स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया करने से साधकों पर हुए परिणामों का वैज्ञानिक परीक्षण

यूटीएस (यूनिवर्सल थर्मो स्कैनर) उपकरण द्वारा महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय का वैज्ञानिक परीक्षण

जीवन में किसी भी कठिन प्रसंग में मानसिक संतुलन खोए बिना उस प्रसंग का धीरज से सामना कर पाने के लिए तथा सदैव आदर्श कृति होने के लिए व्यक्ति का मनोबल उत्तम और व्यक्तित्त्व आदर्श होना आवश्यक है । स्वभावदोेष व्यक्ति का मन दुर्बल बनाते हैं, जबकि गुण आदर्श व्यक्तित्त्व का विकास करने में सहायता करते हैं । इसलिए आदर्श व्यक्तित्त्व विकसित करने के लिए स्वभावदोषों का निर्मूलन कर गुणों का संवर्धन करना आवश्यक है । ईश्‍वरप्राप्ति के प्रयासों में, अर्थात साधना में भी प्रमुखता से स्वभावदोषों की ही (षडरिपुआें की ही) बाधा होती है । काम-क्रोध इत्यादि षडरिपुआें के प्रभाववश अनेक महातपस्वी मुनिश्रेष्ठों का तथा पुण्यशील राजाआें का परमार्थपथ से पतन हुआ, इसके अनेक उदाहरण पौराणिक कथाआें में मिलते हैं । सच्चिदानंदमय ईश्‍वर से एकरूप होना किसी भी योगमार्ग से साधना करनेवाले साधक का ध्येय होता है । सनातन संस्था के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने गुरुकृपायोगानुसार साधना के अंतर्गत (टिप्पणी १) स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया (टिप्पणी २) साधकों के लिए उपलब्ध करवाई है । साधक स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया लगन से करें तो उनके स्वभावदोषों की तीव्रता शीघ्र घटती दिखाई देती है, जिससे उनके आनंद में वृद्धि होती है । देश-विदेश से अनेक साधक स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया प्रभावी रूप से सीखने के लिए गोवा में रामनाथी स्थित सनातन आश्रम में आते हैं । स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया करने से, साधकों पर आध्यात्मिक दृष्टि से क्या परिणाम होता है ?, इसका वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन करने के लिए महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की ओर से एक परीक्षण किया गया । इस परीक्षण के लिए यूटीएस (यूनिवर्सल थर्मो स्कैनर) उपकरण का उपयोग किया गया । ८.१२.२०१७ और ४.१.२०१८ को रामनाथी, गोवा में सनातन के आश्रम में यह परीक्षण किया गया । इस परीक्षण का स्वरूप, निरीक्षण और उसका विवरण आगे दिया है ।

टिप्पणी १ – गुरुकृपायोगानुसार साधना : परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा खोजी गई गुरुकृपायोगानुसार साधना में कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का सुंदर संगम है । इसमें स्वभावदोष-निर्मूलन, अहं-निर्मूलन, नाम, सत्संग, सत्सेवा, भावजागृति, त्याग और प्रीति, जैसी व्यष्टि अष्टांग साधना और समाज में साधना का प्रचार करने की समष्टि साधना अंतर्भूत है । इससे साधक की अल्प अवधि में शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति होती है । इसका अनुभव सनातन के साधक ले रहे हैं । इसकी विस्तृत जानकारी सनातन के ग्रंथ गुरुकृपायोगानुसार साधना में दी है ।

टिप्पणी २ – स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया : स्वभावदोषों के कारण व्यक्ति पर शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, पारिवारिक, सामाजिक और आध्यात्मिक स्तरों पर दुष्परिणाम होते हैं । स्वभावदोषों के दुष्परिणाम दूर हों और व्यक्ति सफल और सुखी जीवन जी पाए, इसके लिए उसके स्वभावदोष दूर कर, चित्त पर गुणों का संस्कार निर्माण करने की प्रक्रिया को स्वभावदोष (षड्रिपु)-निर्मूलन प्रक्रिया, कहते हैं ।

संदर्भ : सनातन की स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया संबंधी ग्रंथमाला

 

१. परीक्षण का स्वरूप

इस परीक्षण में सम्मिलित एक साधक और एक साधिका कुछ वर्षों से गुरुकृपायोगानुसार साधना कर रहे हैं; परंतु उन्होंने इस अवधि में स्वयं के स्वभावदोष दूर करने के लिए विशेष प्रयास नहीं किए थे । इसलिए उनके स्वभावदोष उनकी साधना में बाधा बन रहे थे । इन दोनों साधकों ने गोवा (रामनाथी) में सनातन के आश्रम में निवास कर स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया कैसे करें ?, यह उस विषय के विशेषज्ञ और उन्नत साधिकाआें के मार्गदर्शन में सीखा और उसे गंभीरता से करने का प्रयास किया । स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया आरंभ करने से पूर्व उनके यूटीएस उपकरण के माध्यम से निरीक्षण लिए गए । लगभग १ माह यह प्रक्रिया करने पर उन दोनों के पुन: निरीक्षण लिए गए । इन निरीक्षणों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया । इससे स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया करने से दोनों साधकों को क्या लाभ हुआ ?, यह ध्यान में आया ।

पाठकों को सूचना : स्थान के अभाव में इस लेख में यूटीएस उपकरण का परिचय, उपकरण द्वारा किए जानेवाले परीक्षण के घटक और उनका विवरण, घटक का प्रभामंडल नापना, परीक्षण की पद्धति और परीक्षण में समानता आने के लिए रखी सावधानियां यह नियमित सूत्र दैनिक सनातन प्रभात के जालस्थल की goo.gl/mxCxCn लिंक पर दी है । इस लिंक में कुछ अक्षर कैपिटल (Capital) हैं ।

 

२. स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया करने से एक साधक
और एक साधिका पर हुए परिणामों के निरीक्षण और उनका विवेचन

२ अ. नकारात्मक ऊर्जासम्बन्धी निरीक्षणों का विवेचन

स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया आरम्भ करने के पूर्व साधक में नकारात्मक ऊर्जा न होना और साधिका में बडी मात्रा में नकारात्मक ऊर्जा होना एवं प्रक्रिया करने के उपरांत साधिका में विद्यमान नकारात्मक ऊर्जा अत्यधिक घट जाना

प्रक्रिया आरम्भ करने के पूर्व और पश्‍चात साधक में इन्फ्रारेड और अल्ट्रावायलेट नकारात्मक ऊर्जा नहीं पाई गई । प्रक्रिया आरम्भ करने के पूर्व साधिका की इन्फ्रारेड नकारात्मक ऊर्जा मापते समय यूटीएस स्कैनर ने १८० अंश का कोण बनाया । इस नकारात्मक ऊर्जा का प्रभामण्डल १.०९ मीटर था । साधिका द्वारा १ मास प्रक्रिया करने के उपरान्त पुनः उसकी नकारात्मक ऊर्जा मापने पर वह बडी मात्रा में घटी हुई पाई गई । (इस समय स्कैनर ने केवल ४५ अंश का कोण बनाया । इस कारण इस ऊर्जा का प्रभामण्डल मापा नहीं जा सका ।)

२ आ. सकारात्मक ऊर्जासम्बन्धी निरीक्षणों का विवेचन

स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया करने पर दोनों साधकों में अल्प मात्रा में विद्यमान सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होना

सभी व्यक्ति, वास्तु अथवा वस्तुआें में सकारात्मक ऊर्जा होगी ही ऐसा आवश्यक नहीं । प्रक्रिया आरंभ करने के पूर्व दोनों साधकों में सकारात्मक ऊर्जा अत्यल्प मात्रा में थी । उस समय स्कैनर ने दोनों साधकों के लिए ३० अंश का कोण बनाया था । इन दोनों साधकों ने जब १ मास प्रक्रिया की, तो उनकी सकारात्मक ऊर्जा बढ गई । इस समय स्कैनर ने साधक और साधिका के लिए क्रमशः १२० एवं १०० अंश का कोण बनाया ।

२ इ. साधकों के प्रभामण्डल सम्बन्धी निरीक्षणों का विवेचन

स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया १ मास करने पर दोनों साधकों का प्रभामण्डल बढना

सामान्य व्यक्ति अथवा वस्तु का प्रभामण्डल लगभग १ मीटर होता है । प्रक्रिया आरम्भ करने से पहले साधक और साधिका का प्रभामण्डल क्रमशः १.५२ मीटर एवं १.५० मीटर था । प्रक्रिया १ मास करने पर उनका प्रभामण्डल क्रमशः १.७४ मीटर तथा १.६० मीटर हो गया, अर्थात दोनों का प्रभामण्डल क्रमशः २२ सें.मी. एवं १० सें.मी. बढ गया ।

 

३. परीक्षण के निरीक्षणों का अध्यात्मशास्त्रीय विश्‍लेषण

३ अ. साधिका में विद्यमान नकारात्मक ऊर्जा अत्यधिक घटने का
और उसकी सकारात्मक ऊर्जा बढने का कारण

प्रक्रिया करने के पूर्व इस साधिका की मानसिक स्थिति नकारात्मक थी । उसमें साधना के प्रति उत्साह घट गया था । उसने सात्त्विक स्थल अर्थात सनातन के रामनाथी स्थित आश्रम में आकर प्रक्रिया करने का निर्णय लिया और यह प्रक्रिया १ मास प्रभावीरूप से कर, उसके माध्यम से अपने नकारात्मक विचार करना इत्यादि स्वभावदोष दूर करने का प्रयास किया । इस विषय में उसे उन्नत साधक एवं संतों का मार्गदर्शन भी मिला । आश्रम में उसे साधना के लिए पोषक सात्त्विक वातावरण का भी लाभ हुआ । इस सात्त्विक वातावरण के कारण, उसपर आध्यात्मिक उपचार भी हुए । जिससे उसके आसपास विद्यमान नकारात्मक स्पन्दनों का विघटन होने लगा और उसमें सकारात्मक स्पंदन निर्माण होने लगे । प्रक्रिया १ मास करने के उपरांत यूटीएस स्कैनर द्वारा किए निरीक्षण से भी यही पाया गया कि साधिका की नकारात्मक ऊर्जा अत्यधिक घट गई है और सकारात्मक ऊर्जा बढ गई है । इस साधिका की व्यष्टि साधना का ब्यौरा लेनेवाली उन्नत साधिका ने भी यही बताया कि साधिका ने प्रक्रिया भलीभांति की । इसके कारण उसका उत्साह बढ गया और उसे आनन्द मिलने लगा । इस वैज्ञानिक परीक्षणसे यही सिद्ध होता है कि साधना के लिए पोषक वातावरण मिले और उसका लाभ उठाकर साधक प्रक्रिया मनःपूर्वक करे, तो उसे आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत लाभ होता है । हममें तीव्र स्वभावदोष हों, तो वातावरण की अनिष्ट शक्तियों के लिए हम में स्थान निर्माण कर, प्रवेश करना सरल होता है; अतएव अनिष्ट शक्तियों की पीडा से बचने के लिए प्रक्रिया करना आवश्यक है ।

३ आ. साधक द्वारा १ मास स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया करने पर
आरम्भ में नकारात्मक ऊर्जा न होते हुए भी, उसकी सकारात्मक ऊर्जा साधिका के अनुरूप न बढना
जिस कारण स्वभावदोष और अहं निर्मूलन हेतु साधिका की तुलना में उसके प्रयासों में अल्पता होना

परीक्षणमें सम्मिलित साधक ने भी रामनाथी स्थित सनातन के आश्रम में आकर १ मास प्रक्रिया की । साधना के लिए पोषक आश्रम के सात्त्विक वातावरण का उसे लाभ हुआ । इस कारण उसकी सकारात्मक ऊर्जा बढी; परन्तु इस साधक में परीक्षण के आरंभ में नकारात्मक ऊर्जा न होने पर भी, उसमें साधिका की तुलना में सकारात्मक ऊर्जा अधिक नहीं बढी । इस साधक की साधना का ब्यौरा लेनेवाली उन्नत साधिका ने बताया कि साधिका की तुलना में इस साधक के स्वभावदोष और अहं निर्मूलन के प्रयास अल्प है । यदि साधक साधिका की भांति प्रयास करता, तो उसे निश्‍चित ही अधिक लाभ होता । इस से यह भी ध्यान में आता है कि साधना के लिए सात्त्विक वातावरण के साथ ही साधना के लिए अपने क्रियमाण का भलीभांति उपयोग करना महत्त्वपूर्ण है ।

३ इ. साधिका की अपेक्षा साधक का प्रभामण्डल थोडा अधिक बढने का कारण

परीक्षण के आरम्भ में साधिका और साधक का प्रभामण्डल समान ही था । परीक्षण के आरम्भ में साधिका में अत्यधिक नकारात्मक ऊर्जा थी । साधना से निर्मित सकारात्मक ऊर्जा का उपयोग उसकी कष्टदायक शक्ति नष्ट करने में हुआ; इसलिए उसका प्रभामण्डल भी अल्प मात्रा में बढा ।

इसके विपरीत साधक में नकारात्मक ऊर्जा बिलकुल नहीं थी । इसलिए उसने स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन हेतु साधिका से भी अल्प मात्रा में प्रयास किए, तब भी उसे इस साधना का पूर्ण लाभ हुआ । जिसके कारण उसका प्रभामण्डल साधिका की तुलना में थोडा अधिक बढा ।

३ ई. साधना के लिए पोषक वातावरण की उपलब्धता, पूर्वकर्मों पर निर्भर होना;
परंतु साधना के प्रयास करने के लिए अपने क्रियमाण का पूर्णतः उपयोग करना आवश्यक होना

किसी भी साधक अथवा साधिका को साधना हेतु सात्त्विक वातावरण मिलना अथवा न मिलना, उसके पूर्वकर्मों पर निर्भर होता है; परन्तु साधना के अंतर्गत बताए प्रयास करना, उसमें नियमितता बनाए रखना, उन्नत साधक से मार्गदर्शन लेकर उसके अनुसार लगन से प्रयास करना, इसके लिए उस साधक अथवा साधिका द्वारा अपने क्रियमाण का पूर्णतः उपयोग करना आवश्यक है । इस परीक्षण में सम्मिलित साधिका ने प्रक्रिया करते समय जिस प्रकार साधना के प्रयास किए, यह प्रयास वह आगे भी करे, तो उसके नकारात्मक स्पन्दन पूर्णतः नष्ट हो सकते हैं और उसकी सकारात्मक ऊर्जा बढकर उसका सुपरिणाम उसके साथ ही आसपास के वातावरण पर भी हो सकता है । साधक में नकारात्मक स्पंदन बिलकुल भी न होने के कारण, वह यदि उस साधिका की भांति प्रयास करे, तो उसे साधना की दृष्टि से शीघ्र लाभ हो सकता है ।

– श्रीमती मधुरा धनंजय कर्वे, महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय, गोवा. (८.१.२०१८)
ई-मेल : [email protected]com

संदर्भ : सनातन का आगामी ग्रंथ स्वभावदोष और अहं की विविध अभिव्यक्तियों का विश्‍लेषण

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