वाफसा : पेडों को पानी देने की आवश्यक स्थिति !

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पद्मश्री सुभाष पाळेकर

 

श्रीमती राघवी कोनेकर

 

‘सुभाष पाळेकर प्राकृतिक कषि तंत्र में ‘वाफसा’ एक और प्रमुख स्तंभ है । इस लेख में हम ‘वाफसा क्या होता है ?’, साथ ही वाफसा की स्थिति बनने में पानी का व्यवस्थापन कैसे करें ?, यह समझ लेते हैं ।

 

१. वाफसा क्या होता है ?

‘भूमि में मिट्टी के २ कणों के मध्य की रिक्ति में पानी का अस्तित्व न होकर ५० प्रतिशत भाप और ५० प्रतिशत हवा का मिश्रण होना ‘वाफसा’ है । पेडों की जडें उनकी पानी की आवश्यकता को भाप के रूप में स्थित पानी के कण लेकर पूर्ण करती हैं । इस कारण पेडों को सीधे पानी की नहीं; अपितु भाप की आवश्यकता होती है । इसके साथ ही पेडों की जडों को और मिट्टी में स्थित जीवाणुओं को जीने के लिए हवा की आवश्यकता होती है; उसके कारण मिट्टी में बहती हवा का होना भी आवश्यक होता है । वाफसा की स्थिति में इन दोनों आवश्यकताओं की आपूर्ति होती है ।

सरल भाषा में बताना हो, तो ‘सुभाष पाळेकर प्राकृतिक कृषि तंत्र’ में हमें केवल भूमि में गीलापन बनाए रखना होता है, अतिरिक्त पानी की मार नहीं करनी होती है ।

 

२. भाप ग्रहण करनेवाली जडें कहां होती हैं ?

किसी पेड की दोपहर १२ बजे जो छाया आती है, उस छाया की सीमा पर अन्नद्रव्य और भाप ग्रहण करनेवाली जडें होती हैं । इसलिए पेड के तने के पास पानी न देकर उसे छाया की सीमा के ५-६ इंच बाहर देना चाहिए । ऐसा करने से जडें उनके लिए आवश्यक उतनी भाप ग्रहण करते हैं और उससे अतिरिक्त गीलेपन के कारण जडों के सडने की और उनमें फफूंद लगने की संभावना अल्प होती है ।

 

३. उचित पद्धति से पानी का व्यवस्थापन करने से आय में वृद्धि कैसे होती है ?

पेड के तने से ६ इंच दूरी पर पानी देने से पेड की जडें भाप की खोज में दूर-दूर तक बढती हैं । जडों का अच्छा विकास होने से उसका सीधा परिणाम तने पर होता है और उससे तने का घेरा बढता है । तने का घेरा जितना अधिक, उतना ही पत्तों द्वारा बनाया गया अन्न अधिकाधिक मात्रा में तने में संग्रहित किया जाता है और उसके कारण पेड का आकार और शाखों की संख्या में वृद्धि होती है । इस सब के फलस्वरूप, मिलनेवाली आय अपनेआप बढती है ।

 

४. पेडों को पानी देने की आवश्यकता है, इसे कैसे पहचानें ?

केवल पानी देने का समय आया है इसलिए पेडों को प्रतिदिन पानी दिया, ऐसा न कर पेडों और मिट्टी का निरीक्षण कर वाफसा है न, इसका अनुमान लगाने के उपरांत ही पानी दें । इसे पहचानने के लिए गमले की थोडीसी मिट्टी लेकर उसका लड्डू जैसा गोला बनता है न ?, यह देखें । यदि गोला बना, तो पानी की आवश्यकता नहीं है, मिट्टी में पर्याप्त गिलापन है, ऐसा मान लें । (एक बार अनुमान आने पर प्रत्येक बार मिट्टी कुरेदने की आवश्यकता नहीं होती) साथ ही कभी पानी देने की आवश्यकता हो, तो पौधों का सिरा मुरझाया हुआ दिखाई देता है । ऐसे में पानी डालें ।

ऋतु के अनुसार पेडों को पानी की आवश्यकता बदलती जाती है । वर्षा ऋतु के ४ महिनों में गिलापन तो होता ही है; इसलिए संभवतः पानी देने की आवश्यकता नहीं होती । ठंड में भी तापमान बहुत अल्प हो, तो १-२ दिन छोडकर भी पानी दिया, तो चलता है; परंतु धूप के महिने में नियमित पानी देना चाहिए । धीरे-धीरे अध्ययन से और निरीक्षण से इसकी बारीकियां ध्यान में आनी लगती हैं ।

 

५. पानी के व्यवस्थापन के लिए ध्यान में लेने योग्य सूत्र

अ. गमले में अथवा वाफसा में स्थित मिट्टी भुरभुरी और पानी की निकासी करनेवाली हो । गमले के तल में छेद है न, यह देखें और उस छेद पर पत्थर का टुकडा रखें । उससे छेद से मिट्टी न बहकर केवल पानी की ही निकासी होने में सहायता मिलती है । उसके पश्चात नारियल की शिखाएं, पत्तों का कचरा इत्यादि को अधिक मात्रा में डालकर अल्प मात्रा में मिट्टी डालें और उसमें पौधा लगाएं । (पौधे के जडों के आस-पास मिट्टी न हो, तो पौधा पत्तों के कचरे में न लगाकर मिट्टी में ही लगाएं । जडों के आस-पास मिट्टी का ढेर हो, तो उसके आस-पास पत्ते का कचरा फैलाया जा सकता है ।) ऐसा करने से पानी की अच्छी निकासी होकर अतिरिक्त गिलापन नहीं रहता । मिट्टी बहुत ही चिकनी हो, तो उसमें कुछ मात्रा में रेत भी मिलाया जा सकता है ।

आ. वर्षा के दिनों में गमलों में पानी जमा नहीं रहता न ?, इसकी ओर नियमित ध्यान दें । संग्रहित पानी गमले को तिरछा कर तुरंत निकाल दें ।

इ. पानी सीधे नली से न देकर संभवतः झारी से दें अथवा नली को शॉवर लगाकर दें । झारी तो घर पर ही सरल पद्धति से बनाया जा सकता है । उसके लिए तेल का ५ लीटर क्षमतावाला प्लास्टिक का खाली कैन लें और उसके ढक्कन में १०-१५ छोटे छेद बनाएं । इस कैन का उपयोग पानी देने के लिए झारी की भांति किया जा सकता है ।

ई. वाफसा की स्थिति अच्छे से बनी रहने के लिए छाना (भूमि के पृष्ठभाग को ढंकना) उचित पद्धति से किया गया है न?, इसकी ओर ध्यान दें । (३०.१२.२०२१)

संकलनकर्ता : श्रीमती राघवी कोनेकर, फोंडा, गोवा.

 (‘सुभाष पाळेकर प्राकृतिक कृषि तंत्र’ पर आधारित लेखों से संकलित कर बनाया गया लेख)

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