दृष्टिहीन संत सूरदासजी की भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य भक्ति के दर्शन !

 

१. पुजारी, अर्चनक (पूजा करनेवाला) और गोस्वामी के
बच्चों में एक दिन सूरदासजी की अद्भुत प्रतिभा के बारे में चर्चा होना

‘सूरदासजी ने प्रभु श्रीकृष्ण की नित्यनूतन पदों से शब्दपूजा करने का अपना नित्यक्रम जारी रखा । एक दिन पुजारी, अर्चनक (पूजा करनेवाला) और गोस्वामी के बच्चों में सूरदासजी की अद्भुत प्रतिभा के बारे में चर्चा प्रारंभ हुई । कहने लगे, ‘जिनकी बुद्धि सूक्ष्म तथा व्यापक है, ऐसे सूरदासजी के पास अंतर्दृष्टि अवश्य होगी । क्या बिना उसके वे भगवान के नित्यनूतन शृंगार का वास्तविक वर्णन कर सकते हैं ? सूरदासजी दृष्टिहीन अवश्य हैं, तब भी वे भगवान श्रीकृष्ण की वेशभूषा, अलंकार, आभूषण, पुष्प इत्यादि का वर्णन अपने पदों में बारीकियों से करते हैं । वे यह सब कैसे कर पाते हैं ?’

 

२. बच्चों द्वारा सूरदासजी की दिव्य दृष्टि की परीक्षा लेना निश्‍चित करना

‘‘उसमें कौनसी बडी बात है ? भगवान श्रीकृष्ण की नित्य वेशभूषा तो वे जानते ही होंगे न ? उसमें नित्य कुछ-कुछ परिवर्तन तो होता ही है । जो यह जानता है, उसे यह बताना कठिन बात थोडे ही है ? जिसकी स्वप्न में भी कोई कल्पना नहीं कर पाएगा, ऐसे अपरिचित रूप में हम भगवान श्रीकृष्ण की वेशभूषा करेंगे और फिर सूरदासजी को पद गाने को कहेंगे । यह बात किसी को पता न चले । तब जाकर सूरदासजी की दिव्य दृष्टि की परीक्षा होगी ।’’

 

३. सूरदासजी के प्रति नितांत श्रद्धा रखनेवाले गिरिधर का उनकी दिव्य दृष्टि की
परीक्षा का आरंभ में विरोध करना; परंतु पश्‍चात परीक्षा करने को सहमति दर्शाना

सूरदासजी की उत्कट भक्ति, अद्भुत प्रतिभा एवं व्यक्तित्व पर नितांत श्रद्धा रखनेवाले गिरिधर ने इसका विरोध किया । उसने कहा, ‘‘सूरदासजी जगद्वंदनीय साधुपुरुष हैं । महान कृष्णभक्त हैं । भगवान को कैसा भी शृंगार करें, कोई भी अलंकार, आभूषण पहनाएं; स्वर्ग से भी आभूषण तथा वस्त्र लाएं, तब भी महान सूरदासजी जैसा है वैसा वर्णन करेंगे । भगवद्भक्ति की निंदा करना ठीक नहीं । आप लोगों पर ही यह सब पलट जाएगा ।’’

बच्चों ने कहा, ‘‘क्या हम सूरदासजी का अनादर करना चाहते हैं ? उनकी निंदा करने का हमारा कोई उद्देश्य नहीं है । सूरदासजी यदि अचूकता से वर्णन करेंगे, तो हमारी श्रद्धा अधिक दृढ होगी ।’’ सूरदासजी के उत्कट भक्ति-सामर्थ्य के प्रति गिरिधर की पूर्ण श्रद्धा थी । उसने सहमति दर्शाई । स्वप्न में भी कोई कल्पना नहीं कर पाएगा, ऐसा अद्भुत, अभूतपूर्व साजशृंगार करना निश्‍चित किया गया ।

 

४. बच्चों द्वारा श्रीकृष्ण मूर्ति को पुष्प और अलंकारों से शृंगारित करना

पौ फटने से पहले ही बच्चों ने स्नान किया । संध्यादि नित्यकर्म पूर्ण किए और भगवान की पूजा भी की । आषाढ का माह था ! बहुत उमस थी । उन्होंने निर्णय किया कि ‘भगवान की मूर्ति को कोई वस्त्र नहीं पहनाएंगे ।’ उन्होंने कन्हैया के मस्तक पर पुष्पमाला का शिरोभूषण पहनाया । चमकनेवाली मोतियों की तेजस्वी माला पहनाई । कमर में स्वर्ण का कटिबंध पहनाया । पैरों में सुंदर नयनरम्य नूपुर चढाए । भालप्रदेश पर सुरम्य तिलक लगाया । कर्णफूल पहनाए । बस, इतना ही किया भगवान श्रीकृष्ण का साजशृंगार ! वस्त्रों का तो कुछ पता ही नहीं था ।

 

५. श्रीकृष्ण से क्षणार्ध के लिए भी विभक्त न होनेवाले
सूरदासजी ने श्रीकृष्ण का अद्भुत शृंगार अंतःचक्षुओं से तुरंत पहचाना

भगवान श्रीकृष्ण से क्षणार्ध के लिए भी विभक्त न होनेवाले अनन्य भक्त सूरदास नित्य की भांति मंदिर में आए । कृष्णचरणों में वे अनन्य थे ! उनका सारा चित्त भगवान के चरणों में शरण आया था ! उनके अंतःचक्षुओं के सामने साक्षात कृष्णमूर्ति खडी थी । उन्होंने कहा, ‘हे भगवान, आज आपने अद्भुत शृंगार किया है । देह पर केवल मोतियों की मालाएं ही हैं ! वस्त्रों का तो कुछ पता ही नहीं है । अद्भुत शृंगार है ! न किसी ने कभी देखा होगा और न ही सुना होगा ! आपका सेवक भी आपका गुणसंकीर्तन ‘अद्भुत एवं अपूर्व’, ऐसा ही करेगा ।’

– गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी (संदर्भ : मराठी साप्ताहिक ‘सनातन चिंतन’,  २७.९.२०१२)

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