‘कोरोना’ की महामारी में स्वयं की प्रतिरोधकक्षमता और आध्यात्मिक बल बढाने के लिए मंत्रजप !

वर्तमान में ‘कोरोना’ की महामारी सर्वत्र फैल रही है । ‘इस विषाणु के संक्रमण से बचने के लिए चिकित्सकीय उपचारों के साथ प्रतिबंधात्मक उपायों स्वरूप तथा स्वयं की प्रतिरोधक क्षमता एवं आध्यात्मिक बल बढे, इस हेतु मंत्र-उपचार भी करें ।

ये सभी मंत्र और उनसे संबंधित सूचना यहां दे रहे हैं ।

 

१. मंत्रजप संबंधी सूचना

अ. जनन-मरण अशौच के समय मंत्रजप उपाय न करें । मासिक धर्म के समय स्त्रियां मंत्रजप न बोलें और न ही सुनें । इस अवधि में नामजप आदि अन्य उपाय कर सकते हैं ।

आ. मंत्र केवल सुनने की अपेक्षा वह भावपूर्ण बोलना अधिक लाभदायक होता है । इसलिए जिनके लिए मंत्र बोलना संभव है, वे मंत्र बोलें । मंत्रों का उच्चारण योग्य होना चाहिए, इसके लिए साथ में दिया हुआ ऑडियो सुनते समय उसके अनुसार उन्हें बोलें । कुछ दिनों पश्‍चात मंत्र योग्य पद्धति से बोलने का अभ्यास हो जाता है तथा मंत्र कंठस्थ होने पर सुनने की आवश्यकता नहीं होगी ।

इ. ३ मंत्रों में से कोई भी एक मंत्र बोलें । जो मंत्र योग्य उच्चारण सहित और अधिक भावपूर्ण बोलना सरल हो, उस मंत्र का चयन करें ।

ई. संस्कृत भाषा में बिंदु का उच्चारण उसके अगले अक्षर पर निर्भर होता है । बिंदु के आगे कौन सा अक्षर है, इससे बिंदु का उच्चारण ङ्, ञ्, ण्, न्, म् आदि होता है । बिंदु का योग्य उच्चारण समझने के लिए मंत्र में बिंदु के स्थान पर संभवतः उच्चारण के लिए आनेवाला अक्षर लिखा है । कुछ मंत्रों में अल्पविराम दिए हैं । मंत्र बोलते समय उस स्थान पर थोडा रुकें ।

उ. मंत्र का अर्थ समझकर बोलने से भावजागृति होने में सहायता मिलती है । इसलिए मंत्रों के अर्थ भी दिए हैं ।

ऊ. चुना हुआ मंत्र सवेरे, दोपहर और सायंकाल २१ बार बोलें ।

ए. सवेरे मंत्र जपते समय पानी अभिमंत्रित करें और उसे स्वयं की बोतल अथवा लोटा में रखकर पूरा दिन थोडा-थोडा प्राशन करें । ऐसा करने पर दोपहर और संध्या समय पुन: पानी अभिमंत्रित करने की आवश्यकता नहीं ।

ऐ. पानी इस प्रकार अभिमंत्रित करें – हाथ साबुन से स्वच्छ धोकर एक पात्र में पानी लेकर उसमें दायें हाथ की पांचों उंगलिया डुबोकर मंत्रजप करें । पात्र चांदी, तांबा, पीतल, कांच अथवा चीनी का हो । इस प्रकार का फूलपात्र न मिलने पर स्टील के बरतन का उपयोग करें । वो भी न मिले, तो प्लास्टिक के बरतन का उपयोग करें । मंत्रजप करते समय पात्र भूमि पर न रखकर स्वयं की गोद में, आसन, लकडी के पटल अथवा पीढे पर रखें ।

औ. स्नान कर मंत्रजप करने से रज-तम का आवरण दूर होकर मंत्र की परिणामकारकता बढती है ।

 

२. मंत्रजप बोलने से पूर्व की जानेवाली प्रार्थना !

‘हे सूर्यदेवता, मुझे कोई भी व्याधि हुई हो, तो उसका विष आपकी कोमल किरणों से नष्ट होने दीजिए । अच्छी साधना कर पाने के लिए मेरा शरीर नीरोगी रहने दीजिए’, ऐसी आपके चरणों में प्रार्थना है ।

 

३. मंत्रजप

मंत्र क्र. १

श्री धन्वन्तरि

परात्पर गुरु पांडे महाराजजी द्वारा बताया गया विषाणुनाशक मंत्र

अत्रिवद् वः क्रिमयो हन्मि कण्ववज्जमदग्निवत् ।
अगस्त्यस्य ब्रह्मणा सम् पिनष्म्यहङ् क्रिमीन् ॥ – अथर्ववेद, कांड २, सूक्त ३२, खंड ३

अर्थ : ऋषी कहते हैं, हे कृमियों (रोग उत्पन्न करनेवाले सूक्ष्म कीटाणुओं) ! अत्रि, कण्व और जमदग्नि आदि ऋषियों ने जिस प्रकार तुम्हारा नाश किया है, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारा नाश करूंगा । अगस्त्य ऋषि के मंत्र से मैं ऐसी व्यवस्था करूंगा जिससे रोग उत्पन्न करनेवाले सूक्ष्म कीटाणु पुनः नहीं बढ पाएंगे ।

मंत्र क्र. २

परात्पर गुरु पांडे महाराजजी द्वारा बताया गया विषाणुनाशक मंत्र

हतासो अस्य वेशसो हतासः परिवेशसः ।
अथो ये क्षुल्लका इव सर्वे ते क्रिमयो हताः ॥ – अथर्ववेद, कांड २, सूक्त ३२, खंड ५

अर्थ : इन कृमियों का (रोग उत्पन्न करनेवाले सूक्ष्म कीटाणुओं का) घर नष्ट हो गया है, उस घर के निकट का घर नष्ट हो गया है तथा जो छोटे-छोटे बीजरूप में थे, वे भी नष्ट हो गए हैं ।

मंत्र क्र. ३

सूर्यदेवतेची प्रतिमा

पुणे के मंत्र-उपचार विशेषज्ञ डॉ. मोहन फडके द्वारा बताया हुआ श्‍वसनसंस्था के सर्व विकारों पर उपयुक्त मंत्र (६ बार ॐकारवाला गायत्री मंत्र)

 

ॐ भूः । ॐ भुवः । ॐ स्वः । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यम् । ॐ भर्गो देवस्य धीमहि । ॐ धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ – ऋग्वेद, मंडल ३, सूक्त ६२, ऋचा १०

अर्थ : दैदीप्यमान भगवान सविता (सूर्य) देवता के तेज का हम ध्यान करते हैं । वह (तेज) हमारी बुद्धि को प्रेरणा दे ।

ये मंत्र सनातन चैतन्यवाणी ऍप पर भी उपलब्ध हैं ।

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