वसंत ऋतु के आरोग्यसूत्र

वैद्य मेघराज पराडकर

सृष्टिरचना के समय साक्षात ईश्‍वर ने ही आयुर्वेद का निर्माण किया; इसलिए आयुर्वेद के सिद्धांत विश्‍व के आरंभ से आजतक अबाधित हैं । युगों-युगों से प्रतिवर्ष वही ऋतु आते हैं और आयुर्वेद द्वारा बताई गई ऋतुचर्या भी वही है । इससे निरंतर बदलनेवाली एलोपैथी की तुलना में आयुर्वेद कितना महान है, यह ध्यान में आता है । आज के इस लेख से हम वसंत ऋतु में पालन करने योग्य स्वास्थ्य के नियमों को समझकर लेंगे ।

 

१. ‘वैद्यों के पिता’ वसंत !

दक्षिणायन में भारत से दूर हुआ सूर्य अंत में जब भारत के समीप आने लगता है, तब हिमालयपर जमा बर्फ धीरे-धीरे पिघलने लगता है । उसी प्रकार से ठंड के दिनों में शरीर में जमा कफ भी सूर्य के किरणों से पिघलने लगता है । ठंड समाप्त होने से लेकर प्रखर गर्मी आरंभ होनेतक का काल होता है वसंत ऋतु ! हम विद्यालय में भले ही अनेक बार ‘चैत्र-वैशाख वसंत ऋतु’ सीखा हो, तब भी आज के प्रदूषण के कारण लगभग १५ मार्च से लेकर १५ अप्रैलतक वसंत ऋतु होता है, ऐसा कहना पडेगा । इन दिनों में बढे हुए कफ के कारण सरदी, खांसी, ज्वर और दमा जैसे रोग बढते हैं । इन दिनों में रोगों की मात्रा ठंड के दिनों की अपेक्षा अधिक होती है; इसलिए वैद्यों को मजाकिया भाषा में ‘शारदी माता पिता च कुसुमाकरः ।’ अर्थात शरद ऋतु को वैद्यों की माता, तो वसंत ऋतु को वैद्यों के पिता कहा जाता है ।

 

२. कफ का संतुलित रखने के लिए वसंत ऋतुचर्या !

कफ स्निग्ध (चिकना), ठंडा और गुरु (भारी) गुणों का होने से वसंत ऋतु में हमारे आहार और आचरण से ये गुण न बढकर उनका संतुलन बना रहे; इस प्रकार की व्यवस्था है वसंत ऋतुचर्या ।

 

३. कफ का निर्माणकारी पानी !

मूलतः ‘कफ’ शब्द की व्याख्या ही ‘केन फलति इति कफः ।’ अर्थात पानी । पानी से जो फलित अर्थात निर्मित होता है, वह कफ है । इसके लिए इन दिनों में पेयजल में प्रतिलिटर पौ चम्मच सूंठ अथवा नागरमोथा का चूर्ण डालकर उसे पीने से कफ नहीं बढता । गरमी के कष्टवाले व्यक्ति सूंठ की अपेक्षा नागरमोथा के चूर्ण का उपयोग करें ।

 

४. मीठा नहीं, कडवा …  !

इन दिनों में मीठे और खट्टे पदार्थ अधिक न खाएं । इस ऋतु के पहले १५ दिनों में प्रतिदिन नीम के कोमल पत्ते खाएं, जिससे की स्वास्थ्यरक्षा होती है । गुढी पडवे के दिन गुढी खडी करते समय उसमें नीम के पत्तों का उपयोग किया जाता है, उसका भी यही कारण है ।

 

५. कफनाशक दलहन

आयुर्वेद में दलहन को ‘शिंबी अनाज’ कहा गया है । इसके गुण विशद करते हुए आचार्य कहते हैं, ‘‘मेदःश्‍लेष्मास्रपित्तेषु हितं लेपोपसेकयोः ।’ अर्थात दलहन अनावश्यक मेद एवं कफ को न्यून करने हेतु, साथ ही रक्त एवं पित्त को लाभकारी है । दलहन के आटे का उपयोग उबटन की भांति करना भी हितकारी है । जिन्हें दलहन का पाचन नहीं होता, वे लोग अपने आहार में मूंग एवं मसूर को अंतर्भूत करें; क्योंकि ये दलहन पाचन के लिए हल्के होते हैं ।

 

६. तेलिए पदार्थों से दूर रहें !

स्निग्ध (तेलिया) पदार्थों के कारण कफ के बढने से इन दिनों में ऐसे पदार्थ अल्प ही खाएं ।

 

७. अनाज पुराना अथवा भुना हुआ हो !

आयुर्वेद में ऐसा बताया गया है कि ‘नवधान्यमभिष्यन्दि लघु संवत्सरोषितम् ।’ अर्थात नया अनाज शरीर में स्राव (कफ) बढानेवाला तथा पाचन के लिए भारी होता है, तो एक वर्ष पुराना अनाज उसके विपरीत गुणोंवाला अर्थात पाचन के लिए हल्का होता है । कफ न बढे और बढा हुआ कफ न्यून हो; इसके लिए इस प्रकार का अनाज खाएं । पुराना अनाज उपलब्ध नहीं हुआ, तो नए धान्य को भूनकर खाने से ही वही लाभ मिलता है ।

 

८. व्यायाम करें !

व्यायाम के कारण कफ न्यून होता है । इसके लिए शास्त्र में यह बताया गया है कि वसंत ऋतु में अर्धशक्ति से व्यायाम करें । व्यायाम के समय मुंह से सांस लेने की स्थिति बननेपर उस स्थिति को आधी शक्ति का उपयोग किया गया है, ऐसा कहा जाता है । रुक-रुककर अथवा प्रतिदिन १ घंटा व्यायाम करें ।

 

९. दिन में सोना वर्जित !

‘रात्रौ जागरणं रूक्षं स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा ।’ अर्थात रात में जागने से शरीर में रुक्षता, तो दिन में सोने से स्निग्धता बढती है । दिन में सोने से शरीर में अनावश्यक स्राव उत्पन्न होकर उससे गले में कफ बनना, शरीर भारी होना, बुद्धि का धीमा होना जैसे विकार होते हैं । वसंत ऋतु में दोपहर में सोना टाल दें । वयस्क, रोगी और बहुत दुर्बल व्यक्तियों के लिए दोपहर में सोना स्वीकार्य है ।

 

१०. कफ के लिए सबसे अच्छी दवा – शहद !

शहद कफ के लिए सबसे अच्छी दवा है। इस ऋतु में सर्दी जुकाम खांसी होने पर थोड़ी देर शहद को चाटें। दिन भर में 5-6 चम्मच शहद का सेवन करें।

 

 ११. आनंदित रहें !

वसंत ऋतु आनंद में बढोतरी करनेवाला ऋतु है । इस ऋतु में कोकिल अपना गायन आरंभ करता है । वृक्षों को नए पत्ते आते हैं । इसी ऋतु में गुढी पडवा, रामनवमी जैसे त्योहार और उत्सव आते हैं । आनंदित रहने के स्वास्थ्यलाभ होता है; इसलिए सदैव आनंदित रहें ।

इस ऋतु में बताए गए नियमों का पालन कर सभी को साधना के लिए स्वास्थ्यलाभ हो और उनके आनंद में बढोतरी हो, यह भगवान धन्वंतरी के चरणों में प्रार्थना !’

– वैद्य मेघराज माधव पराडकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा
स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात