दुष्टों के निर्दालन के लिए ब्राह्म तथा क्षात्र तेज का उत्तम उपयोग करनेवाले योद्धावतार भगवान परशुराम ! 

भगवान परशुराम की गुणविशेषताओं को विशद
करनेवाला यह लेख उनके चरणों में सविनय समर्पित !

 

१. सप्तचिरंजीवों में से एक

अश्‍वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्‍च बिभीषण:।
कृपः परशुरामश्‍च सप्तैते चिरजीविनः ॥

अर्थ : अश्‍वत्थामा, बली, महर्षि व्यास, हनुमान, बिभीषण, कृपाचार्य तथा परशुराम ये सप्त चिरंजीव हैं । परशुराम ने काल पर विजय प्राप्त की है । इसलिए वे सप्तचिरंजीवों में से एक हैं । प्रातःकाल उनका स्मरण करने से पुण्य की प्राप्ति होती है ।

 

२. श्रीविष्णु के छठे अवतार

सत्ययुग में मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह तथा वामन ये श्रीविष्णु के ५ अवतार हुए । त्रेतायुग के प्रारंभ में महर्षि भृगु के गोत्र में जामदग्नेय कुल में महर्षि जमदग्नी तथा रेणुकामाता के घर श्रीविष्णु ने अपना छठा अवतार लिया । उनका नाम परशुराम था । भार्गवगोत्री होने के कारण उन्हें भार्गवराम भी कहा जाता है ।

 

३. काल तथा काम पर विजय प्राप्त करनेवाले देवता !

रत्नागिरी जनपद के चिपळूण के निकट लोटे गांव के महेंद्र पर्वत पर भगवान परशुराम का प्राचीन मंदिर है । वहां भगवान परशुराम के पदचिन्ह जिस शिला पर उभरे हैं, उस शिला का नित्य पूजन होता है । इस शिला के पीछे ३ मूर्तियों की स्थापना की गई है । मध्यभाग में भगवान परशुराम की बडी तथा सुंदर मूर्ति है । उसकी दाहिनी ओर कालदेवता तथा बाईं ओर कामदेवता की छोटी मूर्तियां हैं । वे दर्शाती हैं कि भार्गवराम ने काल तथा काम पर विजय प्राप्त किया है ।

 

४. अखंड ब्रह्मचारी तथा परमवैरागी

भगवान परशुराम ने कामवासना पर विजय प्राप्त की थी । इस कारण वे अखंड ब्रह्मचारी हैं । परशुराम में प्रचंड विरक्ति थी । इसीलिए उन्होंने पूरी पृथ्वी जीतकर भी कश्यपऋषि को उदारता से वह दान कर दी और स्वयं महेंद्र पर्वत पर एकांत में रहकर संन्यस्त जीवन व्यतीत किया ।

 

५. अपराजित योद्धा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन
के विनाश के लिए परशुराम द्वारा किया गया अद्वितीय पराक्रम !

५ अ. परशुराम ने तपस्या कर सहस्रार्जुन कार्तवीर्य की अपेक्षा
अधिक तपोबल अर्जित करने से सूक्ष्म स्तर पर कार्तवीर्य सहस्रार्जुन की पराजय आरंभ होना

हैहैय वंश के अधर्मी राजा महिष्मति नरेश कार्तवीर्य सहस्रार्जुन ने सहस्रों वर्ष कठोर तपस्या कर, भगवान दत्तात्रेयजी को प्रसन्न किया था तथा असीम बलशाली बनकर सहस्रों भुजाएं धारण करने का वरदान प्राप्त किया था । ऐसे कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का नाश करना संभव हो; इसके लिए  उसके तपोबल की अपेक्षा अधिक तपोबल अर्जित करने हेतु परशुराम ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की । कार्तवीर्य के तपोबल को परास्त करने के लिए, परशुराम ने उससे अधिक कठोर तपस्या कर, एक प्रकार से ब्राह्मतेज के शस्त्र से, कार्तवीर्य के पुण्यबल पर ही  प्रहार कर उसे क्षीण कर दिया । इससे कार्तवीर्य की सहस्रों भुजाओं के माध्यम से कार्यरत सूक्ष्म कर्मेंद्रियों की दिव्य शक्ति निष्प्रभ होने लगी तथा अधर्म का प्रतीक बन चुके कार्तवीर्य का सूक्ष्म से पराजित होना प्रारंभ हुआ । कार्तवीर्य को पराजित करने के लिए भगवान परशुराम द्वारा किया गया आध्यात्मिक स्तर का युद्ध अद्वितीय है ।

५ आ. गोधन की चोरी करनेवालों का विनाश हो, यह संकल्प कर, उसे पूर्ण करना

कार्तवीर्य सहस्रार्जुन ने ऋषि दंपति के विरोध को अनदेखा कर, जमदग्नी आश्रम से कामधेनु को बलपूर्वक अपने साथ ले गया । इस प्रकार उसने गोमाता का अपहरण किया । जब यह घटना हुई, तब परशुराम आश्रम में नहीं थे । वे घनघोर वन में कठोर तपस्या में व्यस्त थे । जब वे जमदग्नी के आश्रम में पहुंचे, तब उनको घटना ज्ञात हुई । कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के नियंत्रण सेे कामधेनु को मुक्त कर, गोमाता तथा गोधन की रक्षा करने हेतु, उन्होंने गोधन की चोरी करनेवालों के विनाश का संकल्प लिया । उनकी शापवाणी सत्य सिद्ध हुई; क्योंकि गोधन चुराने का अपराध करने से कार्तवीर्य का पुण्यक्षय हुआ । जमदग्नी ऋषि पर प्राणघातक आक्रमण करने से कार्तवीर्य के पुत्रों को भी  पाप लगा । परशुराम ने कार्तवीर्य के कुल के विनाश करने का अपना संकल्प पूर्णकर गोमाता को मुक्त किया और आदरपूर्वक उसे पुनः जमदग्नी के आश्रम ले आए ।

५ इ. कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का अंतकाल निकट आते ही, उसपर परशु से स्थूल से
वार करना तथा शिवजी द्वारा प्रदान किए गए परशू का शस्त्र के रूप में उपयोग आरंभ करना

कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का पुण्यक्षय हो चुका था । आध्यात्मिक स्तर पर वह पूर्णतः पराजित हो चुका था, इसलिए स्थूल से उसका अंतकाल समीप आ गया । उसका अंतकाल समीप आते ही, भगवान परशुराम ने सहस्रार्जुन पर स्थूल से परशु से वार कर, उसकी सहस्र भुजाओं को काट डाला तथा उसके पश्‍चात उसका शिरच्छेद किया । इस प्रकार भगवान परशुराम ने क्षत्रियों के निर्दालन हेतु महाकालेश्‍वर शिवजी द्वारा प्रदान किए परशु का शस्त्र के रूप में उपयोग करना आरंभ किया ।

 

६. भगवान परशुराम द्वारा किए गए अपूर्व अवतार-कार्य तथा पराक्रम के प्रमुख उदाहरण

६ अ. २१ बार पृथ्वी परिक्रमा कर संपूर्ण पृथ्वी को निःक्षत्रिय करना

भगवान परशुराम ने संपूर्ण पृथ्वी की २१ बार परिक्रमा की और पृथ्वी पर उन्मत्त बने अहंकारी तथा अधर्मी क्षत्रियों का नाश किया । इस प्रकार पृथ्वी परिक्रमा कर, उन्होंने पृथ्वी के भार को हलका किया तथा उसके साथ ही पृथ्वी परिक्रमा का पुण्य भी प्राप्त किया ।

६ आ. सहस्रों क्षत्रिय तथा लाखों की सेना के साथ अकेले युद्ध का सामर्थ्य

प्रजा का उत्पीडन कर संपूर्ण पृथ्वीपर ऊधम मचानेवाले क्षत्रियों की संख्या सहस्रों में थी । उनके पास लाखों अक्षौहिणी सेना का बल था । भगवान परशुराम नरदेह में साक्षात् श्रीमन्ननारायण ही थे । उसके कारण उनमें सहस्रो क्षत्रिय तथा लाखों की सेना के साथ अकेले युद्ध करने का अपूर्व सामर्थ्य था ।

६ इ. दानवीर

एकछत्र सम्राट की भांति अखिल भूमि के अधिपति होते हुए भी, अश्‍वमेध यज्ञ के समय परशुराम ने यज्ञ के अध्वर्यू महर्षि कश्यप को संपूर्ण पृथ्वी दान की । इससे परशुराम कितने दानवीर थे, यह दिखाई देता है ।

६ ई. नवसृष्टि का निर्माण करना

भगवान परशुराम ने केवल ३ कदमों में ही समुद्र को पीछे ढकेलकर क्षणार्ध में परशुराम भूमि का निर्माण किया तथा चिता से चित्पावन ब्राह्मणों की उत्पत्ति कर, परशुराम क्षेत्र की नई सृष्टि ही साकार की ।

 

७. शत्रु के निर्दालन के लिए ब्राह्म तथा क्षात्र तेजका उत्तम
उपयोग करनेवाले श्रेष्ठतम योद्धा के उत्तम उदाहरण भगवान परशुराम !

अग्रत: चतुरो वेदा: पृष्ठत: सशरं धनु: ।
इदं ब्राह्मम् इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ॥

अर्थ : जिसके मुख में ४ वेद, पीठ पर बाणों सहित धनुष्य है, वे परशुराम शाप देकर अथवा बाण से शत्रु का नाश करते हैं ।

परशुराम ने शास्त्रबल तथा शस्त्रबल अर्थात बाहुबल इन दोनों के संयोग से रिपुदमन किया । आध्यात्मिक परिभाषा में ज्ञानबल का अर्थ ब्राह्मतेज तथा बाहुबल का है अर्थ क्षात्रतेज । परशुराम ने ब्राह्मतेज के बल पर शाप देकर, अर्थात संकल्प से तथा क्षात्रतेज के बल पर परशु से वार कर, अर्थात प्रत्यक्ष प्रहार से शत्रु का नाश किया । इस प्रकार भगवान परशुराम शत्रु के निर्दालन के लिए ब्राह्म तथा क्षात्र इन दोनों तेजों का उत्तम उपयोग करनेवाले श्रेष्ठतम योद्धा के उत्तम उदाहरण हैं ।

 

८. जन्म से ब्राह्मण होते हुए भी कालानुसार आवश्यक क्षत्रियों के कर्तव्य निभाना

महर्षि जमदग्नी का वर्ण ब्राह्मण तथा रेणुकामाता का वर्ण क्षत्रिय था । परशुराम जन्म से ब्राह्मण; परंतु गुण तथा कर्म से क्षत्रिय थे । इसलिए उन्होंने क्षत्रिय वर्ण के अनुसार आचरण करते हुए, क्षात्रधर्म का पालन कर दुर्जनों का नाश किया । भगवान परशुराम कालानुसार समष्टि साधना के तथा वर्ण के अनुसार क्षात्रधर्म साधना के उत्तम उदाहरण हैं ।

पिता की भांति ब्राह्मतेज तथा माता की भांति क्षात्रतेजयुक्त परशुराम योद्धावतार हैं । ब्रह्मवृंद को समाप्त करने के लिए ,उनके आश्रम तथा गुरुकुल की उज्ज्वल परंपरा ध्वस्त करनेवाली अन्यायपूर्ण राजसत्ता को दोनों तेजों से संपन्न परशुराम ने चुनौती दी । वैदिक ज्ञान का ब्राह्मतेज तथा शस्त्ररूपी क्षात्रतेज द्वारा परशुराम ने अधर्म का निर्मूलन किया । दुष्टों को शाप देकर अथवा शस्त्र से वार कर कठोर दंड दिया । इस प्रकार भगवान परशुराम ने कालानुसार आवश्यक क्षत्रियों के कर्तव्य निभाए ।

 

९. कर्नाटक की तुंगभद्रा नदी के तट पर बसे तीर्थस्थल तीर्थहळ्ळी की महिमा

पिता जमदग्नी ऋषि की आज्ञा से परशुराम ने अपनी माता रेणुका का शिरच्छेद किया । परशुराम की प्रार्थना के पश्‍चात जमदग्नी ऋषि ने रेणुका को पुनर्जीवित किया; परंतु परशुराम की परशु से लगा रेणुकामाता का रक्त,  किसी भी नदी अथवा सरोवर के जल से धुल नहीं रहा था । भगवान परशुराम भ्रमण करते-करते कर्नाटक में तुंगभद्रा नदी के तट पर बसे क्षेत्र में पहुंचे । वहां तुंगभद्रा नदी के जल में परशु धोनेपर परशु पर लगा शोणित धुल गया । तब से यह स्थान तीर्थहळ्ळी के नाम से विख्यात हुआ । इस तीर्थस्थान के तुंगभद्रा के जल में समस्त पापों के शमन का सामर्थ्य है तथा इस जल का स्वाद भी अत्यंत मधुर है ।

 

१०. शिव तथा दत्त को गुरु मानकर उनकी कृपा प्राप्त करना

परशुराम ने शिव तथा दत्तात्रेय को गुरु मानकर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया था । उन्होंने कैलास पर १२ वर्ष वास कर, गुरु रूपी शिवजी से गायत्री उपासना द्वारा युद्धकौशल, एकाग्रता, शस्त्रकाला, अस्त्रविद्या तथा तंत्रविद्या सहित वेदों का ज्ञान तथा आत्मज्ञान प्राप्त किया । उसी प्रकार भगवान दत्तात्रेय को गुरु मानकर उन्हें प्रसन्न किया तथा उनकी कृपा से हठयोग, शक्तिपातयोग तथा ध्यानयोग के गूढ रहस्य समझ लिए ।

 

११. संपूर्ण अवतारकाल में सर्वाधिक क्षात्रोपासना करने का एकमात्र उदाहरण

क्षत्रियों की उन्मत्तता के कारण गुरुकुल की परंपरा, आश्रम व्यवस्था तथा ऋषि जीवन त्रस्त  था । परंपरा, संस्कृति तथा धर्म को क्षत्रियों के उत्पीडन से बचाना अत्यंत आवश्यक था । अतः भगवान परशुराम ने शिवजी द्वारा आशीर्वाद के रूप में प्रदान किए परशु, धनुष-बाण तथा शापमय वाणी का शत्रु पर वार करने के लिए शस्त्र की भांति उपयोग कर, कार्तवीर्य सहस्रार्जुन सहित सभी उन्मत्त क्षत्रियों का नाश किया । अपने संपूर्ण अवतारकाल में सर्वाधिक क्षात्रोपासना का एकमात्र उदाहरण भगवान परशुराम हैं । भगवान परशुराम के चरणों में शिरसाष्टांग नमस्कार !

–  कु. मधुरा भोसले, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा (२.५.२०१५)

 

१२. भगवान परशुरामजी ने इस प्रकार से की अपरान्त भूमि की निर्मिति !

विश्‍वविजय प्राप्त कर भार्गवरामजी (भगवान परशुराम) पृथ्वी के अजेय चक्रवर्ति सम्राट बन गए । उन्होंने अपने राजेश्‍वर्य को शोभा देगा, इस प्रकार का वैभवसंपन्न विश्‍वजीत महायज्ञ किया । उन्होंने संतोष के साथ इस यज्ञ के यजमानपद का निर्वहन किया और इस उपलक्ष्य में अपनी सभी संपत्ति का दान दिया । उन्होंने अपने पास केवल शस्त्रविद्या और शरीर ही शेष रखकर जीती हुई पृथ्वी भी कश्यपों को दान में दे दी ।

उसके पश्‍चात कश्यपों ने उन्हें उनपर के और एक नैतिक दायित्व का उन्हें स्मरण दिलाया । धर्मशास्त्र के अनुसार दान में दिए गए वस्तुओं का उपभोग नहीं करना होता है । कश्यपों ने उन्हें बताया, ‘‘हे राम, आपने समस्त पृथ्वी को दान में देकर उसका स्वामित्व त्याग दिया है । अतः आपको इस भूमिपर निवास का अधिकार नहीं है ।’’ परशुरामजी ने उनका कहना तुरंत मान लिया और अपने निवास हेतु नई भूमि बनाने के विचार से समुद्र को कुछ दूरीतक पीछे हटने का अनुरोध किया ।

जब समुद्र पीछे नहीं हटता, यह देखकर उन्होंने धनुष्य को बाण लगाकर उसे समुद्रपर छोडकर उससे कहा, ‘‘यह बाण पश्‍चिम दिशा में जिस स्थानपर जाकर गिरेगा, उतनी चौडाईवाला और सह्याद्रि पर्वत की लंबाईवाला प्रदेश तुम मुझे प्रदान करो !’’ तब समुद्र का जो भाग भूतल के उपर आ गया, उस भूमि को अपरान्त कहा जाता है । कन्याकुमारी से लेकर उत्तर में भृगुकच्छतक का यह प्रदेश है ।

संदर्भ ग्रंथ : वैश्‍वानर अवतार ग्रंथकर्ता : डॉ. श्रीकांतजी राजीमवाले
साभार : वेदावती पारखे-उरणकर

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