टिप्पणी : सभी हिंदू शाकाहारी होते हैं ।

अमेरिका के प्रख्यात प्रसारमाध्यम ‘सीएनएन’के जालस्थल पर हिन्दू धर्म के सिद्धांत मिथक (कल्पित) होने के स्वरूप में दिए हैं । ये सिद्धांत मिथक न होकर उनके पीछे अध्यात्मशास्त्र है । हिन्दू धर्म की धार्मिक परंपराओं और हिन्दुओं के धर्माचरण के पीछे अध्यात्मशास्त्रीय आधार होता है । यह शास्त्र यदि हम समझ लें, तो हिन्दू धर्म की अद्वितीयता हमारे ध्यान में आएगी ।

 

टिप्पणी : सभी हिंदू शाकाहारी होते हैं ।

वास्तव : व्यक्ति सत्त्व, रज और तम त्रिगुणों से बना है । व्यक्ति में सत्त्वगुण बढने से आध्यात्मिक प्रगति होती है । तमोगुणी व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर, इन षडरिपुओं के अधीन है । रजोगुण, यह गति देनेवाला गुण होने से सत्त्वगुणी व्यक्ति को वह सत्त्वगुण बढाने के लिए और तमोगुणी व्यक्ति को वह तमोगुण बढाने के लिए गति प्रदान करता है । ईश्‍वरप्राप्ति के लिए व्यक्ति सत्त्वगुणी होना आवश्यक होने से हिन्दू धर्म का आचारशास्त्र, आहार-विहारशास्त्र, वेषभूषा और केशभूषा में सत्त्वगुणवृद्धि को महत्त्व है । शाकाहार के कारण व्यक्ति में सत्त्वगुण बढता है और शरीर के तमोगुण का नाश होता है ।

आध्यात्मिक उन्नति के लिए शाकाहारी बनना अत्यावश्यक नहीं । ईश्‍वरप्राप्ति के लिए साधना करनेवाला किसी भी मार्ग से साधना कर रहा है, उस पर भी शाकाहार का महत्त्व निर्भर है, उदा. हठयोग में देहशुद्धि को अत्यधिक महत्त्व है । इसलिए हठयोगानुसार साधना करनेवाले को शाकाहारी होना आवश्यक है । अध्यात्मशास्त्रानुसार शाकाहार द्वारा व्यक्ति की ०.०००१ प्रतिशत सत्त्वगुण बढता है; इसलिए साधारणतः बहुतांश हिन्दू शाकाहारी होते हैं ।

कहां शाकाहार की सीख देकर पशुहत्या का निषेध करनेवाला हिन्दू धर्म और कहां अपना पेट भरने के लिए पशुहत्या कर उसका मांस खाना, इसे नैतिकता समझनेवाले स्वार्थी अन्य पंथ !

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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