अधिक मास चांद्रवर्ष का तेरहवां महीना है तथा यह हर दो या तीन वर्ष में आता है । अधिक मास को अगले मास का नाम दिया जाता है । उदा. आश्विन मास से पूर्व आनेवाले अधिक मास को आश्विन अधिक मास कहते हैं और उसके उपरांत आनेवाले मास को शुद्ध आश्विन मास कहा जाता है । यह मास किसी बडे पर्व की भांति होता है । इसलिए इस मास में धार्मिक विधि किए जाते हैं और ‘अधिक मास महिमा’ ग्रंथ का पाठ किया जाता है ।

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शास्त्र

अधिक मास में व्रत एवं पुण्यकारी कर्म करने का अध्यात्मशास्त्र

प्रत्येक मास में सूर्य एक-एक राशि में संक्रमण करता है; परंतु इस मास में सूर्य किसी भी राशि में संक्रमण नहीं करता, अर्थात अधिक मास में सूर्य संक्रांति नहीं होती । इस कारण चंद्र और सूर्य की गति में अंतर पडता है और वातावरण में भी ग्रहणकाल की भांति परिवर्तन होता हैं ।

‘इस बदलते अनिष्ट वातावरण का अपने स्वास्थ्य पर परिणाम न हो; इसलिए इस मास में व्रत और पुण्यकारी कर्म करने चाहिए’, ऐसा शास्त्रकारों ने बताया है ।

इस मास में प्रतिदिन श्री पुरुषोत्तम कृष्ण की पूजा तथा नामजप करें ।

— हिन्दू धर्म शास्त्र
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व्रत एवं पुण्यकारी कर्म

अधिक मास में क्या करें

अ — उपवास तथा आहार पर नियंत्रण

अधिक मास में श्री पुरुषोत्तमप्रीत्यर्थ उपवास करें । आगे दिए अनुसार किसी एक का आचरण करें:

  • संपूर्ण महीना उपोषण
  • अयाचित भोजन — अकस्मात किसी के घर भोजन के लिए जाना (बिना निमंत्रण)
  • नक्तभोजन — दिन में भोजन न कर रात के पहले प्रहर में (साधारण संध्या ६ से रात्रि ९) एक बार ही भोजन करना
  • एकभुक्त — दिनभर में एक ही बार भोजन करना

दुर्बल व्यक्ति उपरोक्त ४ प्रकारों में से न्यूनतम एक प्रकार का न्यूनतम ३ दिन अथवा एक दिन तो आचरण करे ।

आ — भोजन करते समय मौन रखे

प्रतिदिन एक ही बार भोजन करना चाहिए । भोजन करते समय बोलना नहीं चाहिए, उससे आत्मबल बढता है । मौन रहकर भोजन करने से पापक्षालन होता है ।

इ — तीर्थस्नान

तीर्थस्नान करना चाहिए । न्यूनतम एक दिन गंगास्नान करने से सभी पापों की निकृत्ति हो जाती है ।

ई — दान देना

शास्त्र में बताया है कि, इस पूरे मास में दान देना चाहिए । यदि यह संभव न हो, तो व्यतिपात और वैधृति, इन योगों के दिन विशेष दानधर्म करना चाहिए तथा आगे दिए तिथियों पर दान दें:

  • शुक्ल एवं कृष्ण द्वादशी
  • पूर्णिमा
  • कृष्ण अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी
  • अमावस्या
उ — पूजा तथा नामजप

इस मास में प्रतिदिन श्री पुरुषोत्तम कृष्ण की पूजा और नामजप कर अखंड आंतरिक सान्निध्य में रहने का प्रयास करना चाहिए ।

ऊ — दीपदान

दीपदान करना चाहिए । भगवान के सामने अखंड दीप जलाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है ।

ए — तीर्थयात्रा

तीर्थयात्रा और देवतादर्शन करना चाहिए ।

ऐ — तांबूलदान

तांबूल दान करना चाहिए । एक मास तांबूल दान करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है ।

ओ — गोपूजन

गोपूजन कर गोग्रास देना चाहिए ।

औ — अपूपदान

अपूपदान (अनरसों का) दान देना चाहिए ।

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अनुज्ञेय कर्म

अधिक मास – कौन से कर्म करें

इस मास में नित्य एवं नैमित्तिक कर्म करने चाहिए, अर्थात जिन कर्मों को किए बिना कोई विकल्प नहीं है, ऐसे कर्म करने चाहिए ।

अ — काम्य कर्म

ज्वरशांति, पर्जन्येष्टि आदि सामान्य कर्म करने चाहिए ।

आ — देवता की पुनःप्रतिष्ठा

इस मास में देवता की पुनःप्रतिष्ठा की जा सकती है ।

इ — संस्कार

ग्रहणश्राद्ध, जातकर्म, नामकर्म, अन्नप्राशन आदि संस्कार कर सकते है ।

ई — श्राद्ध विधी

मन्वादि एवं युगादि से संबंधित श्राद्धादि कर्म करने चाहिए, साथ ही तीर्थश्राद्ध, दर्शश्राद्ध और नित्यश्राद्ध करने चाहिए ।

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निषिद्ध कर्म

अधिक मास में यह टालें

सामान्य काम्य कर्मों को छोडकर अन्य काम्य कर्मों का आरंभ और समाप्ति नहीं करनी चाहिए ।

न करें: अपूर्व देवतादर्शन (पहले कभी नहीं गए ऐसे स्थान पर देवता के दर्शन के लिए जाना), गृहारंभ, वास्तुशांति, संन्यासग्रहण, नूतनव्रत ग्रहणदीक्षा, विवाह, चौल (शिशू का प्रथम केशकर्तन), उपनयन, देवता-प्रतिष्ठा ।

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‍विशेष मार्गदर्शन

अधिक मास में जन्मदिवस हाे, तो क्या करना चाहिए

व्यक्ति का जन्म जिस मास में हुआ है यदि वही मास अधिक मास के रूप में आता है, तो उस व्यक्ति का जन्मदिवस शुद्ध मास में मनाएं ।

उदाहरणार्थ

वर्ष २०१९ के आश्विन मास में जन्मे बालक का जन्मदिवस वर्ष २०२० में अधिक मास आश्विन होने के कारण उसे अधिक मास में न मनाकर शुद्ध आश्विन मास में मनाएं । यदि बालक का जन्म अधिक आश्विन मास में हुआ है, तो उस बालक का जन्मदिन प्रतिवर्ष शुद्ध आश्विन मास में उस तिथि पर मनाएं ।

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श्राद्ध संबंधि मार्गदर्शन

अधिक मास में श्राद्ध हाे, तो क्या करना चाहिए

यदि जिस मास में व्यक्ति का निधन हुआ हो, वह अगले वर्ष में अधिक मास हो, तो उस व्यक्ति का वर्षश्राद्ध उसी महीने के अधिक मास करना चाहिए । उदा. शक १९४१ के आश्विन मास में किसी की मृत्यु हुई हो, तो उसका प्रथम वर्षश्राद्ध शक १९४२ के अधिक आश्विन मास में उसी तिथि को करें ।

प्रतिवर्ष के ज्येष्ठ मास का प्रतिसांवत्सरिक श्राद्ध इस वर्ष के शुद्ध ज्येष्ठ मास में करें; परंतु पहले के अधिक ज्येष्ठ मास में मृत्यु हुए व्यक्तियों का प्रतिसांवत्सरिक श्राद्ध इस वर्ष के अधिक ज्येष्ठ मास में करें ।

शक १९४१ में कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष इत्यादि महिनों में मृत लोगों का प्रथम वर्षश्राद्ध संबंधित मास की उनकी तिथि पर करें । १३ मास होते हैं; इसलिए १ महीने पहले न करें ।

इस वर्ष अधिक ज्येष्ठ अथवा शुद्ध ज्येष्ठ मास में मृत्यु होने पर उनका प्रथम वर्षश्राद्ध अगले वर्ष के ज्येष्ठ मास में उसी तिथि पर करें ।

संदर्भ : धर्मसिंधु – मलमास निर्णय, वर्ज्य-अवर्ज्य कर्म विभाग · संदर्भ : दाते पंचांग

हिन्दू पंचांग का शास्त्र
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पंचांग समझ लें

अधिक मास क्या होता है

अ — चांद्रमास

सूर्य एवं चंद्र का एक बार मिलाप होने के समय से लेकर अर्थात एक अमावस्या से लेकर पुनः इस प्रकार मिलाप होने तक, अर्थात अगले मास की अमावस्या तक का समय चांद्रमास होता है । त्योहार, उत्सव, व्रत, उपासना, हवन, शांति, विवाह आदि हिन्दू धर्मशास्त्र के सभी कृत्य चांद्रमास के अनुसार (चंद्रमा की गति पर) सुनिश्चित होते हैं । चांद्रमासों के नाम उस मास में आनेवाली पूर्णिमा के दिन जो नक्षत्र होता है, उसके नाम पर रखे गए है । उदा. चैत्र मास की पूर्णिमा के दिन चित्रा नक्षत्र होता है ।

आ — चांद्रवर्ष

चैत्र से फाल्गुन तक के १२ महिनों के अवधि को चांद्रवर्ष कहते है । चांद्रवर्ष में ३५४ दिन हाेते है । जिस चांद्रवर्ष में अधिक मास होता है, उसमें ३८४ दिन हाेते है ।

इ — सौरमास

सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी सूर्य संक्रांति तक के कालावधि को सौरमास कहते है । सौरमास ३० अथवा ३१ दिन का होता है । ऋतु सौरमास के अनुसार (सूर्य की गति पर) सुनिश्चित हुए हैं ।

ई — सौरवर्ष

सूर्य अश्विनी नक्षत्र से लेकर भ्रमण करते हुए पुनः उसी स्थान पर आता है । इस अवधि को सौरवर्ष कहा जाता है । सौरवर्ष में साधारण ३६५ दिन होते है ।

उ — चांद्रवर्ष और सौरवर्ष का मेल हो, इसलिए अधिक मास का प्रयोजन !

चांद्रवर्ष के ३५४ दिन और सौरवर्ष के ३६५ दिन होते हैं, अर्थात इन २ वर्षों में ११ दिनों का अंतर होता है । इस अंतर की भरपाई हो, साथ ही चांद्रवर्ष और सौरवर्ष का मेल हो; इसके लिए स्थूल दृष्टि से लगभग ३२॥ (साढे बत्तीस) मास के पश्चात एक अधिक मास जोडा जाता है, अर्थात २७ से ३५ मास के पश्चात १ अधिक मास आता है ।

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संज्ञा

अधिक मास के अन्य कुछ नाम

इस मास को मलमास भी कहते हैं । मलमास में मंगल कार्य की अपेक्षा विशेष व्रत और पुण्यकारी कर्म किए जाते हैं; इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं ।

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पंचांग की रचना

अधिक मास किस मास में आता है

चैत्र से आश्विन इन ७ महिनों में से एक मास अधिक मास के रूप में आता है । अधिक मास के उपरांत आनेवाले महीने को शुद्ध चैत्र, शुद्ध वैशाख, इत्यादि कहा जाता है ।

कभी-कभी फाल्गुन मास भी अधिक मास के रूप में आता है ।

कार्तिक, मार्गशीर्ष और पौष, इन मासों से जोडकर अधिक मास नहीं आता ।

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दुर्लभ घटना

क्षय मास (लुप्त महीना)

जैसे अधिक मास हाेता है वैसे क्षय मास (लुप्त महीना) भी हाेता है । कार्तिक, मार्गशीर्ष तथा पौष के तीन महिनों से कोई भी एक मास क्षय मास हो सकता है; क्याेंकि इन तीन महिनों में सूर्य की गति अधिक हाेने से एक चांद्रमास में उसके दो संक्रमण हो सकते है । क्षय मास जब आता है, तब एक वर्ष में क्षय मास के पहले १ और उसके उपरांत १, ऐसे २ अधिक मास पासपास आते है । यह अत्यंत दुर्लभ घटना है । साधारण १४० अथवा १९० वर्ष उपरांत ऐसे होता है ।

माघ मास कभी भी अधिक मास अथवा क्षय मास नहीं हाेता ।

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गणना पद्धति

अधिक मास निर्धारित करने की पद्धति

अ — सामान्य नियम

जिस मास की कृष्ण पंचमी के दिन सूर्य की संक्रांति आएगी, अगले वर्ष प्रायः वही अधिक मास होता है; परंतु यह स्थूल रूप में (सर्वसामान्य) है ।

आ — शालिवाहन शक पद्धति
शालिकाहन शक को १२ से गुणा करें, फिर १९ से विभाजित करें ।
जो शेष रहेगा, वह ९ अथवा उससे न्यून संख्या हो, तो उस वर्ष अधिक मास आएगा, यह जान लें ।
इ — विक्रम संवत पद्धति (अधिक विश्वसनीय)
विक्रम संकत् की संख्या में २४ मिलाकर उस जोड को १६० से विभाजित करें ।

शेष → अधिक मास
३०, ४९, ६८, ८७, १०६, १२५ → चैत्र
११, ७६, ९५, ११४, १३३, १५२ → वैशाख
०, ८, १९, २७, ३८, ४६, ५७, ६५, ८४, १०३, १२२, १४१, १४९ → ज्येष्ठ
१६, ३५, ५४, ७३, ९२, १११, १३०, १५७ → आषाढ
५, २३, ४६, ६२, ७०, ८१, ८२, ८९, १००, १०८, ११९, १२७, १३८, १४६ → श्रावण
१३, ३२, ५१ → भाद्रपद
२, २१, ४०, ५९, ७८, ९७, १३५, १४३, १४५ → आश्विन

अन्य कोई संख्या शेष रही, तो अधिक मास नहीं आता ।
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भविष्य के लिए संदर्भ

आनेवाले अधिक मासों की सारणी

सामान्य युग वर्ष शालिवाहन शक पुरुषोत्तम मास
२०२९१९५१चैत्र
२०३२१९५३भाद्रपद
२०३५१९५६आषाढ
२०३८१९५९ज्येष्ठ
२०४११९६१आश्विन

श्रीमती प्राजक्ता जोशी, ज्योतिषफलित विशारद (२२.४.२०२६)

पुण्यसंग्रह के साथ आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने का अवसर

तीन वर्ष उपरांत अधिक मास आता है । इस कालावधि में किए गए नामजप, सत्संग, सत्सेवा, त्याग, दान को अधिक महत्त्व है । इस काल में किए दान का अधिक मात्रा में आध्यात्मिक लाभ होता है । भारतीय संस्कृति में दानधर्म का विशेष महत्त्व है । धनदान, अन्नदान, वस्त्रदान, ज्ञानदान आदि दान के प्रकार है । दान पापनाशक है । उससे पुण्यबल की प्राप्ति होती है । ‘भूतल पर दानधर्म समान दूसरा निधि (जमापूंजी) नहीं’, ऐसा महाभारत में बताया है ।

धर्मशास्त्र कहता है कि सद़्भावना पूर्वक ‘सत्पात्रे अन्नदान’ करने से अन्नदाता को उसका उचित फल मिलता है तथा सभी पापों से उसका उद्धार होकर वह ईश्वर के निकट पहुंचता है । अन्नदान करने से अन्नदाता को आध्यात्मिक स्तर पर भी लाभ होता है ।

— हिंदु धर्मशास्त्र

सनातन संस्था राष्ट्ररक्षा और धर्मजागृति के लिए कटिबद्ध है । सनातन संस्था के आश्रम और सेवाकेंद्रों से अध्यात्मप्रसार का कार्य किया जाता है । वर्तमान काल में राष्ट्र और धर्म की सेवा करने का महत्त्व ध्यान में रखकर सैकडों साधक आश्रमों में रहकर पूर्णकालिक सेवा कर रहे हैं । निरंतर धर्मजागृति का कार्य करनेवाले सनातन के आश्रमों को अन्नदान के लिए धनरूप में सहायता करने का यह एक अच्छा अवसर है ।