आपातकाल में आधार देनेवाली छतवाटिका (Terrace Gardening – टेरेस गार्डनिंग) भाग २

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सामान्य व्यक्ति के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण घटक है, ‘सब्जी मंडी’ ! अधिकांश लोग दैनिक भोजन हेतु आवश्यक सब्जी, फल इत्यादि लेने के लिए मंडी में जाते हैं । ‘मंडी में अधिकतर ताजी सब्जी, रस से भरे फल नहीं मिलते । उपलब्ध हो, तो भी उनकी कीमतें अधिक होती है’, ऐसा अधिकांश लोगों का अनुभव है । ऐसे में ‘आप घर में ही घर हेतु आवश्यक खेती कर सकते हैं’, ऐसा किसी ने बताया, तो उस बात पर हम विश्वास नहीं करेंगे; परंतु यह संभव है ।

घर के लिए आवश्यक खेती करने हेतु खेत अथवा आंगन हो, यह आवश्यक नहीं । घर के लिए आवश्यक खेती करने में ‘स्थान’ समस्या नहीं है । घर की बालकनी में, छत पर (टेरेस पर) अथवा खिडकी में भी घरेलू खेती करना संभव है । भावी आपातकाल की पृष्ठभूमि पर इस प्रकार के प्रयोगों की अत्यधिक आवश्यकता है । त्रिकालज्ञानी संत एवं भविष्यवक्ताओं के बताए अनुसार आपातकाल आरंभ हो गया है । आगामी ५-६ वर्ष महाभयंकर आपातकाल का सामना करना होगा । तब आज के समान सब्जी मंडी में सब्जी उपलब्ध होगी अथवा हम वहां तक जा पाएंगे, ऐसा कोई भी निश्चित नहीं बता सकता । अभी कोरोना के काल में ही सब्जी इत्यादि मिलने के संदर्भ में कितनी अडचनें आई, वस्तुओं के मूल्यों में कितनी वृद्धि हुई, इसका अनुभव अनेक लोगों को हुआ है । ऐसे में अपने घर में घर के लिए आवश्यक सब्जी, फल उगाना संभव हो, तो क्यों न उस हेतु प्रयास करें ? इससे घर की उत्कृष्ट सब्जी भी मिलेगी, साथ ही पैसे और श्रम की भी बचत होगी । वर्तमान में जैविक अथवा प्राकृतिक खेती के अंतर्गत छत पर खेती (टेरेस गार्डनिंग – terrace-gardening) की नई संकल्पना उदित हो रही है ।

भाग १ पढने के लिए भेट दें  आपातकाल में आधार देनेवाली छतवाटिका (Terrace Gardening) भाग-१

 

उ. खाद

श्रीमती गौरी कुलकर्णी

ऐसे गमलों के पौधों को मास में कम से कम एक बार खाद अवश्य दें । जैविकखाद, गोबरखाद, जीवामृत अथवा घर के घर में ही भोजन के कचरे से (सब्जियों के डंठल, फलों के छिलके, प्याज, लहसुन के छिलके इत्यादि के कचरे से) तैयार किए जानेवाले कंपोस्ट का हम खाद के रूप में उपयोग कर सकते हैं । इसके साथ ही सप्ताह में एक बार १०-२० मि.ली. गोमूत्र पानी में मिलाकर वह पानी पौधों पर छिडक सकते हैं । आपके पास गाय हो, तो जीवामृत (एक प्रकार की प्राकृतिक द्रव खाद । पानी में गोबरखाद, गोमूत्र, गुड अथवा तुअर दाल, चने की दाल, मूंग, लोबिया इत्यादि द्विदल अनाज का आटा इत्यादि पदार्थ डालकर बनाई जाती है, जिससे पौधों की वृद्धि और विकास भलीभांति होता है, साथ ही मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है ।) एक उत्तम प्रकार की खाद घर के घर में बना सकते है ।

१. जीवामृत बनाने की पद्धति

गोमूत्र, गोबर, गुड और द्विदल अनाज के आटे से जीवामृत बनाया जाता है । लगभग २०० लीटर पानी में १० लीटर गोमूत्र, १० किलो गोबर, १ किलो गुड (पीला अथवा काला) और १ किलो अनाज का आटा (तुअर दाल, चने की दाल, मूंग, लोबिया इत्यादि द्विदल अनाज का आटा) डालकर उसका मिश्रण करें और ८ दिन वैसे ही रखें । यह मिश्रण प्रतिदिन सुबह एवं संध्याकाल में लकडी से थोडा सा मिलाएं । यदि अल्प मात्रा में जीवामृत की आवश्यकता हो, तो ऊपर दी मात्रानुसार संबंधित घटक अल्प मात्रा में लेकर बना सकते हैं । ८ दिनों में इस मिश्रण में पौधों हेतु पोषक जिवाणु अत्याधिक मात्रा में दिखने लगते हैं । जीवामृत खाद के कारण पौधों को भलीभांति मात्रा में पोषक द्रव्य मिलते हैं ।

पौधों को कीडे लग जाए अथवा कोई रोग हो जाए, तो उस पर नीम अथवा तंबाकू, लहसुन-मिर्ची का अर्क कीटकनाशक के रूप में छिडक सकते हैं । हर बार एक ही प्रकार के अर्क का उपयोग न कर अर्क अदल-बदल कर उपयोग करें ।

 

ऊ. मिट्टीहीन गमले

गमलों में सब्जी लगाने के लिए उचित मात्रा में आर्द्रता, हवा, योग्य मात्रा में पानी निकलना और जडों में सहजता से वृद्धि होना आवश्यक है । जब भूमि पर पौधे लगाए जाते है, तब पौधों में डाला गया अतिरिक्त पानी भूमि सोख लेती है; परंतु छत पर बागकाम करते हुए गमले में मिट्टी डाली तथा गमले को कितने भी छेद किए, तब भी मिट्टी पानी पकडकर रखती है । जिससे हवा के आवागमन में बाधा निर्माण होकर उसका परिणाम पौधों की वृद्धि पर होता है । इससे बचने के लिए छत पर किए जानेवाले बागकाम में यथासंभव मिट्टी का अल्प उपयोग और सूखे कचरे का उपयोग किया जाता है । विगत कुछ वर्षाें में मिट्टीहीन (अथवा अत्यल्प मात्रा में मिट्टी का उपयोग) बागकाम संकल्पना लोकप्रिय हो रही है ।

१. मिट्टीहीन बागकाम में गमले भरने हेतु आवश्यक घटक

सूखा कचरा, (उदा. हाथों से भलीभांति फैलाई गई नारियल की जटाए, धान की भूसी, गन्ने के रस की दुकान पर मिलनेवाला गन्ने का सूखा चिपडा, सूखी पत्तियां, बालू, ईटों के छोटे टुकडे), गीला कचरा (भलीभांति सडी हुई कंपोस्ट खाद/ जैविक खाद, नीम पेंड, बायो-कल्चर, भोजन का कचरा), ‘कल्चर’ (खाद बनाने की प्रक्रिया गतिशील करनेवाला घटक, जैसे दही बनाने के लिए जामन लगाते है, उसी प्रकार खाद बनाने के लिए ‘कल्चर’ लगाते है, जिससे खाद शीघ्र तैयार होती है ।)

प्रतीकात्मक छायाचित्र

२. गमला भरने की पद्धति

कंपोस्ट करने के लिए गीला कचरा ३० प्रतिशत और सूखा कचरा ७० प्रतिशत मात्रा में लें । गीले कचरे में (पत्तेवाली सब्जियों के डंठल, खराब पत्ते,फलों के छिलकें, बीज, चाय की पत्ती, फफूंद अथवा कीडे लगा हुआ अनाज इत्यादि) सब्जी के डंठल, बासी भोजन, फलों का खराब भाग ले सकते है । तैलीय, घीयुक्त अथवा मसालेदार बासी पदार्थ गीले कचरे में न लें । उन्हें लेना हो, तो वह पदार्थ छलनी में लें । उन्हें अच्छे से पानी से धो लें; जिससे उसमें से तेल, नमक-मसाला इत्यादि निकल जाएगा । तब यह पदार्थ हम गीले कचरे में ले सकते हैं । सूखे कचरे में पेडों की सूखी हुई पत्तियांं, लकडियां, सूखे हुए पत्ते ले सकते हैं । गमले में सबसे नीचे सूखे हुए पत्ते डालें । सूखे हुए पत्तों के स्थान पर नारियल की जटाएं अच्छे से कूटकर उनकी सतह बना सकते हैं । उस पर थोडा-सा ‘कल्चर’ डालें । दूध को दही बनाने के लिए जैसे जामन लगाना पडता है, वैसे कचरे की खाद बनाने के लिए ‘कल्चर’ डालना पडता है । देशी गाय का ताजा गोबर एक उत्तम ‘कल्चर’ है । ‘कल्चर’ पानी में मिलाकर उपयोग करें । बाजार में विविध प्रकार के कल्चर उपलब्ध हो, तो भी देशी गाय का गोबर अथवा खट्टी लस्सी, दही, गुड-पानी प्राकृतिक पदार्थ ‘कल्चर’ के रूप में उपयोग कर सकते हैं । ‘कल्चर’ डालने पर उस पर गीला कचरा डालें । गीला कचरा डालते हुए वह पीस कर डाले । इससे कचरा सडने की प्रक्रिया शीघ्र होती है । उस पर सूखा कचरा डालें । तदुपरांत पुन: ‘कल्चर’ डालें । इस प्रकार सूखा कचरा, ‘कल्चर’, गीला कचरा एक के बाद एक इस पद्धति से गमला भरने तक डालें । गमले का ऊपरी २ इंच भाग रिक्त छोडें । तदुपरांत उस गमले को सुती कपडे से ढंककर रखें । हर ३ दिन उपरांत कचरा थोडा ऊपर-नीचे करें । सप्ताह में एक-दो बार उसमें ‘कल्चर’ और इल्लियां न हो, इसलिए नीम के पत्ते डालें । वे उपलब्ध न हो, तो ‘नीम पेंड’ डालें । कंपोस्ट बनाते हुए उसमें इल्लियां हुई हो, तो उसमें थोडे सूखे पत्ते डालें । गमले में मिट्टी डालनी हो, तो सबसे नीचे नारियल की जटाओं की सतह बनाएं; तदुपरांत मिट्टी की सतह बनाएं; परंतु उसके बाद मिट्टी का उपयोग न करें । कचरे से खाद बनाते समय ध्यान दें कि कचरा खराब करना है, सडाना नहीं है । (खराब होना नैसर्गिक क्रिया है तथा सडना यह अनैसर्गिक क्रिया है । खराब होना अच्छे सूक्ष्मजीवों का तथा सडाना यह अनिष्ट सूक्ष्मजीवों का कार्य है । ऑक्सिजन उपलब्ध होने पर खराब होने की प्रक्रिया होती है और ऑक्सिजन उपलब्ध न हो, तो सडने की प्रक्रिया होती है । खराब होने पर तीव्र दुर्गंध नहीं आती; परंतु सडने पर आती है ।) इस प्रक्रिया में हम ‘नेशनल सेंटर फॉर ऑर्गनिक फार्मिंग’ के ‘वेस्ट डिकंपोजर’ का भी उपयोग कर सकते हैं । जिससे खराब होने की प्रक्रिया शीघ्र होगी । कंपोस्टिंग से दुर्गंध आ रही हो, तो आधा चम्मच हींग पानी में मिलाकर थोडा-सा पानी डाल सकते हैं ।

इस प्रकार लगभग २ से ३ माह में उत्तम प्रकार की कंपोस्ट खाद तैयार होती है । इसे २-३ घंटे धूप में सूखाकर छान लें । कंपोस्ट तैयार होने पर उसे गीली मिट्टी के समान अच्छी सुगंध आती है । इसमें हम पौधे लगा सकते है अथवा बीज बो सकते हैं । इस कंपोस्ट का खाद के रूप में भी उपयोग किया जाता है । इसलिए अलग से खाद देने की आवश्यकता नहीं होती । इस पद्धति में गमले में लगाए गए गीले कचरे को किसी भी प्रकार की दुर्गंध नहीं आती, जिससे गीले कचरे के कारण प्रदूषण में होनेवाले वृद्धि रोकी जा सकती है और पर्यावरण शुद्ध रखने में सहायता होती है । गमले में डाला गया गीला कचरा पानी को पौधों में रोककर रखता है इसलिए अल्प पानी की आवश्यकता होती है ।

 

ए. बीजों से पौधों की निर्मिती

गमले तैयार होने पर उनमें पौधे लगाएं अथवा बीज बोएं । बीज एकदम बारीक हो, तो २ चुटकी बीज लेकर वे समान अंतर पर गिरें, इस पद्धति से डालें । तदुपरांत उस पर मिट्टी की सतह बनाएं । बीजों की मोटाई से तीन गुना मिट्टी का ढेर बनाएं । तदुपरांत मग से हाथ पर पानी लेकर छिडकें । हम सीधे गमले में बीज लगा सकते है अथवा ‘ट्रे’ में पौधे लगाकर बाद में उन्हें गमले में पुर्नरोपित कर सकते हैं । यदि बीज ‘ट्रे’ में रोपित किए, तो उसे ५-६ पत्ते आने पर गमले में पुर्नरोपित करें । पुर्नरोपित करते समय संभवत: छाया में करें । धूप से सीधा संपर्क टालें; क्योंकि धूप के कारण जडें शुष्क होकर मृत हो सकती है । पुर्नरोपित करते समय पौधे मिट्टी सहित उखाडकर दूसरे गमले में लगाए । जिनके सीधे पौधे लगाना संभव है, ऐसे पौधों की ‘कटिंग्ज’ (नया पौधा उगाने के लिए वृक्ष की टहनी में विशिष्ट प्रकार से छेद कर बनाया गया पौधा । गुलाब, गुडहल का पौधा अथवा मसाले के पौधों को बीज से नहीं उगा सकते । इसलिए वृक्षों की टहनियां विशिष्ट प्रकार से छेद कर काटी जाती है । उन्हें भूमि में रोपित करने पर नए पौधे सिद्ध होते हैं ।) भी हम लगा सकते हैं ।

१. पारंपरिक बीजों का महत्त्व

वर्तमान में बाजार में अनेक प्रकार के बीज उपलब्ध है; परंतु उनकी बजाय पारंपरिक बीज बोने को प्रधानता दें । अनुवांशिक तंत्रज्ञान का उपयोग कर बनाए गए संकरित बीजों के कारण अधिक फसल होती है, ऐसा लगता हो, तब भी संकरित बीज प्रकृति के अनुकूल नहीं, यह ध्यान में रखें । संकरित बीज पारंपारिक भारतीय खेती को परावलंबी करने का षड्यंत्र है । पारंपरिक बीजों में स्थानीय वातावरण में टिकने हेतु मूलत: प्रकृति प्रदत्त अनुवांशिक होते है । पारंपरिक बीज अधिक पोषक होते हैं । यह पारंपरिक बीज हमारे क्षेत्र के स्थानीय किसानों के पास उपलब्ध हो सकते हैं । ‘शुद्ध बीजापोटी फळे रसाळ गोमटी (अर्थ : शुद्ध बीज से उत्पन्न फल रसीले और मधुर होते हैं ।)’ इस कहावत के अनुसार बीज शुद्ध होंगे, तो पौधे रोगमुक्त और हरेभरे होते है, यह अनुभव है ।

 

ऐ. सूर्यप्रकाश

प्रतीकात्मक छायाचित्र

सब्जी लगाते समय जलवायु में थोडी उष्णता होनी चाहिए । सूर्यप्रकाश मिलने पर पौधे अच्छे से बढते है । तथापि सूर्यप्रकाश पर्याप्त न हो, तब भी पौधों की वृद्धि होती है । विशेषतः शहरों की छत अथवा खिडकी में बागकाम करना हो, तो सूर्यप्रकाश उपलब्धता की बाधा आ सकती है । ऐसे में सब्जी उगा सकते है; किन्तु वे पर्याप्त सूर्यप्रकाश में उगनेवाली सब्जी की तुलना में थोडी कम पोषक होगी । सूर्यप्रकाश न हो, तो पौधे के पत्तों का आकार बढता है, ऐसा प्रकृति का नियम है । सूर्यप्रकाश अल्प हो, तो अरबी, मिर्ची, पान के पत्ते की बेल, अबोली जैसे पौधों में वृद्धि हो सकती है ।

 

ओ. पानी

प्रतीकात्मक छायाचित्र

अधिक पानी देने पर पौधे मर जाते हैं । अनेक लोगों को घर में गमलों में लगाएं पौधों को पानी देते समय अति पानी डालने की आदत होती है; परंतु इतना पानी डालने की आवश्यकता नहीं होती । हाथ की अंजुली में पानी लेकर छिडक सकते हैं । पानी डालने के दूसरे दिन पत्ते की नोंक थोडी कुम्हलाई दिखें, तो आपके द्वारा योग्य मात्रा में पानी दिया गया, ऐसा समझें । एक गमले को लगभग आधा गिलास पानी पर्याप्त होता है, तथापि हम निरीक्षण कर यह मात्रा थोडी कम-अधिक कर सकते है । कितना पानी डालना है, यह जलवायु पर भी निर्भर होता है । कडी धूप हो, तो पानी थोडा अधिक लगता है । पौधे छोटे हो, तो हम छोटे बच्चों को देते है, वैसा थोडा-सा पानी भी पर्याप्त होता है; परंतु पौधा बडा हो, तो पानी अधिक लगता है । हम पौधों से जितनी बात करेंगे, उनका निरीक्षण करेंगे उतना अधिक योग्य अनुमान लगा पाएंगे । गमले में डाला पानी पौधे को अधिक हो रहा हो, तो गमले में थोडी नारियल की जटाए, सूखे पत्ते भरें । पौधों को सुबह पानी दें । पौधों को सायंकाल में देर से पानी देने से बचें । पौधों के पत्तों पर पानी डालना टालें । पौधों के पत्तों पर पानी मारना हो, तो पत्तों का पानी सायंकाल तक सूख जाए, इस प्रकार से छिडकें । ग्रीष्मऋतु में दिन में दो बार ठंडा पानी पौधों को दें । जब वर्षा हो रही हो तब एवं वर्षा के उपरांत दूसरे दिन पौधों को पानी न दें ।

 

औ. संतुलित आहार

पानी के साथ ही संतुलित आहार भी पौधों हेतु आवश्यक होता है । भरपूर खाद दी है, तो पौधे की अच्छी वृद्धि होगी, ऐसा नहीं है। पौधों को उनकी आवश्यकतानुसार संतुलित मात्रा में खाद दें । साधारणत: जीवामृत अथवा सेंद्रिय खाद के माध्यम से पौधों को आवश्यक घटक आवश्यक मात्रा में मिलते हैं । कितनी खाद कब देनी है, यह अभ्यास द्वारा निश्चित कर सकते है अथवा इस विषय में विशेषज्ञों का मार्गदर्शन ले सकते हैं ।

 

अं. लाभ

इस प्रकार घर में खेती अथवा बागकाम करने से घरेलू उपयोग हेतु आवश्यक लगभग ५० प्रतिशत सब्जी ऊगाई जा सकती है । स्थान की उपलब्धतानुसार परिवार हेतु आवश्यक सब्जी की आपूर्ति की जा सकती है । उपरोक्त पद्धति से तैयार की जानेवाली सब्जी पूर्णतः विषमुक्त और पौष्टिक होती है । अपने हाथों से ऊगाई सब्जी पकाकर खाने में एक विशेष प्रकार का आनंद और अपनापन भी होता है । इसके अतिरिक्त घर के कचरे का सुनियोजन होने से पर्यावरण की भी रक्षा होती है ।

 

क. अन्य महत्त्वपूर्ण सूत्र

गमले के नीचे रखने की थाली

घरेलू खेती करते हुए यथासंभव मौसम के अनुसार सब्जी लगाएं । हमारे द्वारा लगाए गए सभी पौधे जीवित ही रहेंगे, ऐसा नहीं । उनमें से कुछ पौधों को कीडे लग सकते है; परंतु यह प्राकृतिक है । जैसे कीडे लगते है, वैसे कीडे खानेवाले जीवाणू अथवा पक्षी भी आते है और प्रकृति का चक्र चलता रहता है । जिन पौधों की जडें उथली (जिनकी जडें छोटी) है, ऐसे पौधे संभवत: छत के बागकाम हेतु चुनें । सर्वप्रथम किन पौधों का रोपण करना है, यह निश्चित करें । यदि इमारत अथवा घर की छत बडे पौधों का वजन उठा सकती है, तो बडे (सहजन, तुअर, आम, आंवला इत्यादि) पौधे भी लगा सकते है । यदि टेरेस पर मिट्टी डालकर पौधे लगाने हो, तो बहाव रोकने के लिए टेरेस ‘वॉटरप्रूफ’ करें । यदि छत ‘वॉटरप्रूफ’ करना संभव नहीं है, तो टीन के पत्रों का उपयोग कर सकते है अथवा गमलों के नीचे रखने हेतु थाली बाजार में मिलती है, उनका भी उपयोग कर सकते हैं । छत पर गमले रखकर उनमें बागकाम कर सकते हैं । छतवाटिका के कार्य को आरंभ करना हो, तो संभवत: वर्षाऋतु के पहले और कडी धूप समाप्त होने पर करें । टेरेस पर बहुत धूप आती हो, तो ‘गार्डन नेट’ अथवा मच्छरदानी का उपयोग कर भी पौधों को छाया दे सकते हैं । पानी देने हेतु छत पर पानी की सुविधा होना आवश्यक है । यदि आपने प्रारंभ में प्रतिदिन १ घंटा बागकाम हेतु दिया, तो भी आप घर में ही भलीभांति सब्जी उगा सकते हैं ।

— संकलन : श्रीमती गौरी नीलेश कुलकर्णी, सनातन आश्रम, गोवा.

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