नवरात्रि : बाजारीकरण एवं संभाव्य धोखे !

Article also available in :

अनुक्रमणिका

हिन्दुओं के उत्सवों में आजकल अपप्रवृत्तियों ने प्रवेश कर लिया है । उत्सवों का बाजारीकरण होने से हिन्दू उत्सव मनाने का मूल उद्देश्य एवं उसका मूल शास्त्र भूल रहे हैं । हिन्दुओं की भावी पीढी तो उत्सवों में जो अपप्रवृत्तियां प्रवेश हो गईं हैं, उन्हें ही उत्सव समझने लगी हैं । यह स्थिति अत्यंत बिकट है । सिंधुदुर्ग जिले के वेंगुर्ले के वेदमूर्ति भूषण दिगंबर जोशी को इस संदर्भ में कुछ जिज्ञासु महिलाओं ने प्रश्न एवं शंकाएं पूछीं । उनकी शंकाओं का निरसन करनेवाला लेख उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक प्रसारमाध्यम पर प्रसारित किया । मूल लेख में फेरबदल न करते हुए कुछ संपादकीय संस्करण सहित इसे हमारे पाठकों के लिए दे रहे हैं ।

सर्व वेदवेत्ता गुरुजनों का वंदन कर आज एक महत्त्वपूर्ण एवं वादग्रस्त विषय को स्पर्श करनेवाले हैं । वर्तमान में हिन्दुओं के उत्सव-त्योहारों में विकृतियां बढने लगी है, उस अनुषंग से एवं पौरोहित्य करते समय मातृवर्ग द्वारा जो समस्या प्रस्तुत की जा रही हैं, इस कारण यह लेख लिखना प्रतीत हुआ । प्रसिद्ध हिन्दुत्वनिष्ठ लेखक भागवत एवं रामायण के अभ्यासक डॉ. सच्चिदानंद शेवडे एवं गणकप्रवर सिद्धांतिज्योतिषरत्न डॉ. गौरव देशपांडे, इन दोनों मान्यवरों से चर्चा करने के पश्चात ही यह विषय प्रस्तुत कर रहा हूं ।

 

१. किसप्रकार नवरात्रोत्सव का
बाजारीकरण हो रहा है, यह दर्शानेवाले महिलाओं के प्रश्न !

अ. चार-पांच महिलाओं ने दूरभाषद्वारा मुझसे संपर्क किया और पूछा, ‘‘गुरुजी नवरात्रि में प्रत्येक दिन विविध रंगों की साडियां पहनें और देवी तथा नवग्रहों की कृपा संपादन करें’’, ऐसा संदेश सोशल मीडिया द्वारा प्रसारित हो रहा है । क्या यह सत्य है ?

आ. कुछ महिलाओं ने तो ऐसा भी बताया कि उन्हें संदेश मिला है कि ९ दिन कौनसी साडी के साथ मैचिंग चूडियां, कान और गले के अलंकार पहनें ? जिससे देवी की कृपा होगी । धर्मशास्त्र में ऐसा कुछ दिया है क्या ?

इ. गरबा एवं डांडिया खेलना, यही देवी को अच्छा लगता है । जो उसे खेलेगा, उसे लक्ष्मी प्राप्त होगी । ऐसी भी चर्चा हो रही है । यह सत्य है क्या ? गुरुजी, क्या यह धर्मशास्त्र में दिया है ?, ऐसा प्रश्न आज मातृवर्ग पूछ रहा है ।

ई. मुंबई की श्रीमती सावंत नामक महिला ने पूछा, ‘‘कार्यालय में नौ दिन नौ विविध रंगों की साडियां और उसके अनुरूप मैचिंग चूडियां, कानों के अलंकार इत्यादि पहनें, ऐसा निश्चित हुआ है । मैं निर्धन हूं, चौकीदारी का काम करती हूं, पति सतत बीमार रहते हैं । इसलिए मैं इतना खर्च नहीं कर सकती, फिर मैं क्या करूं ? इससे क्या देवी का मुझ पर अथवा मेरा कुटुंब पर कोप होगा ?’’ यह सुनकर तो मैं घबरा ही गया और इस पर एक लेख लिखना तय किया ।

(इन महिलाओं द्वारा नवरात्रोत्सव मनाने के विषय में अपनी शंकाएं गुरूजी को जिज्ञासावश पूछ कर उनका निरसन करवा लेने के लिए उनका अभिनंदन ! – संपादक)

 

२. गुरूजी द्वारा किया शंकानिरसन एवं ध्यान में लाकर दी संभाव्य हानि !

२ अ. धर्मशास्त्र में नौ दिन नौ विविध रंगों की साडियां परिधान
करने का उल्लेख कहीं भी न होना; अपितु  केवल मार्केटिंग कंपनियों का स्वार्थवश आडंबर !

४ वेद, ४ उपवेद, ६ शास्त्र, १८ पुराण एवं उपपुराण, भगवद्गीता, रामायण, महाभारत, दुर्गासप्तशती और दुर्गा उपासना का ग्रंथ, ऐसे लगभग ६० स्मृतिग्रंथों में कहीं भी ऐसा नहीं दिया है कि नवरात्रि में नौ दिन नौ विविध रंगों की साडियां परिधान करें । केवल धुले हुए स्वच्छ वस्त्र परिधान करना चाहिए (नौ गज की साडी होगी तो उत्तम), ऐसे दिया है । तुम्हारे पास जो भी अलंकार हों, उन्हें पहनें । मैचिंग चाहिए ही, ऐसा नहीं । मार्केटिंग कंपनियों ने विविध संकल्पनाओं का उपयोग कर आजकल प्रत्येक क्षेत्र में पैर फैलाने आरंभ किए हैं । इससे त्योहारों की पवित्रता नष्ट होकर, उसमें विकृतियां निर्माण हो गईं ।

अब इसकी अगली आवृत्ति अर्थात ‘नवरात्रि में ९ रंगों के मास्क पहनें’, ऐसे विज्ञापन सर्वत्र झलकने लगे हैं ।

कोविड जैसी महामारी में मास्क लगाना, यह जीवन का अविभाज्य अंग बन गया । नवरात्र एवं कोरोना का लाभ उठाते हुए मास्कविक्रेता एवं व्यावसायिकों ने धन एकत्र करने के लिए ९ रंगों के मास्क की संकल्पना विज्ञापनों द्वारा प्रस्तुत की है । ९ रंगों के मास्क लगाना उपासना की दृष्टि से निरर्थक है ।

२ आ. इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों का हस्तक्षेप !

प्रत्येक प्रांत की एक विशेष संस्कृति होती है, जिसे संजोना चाहिए । महाराष्ट्र में घटस्थापना का विशेष महत्त्व है । उसके साथ ही अखंड नंदादीप, कुछ लोगों के यहां त्रिकालपूजन, सप्तशती पाठ वाचन, सुहागिन और कुमारिका पूजन एवं भोजन एवं माला बंधन, इस स्वरूप की नवरात्रि होती है । ललिता पंचमी, महालक्ष्मी पूजन, अष्टमी का होमहवन, सरस्वती आवाहन-पूजन, ऐसी भी धार्मिक विधि महाराष्ट्र एवं गोवा राज्यों में होती हैं । कर्नाटक में दशहरा धूमधाम से मनाया जाता है । कच्छ, सौराष्ट्र, गुजरात जैसे प्रांतों में देवी की प्रतिमा का पूजन एवं होमहवन और रात में जागरण, गरबा इत्यादि के साथ यह उत्सव मनाया जाता है । बंगाल में यह उत्सव बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है । इवेंट मैनेजमेंट कंपनियां इसमें बहुत गडबड करती हैं । वे मूल परंपराओं में मिलावट कर, कुछ नई पद्धति ही प्रचलन में ले आती हैं । जिनका कोई शास्त्रीय आधार नहीं होता । उसमें देवी की उपासना का सबसे मुख्य भाग का समावेश ही नहीं होता ।

२ इ. नवरात्र मातृशक्ति का उत्सव है !
यदि यह नहीं समझेंगे, तो अगली पीढी का धर्मपरिवर्तन निश्चित है !

प्रत्येक प्रांत की एक विशेषता होती है । उनकी अपनी परंपरा होती है । उसे संजोना अत्यंत आवश्यक है । अन्यथा कुछ वर्षाें में अपने बच्चे, नाती-पोते समझेंगे कि नवरात्र का अर्थ केवल डिजे लगाकर गरबा, डांडिया खेलना ! वे यह समझ ही नहीं पाएंगे कि नवरात्रि, मातृशक्ति का उत्सव है । यदि अपने आचार-विचार, संस्कृति, अपनी धार्मिक परंपराओं का एक बार भुला दिया, फिर तो गले में क्रॉस डालो अथवा सुंता करो, कोई अंतर नहीं पडनेवाला । इन इवेंट एवं मार्केटिंग आस्थापनों ने इसी नस को पकड लिया है । इसके अंतर्गत जो कुछ भी होगा, लाभ परधर्मीय ही उठाएंगे ।

कोई निर्धन बहन वर्तमान की ऐसी ‘हाइ फाय’ नवरात्रि नहीं मना पाएगी, इसलिए वह देवीपूजन नहीं करेगी, और फिर धीरे-धीरे वह नास्तिक हो जाएगी । पैसा एवं धर्मशिक्षा के अभाव के साथ-साथ मौजमस्ती करने का अवसर मिलने से युवा पीढी डिजे और गरबा-डांडिया को ही नवरात्रि समझेगी । उन्हें यह पता ही नहीं होगा कि नवरात्र अर्थात देवी की उपासना । इसके परिणामस्वरूप धर्मपरिवर्तन करना सरल हो जाएगा । संक्षेप में, पराभव हिन्दुओं का ही होगा और इसके लिए प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष हिन्दू समाज ही कारणीभूत है ।

२ ई. ‘डे संस्कृति’ लादनेवाली कंपनियां (आस्थापन) एवं उनके बलि चढी युवा पीढी !

कुछ वर्षाें पूर्व ‘डे संस्कृति’ भारत में नहीं थी । जब ‘गिफ्ट’ अर्थात भेंटवस्तु की कंपनियां एवं ग्रिटिंग कार्ड (शुभेच्छापत्र) बनानेवाली कंपनियां हमारे देश में आईं, तब से युवा पीढी पर ‘डे’ विकृति का भूत सवार हो गया । ये कपंनियां इन दिनों करोडों रुपए कमाती हैं । आज ऐसी अवस्था है कि बच्चों को श्रीगणेशचतुर्थी, गोकुलाष्टमी कब है, यह बताना पडता है; परंतु ‘डे’ ध्यान में रखते हैं । गोकुलाष्टमी राजकीय नेतागणों की कृपा से ऐसी ही डिजेमय एवं मद्यमय हुई । कम से कम माता के उत्सव (नवरात्रोत्सव) में तो ऐसा नहीं होना चाहिए ।

२ उ. नवरात्र काल में महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती, इन तीनों रूपों में देवी की उपासना करें !

चंड मुंड, शुंभ निशुंभ, रक्तबीज इत्यादि राक्षसों को मारकर, उनके उत्पात से संसार को मुक्त कर जगदंबा ने जब विश्राम किया वह काल है नवरात्रि ! इस युद्ध की थकान दूर करने के लिए देवी ने नृत्य किया, ऐसा उल्लेख पुराण में है । (हम युद्ध करते ही नहीं, केवल नाचते हैं ।) इस काल में महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती, इन तीनों रूपों में देवी की सेवा करना, अपनी परंपरा अनुसार नंदादीप, माला बंधन इत्यादि आचार करें । विद्या एवं बुद्धि के लिए सरस्वतीदेवी की उपासना, बच्चों द्वारा करवाएं । धनधान्य, सुख-समृद्धि के लिए महालक्ष्मी की एवं शत्रुसंहार की सामर्थ्यप्राप्ति के लिए महाकाली की उपासना करें ।

२ ऊ. सिनेतारिकाओं अथवा नौटंकी करनेवालों समान
नाचने के स्थान पर युवा लडकियां पराक्रमी होने के लिए प्रयत्न करें !

लडकियों को डांडिया खेलने पर अधिक ध्यान न देते हुए विद्या प्राप्त कर, उत्तम मार्ग से धन एकत्र करना और छेडछाड करनेवाले गुंडों से चार हाथ करने का सामर्थ्य स्वयं में लाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए । इसके लिए देवी की महिमा एवं उनके पराक्रम पढें, जो आज के काल की आवश्यकता है । नौटंकी करनेवालों समान नाचने के स्थान पर महाकाली समान, झांसी की रानी, कित्तूर की रानी चेन्नमा, जिजाबाईं समान पराक्रम दिखाने का समय आ गया है । आज उसी की आवश्यकता है । नाचनेवाले बहुत हो गए; परंतु पराक्रमी अत्यंत अल्प !

२ ए. अपने पुत्र-पुत्रियों को धोखे का भान करवाना हमारा कर्तव्य !

इस डांडिया एवं गरबा के काल में संततीनियमन साधनों (contraceptives) की बिक्री दुगुनी हो जाती है और तदुपरांत विद्यालय एवं महाविद्यालयों की किशोरियों के गर्भपात की मात्रा भी बढती जा रही है । लव जिहाद भी इसी काल में और अधिक फलता-फूलता है । इसलिए अपने बच्चों को इस धोखे से अवगत कराना, हमारा कर्तव्य है । अत: सभी से विनती है कि इन मार्केटिंग एवं इवेंट फंडों की बलि न चढें और सात्त्विक ढंग से, आनंद से, अपनी  परिस्थितिनुरूप जगदंबा की सेवा कर उनकी कृपा संपादन करें !

– वेदमूर्ति भूषण दिगंबर जोशी, वेंगुर्ले, जिला सिंधुदुर्ग

 

३. नवरात्रोत्सव के गैरप्रकार रोककर उत्सव की पवित्रता बनाए रखें !

गरबा में गोल घेरा बनाकर नृत्य करना, यह घट का प्रतीक है । इस विषय में अधिक जानकारी पढने के लिए यहां क्लिक करें, ‘गरबा खेलना’

पहले ‘गरबा’ नृत्य के समय देवी की, कृष्णलीला की एवं संतरचित गीता ही गाई जाती थी । आज भगवान की इस सामूहिक नृत्योपासना को विकृत स्वरूप आ गया है । चलचित्र के (फिल्मी) गीतों की ताल पर अश्लील अंगविक्षेप कर गरबा खेला जाता है । गरबा के समय व्यभिचार भी होता है । पूजास्थल पर तंबाखूसेवन, मद्यपान, ध्वनिप्रदूषण इत्यादि भी होता है । ये अपप्रकार धर्म एवं संस्कृति की हानि हैं ! इन अपप्रकारों को रोकना, कालानुसार आवश्यक धर्मपालन ही है । सनातन की ओर से इन अपप्रकारों के विरुद्ध जनजागृति अभियान चलाया जाता है । इसमें आप भी सहभागी हों !

‘हिन्दू राष्ट्र’ में मंदिर सुरक्षित रहेंगे !

 

यह नहीं होना चाहिए  ! यह होना चाहिए !
बलपूर्वक (जबरन) चंदावसूली ऐच्छिक चंदा
‘प्लास्टर ऑफ पैरिस’ की अशास्त्रीय मूर्ति शाडू की / प्राकृतिक रंगों से बनाई छोटी मूर्ति
कृत्रिम सजावट, भव्य मंडप, विद्युत रोशनाई प्राकृतिक, दीपों की सजावट, छोटा मंडप
फिल्मी गीत / पटाखों से होनेवाला ध्वनि एवं वायु प्रदूषण आरती, नामजप आदि के कारण वातावरण में सात्त्विकता
शोभायात्रा में अश्लील नृत्य, मद्यमान, गुलाल की उधलन देवी का नामजप करते हुए अनुशासनबद्ध शोभायात्रा

 

४. नवरात्रोत्सव आदर्शरीति से मनाने के लिए यह करें !

१. भव्य मंडप, ‘डॉल्बी’ ध्वनिवर्धक, कृत्रिम एवं विद्युत सजावट पर अनावश्यक खर्च टालें !

२. आरतियां कर्णकर्कश आवाज में नहीं, अपितु एक सुर में एवं सुस्पष्ट बोलें ! वाद्य धीमे बजाएं !!

३. विसर्जन शोभायात्रा में गुलाल का अतिरेक, ध्वनिवर्धकों द्वारा ध्वनिप्रदूषण, अश्लील नृत्य, पटाखे जलाना, महिलाओं से असभ्य बर्ताव एवं मद्यपान आदि अधर्माचरण न करें !

 

५. हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए संगठित हों  !

राष्ट्र पर कर्ज, दरिद्रता एवं बिजली की कमतरता, जैसे भीषण संकटों के होते हुए नवरात्रोत्सव में खर्चीली सजावट एवं पटाखे जलाना, राष्ट्रहानि है ।

नवरात्रोत्सव के निमित्त से प्रवचन, कीर्तन, संतकथा, क्रांतिकारकों की शौर्यगाथा जैसे राष्ट्र एवं धर्म जागृति करनेवाले कार्यक्रम आयोजित करें !

Leave a Comment

Click Here to read more …