
रविवार, ७.९.२०२५ (भाद्रपद पूर्णिमा) को लगनेवाला संपूर्ण चंद्रग्रहण भारत में सर्वत्र दिखाई देगा । संपूर्ण चंद्रगहण को अंग्रेजी में Total lunar eclipse कहते हैं । संपूर्ण चंद्रगहण तब लगता है, जब पृथ्वी, चंद्रमा एवं सूर्य एक सीधी रेखा में आते हैं तथा पृथ्वी की संपूर्ण छाया चंद्रमा पर पडती है । उसके कारण चंद्रमा संपूर्ण ढका हुआ दिखाई देता है । चंद्रग्रहण पूर्णिमा के दिन ही लगता है ।
१. किन प्रदेशों में यह चंद्रग्रहण दिखाई देगा ?
‘यह चंद्रग्रहण भारत सहित संपूर्ण एशिया उपमहाद्वीप, अफ्रीका उपमहाद्वीप, संपूर्ण यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, नॉर्वे एवं अंटार्कटिका, इन प्रदेशों में दिखाई देगा । यह ग्रहण भारत में सर्वत्र दिखनेवाला है ।
२. ग्रहण का सूतक लगना
अ. अर्थ
चंद्रग्रहण से पूर्व चंद्रमा पथ्वी की छाया में आने लगता है, जिससे उसका प्रकाश धीरे-धीरे अल्प होने लगता है । इसी को ‘ग्रहण का सूतककाल आरंभ होना’ कहते हैं ।
आ. ग्रहण के सूतककाल का आरंभ
यह ग्रहण रात के दूसरे प्रहर में लगनेवाला है; इसलिए ग्रहण से ३ प्रहर पूर्व अर्थात दोपहर १२.३७ से लेकर ग्रहणमोक्ष तक ग्रहण के सूतक काल का पालन करें । सूतककाल में स्नान, देवतापूजन, नित्यकर्म, जप, श्राद्ध इत्यादि कर्म किए जा सकते हैं । सूतककाल में भोजन करना वर्जित है, अतः अन्नपदार्थ न खाएं; परंतु सूतककाल में अन्य आवश्यक कर्म, उदा. पानी पीना, मल-मूत्र विसर्जन, नींद लेना इत्यादि कर्म किए जा सकते हैं । बच्चे, वृद्ध, बीमार, दुर्बल व्यक्ति तथा गर्भवती महिलाएं रविवार सायंकाल ५.१५ से ग्रहण के सूतककाल का पालन करें । ग्रहण के पर्वकाल में अर्थात रात्रि ९.५७ से १.२७ तक की अवधि में ‘पानी पीना, सोना, मल-मूत्रोत्सर्ग’ जैसे कर्म न करें ।
३. चंद्रग्रहण के समय (भारतीय प्रमाण समय के अनुसार)
अ. स्पर्श (आरंभ) : रात्रि ९.५७ बजे
आ. सम्मिलन (conjunction) : रात्रि ११ बजे
इ. मध्य : रात्रि ११.४२ बजे
ई. उन्मीलन (opposition) : रात्रि १२.२३ बजे
उ. मोक्ष (अंत) : रात्रि १.२७ (७.९.२०२५ की उत्तररात्रि १.२७ बजे)
ऊ. ग्रहणपर्व (टिप्पणी १) (ग्रहण से आरंभ से लेकर अंत तक की कुल अवधि) : ३ घंटे ३० मिनट
टिप्पणी १ – पर्व का अर्थ है पुण्यकाल ! ग्रहणस्पर्श से लेकर के ग्रहणमोक्ष तक का काल पुण्यकाल है । शास्त्र में बताया है कि इस काल में ईश्वर के आंतरिक सान्निध्य में रहने से आध्यात्मिक लाभ मिलता है ।
(उक्त सभी समय पूरे भारत के लिए हैं ।)
४. ग्रहणकाल में कौनसे कर्म करने चाहिए ?
अ. ग्रहणस्पर्श होते ही स्नान करें ।
आ. पर्वकाल में देवतापूजन, तर्पण, श्राद्ध, जाप, होम एवं दान दें ।
इ. ग्रहण की अवधि में पूर्व में कुछ कारणवश खंडित मंत्रपाठ के पुरश्चरण का आरंभ करने से उसका अनंत गुना फल मिलता है ।
ई. ग्रहण मोक्ष के उपरांत (ग्रहण समाप्त होने के उपरांत)
स्नान करें ।
उ. ग्रहणकाल में (पर्वकाल में) नींद लेना, मल-मूत्रोत्सर्ग, अभ्यंग, भोजन एवं कामविषयों का सेवन जैसे कर्म न करें ।
ऊ. किसी व्यक्ति के लिए अशौच हो, तो ग्रहणकाल में उसे ग्रहण से संबंधित स्नान करने तथा दान देने तक सीमित शुद्धि होती है ।
५. ग्रहण का राशियों के अनुसार फल
अ. शुभ फल : मेष, वृषभ, कन्या एवं धनु
आ. अशुभ फल : कर्क, वृश्चिक, कुंभ एवं मीन
इ. मिश्र फल : मिथुन, सिंह, तुला एवं मकर
जिन राशियों के लिए इस ग्रहण का फल अशुभ है, ऐसे व्यक्ति तथा गर्भवती महिलाएं यह ग्रहण न देखें ।
(साभार : दाते पंचांग)
६. ग्रहणकाल में क्या वर्जित करें ?
अ. ग्रहणकाल में भोजन करना वर्जित है; इसलिए अन्नपदार्थ न खाएं । ग्रहण लगने से पूर्व पकाया हुआ अन्न ग्रहण के उपरांत न खाएं; क्योंकि उस अन्न के द्वारा घातक उत्सर्जित किरण सोखे जा सकते हैं ।
आ. ग्रहणकाल साधना के लिए उत्तम होने से सोकर तमोगुण बढाने की अपेक्षा साधना कर इस ग्रहण का लाभ उठाएं ।
इ. ग्रहणकाल में मनोरंजन तथा मौज-मस्ती करने में समय व्यर्थ न गंवाएं; क्योंकि साधकों के लिए यह अमूल्य अवसर है । इस काल में की जानेवाली साधना का (जाप, ध्यान एवं प्रार्थना का) अनंत गुना फल मिलता है । अतः इस काल में अपने इष्टदेवता का अथवा गुरुचरणों का मनोभाव से स्मरण कर एकाग्रता से नामजप करें ।’
– श्रीमती प्राजक्ता जोशी, ज्योतिष फलित विशारद, कुडाळ, जिला सिंधुदुर्ग, महाराष्ट्र. (९.८.२०२५)
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