शरीर के पोषण हेतु ‘मक्खन’!

‘मक्खन’ अथवा माखन शब्द का उच्चारण करते ही स्वाभाविकरूप से समस्त भारतीयों की आंखों के सामने उभर आती है उस नटखट बालकृष्ण की छवि ! असीम सुंदरता की मूर्ति बालकृष्ण के माखनसहित विविध दृश्य मानसपटल पर छा जाते हैं । घुटनों के बल रेंगते हुए, माखन की मटकी तक पहुंचकर चाव से खानेवाले बालकृष्ण,  दूध-दही और माखन देनेवाली गायें और उनके बछडों पर अत्यधिक प्रेम करनेवाले बालकृष्ण, ऐसे हैं उनके विविध मनमोहक रूप । उत्तर भारत में तो कान्हा माखनचोर नंदकिशोर के रूप में प्रसिद्ध हुए हैं । माखन और भगवान का अत्यंत मधुर संबंध है । इसीलिए भारतीयों का भी माखन के साथ अनोखा भावनिक संबंध बना है । वैसे तो सभी दुग्धजन्य पदार्थ छोटे बच्चे, युवक और वयस्क लोगों के स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त होते हैं, फिर भी उस मुरलीधर ने माखन को इतना विशेष सम्मान क्यों किया है ?

माखन के लिए ‘नवनीत’ भी एक वैकल्पिक शब्द है । ‘दिने दिने यत् नवतामुपैति इति नवनीतम्’ इसका अर्थ जो प्रतिदिन नई उत्पन्न करता है और नया लगता है, वह नवनीत है ! शरीर में प्रवेशित माखन प्रतिदिन नई और तरुण धातुओं की उत्पत्ति कर शरीर की सुंदरता बढाता है; इसलिए उसे नवनीत कहा जाता है । केवल हमारे देश में ही नहीं, अपितु विश्‍व में अन्यत्र फैली और प्राचीन परंपरावाले सभी समुदायों में माखन को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है । डॉ. वेस्टन प्राईस द्वारा वर्ष १९३० में किए गए अध्ययन के अनुसार विश्‍व के स्वास्थ्यसंपन्न और दीर्घायु समुदायों के आहार में माखन का प्रधानता से सेवन किया जाता है । स्विजरर्लेंड के चर्च में माखन को दैवीय पदार्थ के रूप में गौरवान्वित किया जाता है । अरबी लोगों में भी माखन को सम्मान का स्थान है । अमेरिका के पुराने जानकार लोगों में यह श्रद्धा है कि माखन पर पले-बढे बच्चे अधिक शक्तिशाली होते हैं ।

 

माखन के गुणधर्म एवं उपयोग

माखन स्वाद में मधुर, स्वाद में ठंडा और स्निग्ध होता है तथा वह हृदय के लिए हितकारी है । पश्‍चिमी देशों के मतानुसार, माखन में विद्यमान विटामिन ‘ए’, एड्रनल ग्लैंड और थाईरॉईड ग्लैंड का काम सुचारू रखता है । उससे रक्ताभिसरण तंत्र और हृदय का काम भी सुचारूरूप से चलता है । वीटामिन ‘ए’ कम होने से बालक के हृदय में जन्म से ही कुछ विकृतियां उत्पन्न हो सकती हैं । माखन विटामिन ‘ए’ का सबसे अधिक प्राकृतिक और शरीर के लिए स्वीकारार्ह (absorbable) पदार्थ है । सहस्रों वर्षों से वैद्य गर्भवती महिलाओं को चौथे महीने से माखन खाने का सुझाव देते हैं; क्योंकि माता के गर्भ में पनप रहे शिशु का चौथे महीने में हृदय बनता है ।

 

माखन और कोलेस्ट्रॉल

माखन में ‘लेसिथीन’ नामक एक घटक होता है, जिससे शरीर में कोलेस्ट्रॉल का उचित संतुलन बना रहता है । माखन में अनेक प्रकार के एंटीऑक्सिडंटस होते हैं, जिनसे शरीर की फ्री रैडिकल्स से रक्षा होती है । फ्री रैडिकल्स के कारण रक्तवाहिनियों को होनेवाले कष्ट से माखन का कवच बचाता है । माखन में विद्यमान वीटामिन ‘ए’ और ‘इ’, ये दोनों घटक शरीर को एंटीऑक्सिडेंट की आपूर्ति करते हैं । सेलेनियम नामक एंटीऑक्सिडेंट की माखन में विद्यमान मात्रा अन्य पदार्थों की तुलना में अधिक है । माखन शरीर के लिए आवश्यक अच्छे कोलेस्ट्रॉल का एक उत्तम स्रोत है ।

 

माखन और कर्करोग

माखन में विद्यमान समृद्ध छोटे (शॉर्ट) और मध्यम (मीडियम) चेन फैटी एसिड के कारण उसमें कर्करोग के विरुद्ध कार्य करने की क्षमता है । माखन  में विद्यमान Conjugated Linoleic Acid के कारण भी शरीर को कर्करोग के प्रति उत्तम प्रतिकारक्षमता प्राप्त होती है । माखन में विद्यमान एंटीऑक्सिडेंट्सवाले विटामिन ए, विटामिन इ, सेलेनियम और कोलेस्ट्रॉल भी कर्करोग का उत्तम प्रतिकार कर सकते हैं ।

 

रोगप्रतिकारक क्षमता उत्तम बनी रहनेे हेतु माखन उपयोगी

माखन खाने से शरीर की प्रतिकारक्षमता उत्तम बनी रहती है । इसीलिए गोकुल के भावी नागरिक बाल-गोपालों को भगवान ने माखन खाने में रुचि उत्पन्न कर, उनके स्वस्थ-सुदृढ रहने का मार्ग प्रशस्त किया ।

 

जोडों के दर्द की रोकथाम हेतु माखन उपयुक्त

मनुष्य की आयु बढने पर उसके जोडों में शुष्कता आने लगती है । तब उनके एक-दूसरेपर रगडे से, जोडों की हड्डियां कमजोर होने लगती हैं । शुष्कता के कारण जोडों को रक्त की आपूर्ति करनेवाली रक्तवाहिनियां कडक बन जाती हैं । हड्डियों में कैल्शियम जमा हो जाता है, जिससे जो कोमल (नरम) होने चाहिए, वे कडक बन जाते हैं और हड्डियां खोखली बनने लगती हैं । इनमें से कोई भी विकृति आनेपर जोडों का दर्द आरंभ होता है । नियमितरूप से माखन खाने से इन सभी विकृतियों को टाला जा सकता है । दूध का पाश्‍चराईजेशन करते समय दूध में विद्यमान स्निग्धांश नष्ट होता है । ऐसा दूध पीने से आगे जाकर निश्‍चितरूप से जोडों का दर्द आरंभ हो सकता है; परंतु आहार में माखन अंतर्भूत करने से यह कष्ट टाला जा सकता है ।

 

दातों के लिए माखन

आजकल आहार में मैदे से बने पदार्थ, बेकरी के मीठे पदार्थ, चॉकलेट्स, दातों को चिपककर रहनेवाला फास्ट फूड, जंक फूड इत्यादि की मात्रा अधिक है । ये पदार्थ सहजता से उपलब्ध होने के कारण उन्हें बार-बार खाया जाता है । परंतु प्रत्येक बार कुल्ला कर, दांत स्वच्छ नहीं किए जाते । दांतों का घिसना और उनमें लगनेवाली कीड का प्रतिकार करने का सामर्थ्य घरेलु पद्धति से बनाए जानेवाले देशी गाय के घी में है ।

 

माखन : आयोडिन का एक उत्तम स्रोत

माखन आयोडिन का एक उत्तम स्रोत है । मुख्य बात यह कि इसमें विद्यमान ‘आयोडिन’ पचने में,  ग्रहण एवं उपयोग में लाने हेतु अत्यंत सरल है । पर्वतीय प्रदेश समुद्र से दूर होते हैं । जहां सहजता से आयोडिनयुक्त नमक नहीं मिलता, वहांं माखन उपयुक्त होता है ।

 

माखन और पाचनतंत्र

आयुर्वेद के अनुसार माखन अग्निप्रदीप्त करनेवाला और स्वाद में स्वादिष्ट होता है । नए शोध के अनुसार माखन के कारण पाचनतंत्र की अनेक प्रकार के कीटाणुओं से रक्षा होती है । माखन में उत्तम जीवाणुरोधक प्रक्रिया (एंटीफंगल एक्टिविटी ) है । उसके कारण चिकित्सा के लिए कठिन फफूनजन्य संक्रमण (फंगल इन्फेक्शन) का माखन प्रतिकार कर सकता है ।

 

माखन : बच्चों के लिए अमृत

आजकल प्रीमैच्युयर बर्थ एक बडी समस्या बन गई है । माता के गर्भ में ९ माह पूर्ण होने से पहले ही, ६-७ अथवा ८ वें महीने ही शिशु का जन्म हो जाता है । ऐसे बच्चों का पर्याप्त शारीरिक विकास नहीं होता है । माता के गर्भ में शिशु का जिस गति से विकास होता है, वह गति जन्म के पश्‍चात नहीं रहती । इसके साथ ही अधूरे विकासवाले शिशु में विविध रोग उत्पन्न होते हैं, जिससे उसका विकास और अधिक मंद हो जाता है । उसका वजन नहीं बढता और बुद्धि का भी पर्याप्त विकास नहीं होता । उनमें रोगप्रतिकारक क्षमता अल्प होती है । इसके लिए माखन सबसे उत्तम है ! शिशु का सर्वांगीण विकास होकर सुदृढ और उसके बुद्धि को तीक्ष्ण बनाने का काम माखन करता है ।

 

आंखों के लिए माखन

आयुर्वेद के अनुसार माखन आंखों के लिए हितकारी है । अतः आंखों के विकारों पर दी जानेवाली औषधियों को माखन के साथ खाने के लिए कहा जाता है । आजकल छोटे बच्चों में चश्मे का प्रोग्रेसिव नंबर होने की घटनाएं बहुत बढी हैं । पश्‍चिमी चिकित्सकीय शास्त्र को इसका कोई ठोस उपाय नहीं मिला है । इसके साथ ही ढलती आयु में धुंधुला दिखाई देना, मोतियाबिंद जैसी समस्याएं लगभग ४० वर्ष की आयु में ही होने लगती हैं । पहले घर-घर में गोधन होता था । उससे बच्चे, कुमार, किशोर, युवा और प्रौढ सभी माखन खाते थे; इससे स्वाभाविकरूप से प्राकृतिक समस्याओं की मात्रा बहुत अल्प थी । आयु के ९० वर्षतक भी चश्मा न लगानेवाली पीढी इसी माखन पर पली-बढी थी । आज भी माखन का कोई दूसरा विकल्प नहीं है ।

 

प्रजनन हेतु मक्खन

प्रजननक्षम महिलाओं में ‘पीसीओडी’, तो पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या अल्प होने की मात्रा आजकल बहुत बढ गई है । शहरों के ७० प्रतिशत से भी अधिक युवकों को पहली संतान होने हेतु चिकित्सा कर लेनी पडती है । बचपन से ही आहार में माखन अंतर्भूत करने से युवावस्था में होनेवाले इस विकार को टाला जा सकता है ।

 

पक्षाघात में माखन

पक्षाघात के विकार में शरीर का कोई अंग अथवा कोई पक्ष अथवा आधा शरीर लूला पड जाता है । पश्‍चिमी पद्धति में इसका फिजियोथेरपी के अतिरिक्त अन्य कोई चिकित्सा उपलब्ध नहीं है; परंतु स्नायुयों में फिजियोथेरपी करने हेतु आवश्यक बल आने हेतु किसी भी प्रकार के उपाय नहीं किए जाते । यह काम माखन करता है; इसलिए इस विकार में आहार में माखन अंतर्भूत होना आवश्यक होता है ।

 

रक्तपित्त में मक्खन उपयुक्त

बुखार की व्याधि के पश्‍चात शरीर के किसी भी भाग से होनेवाले रक्तस्राव को शास्त्रों में रक्तपित्त कहा गया है । इस विकार में माखन रक्त और पित्त, इन दोनों का शमन कर रक्तस्राव रोकने में सहायक होता है । माखन में विद्यमान स्निग्धता के कारण रोगी का बल भी उत्तम रखा जाता है । माखन के कारण नई कोशिकाएं बनने में सहायता मिलती है ।

सभी आयुसमूह के लोगों के स्वास्थ्य में माखन का योगदान महत्त्वपूर्ण है । माखन के नामपर बाजार में मिलनेवाला बटर उचित नहीं है । बाजार में मिलनेवाले अधिकांश बटर (किसी अपवाद को छोडकर) अर्थात किसी भी गाय का दूध मिलाकर बनाया जानेवाला क्रीम होता है । (उसके लिए उसके आवरणपर दिए गए विवरण पढें ।) हमें चाहिए देशी गाय के दूध की मलाई के साथ मोरन लगाकर और दही को हिलाकर बनाया गया माखन ! इनमें से सभी लाभ केवल मक्खन के ही हैं !

देशभर के समस्त बच्चे गोपालों की भांति माखन में पलें-बढें, ऐसी स्थिति लाने के लिए हमें यथाशीघ्र प्रयास करने चाहिए । आज अनेक लोग इसके लिए प्रयासरत हैं । आप भी उसमें सहभागी हों !’

– वैद्या सुचित्रा कुलकर्णी (दैनिक तरुण भारत)