इतिहास एवं मनाने की पद्धति
इस दिन नई फसल की बालियां लाकर उन्हें घर के देवता को अर्पण कर नवान्न भक्षण करते हैं । इस तिथि पर सरस्वतीदेवी उत्पन्न हुईं, इसलिए उनकी पूजा करते हैं । इस दिन को लक्ष्मी का भी जन्मदिन माना जाता है, अर्थात इस तिथि को श्रीपंचमी भी कहते हैं ।’
उद्देश्य
इस त्योहार का उद्देश्य है – इस दिन हुए सृष्टि के नवचैतन्य एवं नवनिर्माण के कारण प्राप्त आनंद को प्रकट करना एवं मौज मनाना ।’
संदर्भ – सनातन का ग्रंथ ‘धार्मिक उत्सव एवं व्रतों का अध्यात्मशास्त्रीय आधार’
श्री सरस्वती देवीकी व्युत्पत्ति एवं अर्थ
‘सरसः अवती’, अर्थात् एक गतिमें ज्ञान देनेवाली अर्थात् गतिमति । निष्क्रिय ब्रह्माका सक्रिय रूप; इसीलिए उन्हें ‘ब्रह्मा-विष्णु-महेश’, तीनोंको गति देनेवाली शक्ति कहते हैं ।
बसंत पंचमीपर श्री सरस्वती पूजनका शास्त्रीय आधार क्या है ?
उत्तर भारतमें बसंत पंचमीपर श्री सरस्वती पूजन किया जाता है । इसका शास्त्रीय आधार इस प्रकार है – गणेश जयंतीपर कार्यरत ‘इच्छा’संबंधी गणेश तरंगोंके प्रभावसे नवनिर्मित ब्रह्मांडमें एक मंडल (‘विद्यासे संबंधित पुरुषतत्त्व) कार्यरत होता है । इस मंडलकी आकर्षण शक्तिके सूक्ष्म परिणामसे शक्तिरूपी तरंगें उत्पन्न होती हैं । इन्हें ‘प्रकृतिस्वरूप विद्यासे संबंधित सरस्वती-तरंगें’ कहा गया है ।
श्री गणेश जयंतीके उपरांत आनेवाले इस विद्यमान कनिष्ठरूपी तारक तरंगोंके प्रवाहमें (‘विद्यमान’ अर्थात् तत्काल निर्मित होकर कार्य हेतु सिद्ध हुआ; ‘कनिष्ठ रूपी’ अर्थात् संपूर्ण तारक प्रवाहका अंश), ब्रह्माकी इच्छाका सरस्वतीरूपी अंश होता है । इसलिए सरस्वती पूजनसे जीवको इस अंशतत्त्वका आवाहन कर, जीवके देहमें बुद्धिकेंद्रको जागृत कर, उसे सात्त्विक कार्यकी दिशा प्रदान की जाती है ।
श्री सरस्वती देवीको ब्रह्माकी शक्ति क्यों मानते हैं ?
महासरस्वतीदेवी एवं श्री सरस्वतीदेवीने क्रमशः निर्गुण एवं सगुण, दोनों स्तरोंपर ब्रह्माकी शक्ति बनकर ब्रह्मांडकी निर्मितिमें ब्रह्मदेवका सहयोग किया । श्री सरस्वतीदेवी अर्थात् ब्रह्माकी निर्गुण अथवा सगुण स्तरपर कार्यरत शक्ति । ‘ब्रह्माकी शक्ति उससे एकरूप ही होती है । आवश्यकतानुसार वह कार्यरत होती है ।’ मानव इस बातको समझ पाए, इसलिए कहते हैं, ‘श्री सरस्वतीदेवी ब्रह्माकी शक्ति हैं ।’

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