परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का मुखमंडल, आश्रम की दीवारें तथा साधकों के शरीरपर अनिष्ट शक्तियों के मुख और आकृतियां दिखाई देना

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के माथेपर दिखाई देनेवाला
शुभचिन्ह ‘ॐ’ तथा अनिष्ट शक्तियों के मुख देवासुर युद्ध के प्रतीक !

 

१. सप्तलोकों में से दैवीय अथवा अच्छे और
सप्तपाताल में विद्यमान अनिष्ट शक्तियों में चल रहे युद्ध का
स्थूलरूप का प्रकटीकरण भूतलपर भी विविध रूपों में दिखाई देना

‘प्राचीनकाल में ऋषी-मुनी यज्ञयागादि विधि करते थे । उस समय राक्षस उनमें बाधाएं उत्पन्न करते थे । वे ऋषी-मुनियों को जान से मार देते थे और गायों को भी मारकर खाते थे । यह इतिहास हमें ज्ञात है । प्रत्येक युग में देवासुर युद्ध निरंतर होता रहता है । आज के इस कलियुगांतर्गत कलियुग में भी वह चल रहा है । सप्तलोकों में विद्यमान दैवीय अथवा अच्छी और सप्तपातालों में विद्यमान अनिष्ट शक्तियों में चल रहे इस युद्ध का स्थूल से प्रकटीकरण भूतलपर भी विविध रूपों में दिखाई देता है । ‘पृथ्वीपर विद्यमान सात्त्विकता को नष्ट करना तथा दुष्प्रवृत्तियों के माध्यम से भूतलपर अनिष्ट शक्तियों के राज्य की स्थापना करना, यह सूक्ष्म अनिष्ट शक्तियों के उद्देश्य होते हैं और वे उसके लिए प्रयास करते हैं । इसके विपरीत साधक भूतलपर हिन्दू राष्ट्र अर्थात ‘विश्‍वकल्याण हेतु कार्यरत सात्त्विक लोगों के राष्ट्र की स्थापना हेतु प्रयासरत हैं । उसके कारण अनिष्ट शक्तियों के राज्य की स्थापना हेतु प्रयासरत अनिष्ट शक्तियों के प्रयासों में बाधाएं उत्पन्न होती हैं; इसलिए वे समष्टि साधना करनेवाले संत और साधकों के कार्य और सेवा में बाधाएं उत्पन्न करते हैं ।

 

२. पहले सनातन के ‘सुखसागर’, उसके
पश्‍चात सनातन के रामनाथी आश्रम में और कुछ समय
पश्‍चात साधकों के घरोंपर अनिष्ट शक्तियों के मुख दिखाई देना

वर्ष २००३ में पहली बार गोवा के ‘सुखसागर’ में परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के कक्ष में तथा आश्रम की कुछ दीवारोंपर अनिष्ट शक्तियों के मुख दिखाई दिए । वर्ष २००५ में परात्पर गुरु डॉक्टरजी रामनाथी आश्रम रहने के लिए आए । विगत १० वर्षों से आश्रम की दीवारोंपर अनिष्ट शक्तियों के मुख दिखाई दे रहे हैं । कुछ समय पश्‍चात देश-विदेशों के घरों की दीवारोंपर भी अनिष्ट शक्तियों के मुख दिखाई दिए ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मुखमंडलपर कष्टदायक मुख दिखाई अंकित होना

१६.९.२०१८ को दर्पण में देखते समय परात्पर गुरु डॉक्टरजी को अपने मुखमंडलपर अनिष्ट शक्तियों के मुख दिखाई दिए । उसके २ सप्ताह पश्‍चात अपने दाहिने हाथपर भी अनिष्ट शक्ति का मुख दिखाई दिया । विगत १०-१५ वर्षों से परात्पर गुरु डॉक्टरजी के शरीर से प्रक्षेपित होनेवाला चैतन्य ॐ, स्वस्तिक, त्रिशुल इत्यादि के रूप में उनकी त्वचापर अंकित दिखाई दे रहे हैं । उनके शरीर से प्रक्षेपित होनेवाले चैतन्य का प्रतिकार करने हेतु अनिष्ट शक्तियां परात्पर गुरु डॉक्टरजीपर आक्रमण करती हैं । परात्पर गुरु डॉक्टरजी की त्वचापर अनिष्ट शक्तियों द्वारा किए गए आक्रमण का निम्न प्रकार से स्थूल से प्रकटीकरण दिखाई देता है ।

ध्यान से देखनेपर कभी-कभी मुख अदृश्य होते हुए दिखाई देते हैं । कभी छायाचित्रक (कैमरा) द्वारा छायाचित्र खींचने से उसमें वह दिखाई नहीं देतें । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के मुखमंडलपर छोटे-बडे तथा उनके माथेपर ४० से भी अधिक अनिष्ट शक्तियों के मुख अंकित हुए हैं । उनमें से कुछ मुख इस मूल छायाचित्र के साथ छापे गए ५ छायाचित्रों में दिखाए गए हैं । (छायाचित्र ‘अ’ देखें ।)

अ. अनिष्ट शक्तियों के मुखपर विद्यमान हावभावों में विविधता है । १. कुछ चिढैले २. कुछ हंसते हुए ३. कुछ भयभीत दिखाई देते हैं, तो ४. कुछ मुख केवल आंखें फाडकर देख रहे हैं । उनके हावभाव भी बदलते हैं । (छायाचित्र ‘आ’, ‘इ’ और ‘ई’ देखें ।)

आ. अनिष्ट शक्तियों के मुख से इर्द-गिर्द ॐ, स्वस्तिक और त्रिशुल इत्यादि दैवीय चिन्ह भी अंकित हुए हैं । उनमें से ॐ का चिन्ह यहां के छायाचित्र में दिखाया गया है । (छायाचित्र ‘उ’ देखें ।) अतः अनिष्ट शक्तियों के मुखों से प्रक्षेपित होनेवाले कष्टदायक तरंगों का परात्पर गुरु डॉक्टरजीपर होनेवाला परिणाम न्यून हो जाता है ।

 

३. साधकों के शरीरपर कष्टदायक मुखों का अंकित होना

कुछ साधकों की साधना के कारण उनके शरीरपर शुभचिन्ह अंकित होते हैं । व्यष्टि एवं समष्टि साधना करनेवाले कुछ साधकोंपर भी विगत कुछ वर्षों से अनिष्ट शक्तियां आक्रमण कर रही हैं । कुछ साधकों को पूर्वजों का कष्ट होता है । अनिष्ट शक्तियें के मुख अंकित होना, स्थूल से होनेवाला अनिष्ट शक्तियों का प्रकटीकरण है । १३.१०.२०१८ को एक साधिका के हाथोंपर अनिष्ट शक्तियों के मुख दिखाई दिए । (छायाचित्र ऊ देखें ।)

 

साधक और पाठकों को शोधकार्य हेतु सहायता का आवाहन

इस विषय के संदर्भ में शोधकार्य की आवश्यकता होने से साधक और पाठक छायाचित्रोंसहित निम्नांकित जानकारी लिखकर भेजें । इसके संदर्भ में दूसरे साधक ने यदि जानकारी दी हो, तो उसका उल्लेख करें । उस साधक का आध्यात्मिक स्तर ज्ञात हो, तो उसे भी लिखें ।

१. नाम

२. आयु

३. जनपद

४. की जा रही सेवा

५. क्या आध्यात्मिक कष्ट है ?

६. शरीरपर अनिष्ट शक्तियों के मुख कहां दिखाई देते हैं ?

७. शरीरपर दिखाई देनेवाले मुखों की संख्या

८. घर की दीवारोंपर अंकित अनिष्ट शक्तियों के मुखों की संख्या

९. अनिष्ट शक्तियों के मुख अंकित होने का वर्ष, दिनांक और समय ध्यान में हो तो, अन्यथा अनुमानित लिखें ।

१०. अनिष्ट शक्तियों के मुख अंकित होने के पश्‍चात आए शारीरिक, मानसिक, पारिवारीक, आध्यात्मिक इत्यादि कष्ट

११. आकृतियां स्थिर होती हैं अथवा अस्थिर ?

१२. अन्यत्र, उदा. विविध विधियों के समय, देवताओं के चित्र, वृक्ष, पहाड, आकाश, समुद्र, चंद्र, विविध देशों के मानचित्र इत्यादि स्थानोंपर दिखाई देनेवाले अनिष्ट शक्तियों के मुख

पाठकों से निवेदन !

१. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के शरीरपर दिखाई दी हुई इन आकृतियों को ध्यान से देखनेपर वो स्पष्टता से दिखाई देते हैं । अतः उनके अन्य छायाचित्रों में वो दिखाई देंगे ही, ऐसा नहीं है । पाठक इन चित्रों को एकाग्रता के साथ देखें ।

२. इन आकारों का मूल कारण आध्यात्मिक है । सूक्ष्म गतिविधियों का शरीरपर दिखनेवाले परिणाम के रूप में ये दैवीय चिन्ह दिखाई देते हैं । इसलिए ‘जिनमें सूक्ष्म से जानने की क्षमता अधिक होती है, उन्हें वे अधिक स्पष्टता से दिखाई देते हैं ।

३. छपाई की तांत्रिक बाधाओं के कारण यहां प्रकाशित छायाचित्र वो जैसे हैं, वैसे ही छापी जाएंगी, ऐसा नहीं है; इसलिए प्रत्येक जिज्ञासु को ये आकार दिखाई दें और उनकी समझ में यह विषय आए; इसके लिए छायाचित्रों में स्थित आकारों को संगणक की सहायता से अधिक स्पष्ट किया गया है, इसका कृपया संज्ञान लें ।

 

सनातन के साधकों द्वारा किए जा रहे
आध्यात्मिक शोधकार्य की ओर सिखने की दृष्टि से देखें !

‘सनातन के साधक साधना के कारण व्यक्ति का अंतर्मन, बाह्यमन और शरीरपर होनेवाले परिणामों का आध्यात्मिक शोधकार्य की दृष्टि से अध्ययन कर रहे हैं । इस शोधकार्य के एक भाग के रूप में सनातन प्रभात नियतकालिकों में सनातन संस्था के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी के शरीरपर अंकित चिन्ह,( उदा. ॐ और अनिष्ट शक्तियों के मुख) प्रकाशित किए जा रहे हैं । सनातन संस्था की ओर से ये चिन्ह किन कारणों से अंकित होते हैं, इसके शोधकार्य में सहायता हेतु वैज्ञानिकों का भी आवाहन किया गया है । ‘जिज्ञासु ही ज्ञान का अधिकारी होता है’, इस वचन के अनुसार साधना के कारण होनेवाले परिणामें की ओर जिज्ञासु वृत्ति से देखा, उससे सिखने की और पूछकर लेने की वृत्ति रखी गई, तभी ईश्‍वर इस संदर्भ का अमूल्य ज्ञान हमें देंगे, ‘अन्यथा यह झूठ है !’, ‘ऐसा कैसे हो सकता है?’, इस प्रकार के बुद्धिवादे में फंस जाने से ईश्‍वर हमें भरभर कर जो देन दे रहे हैं, उससे वंचित रहने का कृत्य आपसे हो जाएगा ! – संपादक

साधकों को सूचना और पाठकों से अनुरोध

‘एक-दूसरे का मुखमंडल देखकर किस के मुखपर अनिष्ट शक्ति का मुख अथवा शुभचिन्ह दिखाई देते हैं क्या ?, इसका अध्ययन करें । इस प्रकार से यदि अनिष्ट शक्तियों के मुख अथवा शुभचिन्ह अंकित होने का ध्यान में आनेपर उसके संदर्भ में छायाचित्र के साथ जानकारी भेजें । छायाचित्र में दिखाई देनेवाले मुखमंडल के इर्द-गिर्द वृत्त बनाकर छायाचित्र भेजें और उसके साथ मूल छायाचित्र भी भेजें ।

यहां प्रारूप हेतु कुछ छायाचित्र छापे गए हैं । शरीर के किसी भी भागपर मुख दिखाई दिया, तो उस स्थानपर विभूति लगाएं और उस स्थानपर न्यास कर २ घंटोंतक अपना सामान्य नामजप करें । उसके लिए अलग नामजप करने की आवश्यकता नहीं है । इस संदर्भ में त्वचारोग विशेषज्ञ क्या बताते हैं ?, इसकी भी शोधकार्य की दृष्टि से अध्ययन किया जा सकता है । इस संदर्भ में कुछ प्रश्‍न हों, तो उन्हें निम्न क्रमांकपर पूछे और श्रीमती भाग्यश्री सावंत के नाम से निम्नांकित पतेपर जानकारी भेजें ।

डाक का पता : पोस्ट बॉक्स क्र. ४६, ‘सनातन आश्रम’, २४/बी, रामनाथी, फोंडा, गोवा

अनिष्ट शक्तियां : वातावरण में अच्छी और अनिष्ट शक्तियां ये दोनों कार्यरत होती हैं । अच्छी शक्तियां अच्छे कार्य में मनुष्य की सहायता करती हैं, तो अनिष्ट शक्तियां उसे कष्ट पहुंचाती हैं । वेद-पुराणों में प्राचीन काल में ऋषिमुनियों के यज्ञों में राक्षसों द्वारा विघ्न उत्पन्न करने की अनेक कथाएं मिलती हैं । अथर्ववेद में कई स्थानोंपर अनिष्ट शक्तियां, उदा. असुर, पिशाच, राक्षस आदि के प्रतिबंध हेतु मंत्र दिए गए हैं । वेदादी धर्मग्रंथों में अनिष्ट शक्तियों के निवारण हेतु विविध आध्यात्मिक उपाय भी बताए गए हैं ।

स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात