वर्षा ऋतु में बीच में ही वर्षा रुक जाती है और धूप निकल आती है, तब सावधानी रखें !

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वैद्य मेघराज माधव पराडकर

१. ‘वर्षा थम जाए और धूप निकल आए’,
तब शरीर में पित्त बढने का वह एक कारण होता है ।

‘कई बार वर्षा ऋतु में सतत होनेवाली वर्षा रुक जाती है और धूप निकल आती है । कुछ दिन वर्षा नहीं होती और सतत धूप रहती है, तब इससे शरीर में पित्त का प्रकोप होने लगता है । (‘प्रकोप’ अर्थात ‘अधिक मात्रा में वृद्धि होना’) ऐसे समय पर आंखें आना (कंजंक्टिवायटिस), बुखार आना, शरीर पर फुंसियां आना, विसर्प (हर्पीस), अतीसार (जुलाब) जैसे विकार हो सकते हैं । वर्षा के समाप्त होते समय साधारणत: सितंबर अथवा अक्टूबर माह में इसीप्रकार का वातावरण होता है । तब भी ये विकार हो सकते हैं ।

 

२. क्या टाले ?

खट्टा, नमकीन एवं तीखा, साथ ही तैलीय पदार्थ पित्त बढाते हैं । इसलिए उपरोक्त वातावरण के रहते ऐसे पदार्थ खाना टालें । मिरची अथवा लाल मिर्च का उपयोग अत्यंत अल्प करें । ‘हम मिर्च के बिना खा ही नहीं सकते, भोजन में भरपूर डालने पर ही उसमें स्वाद आता है । हमें उसकी आदत है, इसलिए हमें कुछ नहीं होनेवाला’, ऐसा विचार कर अपनी हानि न कर लें । सेव, चिवडा, दालमोठ अथवा वडापाव, दाबेली, पानीपुरी, शेवपुरी जैसे चटपटे एवं तीखे अथवा तैलीय पदार्थ भी टालें । ऐसे काल में भूख लगने पर ही भोजन करें । भूख न होने पर भी यदि खाना ही पड जाए तो अल्प मात्रा में खाएं ।’

– वैद्य मेघराज माधव पराडकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (३१.७.२०२२)

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