वैज्ञानिक दृष्टि से ॐ का महत्त्व !

      शासन द्वारा २१ जून योगदिवस के रूप में मनाया गया, यह बात गौरवास्पद थी; परंतु योग से ॐ हटाने का निर्णय दुर्भाग्यपूर्ण था; यह बात केवल श्रद्धालु हिन्दू नहीं, अपितु वैज्ञानिक दृष्टि से प्रमाणित ॐ का महत्त्व जाननेवाले किसी भी व्यक्ति के ध्यान में सहजता से आएगी । कुछ दिन पहले नासा (नैशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन, अमेरिकन संस्थान) द्वारा सूर्य के नाद का उपग्रह के माध्यम से किया ध्वनिमुद्रण यू-ट्यूब नामक जालस्थल पर उपलब्ध है ।

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यह ध्वनिमुद्रण सुनने पर ध्यान में आया कि सूर्य का नाद और ॐकार में चौंका देनेवाली समानता है । इस पृष्ठभूमि पर वैज्ञानिक दृष्टि से ॐ का महत्त्व प्रतिपादित करनेवाला जालस्थल पर उपलब्ध लेख पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं ।

१. वैज्ञानिक और व्यवहारिक
कारणों से ॐ का जप करना लाभदायी !

     ॐ, इस मंत्र के संदर्भ में विविध सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं । इनमें सर्वाधिक प्रचलित सिद्धांत है, ॐ, एक वैश्‍विक ध्वनि (कॉस्मिक साऊंड) है और इससे विश्‍व की सृष्टि हुई है । भारतीय (हिन्दू) संस्कृति में ॐ का नियमित जप करने का यही एकमात्र कारण नहीं है । हिन्दू संस्कृति के अन्य पारंपरिक धार्मिक कृत्यों के पीछे विद्यमान कारणों की भांति मनुष्य को दीर्घकाल तक लाभान्वित करनेवाले कुछ शास्त्रीय और संभाव्य कारण भी हैं । (ये कारण ध्वनि, कंपन और अनुनाद (रेजोनन्स) आदि से संबंधित शास्त्रों पर आधारित हैं ।)

२. मंत्र के अक्षरों का शरीर
के विविध अवयवों पर होनेवाला परिणाम

     मंत्र, ध्वनि की (कंपनों की) सहायता से परिणाम साधनेवाले अक्षरों से बने होते हैं । विविध अक्षरों के उच्चारण से विविध कंपन उत्पन्न होते हैं और इनका शरीर के विविध अवयवों पर परिणाम होता है । प्रत्येक अक्षर की ध्वनि का शरीर के विशिष्ट अवयव से संबंध होता है और वह ध्वनि उस अवयव के स्थान पर प्रतिध्वनित (रेजोनेट) होती है । अ, उ, म ये तीन अक्षर एकत्र करने पर ॐ, यह मंत्र बनता है । उन अक्षरों के उच्चारण से होनेवाले परिणाम आगे दिए हैं ।

२ अ. अ का उच्चारण

अ अ अ… ऐसा उच्चार करने पर उरोभाग (छाती) और उदर (पेट) से संबंधित मस्तिष्कतंत्र में संवेदना प्रतीत होकर वह उस स्थान पर प्रतिध्वनित होता है ।

२ आ. उ का उच्चारण

उ उ उ… यह उच्चार गले और उरोभाग (छाती) में संवेदना उत्पन्न कर वहां प्रतिध्वनित होता है ।

२ इ. म का उच्चारण

म म म … यह उच्चार नासिका तथा खोपडी में प्रतिध्वनित होता है ।

     परिणामस्वरूप ॐ के लगातार उच्चारण से शरीर के पेट, रीढ की हड्डियां, गला, नाक और मस्तिष्क आदि भाग सक्रिय होते हैं । ऊर्जा पेट से ऊपर की दिशा में मस्तिष्क तक प्रवाहित होती है ।

३. ॐ के मंत्रजप से होनेवाले लाभ
का वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोग के माध्यम से परीक्षण करना

     योगी बताते हैं, ॐ के जप से मन की एकाग्रता बढना, मन स्थिर और शांत होना, मानसिक तनाव घटना आदि अनुभव होते हैं । इस संदर्भ में अधिक जानकारी प्राप्त कर आधुनिक वैज्ञानिक एवं तकनीकी सहायता से उसकी पुष्टि करने की जिज्ञासा वैज्ञानिकों में थी । इस हेतु उन्होंने कुछ प्रयोग किए और इससे योगियों द्वारा प्रतिपादित अनुभवों की पुष्टि हुई । (इससे संबंधित कुछ उदाहरण आगे के सूत्रों में दिए हैं ।)

३ अ. ॐ का जप नियमित रूप
से करने पर व्यक्ति के शारीरिक और
मानसिक स्वास्थ्य पर होनेवाले सकारात्मक परिणाम

३ अ १. शारीरिक लाभ

अ. रक्तदाब न्यून होना : ॐ के नियमित जप से रक्तदाब न्यून हो सकता है, यह बात आधुनिक चिकित्सकीय शोध द्वारा भी प्रमाणित हुई है । इससे संबंधित एक संदर्भ प्राप्त हुआ है, ध्यानधारणा और ॐ का मंत्रजप कर श्रीमती क्लॉडिया जेफ ने उच्च रक्तदाब की व्याधि पर विजय प्राप्त की । आश्‍चर्य यह है कि अब उनकी औषधियां बंद हो गई हैं और उनके हृदय में उत्पन्न हुआ दोष अपनेआप ठीक हुआ है । (संदर्भ : chants_bp News Report: http://www.dailymail.co.uk/health/article-1258234/Chants-fine-thing-It-sound-daft-doctors-believe-med)

ॐ के जप से कष्ट न हो, इसलिए
योग्य अध्यात्मशास्त्रीय दृष्टिकोण समझ लें !

१. निर्गुण (ब्रह्म) तत्त्व से सगुण की (माया की) निर्मिति होने हेतु प्रखर शक्ति आवश्यक होती है । इस प्रकार की शक्ति ओंकार के (ॐ के) जप से उत्पन्न होती है, इसलिए अनधिकारी व्यक्ति द्वारा ओंकार का नामजप किए जाने पर उसे शारीरिक अथवा मानसिक कष्ट होने की संभावना होती है । किसी विशिष्ट कारण के लिए, उदा. अनिष्ट शक्ति का निवारण करने हेतु नामजप को ॐ लगाना आवश्यक हो, तो नामजप के समय ॐ का उच्चारण अधिक दीर्घ न करें ।

     ॐ के जप से स्त्रियों को कष्ट होने की संभावना अधिक होती है । यह सूत्र इस उदाहरण से समझ में आएगा । ॐ कार से उत्पन्न होनेवाले स्पंदनों से शरीर में बहुत शक्ति (उष्णता) निर्मित होती है । पुरुषों की जननेंद्रियां शरीर के बाहर होती हैं । इसलिए निर्मित शक्ति का उनकी जननेंद्रियों पर परिणाम नहीं होता । स्त्रियों की जननेंद्रियां भीतर होने से इस उष्णता का उनकी जननेंद्रियों पर परिणाम होकर उन्हें कष्ट हो सकते हैं । उन्हें मासिक धर्म अधिक होना, न होना, मासिक धर्म के समय वेदना होना, गर्भधारणा न होना, इस प्रकार की विविध व्याधियां हो सकती हैं; इसलिए नामजप करते समय गुरु ने यदि बताया न हो, तो वे नामजप को ॐ न लगाएं, ६० प्रतिशत से अधिक आध्यात्मिक स्तर की स्त्रियों के लिए नामजप को ॐ लगाने में कोई अडचन नहीं।

२. ॐ में बहुत शक्ति होती है । इसलिए किसी को कोई विशिष्ट कारण के लिए, उदा. अनिष्ट शक्तियों के निवारण हेतु अन्य किसी देवता का नामजप करना आवश्यक होने पर उस देवता के नाम के पहले ॐ लगाते हैं । उदा. श्री गणपतये नमः । के स्थान पर ॐ गँ गणपतये नमः । नामजप करते हैं ।

संदर्भ : सनातन प्रभात हिंदी पाक्षिक

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