सत्संग का महत्त्व

‘ईश्वरप्राप्ति हेतु (आनंदप्राप्ति हेतु) साधना करनेवाले साधक की दृष्टि से नामजप का महत्त्व अनन्यसाधारण है । २४ घंटे नामजप होना साधना के लिए अत्यंत आवश्यक रहता है । नामजप की अगला स्तर अर्थात् सत्संग । सत्संग के कारण संख्यात्मक तथा गुणात्मक वृद्धि होती है । साथ ही सत्संग में साधक को दिशादर्शन भी किया जाता है ।

इस लेख में हम सत्संग की परिभाषा, महत्त्व, लाभ इत्यादि के संदर्भ में अधिक जानकारी प्राप्त करेंगे !

 

१. सत्संग का अर्थ क्या है ?

सत्संग अर्थात् सत् का संग । सत् अर्थात् ईश्वर अथवा ब्रह्मतत्त्व । सत्संग अर्थात् र्ईश्वर के अथवा ब्रह्मतत्त्व की अनुभूति की दृष्टि से.अध्यात्म के लिए पोषक वातावरण । कीर्तन अथवा प्रवचन के लिए जाना, तीर्थक्षेत्र में निवास करना, संतलिखित आध्यात्मिक ग्रंथों का वाचन, अन्य साधकों के सान्निध्य में रहना, संत अथवा गुरु के पास जाना इत्यादि से अधिकाधिक उच्च स्तर का सत्संग प्राप्त होता है ।

 

२. सत्संग का महत्त्व

एक बार वसिष्ठ तथा विश्वामित्र ऋषियों में विवाद हुआ था कि, सत्संग श्रेष्ठ या तपश्चर्या ? वसिष्ठ ऋषि ने बताया कि, ‘‘सत्संग’’; तो विश्वामित्र ऋषि ने बताया कि,‘‘तपश्चर्या ।’’ विवाद का निर्णय करने हेतु वे ईश्वर के पास गए । ईश्वर ने बताया कि,”शेष के पास ही तुम्हें तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त होगा !’’ अतः दोनों शेषनाग के पास गए । उन्होंने प्रश्न पूछने के पश्चात् शेष ने उत्तर दिया कि, ‘‘मेरे सिर पर जो पृथ्वी का वजन है, वह तुम कुछ मात्रा में हल्का करों । पश्चात् मैं विचार करूंगा तथा उत्तर दूंगा ।’’ इस बात पर विश्वामित्र ने संकल्प किया कि, ‘मेरे सहस्त्र वर्ष की तपश्चर्या का फल मैं अर्पण करूंगा । पृथ्वी शेष के सिर से कुछ ऊपर ऊठें ।’ किंतु पृथ्वी बिलकुल बाजू नहीं हुई । पश्चात् वसिष्ठ ऋषि ने संकल्प किया, ‘आधे घटका का (बारह मिनटों का) सत्संग का फल मैं अर्पण करूंगा । पृथ्वी अपना वजन न्यून करें ।’ पृथ्वी त्वरित ऊपर ऊठ गई ।

साधना में प्रयास से किए गए नामजप का कुल मिलाकर महत्त्व ५ प्रतिशत इतना है । सत्संग तथा संतसहवास का ३० प्रतिशत, तो सत् (संत)सेवा १०० प्रतिशत महत्त्वपूर्ण है ।

 

३. सत्संग के कारण प्राप्त होनेवाले लाभ इस प्रकार के हैं ।

अ. दैनंदिन जीवन में अपने संपर्क मे आनेवाले अधिकांश व्यक्तिओं का अध्यात्म, साधना इत्यादि बातों पर विश्वास नहीं होता । अतः वे अध्यात्म के विरोध मे वक्तव्य करते हैं अथवा साधना की खिल्ली ऊडाते हैं । अतः प्राथमिक स्तर के साधक का मन साधना के संदर्भ में दोलायमान स्थिती में रहता है । यदि साधक के मन में साधना के संदर्भ में विकल्प निर्माण हुए, तो सत्संग में उपस्थित रहने से वह दूर होने के लिए सहायता होती है ।

आ. कुछ रुग्णों पर एकत्रित उपचार पद्धति का (ग्रुप थेरपी का) एक लाभ यह होता है, अर्थात् रुग्ण में अन्य रुग्णों की अपेक्षा शीघ्र गति से अच्छा होने की इच्छा अपने आप निर्माण होती है । इसी प्रकार का लाभ सत्संग को जानेवाले साधकों को भी होता है ।

इ. सत्संग में एकदूसरे के साथ चर्चा करने से साधकों के ध्यान में यें बातें आती हैं, ‘अन्य साधकों को साधना में क्या-क्या अडचनें आई तथा उसका निवारण वे अथवा गुरु किस प्रकार से करते हैं ।’

ई. सत्संग को आनेवाले साधक के सत्त्वगुणों की मात्रा समाज के अन्य व्यक्ति की अपेक्षा अधिक रहती है । उनके एकत्रित सत्त्वगुण के कारण सात्त्विक वातावरण निर्माण होता है । उससे साधक के सत्त्वगुण की मात्रा बढने के लिए सहायता प्राप्त होती है ।

उ. सात्त्विक वातावरण में साधक की ध्यान इत्यादि साधना अधिक अच्छे प्रकार से होती है ।

ऊ. सात्त्विक व्यक्ति के सहवास में कुछ अच्छी शक्तियां भी रहती हैं । उसका भी लाभ साधक को प्राप्त होता है ।

ए. सत्संग को आनेवाले अन्य साधक अपने ही हैं, यह भाव निर्माण होता है । इस से तीन-तीन पिढीयों से चल रहे विवाद का विस्मरण कर युवक एक-दूसरे के साथ परिवार की तरह व्यवहार करने लगते हैं । पश्चात् ‘अवघे विश्वचि माझे घर’ यह भाव निर्माण होता है । कुसंग का परिणाम सत्संग के पूरीतरह से उलट होता है; अतः वह टालना चाहिए ।

ऐ. सत्संग के कारण अनुभूतियां आती हैं । अनुभूतियों के कारण साधना पर होनेवाली श्रद्धा वृद्धिंगत होने के लिए सहायता प्राप्त होती है । इस संदर्भ की एक अनुभूति आगे प्रस्तुत की है ।

ऐ १. सत्संग तथा कुलदेवी एवं दत्त का नामजप करने के कारण आंखे फडफडाना तथा त्वचारोग एव दाह ठीक होना ‘हिरापुर सत्संग में कल्पनाकुमारी नाम की एक छोटी लडकी आती है । वह त्वचारोग से त्रस्त होने के कारण उसके पूरे शरीर की लाही-लाही होती थी । साथ ही उसे निरतंर आंखे फडफडाने की आदत थी । दो से तीन मास निरंतर वह सत्संग में उपस्थित रहने के पश्चात् उसकी आंख फडफडाने की आदत छूट गई । साथ ही वह पहले से अधिक उत्साही दिखाई देने लगी । उसका त्वचारोग पूरीतरह से अच्छा हुआ, उसके शरीर का दाह भी पूरीतरह से न्यून हुआ है । सत्संग में बताई गई साधना के अनुसार वह ‘श्री गुरुदेव दत्त’ तथा ‘श्री कुलदेवतायै नमः’ ये दोनों नामजप करती है । उसने बताया कि,‘सत्संग में बताएं विषयों का आकलन भी मुझे क्वचित ही होता है; उस वातावरण से आनंद प्राप्ती होती है ।’ – कु. तनुजा, बिहार ।

ओ. सत्संग में अनिष्ट शक्तियो के कष्ट न्यून होना सत्संग में सात्त्विकता बढती है । अतः यदि किसी को अनिष्ट शक्तियों के कष्ट हैं, तो वह न्यून होने के लिए सहायता प्राप्त होती है । कुछ बार अच्छे आध्यात्मिक स्तरवाले साधक अथवा संत सत्संग में सीखाते हैं । उस समय उनकी वाणी से चैतन्य प्रक्षेपित होता है । उस से भी अनिष्ट शक्तियो के कष्ट दूर होने के लिए सहायता प्राप्त होती है । इस संदर्भ की एक अनुभूति आगे प्रस्तुत की है ।

ओ १. अनिष्ट शक्तियों के कष्ट के कारण तथा सामूहिक नामजप के पश्चात् भी न रूकनेवाला सिरदर्द साधिका के वक्तव्य के कारण रूक गया ।

‘१८.७.२००३ को प्रातः से मुझे सिरदर्द हो रहा था । उससे पूर्व ४-५ दिनों से ही अनिष्ट शक्तियों के कष्ट के कारण लगभग पूरे दिन मुझे सिरदर्द होता था । उस दिन प्रातः से सामुहिक नामजप करने के पश्चात् भी मेरा सिरदर्द नहीं रुका । सामुहिक नामजप के पश्चात् साधिका श्रीमती अंजली गाडगीळ ने कुछ साधकों के लिए सत्संग आयोजित किया था । मैं भी उस सत्संग में उपस्थित थी । उस समय श्रीमती गाडगीळ के वक्तव्य में अधिक चैतन्य प्रतीत हो रहा था । उनके वक्तव्य के समय ही मेरा सिरदर्द रूक गया तथा सिर अत्यंत हल्का प्रतीत होने लगा । सत्संग के कुछ समय पश्चात् पुनः सिरदर्द आरंभ हुआ ।’ – श्री. संदीप, गोवा ।

 

४. संतसंग, सत्सेवा महत्त्वपूर्ण रहती है; अपितु यह
कैसे पहचान सकते हैं कि, कोई भी संत वास्तव हैं या झूठे हैं ?

कलियुग में ९८ प्रतिशत तथाकथित संत अथवा गुरु झूठे होने के कारण उनके दर्शन के लिए नहीं जाना; किंतु यदि किसी की कुछ मात्रा में आध्यात्मिक उन्नति हुई है, ऐसा विश्वास हुआ तथा उसने ‘किसी एक संत के दर्शन प्राप्त करें’, ऐसा बताया, तो शब्दप्रमाण मानकर उनका दर्शन तथा सेवा हेतु अवश्य जाना ।

 

५. सत्संग का स्वरूप कैसा होता है ?

साधारण रूप से सत्संग डेढ घंटे का रहता है । स्थानीय परिस्थिती नुसार तथा प्रातांनुसार भी सत्संग के विषयों में कुछ मात्रा में परिवर्तन किया जाता है ।

उदा. ग्रामीण क्षेत्र में तात्त्विक विवेचन की अपेक्षा कथाओं के स्वरूप में अध्यात्म सीखाया जाता है ।

इस लेख में प्रस्तुत की गई सत्संग की महानता ध्यान में रखते हुए अधिकाधिक जिज्ञासु, मुमुक्षु तथा साधकों को अगले-अगले स्तर का सत्संग प्राप्त हो तथा उनके साधना पथ पर शीघ्र गति से मार्गक्रमण हो, यही श्री गुरुचरणों में प्रार्थना !’

 

६. सत्संग का महत्त्व – स्वर्ग का अमृत और कथामृत में अंतर !

शुकदेवजी परीक्षित राजा को कथा सुनाना आरंभ कर रहे थे, तभी वहां एक अद्भुत घटना हुई । उच्च लोक के देवी-देवता अमृत से भरे स्वर्णकलश लेकर वहां पहुंचे । वे परीक्षित से कहने लगे, ‘‘७ दिन पश्‍चात तक्षक के डंसने से आपकी मृत्यु होनेवाली है । अतः आप इस अमृत का सेवन करें, जिससे आपको जीवनदान मिलेगा । आप यह अमृत लेकर आपका कथामृत हमें दें । यहां स्वर्ग के अमृत और कथामृत में अंतर हमारे ध्यान में आता है । परीक्षित ने जब इस संदर्भ में शुकदेवजी से पूछा, तब उन्होंने बताया, ‘आपने स्वर्ग का अमृतपान किया, तो आप दीर्घायु बनेंगे और आपने यदि कथामृत सेवन किया, तो आप दिव्यजीवि बनेंगे और ‘मुझे मृत्यु ही नहीं है’, यह आपके ध्यान में आएगा । यदि इन देवताओं के पास अमृत था, तो वे इस कथा में क्यों आए, इसपर आप विचार करें । देवता भी भलीभांति यह जानते हैं कि स्वर्ग के अमृत की अपेक्षा कथामृत महत्त्वपूर्ण है । इससे यह हमारे ध्यान में आता है कि भगवद्प्रेमी भक्तों के कुछ क्षणों के सत्संग की तुलना स्वर्ग अथवा मोक्ष से और अमृत के साथ भी नहीं की जा सकती ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘अध्यात्म का प्रास्ताविक विवेचन’