अनुक्रमणिका
१. दूध पौष्टिक भले ही हो, परंतु यदि पचे नहीं, तो कष्टदायक होगा

‘दूध’ पृथ्वी एवं आप, इन महाभूतों की प्रधानता से युक्त एक पौष्टिक आहार है । ये दोनों महाभूत अग्नि के विरोधी गुणधर्म के, अर्थात अग्नि मंद करनेवाले हैं । वर्षा ऋतु में शरीर की अग्नि (पचनशक्ति) मंद होती है । ऐसी अग्नि अनेक बार दूध पचाने में असमर्थ होती है । दूध भले ही कितना भी अच्छा हो, तब भी यदि उसका पचन न हो, तो शरीर के लिए कष्टदायक ही होता है । इसलिए वर्षा ऋतु के दिनों में सवेरे उठते ही दूध अथवा दूधयुक्त चाय अथवा कशाय पीना टालें । माता-पिता अपने बच्चों को सवेरे-सवेरे विद्यालय जाने से पहले दूध देते हैं, उसे भी टालना चाहिए । कुछ लोग वैद्यों ने दूध के साथ औषधि लेने के लिए कहा है, इसलिए सवेरे उठते-उठते ही दूध लेते हैं । ऐसों को ‘वर्षा ऋतु के दिनों में उसे शुरू रखना है या नहीं’, यह अपने वैद्यों से पूछने के लिए बताना चाहिए ।
२. दूध कब पीएं ?

‘सवेरे शीघ्र उठने पर शौच साफ हुई है । व्यायाम हुआ है । स्नान के उपरांत शरीर हलका लग रहा है । आकाश साफ है और अच्छी भूख लगी है’, ऐसी स्थिति निर्माण होने पर दूध पीएं । इस अवसर पर १ – २ कप दूध में २ चम्मच देशी घी डालकर पीने से वह शरीर के लिए अमृत समान उपकारक होता है । वयोवृद्धों के लिए तो यह सर्वश्रेष्ठ औषधि है; परंतु ऐसी शारीरिक स्थिति वर्षा ऋतु में अत्यंत ही अल्प लोगों में पाई जाती है । इसलिए वर्षा में ऐसी स्थिति न हो, तो दूध पीना टालें । सर्दियों में अग्नि (पचनशक्ति) प्रबल होने से अच्छी शरीरस्थिति सहज ही निर्माण हो जाती है । उस समय दूध पीएं, परंतु दूध के साथ नमकयुक्त पदार्थ न खाएं । अधिकांशत: सभी पदार्थाें में नमक होता ही है । इसलिए दूध पीने के पश्चात कम से कम एक घंटा कुछ भी खाएं-पीएं नहीं ।
३. वर्षा ऋतु में दूध के लिए पर्याय
वर्षा में पौष्टिक आहार के रूप में दूध के स्थान पर सूखा मेवा, मूंगफली अथव चने खाएं । यह भोजन के उपरांत तुरंत ही अल्प मात्रा में खाएं । देसी घी, दही एवं मठ्ठा जैसे दुग्धजन्य पदार्थ भोजन करते समय भूख की मात्रा में सेवन करें ।’
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