प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता के संदर्भ में संतों का द्रष्टापन तथा उनका कार्य

‘पिछले कुछ वर्षों से समस्त विश्‍व प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता को अनुभव कर रहा है । इन प्राकृतिक आपदारूपी संकटों के संदर्भ में द्रष्टा संत कई वर्षों से समाज को सचेत कर रहे हैं और उनपर मात करने हेतु करने आवश्यक आध्यात्मिक उपायों के संदर्भ में मार्गदर्शन भी कर रहे हैं; किंतु समाज एवं शासनकर्ताओं द्वारा इस मार्गदर्शन की अक्षम्य उपेक्षा की जाने से सर्वत्र की मनुष्यजाति को बडी मात्रा में प्राकृतिक आपदाओं का दंश झेलना पड रहा है । जुलाई २०१९ से भारत के विविध राज्यों में आई बाढ संतों द्वारा की गई भविष्यवाणी के सत्य होने की मानो प्रतीति ही है । इस लेख में प्राकृतिक आपदाओं का वर्तमानकाल में भयानक स्वरूप, संतों द्वारा उनके संदर्भ में बताए गए सूत्र और उनका पालन न करने से उत्पन्न दुःस्थिति, साथ ही तीव्र संकटकाल में भी समष्टि की रक्षा हेतु संत किस प्रकार से कार्यरत हैं ?, इन सूत्रों को रखने का प्रयास किया गया है ।

 

१. प्राकृतिक आपदाओं का भयानक स्वरूप

१ अ. भारत की स्थिति

‘जुलाई २०१९ से हो रही अतिवृष्टि के कारण उत्पन्न स्थिति को यहां संक्षेप में रख रहे हैं ।

१ अ १. महाराष्ट्र

मुंबई के सांताक्रूज मौसम विभाग की प्रविष्टियों में १ जून से लेकर २ अगस्त २०१९ इन २ मासों की (महिनों की) कालावधि में २११७ मि.मी. वर्षा होने का निरीक्षण किया गया । वास्तव में मुंबई से जून से सितंबर इन ३ मासों में होनेवाली वर्षा का औसत २३१७ मि.मी. है । इसका अर्थ मुंबई में ३ मासों में होनेवाली वर्षा इस वर्ष २ मासों में ही हुई । इस वर्षाऋतु में मुंबई के उपनगरों में हुई वर्षा वहां की औसतन वर्षा की अपेक्षा ४९ प्रतिशत अधिक थी । महाराष्ट्र के ७६१ गांवों को भी इसी प्रकार की अतिवृष्टि का दंश झेलना पडा है, जिससे १४४ से भी अधिक लोगों की मृत्यु हुई और २ लाख ८५ सहस्र लोग बाढग्रस्त हुए । बाढ के कारण यातायात प्रभावित होने से प्रवासी गाडियां चलाना संभव न होने से राज्य के ‘महाराष्ट्र राज्य परिवहन विभाग’की १०० करोड रुपए की हानि हुई । इस वर्ष १ लाख हेक्टैर कृषिभूमि में जलभराव होने से किसानों की भी बहुत बडी हानि हुई । (संदर्भ : जालस्थल एवं दैनिक ‘सनातन प्रभात’)

१ अ २. कर्नाटक

८ अगस्त २०१९ को कर्नाटक में हुई वर्षा वहां एक दिन में होनेवाली औसतन वर्षा की अपेक्षा ५ गुना अधिक थी । इस दिन दक्षिण कर्नाटक के म्हैसुरू में हुई वर्षा वहां एक दिन में होनेवाली औसतन वर्षा की अपेक्षा ३२ प्रतिशत अधिक थी, तो उसी दिन उत्तर कर्नाटक के धारवाड में औसत की अपेक्षा २२ गुना अधिक वर्षा हुई । अगस्त के मध्यतक कर्नाटक के ७ जनपदों में वहां की औसतन वर्षा से दोगुनी वर्षा हुई है । कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने वर्षा के कारण २६ लोगों की मृत्यु होने की, तो राज्य के १ सहस्र गांवों में बाढ की स्थिति होने की जानकारी दी, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस वर्ष वर्षा के कारण विगत ४५ वर्षों में यह सबसे बडी आपदा है । बाढ के कारण सेना द्वारा २ लाख ७ सहस्र लोगों का स्थानांतरण किया गया और ६५० गांवों के ११ सहस्र घर नष्ट हुए हैं । देश में कॉफी के कुल उत्पादन में से ४० प्रतिशत उत्पादन अकेले कर्नाटक राज्य में होता है । वर्षा के कारण कॉफी की फसल को भी हानि पहुंची है । (संदर्भ : जालस्थल)

१ अ ३. केरल

केरल राज्य में बाढ एवं भूस्खलन के कारण संकटकालीन स्थिति बनी है । बाढ के कारण ८५ लोगों की मृत्यु हुई और ५३ लोग लापता है, तो भूस्खलन के कारण २८ लोगों की मृत्यु हुई है । २ लाख ५० सहस्र से भी अधिक लोगों ने सहायता शिविरों में आश्रय लिया है । मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन् ने ट्विट कर केरल में ३ दिनों में ८ जनपदों में ८० से भी अधिक स्थानों में भूस्खलन होने की जानकारी दी । (संदर्भ : जालस्थल)

१ अ ४. बिहार

बिहार राज्य में हुई अतिवृष्टि के कारण वहां के १३ जनपदों में बाढ आई है, उसमें १३० लोगों की मृत्यु हुई है, तो ८८ लाख ४६ सहस्र जनसंख्या बाढक्षेत्र में रह रही है । इस वर्ष हुई वर्षा से एक दिन में सर्वाधिक वर्षा होने का विगत ५४ वर्ष पुराना कीर्तिमान टूट गया है । (संदर्भ : जालस्थल)

१ अ ५. असम

असाम राज्य के ३ सहस्र २४ गांवों की ४४ लाख लोगों को बाढ का दंश झेलना पडा । १३ जुलाई २०१९ से लेकर १ मास में काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में बाढ के कारण १२० से भी अधिक प्राणिओं की मृत्यु हुई है । (संदर्भ : जालस्थल)

१ अ ६. गुजरात

इस वर्ष के जुलाई मास एवं अगस्त के पहले सप्ताहतक की कालावधि में हुई अतिवृष्टि के कारण गुजरात का वडोदरा नगर तथा उसके परिसर के गांवों में बाढ आई ।

३१ जुलाई २०१९ को केवल ६ घंटों में ही ४२४ मि.मी. वर्षा हुई । बाढ के कारण ८ लोगों की मृत्यु हुई और ६ सहस्र लोगों को स्थानांतरित किया गया । वडोदरा नगर में बाढ के पानी के साथ बडी संख्या में मगरमच्छ भी आए । उससे नागरिकों को संकट उत्पन्न हुआ । वहां के निवासी क्षेत्रों से २२ मगरमच्छ पकडे गए । (संदर्भ : जालस्थल)

१ आ. विश्‍व की स्थिति

१ आ १. नेपाल

जुलाई २०१९ से हुई अतिवृष्टि के कारण नेपाल के ३१ जनपद बाढग्रस्त हो चुके हैं । नेपाल के गृहमंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार वर्षा एवं भूस्खलन के कारण १०८ लोगों की मृत्यु हुई और ३३ लोग लापता हैं । (संदर्भ : जालस्थल)

१ आ २. बांग्ला देश

बांग्ला देश में आई बाढ में १४४ लोगों की मृत्यु हुई और ९५ लोग बाढ में बह गए । १० से २६ जुलाई २०१९ की कालावधि में बाढ की पानी के कारण फैले संक्रामक रोगों के कारण वहां से १४ सहस्र ७८१ लोग बीमार हैं । (संदर्भ : जालस्थल)

१ आ ३. न्यूयॉर्क

२३ जुलाई २०१९ को आए चक्रवाती तूफान के कारण बिजली आपूर्ति ठप्प होने से न्यू जर्सी के ३ लाख लोगों को बिना बिजली के रहना पडा । चक्रवाती तूफान के कारण बाढसदृश्य स्थिति बनने से ब्रूकलीन नगर के कुछ भागों में कमरतक जलभराव हुआ था । १३ जुलाई २०१९ को आई गर्म हवा की लहरों के कारण न्यूर्याक नगर के नागरिकों को अंधरे में (ब्लैकआऊट) रहना पडा ।

१ आ ४. विश्‍व के अन्य देश

पाकिस्तान, मध्य-पश्‍चिम अमेरिका, दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व अमेरिका, इंडोनेशिया के दक्षिण सुलावेसी, ऑस्ट्रिया के टाऊनस्विले आदि स्थानोंपर भी बाढ के कारण बडी मात्रा में आर्थिक एवं जीवितहानी हुई है ।

उक्त जानकारी से संपूर्ण विश्‍व में संकटकाल के कारण किस प्रकार से प्राकृतिक आपदाओं की घटनाओं में वृद्धि हो रही है, यह ध्यान में आता है ।

 

२. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का द्रष्टापन तथा उन्होंने
समाज में संकटकाल के संदर्भ में जागृति लाने हेतु किया हुआ कार्य

संत त्रिकालदर्शी होते हैं; इसलिए वे भविष्य में आनेवाले तीव्र संकटों के संदर्भ में समाज का मार्गदर्शन कर सकते हैं । सनातन संस्था के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी उच्च कोटि के समष्टि संत हैं । उन्हें ‘समाज का कल्याण होना चाहिए’, ऐसा लगता है । इसलिए वे वर्ष २००० से ही भविष्यकालीन संकटकाल के संदर्भ में समाज में विविध माध्यमों द्वारा जागृति ला रहे हैं और ‘साधना करना ही इस संकटकाल से बचने का एकमात्र मार्ग है’, ऐसा बता रहे हैं । यहां हम उनके द्वारा किए गए इस व्यापक कार्य का संक्षेप मैं ब्यौरा रखने का प्रयास कर रहे हैं ।

२ अ. प्राकृतिक आपदाओं से समाज को अपनी रक्षा करना संभव हो; इसके लिए निर्मित ग्रंथमाला

संकटकाल में व्यक्ति को स्वयं की रक्षा कर दूसरों की भी सहायता करना संभव हो; इसके लिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने संकटकाल के लिए उपयोगी विविध उपायों का ज्ञान प्रदान करनेवाली ग्रंथमाला बनाई है । इसके अंतर्गत जुलाई २०१९ तक विविध विषयोंपर २१ ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं । इसमें स्वयं को होनेवाले शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तर के कष्टों के निवारण हेतु बिंदुदाबन चिकित्सा, संमोहन चिकित्सा, योगासन, देवताओं के नामजप एवं बीजमंत्र, खाली खोकों के उपाय आदि विषयोंपर आधारित ग्रंथ प्रकाशित किए गए हैं । इसके साथ ही संकटकाल में स्वयं की तथा दूसरों की सहायता करने हेतु अग्निशमन, प्राथमिक चिकित्सा, संकटकालीन सहायता, औषधिय वनस्पतियों की बोआई और अग्निहोत्र इन विषयोंपर भी ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं ।

२ आ. संकटकाल की तीव्रता समाज के ध्यान में आए; इसके लिए दैनिक ‘सनातन प्रभात’में लेख लिखना

दैनिक समाजजागृति का एक प्रमुख माध्यम है । दैनिक ‘सनातन प्रभात’ में समाज को संकटकाल की तीव्रता से अवगत करानेवाले तथा संकटकाल के लिए उपाय बतानेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के कई लेख प्रकाशित हुए हैं । उनमें से कुछ प्रमुख लेखों के नाम और उन लेखों का सार नीचे दिया गया है ।

२ आ १. संकटों से रक्षा हेतु व्यष्टि साधना अर्थात भक्ति को बढाने हेतु मार्गदर्शन करना

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने वर्ष २०१५ में नेपाल का भूकंप; अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रान्स आदि विकसित देशोंपर हुए आतंकी आक्रमण, भारत के चेन्नई में हुई अतिवृष्टि आदि घटनों के पश्‍चात ‘साधना न करनेवाले राज्यकर्ता जनता की रक्षा नहीं कर सकते; इसलिए ईश्‍वर के भक्त बनें !’ यह लेख लिखा था । उसमें उन्होंने ‘संकटकाल में अपनी रक्षा हेतु साधकों को साधना बढाकर ईश्‍वर का भक्त बनना आवश्यक है’, यह संदेश दिया था ।

२ आ २. विविध संकट एवं आक्रमणों से रक्षा हेतु ‘समष्टि साधना अर्थात संगठित होकर कार्य करने’ का आवाहन करना

वर्ष २०१७ में परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने ‘क्या ये घटनाएं आनेवाले भयानक संकटकाल का आरंभ नहीं है ?’, इस शीर्षकवाला लेख लिखा था । ११ जून २०१७ को दिवशी दैनिक ‘सनातन प्रभात’में प्रकाशित इस लेख में उन्होंने असुरक्षित समाजजीवन, आंतकवादी संकटों और प्राकृतिक आपदाओं का विवेचन कर उनका सामना करने हेतु हिन्दुओं का संगठित होकर कार्य करने का आवाहन किया है ।

२ आ ३. संकटकाल से रक्षा हेतु व्यष्टि एवं समष्टि इन दोनों स्तरोंपर करने आवश्यक प्रयासों के संदर्भ में प्रायोगिक स्तरपर मार्गदर्शन करना

६ जनवरी २०१९ के दैनिक ‘सनातन प्रभात’में ‘भावी विभिषिक संकटकाल का सामना करने हेतु विविध स्तरोंपर अभी से ही सिद्धता करें !’ यह लेख लिखा था । संकटकाल में चक्रवाती तूफान, भूकंप आदि के कारण बिजली आपूर्ति बंद पड जाती है । पेट्रोल, डिजल आदि की किल्लत होने से यातायात व्यवस्था भी ठप्प हो जाती है । उसके कारण रसोई गैस, खाने-पीने की वस्तुएं आदि लंबे समयतक नहीं मिलती अथवा उनकी नियंत्रित आपूर्ति (रेशनिंग) की जाती है । संकटकाल में डॉक्टर, वैद्य, औषधियां, चिकित्सालय आदि का उपलब्ध होना लगभग असंभव ही होता है । इन सभी को ध्यान में लेते हुए संकटकाल का सामना करने हेतु सभी को शारीरिक, मानसिक, पारिवारीक, आर्थिक, आध्यात्मिक इत्यादि स्तरोंपर करनी आवश्यक पूर्वसिद्धता के संदर्भ में परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने इस लेख से मार्गदर्शन किया है ।

जुलाई एवं अगस्त २०१९ में महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल एवं अन्य कुछ राज्यों में आई बाढ में उक्त लेखों में दिए जाने के अनुसार विदारक स्थिति उत्पन्न होने का ध्यान में आता है । इसीलिए द्रष्टा संतों के द्वारा काल के अनुसार बताए जा रहे सूत्रों का पालन करना कितना महत्त्वपूर्ण है, यह ध्यान में आता है ।

 

३. प्राकृतिक आपदा एवं युद्ध से रक्षा होने हेतु ‘साधना करना’ ही एकमात्र विकल्प !

इससे यह ध्यान में आता है कि विश्‍वभर में आईं विविध प्राकृतिक आपदाएं और मनुष्यनिर्मित आपदाओं के पीछे बढा हुआ रज-तम ही प्रमुख कारण है । मनुष्य जब संत अथवा गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार साधना करता है, तब उसकी सात्त्विकता बढती है और विविध आपदाओं से उसकी रक्षा की संभावना बढती है । अधिकांश जीव एवं राजनेता रज-तमप्रधान होने से वे संत अथवा गुरु के मार्गदर्शन की अनदेखी करते हैं । इस लेख के माध्यम से समाज एवं राज्यकर्ताओं को संत अथवा गुर के आज्ञापालन की बुद्धि उत्पन्न हो और वे साधना की दिशा में अग्रसर हों, यह ईश्‍वर के चरणों में प्रार्थना !’

– कु. प्रियांका लोटलीकर, महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय, गोवा. (१४.८.२०१९)

 

साधना करनेवाले जीवों की रक्षा हेतु संतों द्वारा चल रहा कार्य

साधना करनेवाले जीव ईश्‍वर को प्रिय होते हैं । श्रीमद् भगवद्गीता में अर्जुन को उपदेश देते हुए श्रीकृष्णजी बताते हैं, ‘न मे भक्तः प्रणश्यति ।’ (अर्थ : मेरे भक्तों का नाश नहीं होता ।) इसके कारण साधना करनेवाले जीवों की रक्षा हेतु ईश्‍वर संतों के माध्यम से कार्य करते हैं । प्राकृति आपदाएं अर्थात पंचमहाभूतों के प्रकोप से साधकों की रक्षा हो; इसके लिए पुणे के महान संत प.पू. आबा उपाध्येजी ने पंचमहाभूतों की शांति हेतु (पृथ्वी, आप, तेज, वायु एवं आकाश के लिए) यज्ञ करने का निर्देश दिया । उसके अनुसार २६.७.२०१९ को सनातन के रामनाथी आश्रम में ‘पंचमहाभूत यज्ञ’ किया गया ।

१. यज्ञ का महत्त्व

‘यज्ञं से मनुष्य के शरीर के इर्द-गिर्द तथा वायुमंडल में दैवीय स्पंदनों के सूक्ष्म कोष उत्पन्न होते हैं । ये कोष रक्षाकवच की भांति कार्य करते हैं; इसलिए प्राकृतिक आपदाएं एवं तिसरे महायुद्ध जैसे विभिषिक संहार से जीव की रक्षा होती है ।

२. प्राकृतिक आपदा एवं परमाणु बम के विस्फोट के कारण
प्राणशक्ति का भूमंडल की ओर न आने से जीवसृष्टि का लोप होना आरंभ हो जाना

आनेवाले समय में मनुष्यजाति का अतिवृष्टि, अनावृष्टि, उष्माघात, भूकंप, चक्रवाती तूफान आदि प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पडेगा । उसके पश्‍चात आरंभ होनेवाले तिसरे महायुद्ध में परमाणु बम के प्रयोग के कारण पृथ्वीपर बडी मात्रा में संहार होगा । परमाणु बम के उपयोग के कारण वायुमंडल में बडी मात्रा में तेजतत्त्व, वायुतत्त्व और आकाशतत्त्व के स्तरपर रज-तमजन्य तरंगों का प्रक्षेपण होता है ।

इस प्रकार से संकटकाल में विविध कारणों से उत्पन्न होनेवाली संहारक ऊर्जा वैश्‍विक मंडल को भेदती है । उससे वैश्‍विक मंडल से प्राणशक्ति के स्पंदन भूमंडल की ओर आने में बाधा उत्पन्न होने से उसका प्रत्यक्ष परिणाम जीवसृष्टि अके सभी प्राणिमात्रोंपर होकर धीरे-धीरे जीवसृष्टि नाश की ओर अग्रसर होती है ।

३. सृष्टिपर ‘पंचमहाभूत यज्ञ’के होनेवाले परिणामों
के संदर्भ में कु. प्रियांका लोटलीकर द्वारा किया गया सूक्ष्म-परीक्षण

‘पंचमहाभूत यज्ञ’से उत्पन्न होनेवाले तेजतरंग वैश्‍विक मंडलतक पहुंचते हैं और जीवसृष्टि के लिए आवश्यक प्राणशक्ति के तरंगों को खींचकर भूमंडलपर लाते हैं । इस यज्ञ से उत्पन्न होनेवाले चैतन्यमय तरंग तेज, वायु एवं आकाश इन तत्त्वों के स्तरपर आक्रमण करनेवाले रज-तम तरंगों का उन्हीं तत्त्वों के बलपर उच्चाटन करते हैं । अतः प्राकृतिक आपदा एवं परमाणु बम के विस्फोट के कारण उत्पन्न रज-तम नष्ट होने में सहायता मिलती है । ‘पंचमहाभूत यज्ञ’ करने से वातावरण में सात्त्विकता बढकर उससे रज-तम का उच्चाटन होने से साधकों की रक्षा होने में सहायता मिलती है ।

आनेवाले संकटकाल में संतों की कृपा एवं उनके द्वारा बताए गए उपाय करने से साधकों को जीवनदान मिलकर उनकी रक्षा होगी ।’

– कु. प्रियांका लोटलीकर, महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय, गोवा. (२६.७.२०१९)
स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात