग न्यून हो जाता है ।

२० आ. वैश्विक तापमानवृद्धि की (ग्लोबल वार्मिंग की) समस्या पर आच्छादन एक उपाय होना

जब पृथ्वी का तापमान ३५ अंश सेल्सिअस होता है, तब मिट्टी की जैविक कर्ब खुलकर हवा में फैल जाती है और वह वैश्विक तापमान वृद्धि का (ग्लोबल वार्मिंग के लिए) कारण बनती है । यदि भूमि को घास से ढक दिया जाए, तो वह जैविक कर्ब भूमि में ही रहता है और इससे भूमि की उर्वरता बढती है ।

२० इ. आच्छादन के कारण खेत में देशी केंचुओं के कार्य में वृद्धि होना

केंचुए दिन में काम नहीं करते; कारण दिन में यदि वे भूमि के ऊपर आते हैं, तो पक्षी उन्हें उठा ले जाएंगे । केंचुओं को अपनी मृत्यु का भय होता है; इसलिए वे दिन में भूमि के अंदर छिपे रहते हैं । जब हम आच्छादन बनाते हैं (घास से भूमि को ढक देते हैं), तब केंचुओं को अंधकार मिलता है और पक्षियों को भी वे दिखाई नहीं देते । इससे केंचुए दिन-रात काम करते हैं । भगवान ने बिना कोई वेतन लिए ऐसे रात-दिन काम करनेवाले मजदूर किसानों के लिए भेजे हैं ।

२० ई. खेत के सूक्ष्मजीवाणुओं द्वारा आच्छादन का खाद में रूपांतर होना

खेत में जो सूक्ष्म जीवणु होते हैं, उनका आच्छादन एक अन्न है । जीवाणु उसे खाकर उसका खाद में रूपांतर करते हैं और भूमि की उर्वरता बढाते हैं ।

रासायनिक अथवा जैविक कृषि नहीं, अपितु प्राकृतिक कृषि अपनाइए ! (भाग ४)

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