मलेशिया के ३ सिद्धों के जीवसमाधीस्थलों के दर्शन

जीवसमाधि के स्थानपर (१) श्री. सत्यकाम कणगलेकर, (२) सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी, क्वालालंपुर (मलेशिया) के साधक (३) श्री. टोनी च्यांग एवं (४) श्री. विनायक शानभाग

‘२६.१.२०१९ को पू. (डॉ.) ॐ उलगनाथनीजी ने भ्रमणभाषपर बताया, ‘‘ सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी ६ से १३.३.२०१९ की अवधि में मलेशिया जाकर वहां के सिद्धों के समाधिस्थल खोजें ।’ उससे पहले सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी मलेशिया जाकर आई हैं । तब वे वहां के साधकों से मिलने वहां गई थीं । महर्षिजी द्वारा बताए जाने के अनुसार सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी तथा उनके साथ गए साधकों ने वहां जाकर सिद्धों के समाधिस्थलों का शोध किया । इसका समाचार यहां दे रहे हैं –

 

१. मलेशिया के तीन पीढियों के समाधीस्थल

मलेशिया के ‘बतू’ पर्वत की तलहटीपर स्थित ‘मौनगुरु’ नामक सिद्धजी की समाधी

१ अ. बतू पर्वत (क्वालालंपुर, मलेशिया) के मौनगुरु सिद्ध

मलेशिया की राजधानी क्वालालंपुर से २० कि.मी. दूरीपर बतू पर्वत है । यह कार्तिकेयजी का स्थान है । इस स्थानपर पर्वत के अंदर १५ पडछत्ती की एक इमारत बनेगी, इतनी बडी गुफा है । गुफा में जाने हेतु २०० से भी अधिक सीढीयां हैं । ये सीढीयां जहां से आरंभ होती हैं, वहां दाहिनी ओर एक सिद्धजी की समाधि है । उनका नाम था मौनगुरु सिद्ध ! इन सिद्धजी के विषय में पहले किसी को ज्ञात नहीं था । कुछ वर्ष पूर्व मलेशिया के एक भक्त तमिलनाडू में स्वयं का नाडीभविष्य देखने हेतु आए थे, उनके नाडीवाचन में अगस्ति ऋषीजी ने बताया था कि मलेशिया मे बतू पर्वत की तलहटी में मौनगुरु नामक सिद्धजी की समाधी है । तुम वहां जाकर उनका शोध करो और वहां एक शिवलिंग की स्थापना करो और उन सिद्धजी की जीवसमाधि का सम्मान करो । उन्होंने उस प्रकार से किया । जिन्हें इन सिद्धजी के विषय में ज्ञात है, वे लोग ही केवल यहां दर्शन करने आते हैं ।

मलेशिया के तापा नामक स्थानपर समाधिस्थ महान सिद्धपुरुष स्वामी जगन्नाथ

१ आ. तापा (मलेशिया) के जगन्नाथ स्वामी सिद्ध

वर्ष १८८१ में भारत के ‘पुरी’ से जगन्नाथ नामक एक सिद्धपुरुष मलेशिया स्थित तापा नामक स्थानपर आ गए । यह स्थान एक अरण्य है । वर्ष १९५९ में उन्होंने जीवसमाधि ली । वे नाथसंप्रदाय के एक कठोर तपस्वी थे । वर्ष १८१२ में जगन्नाथ स्वामीजी का जन्म हुआ और वे १४७ वर्षोंतक जीवित रहे । मलेशिया में ७८ वर्ष की अवधि में लोग उन्हें ‘पागल संन्यासी’ कहते थे । मलेशिया के अनेक स्थानीय हिन्दू उनके भक्त थे । ऐसा कहा जाता है कि वर्ष १९४२ में उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिन्द सेना की सहायता की थी । जगन्नाथ स्वामीजी ने यह भविष्यवाणी की थी कि आगे जाकर उनकी गुरुपरंपरा को चलानेवाले २ लोग आएंगे । उनमें से एक भारत से, तो दूसरे अमेरिका से आएंगे । वर्ष १९२० में भारत के तमिलनाडू राज्य से आए चित्रमुत्तु अडिगळार उनके परमशिष्य बने तथा स्वामी चित्रमुत्तु ने भारत में गुरु जगन्नाथ स्वामी सिद्धजी द्वारा बताए गए सिद्धांतों का प्रसार किया । उसके पश्‍चात अमेरिका के हवाई द्वीप से आए शिवाय सुब्रमण्या नामक एक योगी उनके शिष्य बने । उन्होंने हवाई द्वीप के कुवाय नामक स्थानपर बडे आश्रम तथा मंदिर का निर्माण किया है । स्वामी शिवाय सुब्रमण्याजी अब शैव सिद्धांत का प्रचार कर रहे हैं तथा ‘हिन्दूइजम टुडे’ नामक वैश्‍विक नियतकालिक चला रहे हैं । आजकल जगन्नाथ स्वामीजी की जीवसमाधी के स्थानपर पुनर्निर्माण तथा विस्तार का कार्य प्रगतिपर है । संगठन ‘मलेशिया हिन्दू संगम’ ने मलेशिया के हिन्दुआें की सहायता से यह कार्य हाथ में लिया है ।

चेंग गांव के एक महान सिद्धजी की जीवसमाधी

१ इ. सन्नासीमलै (मलक्का, मलेशिया) के महान संन्यासी सिद्ध

मलेशिया का नाम पहले मलक्का था । उस समय में वहां का सुल्तान राजा परमेश्‍वरा अपनी नई राजधानी की खोज करते-करते मलक्का गांव केपास आया । वहां जब वह एक ‘आमलका’ (आंमला) वृक्ष के नीचे बैठा था, तब वहां उसके सामने एक विचित्र घटना घटित हुई । हिरण जैसा एक छोटासा प्राणी उसके शिकारी कुत्ते से लड रहा था । यह देखकर राजा को लगा कि हम इसी स्थानपर राजधानी बनाएंगे । आमलका वृक्ष के नीचे ही यह निर्णय किए जाने से उसने इस नई राजधानी को मलक्का नाम दिया । आगे जाकर उसका राज्य मलक्का सुल्तानशाही नाम से विख्यात हुआ । हुंग तुआ मलक्का सुल्तानशाही के १५वीं शताब्दी में सुल्तान मन्सूर शाह का सेनापति था । उस समय मलक्का में राजा को परमेश्‍वरा कहा जाता था और सेनापति को लक्ष्मणा कहा जाता था । या हुंग तुआ के गुरु एक महान सिद्ध थे । उन्हें स्थानीय लोग आदिपुत्रा कहते थे । ऐसा कहा जाता है कि वे भारत के आंध्र प्रदेश से आए थे । उन्होंने सेनापति हुंग तुआ को अनेक युद्धकला एवं मंत्रविद्याआें की शिक्षा दी थी । हुंग तुआ अपना शौर्य और प्रामाणिकता के कारण प्रसिद्ध हुआ और आज उसे मलेशिया का राष्ट्रीय वीर माना जाता है । ऐसे वीरपुरुष को बनाने में उसके गुरु का बडा हाथ था । मलक्का नगर से ९ कि.मी. की दूरीपर स्थित चेंग नामक गांव में उसकी जीवसमाधी है । अब वहां शिव, पार्वती, कार्तिकेय एवं गणेशजी का मंदिर है ।

– श्री. विनायक शानभाग, मलेशिया (७.३.२०१९)