प्राणशक्ति (चेतना) प्रणाली में अवरोध के कारण होनेवाले विकारों पर उपाय

रोगनिवारण के लिए प्राणशक्ति (चेतना) प्रणाली के अवरोधों को स्वयं ढूंढकर दूर करना

संतों की भविष्यवाणी है कि आगामी तृतीय विश्‍वयुद्ध में परमाणु युद्धके कारण करोडों लोगों की मृत्यु होगी । भविष्य में भीषण प्राकृतिक आपदाएं भी आएंगी । ऐसे आपातकाल में यातायात के साधनों के अभाववश रोगी को चिकित्सालय पहुंचाना, उसे डॉक्टर अथवा वैद्य उपलब्ध होना और हाट से (बाजार से) औषधियां प्राप्त करना भी कठिन होता है । आपातकाल का सामना करने की तैयारी के एक भाग के रूप में सनातन संस्था ने आपातकाल में संजीवनी समान प्रभावी ग्रंथमाला प्रकाशित की है । इस ग्रंथमाला से सीखी गईं उपचारपद्धतियां केवल आपातकाल की दृष्टि से नहीं, अपितु अन्य समय भी उपयोगी हैं । इस ग्रंथमाला के ११ ग्रंथ अब तक प्रकाशित हुए हैं । इस ग्रंथमाला के नूतन ग्रंथ, प्राणशक्ति (चेतना) प्रणाली में अवरोधसे उत्पन्न होनेवाले विकारों पर उपाय से परिचय क्रमशः ३ भागों में करवा रहे हैं ।

यह उपचारपद्धति केवल आपातकाल की दृष्टि से नहीं, अपितु सदैव उपयोगी है । पाठक अभी से ये उपाय समझकर करना आरंभ करें । ऐसा करने से इस उपचारपद्धति का अभ्यास होगा, साथ ही उस की सूक्ष्म बातें (बारीकियां) भी ध्यान में आएंगी । इससे, प्रत्यक्ष आपातकाल में विकारों का सामना करने के लिए लगनेवाला आत्मविश्‍वास उत्पन्न होने में सहायता होगी । इन ३ भागों से पाठकों का इस उपचारपद्धति से परिचय होगा । इसका विस्तृत विवेचन ग्रंथ में किया है । पाठक वह ग्रंथ अपने ग्रंथकोश में अवश्य रखें ।

मनोगत

१. उपचार-पद्धति का मर्म (मूल सिद्धांत)

प्राणमय कोश और कुंडलिनी चक्र मिलकर प्राणशक्ति (चेतनाशक्ति) प्रणाली का निर्माण करते हैं । पंच-प्राण, पंच-उपप्राण और पंच-कर्मेन्द्रिय मिलकर प्राणमय कोश की रचना करते हैं । यह कोश रजोगुणप्रधान तथा वायुरूप होता है । मानव के स्थूल शरीर में रक्त-परिसंचरण, श्‍वसन, पाचन, तंत्रिका इत्यादि विविध तंत्र कार्यरत रहते हैं । इन्हें तथा मन को कार्य करने के लिए आवश्यक ऊर्जा प्राणशक्ति प्रणाली प्रदान करती है । इस प्रणाली में कहीं भी अवरोध उत्पन्न होने पर संबंधित इंद्रिय की कार्यक्षमता घट जाती है, जिससे उस में विकार उत्पन्न होते हैं । तब उस इंद्रिय का कार्य सुधारने के लिए कितनी भी आयुर्वेदिक, एलोपैथिक आदि औषधियों का सेवन कर लें, विशेष लाभ नहीं होता । इसका एकमात्र उपचार है प्राणशक्ति प्रणाली में उत्पन्न अवरोध दूर करना । हमारे हाथ की उंगलियों से निरंतर प्राणशक्ति प्रक्षेपित होती रहती है । उसका उपयोग कर रोग दूर करना, यह प्राणशक्ति उपचार-पद्धति का मर्म (मूल सिद्धांत) है ।

२. अधिक परिपूर्ण उपचार-पद्धति !

व्यक्ति को कष्ट देनेवाली अनिष्ट शक्ति, व्यक्ति के शरीर में रोग का मूल स्थान बार-बार परिवर्तित करती रहती है । इसलिए, ऐसे समय बिंदुदाब आदि उपचार-पद्धतियों में बताए गए रोग से संबंधित बिंदु दबाकर सटीक उपचार करना संभव नहीं रहता । प्राणशक्ति प्रणाली उपचार-पद्धति में प्रत्येक बार अवरोध का स्थान खोजा जाता है । इसलिए इस पद्धति से सटीक उपचार किया जा सकता है ।

३. अधिक स्वयंपूर्ण उपचार-पद्धति !

आगामी भीषण आपातकाल का विचार करें, तो रोगनिवारण के विषय में स्वावलंबी बनने के लिए बिंदु, बिंदुदाब, रिफ्लेक्सोलॉजी, पिरैमिड से उपचार, चुंबक उपचार जैसी उपचार-पद्धतियां महत्त्वपूर्ण हैं । इन उपचार-पद्धतियों में पुस्तक अथवा जानकारों की सहायता आवश्यक होती है । पिरैमिड, चुंबक आदि उपचार-पद्धतियों में उपकरणों की भी आवश्यकता होती है । पर, प्राणशक्ति उपचार-पद्धति में किसी साधन की आवश्यकता नहीं पडती । अतः, यह अधिक स्वपूर्ण है ।
– (परात्पर गुरू) डॉ. आठवले (२८.१०.२०१५)

१. प्राणशक्ति के प्रवाह में अवरोध खोजना (न्यास का स्थान खोजना)

१ अ. अनिष्ट शक्तियों से पीडित व्यक्ति नामजप करते हुए स्थान खोजें !

उंगलियों से स्थान खोजते समय इस बात पर ध्यान देना महत्त्वपूर्ण होता है कि श्‍वास कहां रुक रही है । अनिष्ट शक्तियों की तीव्र पीडा से ग्रस्त लोग नामजप करते हुए ही यह प्रयोग करें; अन्यथा स्थान खोजते समय उंगलियों से निकलनेवाली कष्टदायक ऊर्जा शरीर में जाने की संभावना रहती है ।

१ आ. कुंडलिनीचक्रों पर उंगलियां घुमाकर न्यासस्थान खोजना

श्‍वास की ओर ध्यान देकर विकारग्रस्त इंद्रिय जिस कुंडलिनीचक्र से संबंधित है, उसके आसपास के भाग के ऊपर से उंगलियां ऊपर अथवा नीचे ले जाते समय श्‍वास लेने में कुछ रुकावट प्रतीत होती है । यह अनुभव करने के लिए हाथ का अंगूठा छोडकर शेष उंगलियां शरीर से १-२ सें.मी. दूर रखकर नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे ले जाएं । ऐसा करने पर भी कुछ अनुभव न हो, तब स्वाधिष्ठानचक्र से सहस्रार चक्र तक क्रम से प्रत्येक चक्र के आसपास के भाग के ऊपर से उंगलियां ऊपर और नीचे ले जाएं । ऐसा करते समय जिस कुंडलिनीचक्र अथवा उसके आसपास उंगलियां ले जाने पर श्‍वास लेने में रुकावट अनुभव हो, वह न्यासस्थान है ।

१ इ. शरीर के सभी भागों के ऊपर उंगलियां घुमाकर न्यासस्थान खोजना

कभी-कभी कुंडलिनीचक्र में अवरोध न होने पर भी शरीर की विविध नाडियों में अवरोध रहता है । इसलिए उनसे संबंधित इंद्रिय में कष्ट रहता है, उदा. श्‍वास फूलना रोगमें नाडियों में उत्पन्न अवरोध खोजने के लिए कुंडलिनीचक्रों के स्थान छोडकर शरीर के सिर, गरदन, छाती, पेट, हाथ, पैर आदि सभी अवयवों के ऊपर उंगलियां घुमाकर खोजें कि अवरोध कहां है ?

१ ई. स्थान खोजते समय जिस स्थान पर कष्ट के प्रकटीकरण के लक्षण ध्यान आएं, वह स्थान भी न्यास करने के लिए उचित होना

स्थान ढूंढते समय कभी-कभी आध्यात्मिक उपाय भी होते हैं । आध्यात्मिक उपाय होने से कष्ट के प्रकटीकरण के लक्षण (उदा. जम्हाई आना, डकारें आना, त्वचा पर चुभने-जैसी संवेदना प्रतीत होना) अनुभव होते हैं । ऐसा होने पर समझें कि वह स्थान भी न्यास करनेयोग्य है ।

१ उ. दाएं हाथ की उंगलियों से न्यासस्थान न मिले, तो बाएं हाथ की उंगलियों से न्यासस्थान खोजें ।

१ ऊ. दोनों हाथों की उंगलियों से न्यासस्थान खोजना

एक हाथ की उंगलियों से कुंडलिनीचक्रों में अथवा शरीर के अन्य अवयवों में प्राणशक्ति के प्रवाह के अवरोध ध्यान में न आएं, तब एक हाथ की हथेली के पृष्ठ भाग पर दूसरे हाथ का पृष्ठभाग रखकर, दोनों हाथों की उंगलियों से अवरोध का स्थान खोजें । दोनों हाथों की उंगलियों से प्राणशक्ति अधिक मात्रा में प्रक्षेपित होती है । इससे अवरोध अल्प होने पर भी उसका स्थान ज्ञात होता है और वहां उपचार करना सम्भव होता है ।

१ ए. न्यासस्थान खोजते समय हाथ की उगंलियां घुमाने पर कभी-कभी असह्य कष्ट होना

न्यासस्थान खोजने के लिए हाथों की उंगलियां घुमाते समय कभी-कभी उलटी जैसा लगना, श्‍वास रुक जाना, इस प्रकार के असह्य कष्ट होते हैं । वे कष्ट, वहांके इन्द्रिय की स्वाभाविक गति की दिशा/ अंग के कार्य करने की दिशा के विरुद्ध उंगलियां घुमाने से होता है । इसका एक उदाहरण इस प्रकार है बडी आंत के कार्य करने की दिशा पेटके दाईं ओर के निचले स्थान से सीधे ऊपर छाती की पसली तक, वहां से बाईं ओर की पसली तक तथा वहां से पेट के बाईं ओर नीचे की दिशा में होती है । उसके विरुद्ध उंगलियां घुमाने से असह्य कष्ट होता है । ऐसा होने पर समझना चाहिए कि उंगलियां घुमाने की दिशा अनुचित है ।

 

२. उपचार के लिए आवश्यक मुद्रा और नामजप खोजना

२ अ. पंचतत्त्व एवं उससे संबंधित देवता का नामजप / पंचतत्त्वों से संबंधित बीजमंत्र एवं मुद्रा

२ अ १. मुद्रा खोजने की पद्धति

जब छोटे स्तर की अनिष्ट शक्तियों से कष्ट हो, तब कनिष्ठिका और अनामिका उंगलियों से संबंधित मुद्रा करनी पडती है । आजकल अनिष्ट शक्तियों का प्रकोप बढ गया है । अतः, कनिष्ठिका और अनामिका से संबंधित मुद्रा करने से अधिक लाभ नहीं होगा । बडे स्तर की अनिष्ट शक्तियों से होनेवाले कष्ट दूर करने के लिए मुद्रा भी उस स्तर की होनी चाहिए
मुद्रा खोजते समय –

१. अंगूठे का सिरा उंगलियों के सिरोंसे जोडना,
२. अंगूठे का सिरा उंगलियों के मूल से जोडना,
३. उंगलियों के सिरे हथेली से जोडना और
४. तर्जनी का सिरा अंगूठे के मूल से जोडना,

इस क्रम से प्रयोग करें प्रथम मध्यमा, पश्‍चात तर्जनी और अंत में अंगूठा, इस क्रम से मुद्रा खोजें । प्रत्येक मुद्रा साधारणतः २०-३० सेकंड कर, उसका प्रभाव जानने का प्रयत्न करें एक मुद्रा करने के पश्‍चात ३-४ सेकंड रुककर अगली मुद्रा से प्रयोग करें । यह प्रयोग करते समय जिस मुद्रा से अधिक मात्रा में श्‍वास में रुकावट प्रतीत हो, वह मुद्रा उपचार के लिए उपयुक्त होती है ।

२ अ २. मुद्रा के प्रकार तथा सगुण-निर्गुण स्तर

मुद्रा के प्रकार सगुण-निर्गुण स्तर
१. अंगूठे का सिरा उंगली के सिरे से जोडना सगुण
२. अंगूठे का सिरा उंगली के मूल से जोडना सगुण-निर्गुण
३. उंगली का सिरे हथेली से जोडना निर्गुण-सगुण
४. तर्जनी का सिरा अंगूठे के मूल से जोडना अधिक निर्गुण-सगुण
५. उंगली का सिर अथवा हथेली न्यासस्थान से १-२ सें.मी. दूर रखना अत्यधिक निर्गुण-सगुण

२ अ ३. कष्ट पर संबंधित महाभूत के उपचार होने के लिए प्रयोग से प्राप्त मुद्रा और उसके अनुरूप किया जानेवाला नामजप / पंचमहाभूत से संबंधित देवता का नामजप / बीजमंत्र का जप

मुद्रा अंगूठे का सिरा उंगली के सिरे से जोडना अंगूठे का सिरा उंगली के मूल से जोडना उंगली का सिरा हथेली से लगाना
पंचमहाभूत से संबंधित नामजप पंचमहाभूत से संबंधित बीजमंत्र पंचमहाभूत से संबंधित नामजप पंचमहाभूत से संबंधित बीजमंत्र पंचमहाभूत से संबंधित नामजप पंचमहाभूत से संबंधित मंत्र
१. मध्यमा श्री अग्निदेवाय नमः रं श्री सूर्यदेवाय नमः रं श्री सूर्यदेवाय नमः । रं
२. तर्जनी श्री हनुमते नमः । यं श्री वायुदेवाय नमः यं श्री वायुदेवाय नमः । यं

 

मुद्रा पंचमहाभूत से संबंधित नामजप पंचमहाभूत से संबंधित बीजमंत्र
अंगूठा तर्जनी का सिरा अंगूठे के मूल से जोडना श्री आकाशदेवाय नमः । हं / खं

(देवता के नामजप के साथ ॐ अथवा महा जोडने के विषय में सूचनाएं भाग ३ के सूत्र ४ इ में दी हैं ।)

२ अ ४. प्रयोग से प्राप्त उपचार २ घंटे करने पर भी लाभ न हो, तब क्या करें ?

कभी-कभी किसी का कष्ट बहुत बढ जाता है, तब उसके लिए न्यास और मुद्रा खोजना कठिन हो सकता है । इसी प्रकार, कभी-कभी खोजा हुआ न्यास, मुद्रा और उसके अनुसार नामजप २ घंटेे करने पर भी लाभ नहीं होता । तब बार-बार प्रयोग करना पडता है । इससे बचने के लिए निम्नानुसार प्रयत्न करें –

अ. प्रयोग से प्र्राप्त उपचार २ घंटेे करने पर भी लाभ न हो, तब ध्यान में अथवा ईश्‍वर से प्रश्‍न करें कि क्या यह उपचार और १-२ घंटेे जारी रखने से लाभ होगा ? उत्तर हां मिलने पर वही उपचार जारी रखें । वह उपचार १-२ घंटेे करने पर भी लाभ न हो, तब निम्नांकित उपचार करें और उत्तर नहीं मिलने पर भी आगे दिए उपचार करें ।

आ. न्यास मध्यमा उंगली से (अग्नितत्त्वसे) कर रहे हों, तब उसके स्थान पर इससे उच्च स्तर की वायुतत्त्व से संबंधित तर्जनी उंगली से न्यास करें । इस समय, अंगूठे का सिरा तर्जनी के मूल से जोडकर मुद्रा बनाएं और अग्निदेव अथवा सूर्यदेव का जप न कर, हनुमान अथवा वायुदेव का नामजप करें ।

इ. न्यास तर्जनी से (वायुतत्त्व से) कर रहे हों, तब उसके स्थान पर उससे उच्चतर आकाशतत्त्व से संबंधित अंगूठे से करें । इस समय, तर्जनी का सिरा अंगूठे के मूल से जोडकर मुद्रा बनाएं और हनुमान अथवा वायुदेव का नामजप करने के स्थान पर आकाशदेवता का नामजप करें ।

ई. उपर्युक्त जप और न्यास करने पर भी लाभ न हो, तब आकाशदेवता का नामजप बिना न्यास के करें; परंतु मुद्रा उपर्युक्त अनुसार ही करें ।

उ. आकाशदेवता का नामजप सूत्र ई अनुसार ५-६ दिन करने पर भी लाभ न हो, तब वर्तमानकाल के लिए आवश्यक श्रीकृष्ण का नामजप करें । इस समय दोनों हाथों की मध्यमा और अंगूठे के सिरे आपस में जोडें । अब, एक हाथ की मुद्रा से मणिपुरचक्र पर न्यास करें और दूसरे हाथ की मुद्रा को वैसे ही रहने दें, उससे न्यास न करें ।

आकाशदेवता का नामजप निर्गुण स्तर का होता है तथा श्रीकृष्ण का नामजप निर्गुण-सगुण स्तर का होता है । अनिष्ट शक्तियों के आक्रमण कभी-कभी अधिक मात्रा में सगुण स्तर के तथा कभी-कभी अधिक मात्रा में निर्गुण स्तर के होते हैं । इसलिए, आवश्यकतानुसार आकाशदेवता अथवा श्रीकृष्ण का और आवश्यकता समझमें न आने पर, आकाशदेवता एवं श्रीकृष्ण का नामजप बारी-बारी से करना अधिक लाभदायक होता है ।

महाभूतों का नामजप करते समय भाव जागृत होना कठिन होता है । इसके विपरीत, श्रीकृष्ण का नामजप करते समय सहजता से भाव जागृत हो सकता है । इससे नामजप की प्रभावशीलता बढ जाती है ।

२ आ. उच्च देवताआें के और निर्गुण से संबंधित नामजप एवं मुद्रा

२ आ १. नामजप खोजने की पद्धति

सूत्र ५ इ १ अ में दिए नामजपमें पहला नामजप १-२ मिनट करते हुए निरीक्षण करें कि क्या श्‍वास रुकता है अथवा क्या श्‍वास लेने में कष्ट होता है । इसी प्रकार, आगे के नामजप करते समय निरीक्षण करें । जिस नामजप के समय श्‍वास रुकने की अथवा श्‍वास लेने में कष्ट होने की तीव्रता अधिक हो, उसे उपचार हेतु सर्वाधिक उपयोगी समझें ।

२ आ १ अ. उपचार हेतु आवश्यक नामजप

१. कुलदेवता, उपास्यदेवता एवं सप्तदेवता (श्रीराम, हनुमान, शिव, श्री दुर्गादेवी, श्री गणपति, दत्त और श्रीकृष्ण) के नामजप में से प्रत्येक का नामजप कर अनुभव करें । अधितर देवताआें के नामजप के आरंभ में श्री लगाया जाता है, उदा. श्री गणेशाय नमः । प्रथम ऐसे नामजप कर अनुभव करें । तब भी कुछ अनुभव न हो, तब प्रत्येक नामजप के आरंभ और अंत में एक ॐ लगाकर नामजप करें और उनके प्रभाव का अनुभव करें । ऐसा करने पर भी कुछ अनुभव न हो, तब नामजप के आरंभ और अंत में दो बार ॐ लगाकर प्रभाव का अनुभव करें ।

२. शून्य, महाशून्य, ॐ और निर्गुण, ये सभी क्रमशः बढते क्रम में निर्गुण से संबंधित नामजप हैं । अत: इन नामजपों में से क्रमश: एक-एक नामजप कर, उनके प्रभाव का अनुभव करें ।

२ आ २. मुद्रा खोजने की पद्धति

सूत्र २ अ १ देखें.

 

३. प्राणशक्ति के प्रवाह में आनेवाले अवरोधों पर उपचार करना

३ अ. न्यास कैसे करें ?

प्रयोग द्वारा प्राणशक्ति के प्रवाह में आए अवरोध का स्थान, मुद्रा और नामजप खोजने के उपरांत उस स्थान पर नामजप कर उपचार करने पडते हैं । इसके लिए न्यास कैसे करना है, यह समझना आवश्यक है । आगे दी हुई मुद्राआें से न्यास करें ।

मुद्रा न्यास
१. अंगूठे का सिरा उंगली के सिरे से लगाना मुद्रा करते समय जुडी हुई उंगली के
सिरे सेे न्यास करें ।
२. अंगूठे का सिरा उंगली के मूल से लगाना संबंधित उंगली के सिरे सेे न्यास
करें ।
३. उंगली का सिरा हथेली से लगाना हथेली सेे न्यास करें ।
४. तर्जनी का सिरा अंगूठे के मूल से लगाना अंगूठे के सिरे सेे न्यास करें ।

३ आ. उपचार करने की पद्धति

३ आ १. न्यासस्थान पर उंगलियां घुमाकर उपचार करना

३ आ १ अ. सिद्धांत

न्यासस्थान पर उंगलियां नीचे से ऊपर अथवा ऊपर से नीचे लाकर उपचारों की दिशा निश्‍चित करें और तदनुसार उपचार करें ।

३ आ १ आ. क्रिया

सूचना : अंगूठा छोडकर हाथों की शेष उंगलियां अवरोधवाले स्थान पर शरीर से १-२ सें.मी. की दूरी से ऊपर से नीचे अथवा नीचे से ऊपर करने पर, जिस क्रिया के समय श्‍वास लेने में रुकावट अनुभव हो, वह हमारे लिए उपचार करने की दिशा है । आगे दिए लेखन में जहां उपचार की दिशा निश्‍चित करने की दृष्टि से उंगलियां ऊपर-नीचे करें, ऐसा उल्लेख हो, वहांं समझें कि अंगूठा छोडकर हाथ की शेष उंगलियां चलानी हैं ।

जहां उपचार करने की दृष्टि से उंगलियां ऊपर-नीचे करें, ऐसा उल्लेख हो, वहां समझें कि न्यास करने हेतु उपयोग में लाई जानेवाली उंगली का सिरा, दो उंगलियों को लगाने से बना सिरा अथवा हथेली, अवरोध वाले स्थान पर शरीर से १-२ सें.मी. दूर से ऊपर-नीचे कर उपचार करना है । न्यास करने हेतु उपयोग में लाई जानेवाली उंगलियों के विषय में जानकारी सूत्र ३ अ में दी है

१. यदि न्यासस्थान पर उंगलियां नीचे से ऊपर ले जाने पर श्‍वास रुकती हो, तो वहां ४-५ सें.मी. के भाग में उंगलियां नीचे से ऊपर ले जाएं ।

२. यदि उंगलियां ऊपर से नीचे करते समय श्‍वास रुकती हो, तो वहां ४-५ सें.मी. के भाग में उंगलियां ऊपर से नीचे करें ।

३. अनेक बार न्यासस्थान पर हाथ ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर ले जाते समय श्‍वास रुकती है । तब –

अ. हाथ ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर दोनों प्रकार से ले जाएं ।

आ. न्यासस्थान से दोनों दिशाआें में हाथ की उंगलियां २-३ सें.मी. दूर रखकर उपचार करें ।

४. सहस्रार की सीधी रेखा में पीछे की ओर जहां केश समाप्त होते हैं, वहां तक उंगलियां घुमाएं, इसके विपरीत भी करके देखें । दोनों में से जो करते समय अधिक कष्ट हो, उसे उपचारों की दिशा समझें और तदनुसार उपचार करें ।

३ आ २. विकारग्रस्त अवयव के ऊपर उंगलियां घुमाकर उपचार करना

३ आ २ अ. सिद्धांत

विकारानुसार अवयव के ऊपर उंगलियां घुमानेकी दिशा निश्‍चित करें और तदनुसार उपचार करें ।

३ आ २ आ. क्रिया

कभी-कभी कुंडलिनीचक्र अथवा शरीर के अन्य भाग के न्यासस्थान पर उपचार करनेपर कष्ट दूर होनेमें समय लगता है, उदा. मूत्र जमा होना, शौच न होना, पैर सूजना । ऐसी स्थिति में विकारग्रस्त अवयव के ऊपर शरीर से १-२ सें.मी. दूर से ही उंगलियां घुमाकर उपचार करने से कष्ट दूर होने में सहायता होती है । इसके कुछ उदाहरण आगे दिए है ।

१. पैर सूजे हों, तब उनपर उंगलियां नीचे से ऊपर मंद गति से ले जाएं ।

२. मूत्रत्याग न हो रहा हो, तब उंगलियां नाभि से २ से.मी. नीचे स्वाधिष्ठान चक्र तक पुनः-पुन: ले जाएं ।

३. शौच न हो रहा हो, तब उंगलियां पेट के दाहिने भाग के नीचे से घुमाना आरंभ कर सीधे पसलियों तक ऊपर लाएं । पश्‍चात उसे सीधे बाईं ओर ले जाएं । वहांं से उसे सीधे नीचे लाकर मलद्वार की दिशा में ले जाएं । यह पूरी क्रिया बार-बार करें ।

३ आ ३. कष्ट से संबंधित कुंडलिनीचक्र के अथवा अवयवों के स्थान पर न्यास करना

कुंडलिनीचक्र के आसपास उंगलियां ऊपर से नीचे अथवा नीचे से ऊपर ले जाने से भी न्यासस्थान न मिल पाए अथवा वैसा करना असंभव हो, तब कष्ट से संबंधित कुंडलिनीचक्र के स्थान पर तथा उस स्थान से ३-४ सें.मी. ऊपर-नीचे शरीर से १-२ सें.मी. दूर से न्यास करें ।
आवश्यक हो, तब विकारग्रस्त अवयव के ऊपर भी शरीर से १-२ सें.मी. दूर से न्यास करें ।

३ आ ४. सहस्रारचक्र पर हाथ की पांचों उंगलियों से अथवा हथेली से न्यास करना

३ आ ४ अ. अनिष्ट शक्ति से पीडित

अनिष्ट शक्ति से पीडित व्यक्ति सहस्रारचक्र के स्थान पर सिर से १-२ सें.मी. दूर हाथों की पांचों उंगलियां अथवा हथेली लाकर न्यास करे, तो इससे उपचार होगा ।

३ आ ४ आ. अनिष्ट शक्ति की पीडा से रहित व्यक्ति

यदि ऐसा व्यक्ति सहस्रारचक्र के ऊपर शरीर से १-२ सें.मी. दूर से पांचों उंगलियां मिलाकर न्यास करता है, तब उसका देवता के प्रति भाव जागृत होता है । सहस्रारचक्र के ऊपर हथेली ले जाने से, उंगलियों की अपेक्षा अधिक भावजागृति होती है ।

४. उपचारों के विषय में सूचनाएं

४ अ. उपचारकर्ता आगे दिए सूत्रों पर ध्यान दें !

४ अ १. सभी के लिए, विशेषरूप से अनिष्ट शक्तियों की तीव्र पीडा से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए नामजप करते हुए उपचार करना आवश्यक

अ. अनिष्ट शक्तियों की तीव्र पीडा से ग्रस्त लोगों की उंगलियों से कष्टदायक शक्ति प्रक्षेपित होती रहती है । अतः, ऐसी उंगलियों से उपचार करने पर, शरीर में कष्टदायक शक्ति ही जाती है । इसलिए, बिना नामजप के उपचार करने से कष्ट बढता है । यदि कष्ट के कारण कोई नामजप न कर पाए, तब वह अपने पर आध्यात्मिक उपचार न करे । ऐसा व्यक्ति आयुर्वेदीय उपचार, गत्तेके रिक्त बक्सोंके उपचार तथा अन्य उपचार करे । मंद अथवा मध्यम प्रकार की पीडा से ग्रस्त व्यक्ति के लिए नामजप करना संभव होता है । अतः, वे अपने पर उपचार कर सकते हैं ।

आ. वर्तमान कलियुग में अनिष्ट शक्तियों का प्रकोप इतना बढ गया है कि लगभग प्रत्येक व्यक्ति को इनसे थोडा-बहुत कष्ट होता ही है । अतः, प्रत्येक के लिए नामजप करते हुए उपचार करना आवश्यक है ।

४ आ. उपचार करते समय ध्यान रखनेयोग्य सूत्र

४ आ १. उपचार करते समय यथासम्भव दाएं हाथ का उपयोग करें !

प्राणशक्ति (चेतनाशक्ति) के संवहन में आया अवरोध दूर करने के लिए सूर्यनाडी से संबंधित दाएं हाथ से उपचार करना अधिक लाभदायक होता है । अधिकतर उपचार कुछ घंटे करने पडते हैं । तब, हाथ में वेदना होने लगती है । उस समय, दूसरे हाथ से उपचार करें ।

४ आ २. दो अलग-अलग स्थानों पर अवरोध मिलें, तब एक हाथ से एक स्थान पर तथा दूसरे हाथ से दूसरे स्थान पर उपचार करें । यदि अवरोध का स्थान एक ही हो, तब एक हाथ से उस स्थान पर उपचार (न्यास) करें और दूसरे हाथ से मुद्रा करें !

४ आ ३. जब अवरोध, कुंडलिनीचक्र में तथा शरीर के विविध भागों में हो, तब अधिक अवरोधवाले दो स्थानोंपर उपचार करें ।

४ आ ४. उपचार करते समय बीच-बीच में अवरोध के नए स्थान खोजकर उनपर उपचार करें ! : प्रयोग से न्यासस्थान खोजने के पश्‍चात, उसपर उपचार करते समय प्रत्येक २० से ४० मिनट के उपरांत अवरोध के नए स्थान खोजकर उनपर उपचार करें; क्योंकि उपचारों से अवरोध का स्थान परिवर्तित होता रहता है । कभी-कभी अनिष्ट शक्तियां ही, उपचार न होने देने के लिए अवरोध का स्थान परिवर्तित कर
देती हैं ।

४ आ ५. रोगनिवारण के लिए कौन-सी मुद्रा अथवा नामजप करना चाहिए, यह प्रयोग से निर्धारित न होने पर ध्यान रखनेयोग्य सूत्र

प्रयोग से मुद्रा खोजते समय कभी-कभी दो ऐसी मुद्राएं मिलती हैं, जिनसे समान कष्ट अनुभव होता है । ऐसे समय, वे दोनों मुद्राएं पुनः कर, पता करें कि किस मुद्रा से अधिक कष्ट होता है । इसके पश्‍चात भी उचित मुद्रा न मिले, तब पंचतत्त्वोंमें से उच्च स्तर के तत्त्व की मुद्रा करें । सूत्र ५ इ. उच्च देवताआें के और निर्गुण से सम्बन्धित नामजप एवं मुद्राएं में बताए अनुसार नामजप के विषय में प्रयोग करते समय भी उपर्युक्त सूत्र ध्यान में रखें ।

४ आ ६. अवरोध-स्थान पर शरीर से १-२ सें.मी. दूर से उपचार करना

अवरोध-स्थान पर उंगलियों से उपचार करते समय उन्हें शरीर से १-२ सें.मी. दूर रखकर ऊपर-नीचे ले जाएं । इसी प्रकार, अवरोध के स्थान पर न्यास करते समय उंगलियों को शरीर से १-२ सें.मी. दूर रखें । वृद्ध अथवा रोगी व्यक्ति को न्यास करते समय हाथ को आधार की आवश्यकता पड सकती है; तब वे शरीर को स्पर्श करते हुए न्यास करें ।

४ इ. देवता के नामजप के साथ ॐ अथवा महा जोडना

४ इ १. उपचारों के समय नामजप के साथ ॐ जोडने के नियम

४ इ १ अ. सर्वसाधारण व्यक्तिके लिए

१. प्राणशक्ति संवहन प्रणाली में आया अवरोध अल्प हो, तब श्री युक्त प्रचलित नामजप ही करें । (प्रचलित नामजप के आरंभ में श्री न हो, उदाहरण के लिए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, तब वह नामजप वैसा ही करें ।)

२. प्राणशक्ति प्रणाली में आए अवरोध की तीव्रता मध्यम हो, तब प्रचलित नामजप के आरंभ एवं अंत में एक-एक ॐ लगाएं ।

३. जब प्राणशक्ति संवहन प्रणाली में आए अवरोध की तीव्रता उच्च हो, तब प्रचलित नामजप के आरंभ एवं अंत में दो-दो ॐ लगाएं ।

४ इ १ आ. साधक व्यक्तिके लिए

वर्तमान में आपातकाल की उग्रता बढ गई है । इस काल में साधना न करनेवाले व्यक्ति की तुलना में, साधना करनेवाले व्यक्ति पर अनिष्ट शक्तियों के आक्रमण बढ जाते हैं । इन आक्रमणों से अपनी रक्षा के लिए किसी भी साधनामार्ग का और किसी भी संप्रदाय का अनुसरण करनेवाला साधक, अपने नामजप को अधिक प्रभावी बनाने के लिए नामजप के आरंभ और अंत में दो-दो ॐ लगाकर उपचार करे ।

४ इ २. देवता के नामजप के साथ महा शब्द जोडना

ॐ की ही भांति कुछ प्रचलित नामजप (उदा. गणपति, लक्ष्मी, विष्णु, रुद्र) के आरंभ में महा शब्द लगाना उपयोगी होता है । इससे निर्गुण तत्त्व अधिक मिलता है, जिससे अल्प समय में कष्ट दूर होने में सहायता होती है ।

४ ई. अन्य सूचनाएं

१. कष्ट दूर होने तक, उपर्युक्त उपचार प्रतिदिन न्यूनतम २ घंटे करें ! : कभी-कभी उपचार के २ घंटेे पूरे होने के पहले ही किसी-किसी का कष्ट दूर हो जाता है । तब उपचार करना रोक दें ।

२. प्रयोग से ज्ञात उपचारों से १ घंटे में थोडा लाभ हो, तब आगे वही उपचार जारी रखें ।

३. प्रयोग से ज्ञात उपचारों से १ घंटा नामजप करने पर भी कोई लाभ न हो, तब दूसरा उपचार खोजें और करें ।

४ उ. उपचार पूरा होने पर उपास्यदेवता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें ।

४ ऊ. उपर्युक्त उपचारों के साथ औषधीय उपचार जारी रख सकते हैं !

उपर्युक्त उपचारों के साथ गत्ते के रिक्त बक्सों के उपचार, औषधियां, चुंबक-चिकित्सा जैसे उपचार भी कर सकते हैं ।

५. उपचार किसे नहीं खोजना चाहिए ?

अनिष्ट शक्तियों की तीव्र पीडा से ग्रस्त व्यक्ति उपचार खोजने का प्रयत्न न करें; क्योंकि अनिष्ट शक्तियां उन्हें उचित उत्तर नहीं मिलने देतीं हैं ।

यदि अनिष्ट शक्तियों की तीव्र पीडा से ग्रस्त लोगों में देवता के प्रति भाव हो, तब वे भी अपने लिए उपचार खोजने का प्रयत्न करें और प्राप्त उत्तर की सत्यता दूसरों से भी पूछकर सुनिश्‍चित कर लें अथवा उस उपचार से लाभ हो रहा है न, इस बात का निरीक्षण करें । उपचार से लाभ हो रहा हो, तब समझें कि खोजा हुआ उपचार उचित है और उसे जारी रखें ।

टिप्पणी : अब तक के लेखों में दिए अनुसार न्यासस्थान, मुद्रा और नामजप यदि स्वयं खोज न पाएं, तो कौन-से उपाय करें, यह भी इस ग्रंथ में दिया है ।

इस विषय को विस्तार से समझने के लिए पढिए :

सनातन का ग्रंथ प्राणशक्ति (चेतनाशक्ति) संवहन प्रणाली में आए अवरोधों से उत्पन्न होनेवाले विकारों पर उपाय

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