बक्सों से प्रत्यक्ष उपचार करने की विविध पद्धतियां

बक्सों से उपचार करते समय आगे दी जिन उपचार-पद्धतियों से शरीर के कुंडलिनीचक्र, विकारग्रस्त अवयव अथवा नवद्वारों पर उपचार करने के लिए बताया हो, वहां इन तीन स्थानों में से प्रधानता से कुंडलिनीचक्रों पर बक्सों से उपचार करें । (दो आंखें, दो कान, दो नथुने, मुंह, मूत्रद्वार और गुदाद्वार, ये शरीर के नवद्वार हैं ।)

१. बडे बक्सों से शरीर के कुंडलिनीचक्र,
विकारग्रस्त अवयव अथवा नवद्वारों पर उपचार करना

१ अ. उपचारों के संदर्भ में कुछ सूचनाएं

१ अ १ . व्यक्ति से लगभग ३० सें.मी. (१ फुट) दूर बक्से रखें । यह दूरी १ ० सें.मी. न्यूनाधिक हो सकती है ।

 

बैठकर उपचार करते समय ऊपर दिखाए अनुसार बक्से खडे रखें ।

१ अ २. उपचार के स्थानों के स्तर पर बक्से रखें । इसका कारण यह है कि उपचार के स्थानों पर, अर्थात कुंडलिनी चक्र अथवा विकारग्रस्त अवयव के सामने बक्से रखने पर वहां की कष्टदायक शक्ति प्रभावी रूप से बक्से में खिंच जाती है, जिससे व्यक्ति का विकार शीघ्र दूर होने में सहायता मिलती है । इसलिए व्यक्ति उपचार के लिए कुर्सी पर बैठेगा कि भूमि पर, इसके अनुसार बक्से कितनी ऊंचाई पर रखने हैं, यह निर्धारित करें ।

उदाहरण के लिए शिरोवेदना से पीडित व्यक्ति उपचार के लिए कुर्सी पर बैठ रहा हो, तो एक बक्सा उसके अनाहतचक्र तक (छातीके मध्य) आए आैर दूसरा बक्सा उसके आज्ञाचक्र तक (दोनों भौंहों के मध्य) आए, इतनी ऊंचाई पर किसी पटल पर एक के ऊपर एक बक्से रखें । (बक्सों से उपचार करते समय नामजप तथा मुद्रा अथवा न्यास करना लाभदायक होता है । इसीलिए आकृति में व्यक्ति को एक हाथ से मुद्रा तथा दूसरे हाथ से न्यास करते दिखाया है ।)

उपचार-स्थान के स्तर पर बक्से रखना संभव न हो, तो उन्हें थोडा नीचे अथवा भूमि पर रखें । बक्से समान ऊंचाई पर रखने पर होनेवाले लाभ के १० – २० प्रतिशत लाभ ही बक्से समान ऊंचाई पर न रखने से होता है, यह ध्यान में रख बक्से समान ऊंचाई पर रखने का प्रयत्न करें । बक्से समान स्तर पर न रख पाएं, तो उन्हें एेसे कोण में रखें, जिससे बक्सों की रिक्ति व्यक्ति की दिशा में रहे । बक्सा तिरछा रखने के लिए बक्से के नीचे कोई लकडी का टुकडा रख सकते हैं ।

१ अ ३. जिस स्थान पर उपचार करने हैं, उसके सामने बक्से का खुला भाग आए, इस प्रकार से बक्सा रखें, साथ ही बक्से का मध्य भाग ठीक उस स्थान के सामने आए, यह देखें ।

१ अ ४. रोगी को लेटकर उपचार करने हों, तो वह वैसा कर सकता है; परंतु उस समय बक्से उपचार के स्थानों के पास आएं, इसका प्रयास करें । लेटकर उपचार करते समय सूत्र ‘२ अ’ में दिखाए अनुसार बक्से लिटाकर रखें ।

२. बक्सा शरीर से लगभग १ – २ सें.मी. दूर हाथों में पकडकर
कुंडलिनीचक्र, विकारग्रस्त अवयव अथवा नवद्वारों पर उपचार करना

यात्रा, कार्यालय, बैठक (मीटिंग) इत्यादि में बडे बक्से रखकर उपचार नहीं किए जा सकते । एेसे में छोटे बक्से हाथ में पकडकर उपचार किए जा सकते हैं ।

(ऊपर की आकृति में हाथ से बक्सा पकडकर आज्ञाचक्र और अनाहतचक्र के स्थान पर उपचार करते हुए दिखाया गया है ।)

२ अ. बक्से का नाप

हाथ में पकडने के लिए बक्से का आकार सुविधाजनक होना चाहिए । उसकी ‘लंबाई, चौडाई आैर गहराई का अनुपात’ १० : ७ : ६ होना चाहिए ।

२ आ. उपचारों के विषय में कुछ सूचनाएं

२ आ १ . जिस स्थान पर उपचार करना हो, उसके सामने बक्से के खुले भाग का मध्य आए, इस प्रकार उसे हाथ में पकडना है ।

२ आ २. बक्सा पकडने पर हाथ में वेदना होने लगे, तो बक्सा दूसरे हाथ में पकडें ।

२ आ ३. उपचार करते समय जब हाथ को आधार नहीं मिलता, तब उसमें वेदना हो सकती है । एेसा न हो, इसके लिए कुर्सी पर (कुर्सी पर) बैठा व्यक्ति अपने हाथों की कोहनी कुर्सी के हत्थों पर रख सकता है । इसी प्रकार, शक्तिहीन अथवा वृद्ध व्यक्ति के लिए थकान के कारण बक्सों को विकारग्रस्त अवयव के सामने १ – २ सें.मी. अंतर पर हाथ में पकडना संभव न हो, तो वे बक्सों को विकारग्रस्त अवयव पर टिका दें ।

३. दैनिक क्रियाकलाप, अध्ययन, सेवा आदि करते समय भी बक्सों से उपचार सहजता से होना

बक्सों को शरीर से लगभग ३० सें.मी. (१ फुट) दूर रखकर उपचार करना, बक्से हाथ में पकडकर उपचार करना, इस प्रकार से केवल बक्सों से उपचार करने के अतिरिक्त भी बक्सों से उपचार प्रतिदिन सहजता से कैसे किए जा सकते हैं, इसके कुछ उदाहरण आगे दे रहे हैं ।

३ अ. कुर्सी पर बैठकर अध्ययन करना, अनाज चुनना, सेवा करना आदि के समय बक्सा रखना : कुर्सी के नीचे १ बक्सा भूमि की आेर मुख कर रख सकते हैं । एेसा करने से पाताल से आनेवाली कष्टदायक शक्ति से रक्षा होने में सहायता मिलती है ।

दोनों जांघों के बीच एक पर दूसरा बक्सा इस प्रकार रख सकते हैं कि उनके खुले भाग हमारी आेर रहें । इससे स्वाधिष्ठान (जननेंद्रिय के १ से २ सें.मी. ऊपर) एवं मणिपुर (नाभि का स्थान) कुंडलिनीचक्रों से संबंधित कष्ट में या पेडू आैर पेट के विकारों में लाभ होने में सहायता मिलती है ।

३ आ. किसी से बात करते समय अथवा बैठक में (‘मीटिंग’ में) छोटा बक्सा हाथ में पकडकर उपचार के स्थान पर रख सकते हैं ।

३ इ. बैठने के स्थान पर बक्से को छत से इस प्रकार लटकाकर रखें कि उसका खुला भाग ठीक सिर के ऊपर आए; बक्सों का शिरस्त्राण (हेलमेट) दिनभर पहनना; बक्से को ‘सेलोटेप’ से उपचार के स्थान पर चिपकाना आदि पद्धतियों से भी बक्सों से उपचार सहजता से किए जा सकते हैं ।

विस्तृत विवेचन के लिए पढें : सनातन का ग्रंथ ‘विकार-निर्मूलन हेतु रिक्त गत्ते के बक्सों से उपचार (भाग २)