प्रेमभाव एवं परात्पर गुरु डॉक्टरजी के प्रति अनन्य भाव आदि गुणों से युक्त शालिनी माईणकरदादीजी (आयु ९२ वर्ष) !

पू. शालिनी माईणकरदादीजी

शालिनी माईणकरजी (आयु ९२ वर्ष) विगत २७ वर्षों से सनातन संस्था के मार्गदर्शन में साधना कर रही हैं । आजकल वे उनकी पुत्री श्रीमती मेधा विलास जोशीसहित नंदनगद्दा, कारवार, कर्नाटक में रहती हैं । वे गुरुचरित्र का पाठ करना, दत्तमाला मंत्रजाप करना, प्रार्थना एवं समष्टि हेतु दिनभर नामजप करना जैसी साधना करती हैं । दादीजी की आनंदावस्था, साथ ही उनके निवास में प्रतीत हो रहे बदलाव के विषय में साधक तथा दादीजी के परिजनों को प्रतीत विशेषतापूर्ण सूत्र आगे दे रहे हैं ।

 

१. गुणविशेषताएं

१ अ. सदैव आनंद की स्थिति में होना

दादीजी प्रतिर शांत एवं आनंदित रहती हैं । दादीजी को बवासी तथा घुटनों की पीडा है; किंतु तब भी वे आनंदित रहती हैं ।

१ आ. ९२वें वर्ष में भी दृष्टि अच्छी होना

दादीजी की आयु ९२ वर्ष है, उन्हें उपनेत्र है; परंतु तब भी वे गुरुचरित्र का पाठ करते समय, साथ ही अन्य कृतियां करने समय उपनेत्र का उपयोग नहीं करतीं । – श्री. नगाराम चौधरी (साधक), कारवार, कर्नाटक

१ इ. प्रेमभाव

१. दादीजी में बहुत प्रेमभाव है । वे मुझे मिठाई देती हैं और मेरे साथ प्रेमपूर्वक बातें करती हैं । – कु. अनन्या राधेश जोशी (प्रपौत्री, दादीजी की बेटी की नातिन, आयु १४ वर्ष), कारवार, कर्नाटक

२. इस बार मैं दादीजी से मिलने गया और तब मुझे ‘दादीजी से बोलते ही रहना चाहिए’, ऐसा लगा । उनकी बातों में बहुत प्रेम है । उनके घर जानेपर समय कैसे निकल जाता है, यह ध्यान में ही नहीं आता । ‘दादीजी के सत्संग में रहना चाहिए’, ऐसा मुझे लग रहा था । – श्री. काशिनाथ प्रभु, कर्नाटक

३. एक बार मैं ३ वर्ष पश्‍चात दादीजी से मिलने गया था; किंतु तब भी दादीजी को मेरे नाम का तुरंत स्मरण हुआ । मुझे देखनर वे कहने लगीं, ‘‘हमारा राम आया है ।’’ उन्हें मिलने जानेपर प्रत्येक बार वे मुझे अन्य साधकों के विषय में उनका नाम लेकर उनका हाल पूछती हैं और उनकी चिंता करती हैं ।

१ ई. अनासक्त स्वभाव

दादीजी में बहुत ही अल्प आसक्ति है । ‘अपने लिए कुछ लेना चाहिए’, ऐसा उन्हें कभी नहीं लगता ।

१ उ. परात्पर गुरु डॉक्टरजी के प्रति भाव

१. मैं जब दादीजी से मिलने जाता हूं, तब प्रत्येक बार वे मुझे पूछती हैं, ‘‘प.पू. गुरुदेवजी कैसे हैं ? वे ठीक हैं न ? अगली बार जब तुम रामनाथी आश्रम जाओगे, तब तुम मेरे विषय में उन्हें बता देना कि अब मैं बूढी हो चुकी हूं ।’’ वे सदैव गुरुदेवजी के स्मरण में ही होती हैं ।

२. दादीजी को ऐसा लगता है कि परात्पर गुरु डॉक्टरजी ही उनके माता-पिता हैं । वे कहती हैं कि वे ही मेरे सबकुछ हैं और वहीं ईश्‍वर हैं ।

३. मैने दादीजी से पूछा,  ‘‘दादीजी, मुझे आपका छायाचित्र खींचना है । आप कोई दूसरी साडी पहनिए ।’’ तब उन्होंने कहा,‘‘रहने भी दो न ! प.पू. गुरुदेवजी को सब ज्ञात है ।’’

– श्री. नगाराम चौधरी (साधक), कारवार, कर्नाटक

 

२. दादीजी के निवास में प्रतीत होनेवाले परिवर्तन

२ अ. सर्वत्र गर्मी का वातावरण होते हुए भी घर में शीतलता,
साथ ही आनंद और शांति प्रतीत होकर दूसरों को भी उसकी अनुभूति होना

‘कारवार में बहुत धूप और गर्म वातावरण है; परंतु तब भी हमें हमारे घर में बहुत शीतलता प्रतीत होती है । साथ ही घर में आनंद एवं शांति प्रतीत होती है । मेरी बहू (श्रीमती दिव्या राधेश जोशी) और नातिन (कु. अनन्या राधेश जोशी) इन दोनों को भी ऐसा ही लगता है । घर आनेवाले परिजनों को भी यहां आनेपर शांत एवं शीतलता प्रतीत होती है, ऐसा वे बताते हैं । एक बार हमारे घर सदैव आनेवाले एक व्यापारी आए थे । उन्हें घर में परिवर्तन प्रतीत हुआ; इसलिए उन्होंने पूछा, ‘‘क्या आपने अपने घर में कोई परिवर्तन किए हैं ?; क्योंकि पहले की अपेक्षा अब घर में शांति एवं शीतलता प्रतीत हो रही है ।’’

– श्रीमती मेधा विलास जोशी (दादीजी की पुत्री), कारवार, कर्नाटक

२ आ. दादीजी के सान्निध्य में उपाय होना

‘मैं इसी मास में २ बार दादीजी से मिलने गया था । तब मुझे ‘उनके घर का वातावरण शांत, शीतल एवं आनंदित है’, ऐसा लग रहा था । दादीजी भी शांत एवं आनंदित थीं । वहां के बैठक कक्ष में बैठनेपर मुझपर उपाय हो रहे थे । कुछ समय पश्‍चात जब मैं घर लौटा, तब मेरी भावजागृति हो रही थी और मुझपर उपाय हो रहे थे ।’

– श्री. नगाराम चौधरी

२ ई. दादीजी के अस्तित्व के कारण घर में तथा परिजनों में सकारात्मक परिवर्तन आना,
दादीजी की प्रतिक्षा करते समय ध्यानावस्था का अनुभव करना तथा दादीजी के बाहर आनेपर सुगंध आना

मैं लगभग १ वर्ष पहले दादीजी के घर पहली बार गया था और इस बार अब गया; परंतु इस बार मुझे दादीजी के घर में बहुत परिवर्तन प्रतीत हुए । घर का वातावरण सकारात्मक लग रहा था तथा घर के व्यक्तियों में  भी सकारात्मक परिवर्तन आए हैं, यह मेरे ध्यान में आ गया । तब ‘दादीजी के अस्तित्व के कारण ही यह परिवर्तन आए हैं’, यह मुझे प्रतीत हुआ । मैं दादीजी की प्रतिक्षा में बैठा था, तब मुझे मेरा ध्यान लगा है, ऐसा लगा । दादीजी जब अंदर से बाहर आईं, तब मुझे सुगंध की अनुभूति हुई ।

– श्री. काशिनाथ प्रभु, प्रसारसेवक

२ ई. दादीजी के घर में बहुत चैतन्य प्रतीत हो रहा था और ‘वे निरंतर आनंदावस्था में हैं’, ऐसा प्रतीत हुआ ।

– श्री. सोमेश गुरव एवं श्री. सागर कुर्डेकर (साधक), कारवार, उत्तर कन्नड जनपद, कर्नाटक

२ उ. दादीजी को देखकर प.पू. गुरुदेवजी का बहुत स्मरण हुआ । उनके घर में बहुत शांत लग रहा था ।’

– श्रीमती उषा शशिधर, उत्तर कन्नड जनपदसेविका

स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात