हिन्दू संस्कृति के प्राण भगवान सूर्यनारायण की विविध फलदायी सूर्योपासना !

 रथसप्तमीके निमित्त…

सूर्य की उपासना भारतवर्ष का प्राण है । हमारे ऋषि-मुनियों ने साधना कर सूर्योपासना के लाभ प्राप्त किए हैं । रथसप्तमी के पावन पर्व पर भगवान सूर्यनारायण से संबंधित गहन, शास्त्रीय और आध्यात्मिक जानकारी आगे दे रहे हैं ।

१. भगवान सूर्यनारायण धर्मपरायण हैं, अतः उनका आदर्श लेना आवश्यक !

पृथ्वी के मनुष्यप्राणी को प्रत्यक्ष आंखों से दिखाई देनेवाले देवता भगवान सूर्यनारायण हैं । सूर्यनारायण पृथ्वी के सर्व जीवों का एकमात्र आधार हैं, उनके निवास स्थान को सूर्यलोक कहते हैं । हम सभी को सूर्यदेव का आदर्श लेना चाहिए; क्योंकि सूर्यदेव अपना नित्यक्रम (धर्माचरण) कभी परिवर्तित नहीं करते । धर्मलोक में भी सूर्यनारायण का विशेषण देकर उनका सम्मान किया जाता है, वे धर्मपरायण भी हैं । इसलिए आदर्श होना चाहिए, तो केवल सूर्यदेव का ! सूर्यदेव हिन्दू संस्कृति के प्राण हैं । अन्य किसी भी संस्कृति और सनातन संस्कृति में यह एक बडा अंतर है । सूर्यदेव पंचांग के आधारात्मा हैं ।

रथसप्तमी व्रत(video)

२. सूर्यदेव ब्रह्मांड के नियंत्रक हैं । इसलिए भारतवर्ष के
ऋषिमुनियों, सिद्ध महात्मा और संतों ने सूर्योपासना का नियम बनाया है ।

सूर्य सर्वाधिक तेजस्वी, सामर्थ्यवान, युक्तिवान, बुद्धिमान और सर्वज्ञ सृष्टि के चालक हैं तथा वे संपूर्ण ब्रह्मांड के नियंत्रक हैं । सूर्य के ऊगने से संपूर्ण सृष्टि अपनेआप ही जागृत होकर चैतन्यमय हो जाती है; इसलिए सूर्यास्त के पश्‍चात प्रत्येक घर में तुलसी के पास दीपक जलाए जाते हैं । सूर्यदेव अपना तेज और शक्ति सायंकाल पूजाघर में जलाए जानेवाले दीपक को दे जाते हैं; इसलिए सायंकाल पूजाघर में दीपक जलाना चाहिए । सभी हिन्दुआें का दिन सूर्योदय से प्रारंभ होता है तथा सूर्यास्त के पश्‍चात समाप्त होता है । इसलिए भारतवर्ष के ऋषिमुनियों, सिद्ध महात्माआें और संतों ने सूर्योपासना का नियम बनाया है ।

३. सभी का उद्धार करने की शिक्षा देनेवाले आदर्श शिक्षक – सूर्यनारायण !

सूर्यदेव पृथ्वी पर स्थित हवा, जल, अग्नि, तेज, उष्णता, शुद्धता, स्वच्छता और पवित्रता का स्रोत हैं । प्रतिदिन इन सभी घटकों की संयुक्त प्रक्रिया एवं सूर्यकिरणों के माध्यम से वातावरण शुद्ध बनता है तथा जीवसृष्टि की रक्षा होने में सहायता होती है । सूर्यदेव यह कार्यपालन अखंड कर रहे हैं । इसलिए कार्यपालन का मर्म सूर्योपासना से सीखकर पृथ्वी पर हम सभी का उद्धार करने की शिक्षा देनेवाले आदर्श शिक्षक सूर्यनारायण सिद्ध होते हैं ।

४. सूर्यदेव की आध्यात्मिक विशेषताएं

४ अ. कर्तव्यपरायणता

सूर्यदेव मानवी शरीर को अंतर्यामी प्रेरणा देते हैं तथा सभी को जागृत होने का संदेश देकर अपनी कर्तव्यपरायणता सिद्ध करते हैं । इसलिए सूर्यदेव के रूप में उनकी अत्यधिक आदर सहित पूजा की जाती है ।

४ आ. आत्मशक्ति के आध्यात्मिक प्रेरक

यद्यपि विज्ञानवादी सूर्य को एक तप्त गोला मानते हैं, तथापि वास्तव में सूर्य आत्मशक्ति का प्रेरक है ।

४ इ. नम्रता

१. सूर्य की किरणें सभी को नमस्कार करने की प्रेरणा देती हैं । इसलिए आपस में राम, राम, नमस्कार आदि शब्दों के भावपुष्पों से सुबह भरी हुई दिखाई देती है ।

२. सूर्यदेव महान हैं, तब भी उनकी किरणें पृथ्वी पर स्थित क्षुद्र जीवजंतु और मनुष्य के चरणों को स्पर्श कर हम सभी को नम्रता की सीख देते हुए प्रेरित करती हैं ।

४ ई. आज्ञापालन, शरणागति और तत्परता

सूर्यनारायण प्रारंभ किया हुआ तथा अपूर्ण कर्म वैसा ही छोडकर अस्त हो जाते हैं । उनकी इस क्रिया से आज्ञापालन, शरणागति, निरंतर वर्तमान काल में रहना सीखने को मिलता है । इस प्रकार वे सुझाते हैं कि मानव को तत्परता यह गुण आत्मसात करना चाहिए ।

४ उ. निरपेक्षता और अनासक्ति

सूर्यदेव कर्मपूर्ति की अपेक्षा अथवा प्रतीक्षा कभी नहीं करते । उनमें कर्मासक्ति और फलासक्ति शेष नहीं रहती । सूर्यदेव अपनी किरणें एक क्षण में समेट लेते हैं । बडों-बडों के लिए भी यह करना कभी संभव नहीं है । यही सूर्यनारायण की असामान्यता है ।

सूर्याद्भवन्ति भूतानि सूर्येण पालितानि तु ।
सूर्ये लयं प्राप्नुवन्ति यः सूर्यः सोऽहमेव च ॥ – सूर्योपनिषद्

अर्थ : ईश्‍वर कहते हैं कि सूर्य से ही प्राणिमात्र की निर्मिति होती है, उनकी कृपा से उनका पालनपोषण होता है तथा उन्हीं में सभी का लय होता है ।

४ ऊ. सर्वदेवमय

सूर्यदेव संपूर्ण भुवन के प्रकाशमान, तेजस्वी देवता के रूप में जाने जाते हैं, तथापि सूर्यदेव सर्वदेवमय ही हैं । ब्रह्मा, विष्णु, महेश, स्कंद, प्रजापति, महेंद्र, वरुण, काल, यम, सोम आदि वे ही हैं ।

मित्र नामक देवता सूर्य के दिनभर के तथा वरुण नामक देवता रात्रि के हैं: इसलिए सूर्यास्त के उपरांत रात्रि प्रारंभ होते ही तमोगुणी रूपी निद्रा निरंकुश हो जाती है । अहंकार के देवता भी रात्रि ही है । इसलिए रात्रि में भयंकर उत्पात घटते हैं । देवतास्वरूप सूर्यनारायण भगवान शंकरजी की आज्ञा से प्रतिदिन भ्रमण करते हैं ।

४ ए. सूर्य का स्थूल, सूक्ष्म और आध्यात्मिक स्वरूप

सूर्य का स्थूल रूप सूर्यमंडल, सूक्ष्म रूप तदन्तर्यामीपुरुष तथा आध्यात्मिक स्वरूप हमारे नेत्रों की ज्योती (नेत्रज्योती) है ।

४ ऐ. आयुर्दान करना

संपूर्ण संसार को सूर्यदेव आयुर्दान करते हैं; इसलिए भी सूर्य को आदित्य सूर्यनारायण कहते हैं ।

४ ओ. ब्रह्मांड का सर्व ज्ञान सूर्य के पास होना

ब्रह्मांड का संपूर्ण ज्ञान अकेले सूर्य के पास उपलब्ध है । हनुमानजी ने भी यह संपूर्ण ज्ञान सूर्यदेव से प्राप्त किया था; इसलिए बाल्यावस्था में हनुमानजी ने सूर्य की ओर उडान भरने का प्रसंग है ।

४ औ. कर्मठ और कर्मकुशल

सूर्यदेव अखंड कार्यरत रहते हैं तथा वे अत्यंत कर्मठ और कर्मकुशल होने के कारण उनसे योगः कर्मसु कौशलम । अर्थात समत्वरूपी योग साध्य करना ही कर्म की कुशलता है, इस तत्त्व का उदय हुआ है । सूर्यदेव की यही सीख मानव के लिए है ।

४ अं. तेजोमय

सूर्यदेव धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर निरंतर चलते हैं, इसलिए उनका तेज कभी लुप्त नहीं होता । उनकी कांति (शरीर) तप्त स्वर्ण के समान है; इसलिए उनकी किरणों को सुनहरी किरणें कहा जाता है ।

४ क. विश्‍व के साक्षीदेव

सूर्यदेव १४ भुवनों के पालक हैं तथा वे विश्‍व के साक्षीदेव के रूप में कार्यरत हैं ।

४ ख. सर्व देवताआें के नियामक

सूर्यदेव का सबसे बडा गुण यह है कि उन्हें आलस्य कभी स्पर्श नहीं कर पाता । सूर्यदेव अन्य सर्व देवताआें के नियामक हैं ।

४ ग. चराचर सृष्टि की आत्मा

सृष्टि के सर्व आकार और रंग सूर्य से ही उत्पन्न हुए हैं । सूर्य जैसी जीवनशक्ति अन्य कोई नहीं है । सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्‍च । अर्थात सूर्य चराचर सृष्टि की आत्मा हैं, ऐसा उनका वर्णन है ।

४ घ. विराट पुरुष का नेत्र

संसार के सर्व कर्म, व्यवहार सूर्य की दृष्टि से छूट नहीं सकते । सूर्यदेव विराट पुरुष का नेत्र हैं तथा आकाश का अलंकार हैं । सूर्य का प्रकाश जैसे अमूर्त अग्निदेवता का मुख है ।

४ च. दोपहर १२ बजे अहंकार का स्मरण होना

सूर्यदेव को दोपहर १२ बजे अपने अहंकार का स्मरण होता है; परंतु उनका अहंकार कुछ क्षणों में नष्ट हो जाता है तथा उनका नीचे की ओर मार्गक्रमण प्रारंभ होता है ।

४ छ. सूर्यदेव के चरण सदैव ढंके हुए होते हैं । विश्‍वकर्मा ने सूर्यदेव के तेज से ही सुदर्शन चक्र का निर्माण किया है ।

४ ज. सूर्यदेव के कान होते हैं, अतः वे अपनी प्रार्थना सुन सकते हैं ।

५. सूर्यदेव के १२ अवतार

सूर्यदेव के १२ अवतार हैं । इंद्र, धाता, त्वष्टा, पूषा, अर्यमा, भग, विवस्वान, विष्णु, अंशुमान, वरुण, मित्र और पर्जन्य ऐसे बारह रूप हमें दिखाई देते हैं ।

६. सूर्य की उपासना

सूर्य को लाल कन्हेर का पुष्प चढाएं । सूर्यपूजन में जाही का फूल श्रेष्ठ है । सूर्य को मोदक का भोग लगाएं ।

७. सूर्योपासना से होनेवाले लाभ

७ अ. स्वास्थ्य उत्तम रहना

आरोग्यं भास्करात् इच्छेत् । अर्थात सूर्य से स्वास्थ्य की मांग करनी चाहिए, अर्थात सूर्योपासना कर स्वास्थ प्राप्त करना चाहिए, ऐसा वचन है । अन्य देवताआें की उपासना का आधार केवल सूर्योपासना ही है; इसलिए जो उत्तम स्वास्थ्य प्राप्ति का इच्छुक है, वह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करे तथा ऊगते सूर्य को अर्घ्य देकर प्रतिदिन नमस्कार करे ।

७ आ. विजय प्राप्त होना

सूर्योपासना करने से सर्व विषयों में, व्यापार में, धंधे में विजय मिलती है । अन्य उपासना की अपेक्षा सूर्योपासना शीघ्र फलप्राप्ति करवाती है । सूर्योपासना करने से सर्वज्ञता प्राप्त हो सकती है । प्रत्यक्ष प्रभु रामचंद्रजी ने भी रावण के साथ युद्ध में विजयी होने के लिए अगस्ति ऋषि के कहने पर आदित्यहृदय स्तोत्र का पाठ किया था । तत्पश्‍चात ही विजय प्राप्त की ।

७ इ. सूर्योपासना करने से मनुष्य संकट से मुक्त होता है, यह अगस्ति ऋषि ने बताना

सूर्योपासना के संबंध में अगस्ति ऋषि कहते हैं कि भीषण संकट में, भयंकर परिस्थिति में, निर्जन वन में, घोर प्रसंग में, महासागर में कीर्तन, प्रार्थना, पूजा, अर्चना कर मानव संकट से सहज मुक्त हो सकता है । सूर्यदर्शन से अपवित्र मानव भी पवित्र हो जाता है । प्रत्यक्ष आंखों से दिखाई देनेवाले इस देवता की शक्ति जानिए ।

७ ई. विकारों की दासता नष्ट होकर मनुष्य का संतपद तक मार्गक्रमण करना

सूर्यदेव वेदों के भी परमात्मा हैं । सूर्योपासना वैदिक संस्कृति का मूलाधार है; इसलिए ही हिन्दू धर्मीय विकारों की दासता नष्ट कर पा रहे हैं तथा पृथ्वीपर संतपद तक मार्गक्रमण कर रहे हैं ।

७ उ. रोगों का निवारण होना

सूर्योपासना करने से प्रतिदिन वायुमंडल, वातावरण शुद्ध होता है तथा रोगों का निवारण होता है । यह सूर्य पृथ्वी से ९ करोड मील की दूरी पर है, तब भी सूर्य का प्रभाव इस पृथ्वी पर निरंतर बना हुआ है । सूर्योपासना से कर्करोग (कैंसर) जैसा भयंकर रोग भी ठीक हो जाता है ।

७ ऊ. बल प्राप्त होना और अनिष्ट शक्तियों की पीडा दूर होना

सूर्य की उपासना करने से बल, शक्ति, स्मरण, तेज, ज्ञान, वीरता और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है । इस उपासना से बुरे स्वप्न दिखाई नहीं देते तथा अनिष्ट ग्रहों की पीडा दूर होती है । इस उपासना से किसी भी व्रत को हानि पहुंचानेवाली अनिष्ट शक्तियों का नाश हो सकता है ।

७ ए. भविष्यकाल जानने की सिद्धि प्राप्त होना

सूर्य की सविता नामक शक्ति का लाभ साधक को मिलता है । सूर्य की उपासना करने से संसार के सभी का भविष्य जानने की सिद्धी प्राप्त होती है ।

७ ऐ. यज्ञ करने का फल मिलना

जिस घर में, परिवार में प्रतिदिन सूर्य की आराधना की जाती है, वहां प्रतिदिन एक यज्ञ होता है । प्रतिदिन दुर्वा चढाकर सूर्य की पूजा करने से यज्ञ करने का फल मिलता है ।

सूर्य का दुग्धाभिषेक करने से विलक्षण सुख प्राप्त होता है । सूर्योपासना करने से ही ऋषि तेजस्वी बन पाए ।

७ ओ. सूर्यदेव सुबह ब्रह्मदेव, दोपहर में विष्णु तथा दो प्रहर के उपरांत रुद्र (शंकर) होते हैं ।

सूर्यदेव सुबह ब्रह्मदेव, दोपहर विष्णु तथा दो प्रहर के उपरांत रुद्र (शंकर) होते हैं ।

७ औ. कुल के सात पुरुष सूर्यलोक जाना

सूर्य मंदिर बनानेवाले व्यक्ति अपने कुल के सात पुरुषों को सूर्यलोक ले जाते हैं ।

७ अं. अंध मनुष्य को उत्तम नेत्र प्राप्त होना

भाव-भक्ति पूर्ण किया हुआ एक ही नमस्कार सूर्य की कृपा संपादन करने हेतु पर्याप्त है । सूर्य को त्रिकाल धूप-दीप दिखाने से अंध मनुष्य को भी उत्तम नेत्र प्राप्त होते हैं ।

७ क. उपासना करने से होनेवाले लाभ के उदाहरण

सूर्य से ही कुंती को स्वर्णकवच कुंडलधारी कर्ण प्राप्त हुआ तथा द्रौपदी को अन्नथाली मिली एवं सांबा का कुष्ठ रोग ठीक हो गया ।

८. इच्छित फल देनेवाला रथसप्तमी का व्रत !

रथसप्तमी को रविवार को उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्र पर आदित्यदेव (सूर्यदेव) प्रकट हुए । इसलिए रथसप्तमी श्रेष्ठ तिथि मानी जाती है । इस दिन सूर्यदेव अधिक आनंदी होते हैं तथा आप जो मांगते हैं, वह आपको देते हैं । श्रद्धालुआें की श्रद्धा है कि रथसप्तमी का उपवास करनेवाले को स्वप्न में सूर्यदेव के दर्शन होते हैं । रथसप्तमी और सूर्य की यह महानता है । सूर्यदेव के चरणों में कोटि-कोटि नमन !

– प्रा. श्रीकांत भट, अकोला (४.२.२०१४)

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