गुढी : महत्त्व तथा गुढी के लिए प्रार्थना !

त्योहार तथा उत्सवों का रहस्य ज्ञात होने से उन्हें अधिक आस्था के साथ मनाया जा सकता है । अतः इन लेखों में इस त्योहार का रहस्य तथा शास्त्र की जानकारी देनेपर विशेष बल दिया गया है । हिन्दू नववर्ष अर्थात गुढी पाडवा को गुढी क्यों खडी की जाती है ?, युद्ध और गुढी का परस्पर संबंध तथा गुढीपाडवा के दिन कौनसी प्रार्थना की जाती है, इसकी जानकारी इस लेख में दे रहे है ।

१. प्रजापति तरंगों का सबसे अधिक लाभ उठाना संभव होना

गुढी खडी करने से वातावरण में व्याप्त संयुक्त प्रजापति तरंगे इस कलशरूपी सूत्र की सहायता से घर में प्रवेश करती हैं । (जैसे दूरदर्शन का एंटिना कार्य करता है, वैसा ही यह है) दूसरे दिन से इस कलश में पीने के लिए पानी लेने से प्रजापति तरंगों से भारित कलश उसमें रखे गए पानीपर उसी प्रकार से भारित करता है, जिससे कि संपूर्ण वर्षतक हमें प्रजापति तरंगें प्राप्त होती हैं । इन तरंगों में प्रजापति तरंगों की मात्रा ८० प्रतिशत होती है, तो सूर्य, यम तथा संयुक्त तरंगों का अनुपात क्रमशः १०, ८ और २ प्रतिशत होता है । संपूर्ण वर्ष में अन्य किसी भी समय में इन तरंगों की मात्रा इतनी नहीं होती । प्रजापति तरंगों के कारण वनस्पतियों के अंकुरित करने की भूमि की क्षमता बढना, बुद्धि का प्रगल्भ होना तथा कुआें में नए झरने उत्पन्न होना इत्यादि परिणाम मिलते हैं ।

२. ब्रह्माजी से सत्त्वगुण, चैतन्य,ज्ञानतरंगें तथा सगुण-निर्गुण ब्रह्मतत्त्व का
५० प्रतिशत से अधिक प्रक्षेपण होना तथा उनको ग्रहण करने के लिए गुढी खडी की जाना

अन्य दिनों की अपेक्षा गुढीपाडवा को ब्रह्माजी से सत्त्वगुण, चैतन्य, ज्ञानतरंगें तथा सगुण-निर्गुण ब्रह्मतत्त्व का ५० प्रतिशत से भी अधिक प्रक्षेपण होता है । इस प्रक्षेपण को ग्रहण करने के लिए गुढी पाडवा के दिन घर के सामने गुढी खडी की जाती है । गुढी खडी करने से उसके माध्यम से सत्त्वगुण, चैतन्य, ज्ञानतरंगें तथा सगुण-निर्गुण ब्रह्मतत्त्व सहजता से घर में प्रवेश कर सकते हैं । गुढी में ब्रह्मतत्त्व का प्रवेश होनेपर गुढी को लगाई गई फूलों की मालाएं, चीनी की माला, तांबे का कलश तथा आम के पत्तों में यह तत्त्व आकर्षित होता है तथा ये वस्तुएं ब्रह्मतत्त्व से संपृक्त बन जाती हैं । इनमें से ग्रहण करनेयोग्य वस्तुआें का ग्रहण करने से अथवा उनको वास्तू में रखने से जीव को उनका लाभ मिलता है तथा उसकी प्रत्येक कोशिका में ब्रह्मतत्त्व को प्रवेश करना सरल हो जाता है । दिनभर (सूर्यास्ततक) द्वार के सामने गुढी खडी करने से सत्त्वगुण, चैतन्य, ज्ञानतरंगें तथा सगुण-निर्गुण ब्रह्मतत्त्व दिनभर घर में आते रहते हैं तथा संग्रहित किए जाते हैं । वास्तु में रहनेवाले तथा उस वास्तू में आनेवाले प्रत्येक जीव को उनका पूरे वर्षतक लाभ मिलता है । ब्रह्मतत्त्व से होनेवाले सूक्ष्म-प्रक्षेपण का जीव को पूरे वर्षतक लाभ पहुंचे, इसलिए उसमें न्यूनतम ४० प्रतिशत भाव का होना आवश्यक है । जीव में जितना अधिक भाव हो, उतना उसे प्रत्येक त्योहार का तथा ईश्‍वर की ओर से समय-समयपर प्रक्षेपित होनेवाली ज्ञानतरंगें, शक्ति, चैतन्य की तरंगें, सत्त्वतरंगें तथा विशिष्ट देवताआें की तरंगों का संपूर्णरूप से लाभ मिलता है ।

–  ईश्‍वर (कु. मधुरा भोसले के माध्यम से, ९.३.२००५, सुबह १०.३० से दोपहर १२.०१)

३. युद्ध तथा गुढी का संबध

अ. युद्ध के प्रत्येक स्तरपर गुढी खडी करने का कारण

गुढी विजय की दर्शक होती है । ईश्‍वर के षड्गुणों में से यश गुण के कारण देवासुरों के युद्ध में देवताआें की पहले ही तथा प्रत्येक स्तरपर विजय हुई है । इसे दर्शाने के लिए युद्ध के प्रत्येक स्तरपर गुढी खडी की जाती है ।

आ. युद्ध में गुढी का उपयोग करने से उच्च देवताआें द्वारा तत्त्वरूपी आशीर्वाद प्राप्त होना

इस प्रकार से खडी की गई गुढी को लगाए गए वस्त्र की भांति उससे आवश्यकता के अनुसार शक्ति, भाव, चैतन्य, आनंद तथा शांति के तरंग प्रक्षेपित होकर सभी को उसका लाभ पहुंचता है । उच्च लोकों से ब्रह्मांड में प्रक्षेपित होनेवाली सूक्ष्मतम स्तर की तरंगें गुढी खडी करने से उसकी ओर आकर्षित होकर देवसैनिकों को उसका लाभ पहुंचता है । गुढी खडी करने से उसमें निकलनेवाले चैतन्य के बलपर देवसैनिक महा-असुरों के साथ ही निर्भयता के साथ युद्ध कर विजयी हो जाते हैं । इस प्रकार से ब्रह्मदेव, महादेव तथा श्रीविष्णु के देवताआें को मिलनेवाले आशीर्वादजन्य तत्त्वतरंगों के कारण युद्ध में देवताआें का अप्रत्यक्ष रूप से अंतर्भाव होता है ।

४. गुढीपाडवा के दिन की जानेवाली प्रार्थना

गुढी को प्रार्थना करते समय 

हे ईश्‍वर आज आपसे आनेवाले शुभाशिर्वाद तथा ब्रह्मांड से आनेवाली सात्त्विक तरंगों को अधिकतम ग्रहण कर लेना मेरे लिए संभव हो । मुझ में इन तरंगों को ग्रहण करने की क्षमता नहीं है । मैं आपकी चरणों में संपूर्ण रूप से शरणागत हूं । आप ही मुझे इन सात्त्विक तरंगों को ग्रहण करने की शिक्षा दें, यही आपके चरणों में प्रार्थना है !

– ईश्‍वर (श्री. माने के माध्यम से, १३.३.२००६, रात में)