साधकों, जो कुछ होता है, वह अच्छे के लिए ही होता है और हम अपने मन को सतत ईश्वर के सान्निध्य में रहना सिखाएंगे तो उससे हमारी साधना होती है !

‘मेरी ओर कोई ध्यान नहीं देता’, ऐसा विचार नहीं करना है । हम जो कुछ भी करते हैं, उस प्रत्येक बात का लेखा-जोखा भगवान के पास होता है । हमें ऐसा लगना; अर्थात अपने मन में असुरक्षितता की भावना है । हमारे संदर्भ में जो कुछ भी होता है, वह अच्छे के लिए ही होता … Read more

एक परिवार का एक व्यक्ति यदि साधना में होगा, तब भी वह साधक और उसका परिवार बहुत पुण्यवान होता है !

‘कलियुग में साधना करनेवाले व्यक्ति मिलना कठिन है और साधना करनेवाले साधक मिलना उससे भी अधिक कठिन है । किसी परिवार में एक साधक साधना में होगा, तब वह साधक और उसका परिवार बहुत पुण्यवान है । उस पुण्य को कृतज्ञतापूर्वक नमस्कार करने के लिए हमें उन साधकों से मिलना पडता है ।’ -श्रीचित्‌शक्‍ति (श्रीमती) … Read more

साधना का चैतन्य !

हम अपने व्यक्तित्व के कारण औरों के ध्यान में नहीं रहते, अपितु साधना के चैतन्य के कारण ध्यान में रहते हैं ! – श्रीचित्‌शक्‍ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ

विज्ञान के प्रयोग में त्रुटि हो सकती है; किन्तु अध्यात्म का कोई भी प्रयोग न तो चूकता है, न ही निष्फल होता है !

अध्यात्म की श्रेष्ठता एवं विज्ञान की मर्यादाएं कलियुग में अनेक लोग विविध वैज्ञानिक प्रयोग करते हैं । यह आवश्यक नहीं कि वे सभी प्रयोग सफल हों । कई बार विज्ञान के प्रयोग में त्रुटि होने के कारण उसके लिए उपयोग किया गया मनुष्यबल, आर्थिक निवेश एवं समय, इस प्रकार समस्त ऊर्जा प्रयोग के अंत में … Read more

मनुष्य जन्म में साधना करने का महत्त्व

अनेक जन्मों के पश्चात मनुष्य जन्म प्राप्त होता है एवं ‘अनेक जन्मों में की गई साधना के फलस्वरूप परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी जैसे ‘गुरु’ उस मनुष्य के जीवन में आते हैं । मनुष्य की आयु अल्प है । इसलिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी साधकों को इसका सतत भान कराते हैं एवं मनुष्य के जन्म को … Read more

वास्तविक देवतापूजन

सेवा करते समय कोई चूक होने पर उसके लिए तुरंत ही क्षमायाचना करना, प्रायश्चित्त लेना और वह चूक पुन: न होने हेतु लगन से प्रयत्न करना’, यही खरी ‘ईश्वरपूजा’ है । – श्रीचित्‌‌शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ (२८.४.२०२०)

जीवन में चिरंतन जागृति का महत्त्व

जीवन में चिरंतन जागृति आवश्यक है । देह से प्राण निकल जाने के पश्चात चिरनिद्रा ही है; क्योंकि उस समय जगाए जाने पर भी मनुष्य जागता नहीं है ! – श्रीचित्‌शक्‍ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ

बाह्य नातों में फंसने की अपेक्षा आंतरिक नाते से मनुष्य में विद्यमान भगवान को निकट लेने से भगवान हमें कभी दूर नहीं करेंगे

हमें बाह्य देह की अपेक्षा साधक के अंतर में विद्यमान भगवान से प्रेम करना चाहिए, जिससे कुछ कारणवश वह साधक हमारे साथ न हो, तब भी उसके विरह का हमें दुख नहीं होता । हमारा मन साधक की देह के तत्त्व से प्रेम करने का अभ्यस्थ होने से ऐसा लगता है कि वह ‘तत्त्व रूप … Read more

अन्यों से पूछकर कृत्य करने से भगवान प्रसन्न होकर वे कठिन परिस्थिति में भी साधकों का पालन-पोषण करते हैं !

काल की गति को समझकर किया गया वर्तमानकालीन कर्म उस जीव के उद्धार के लिए प्रमाण सिद्ध होता है; इसलिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने पहले ही ‘काल के अनुसार साधना’, यह वचन बता दिया है । कभी भी कुछ भी नहीं करना चाहिए । प्रत्येक बार उन्नत पुरुषों से पूछकर ही कर्म करना चाहिए … Read more

स्वयं में देवतत्त्व आना

एक बार हममें भाव उत्पन्न हुआ, तो सभी गुणों के भंडार भगवान ही हमारे हृदय में आकर वास करते हैं । जब वे ही हममें विराजमान होते हैं, तब अपनेआप ही हम उनके सभी गुणों के साथ एकरूप होने लगते हैं और इसी को ‘स्वयं में देवत्व उत्पन्न होना’ कहते हैं । – श्रीचित्‌शक्ति् (श्रीमती) … Read more