श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

भगवान कृष्ण की तिथि

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म श्रावण कृष्ण पक्ष अष्टमी की मध्यरात्रि में जब रोहिणी नक्षत्र में चंद्र वृषभ राशि में था । आठ क्षयांक है । श्रीराम का जन्म नवमी के दिन हुआ । नौ पूर्णांक है ।

विशेषता

गोकुलाष्टमी की तिथि पर श्रीकृष्ण का तत्त्व पृथ्वी पर नित्य की तुलना में १००० गुना अधिक कार्यरत होता है । इस तिथि पर गोकुलाष्टमी का उत्सव मनाने तथा ॐ नमो भगवते वासुदेवाय । नामजप आदि उपासना भावपूर्ण रूप से करने पर नित्य की तुलना में अधिक मात्रा में कार्यरत कृष्णतत्त्व का लाभ मिलता है ।

उत्सव मनाने की पद्धति

गोकुलाष्टमी को दिनभर उपवास रख, रात्रि बारह बजे एक पालने में बालकृष्ण का जन्म मनाया जाता है । उसके उपरांत प्रसाद ग्रहण कर उपवास छोडते हैं अथवा दूसरे दिन सवेरे दहीकाला का प्रसाद लेकर उपवास छोडते हैं । विभिन्न खाद्यपदार्थ – दही, दूध, मक्खन, इन सबके मिश्रण को काला कहते हैं ।

कालानुुसार आवश्यक उपासना

आध्यात्मिक उन्नति हेतु स्वयं उपासना तथा धर्माचरण करना अर्थात व्यष्टि साधना । समाज की सात्त्विकता बढे, इस हेतु समाजको भी साधना एवं धर्माचरण करनेके लिए प्रेरित करना अर्थात समष्टि साधना । श्रीकृष्ण की उपासना परिपूर्ण ढंग से होनेके लिए श्रीकृष्णभक्तों को व्यष्टि एवं समष्टि दोनों प्रकार की साधना करना आवश्यक है ।

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भगवान श्रीकृष्ण का अनादर रोकें !

वर्तमान में विविध प्रकार से देवताओं का अनादर हो रहा है । व्याख्यान, पुस्तक, नाटक-चलचित्र, उत्पाद आदि के माध्यम से देवताओं का अनादर किया जाता है ।

१. जिन विज्ञापनों व कार्यक्रमों में देवताओं का अनादर किया गया हो, उन उत्पादों, समाचार-पत्रों एवं कार्यक्रमों का, उदा. नाटकों का बहिष्कार कीजिए ! अपनी धार्मिक भावना आहत होने का लिखित परिवाद (शिकायत) पुलिस थाने में करें !

२. देवताओं की वेशभूषा धारण कर भीख मांगनेवालों को रोकिए !

नामजप

पूजा, आरती, भजन इत्यादि उपासनापद्धतियों से देवता के तत्त्व का लाभ मिलता है; परंतु इन सर्व उपासनाओं की एक मर्यादा होती है, इस कारण उसका लाभ भी मर्यादित मात्रा में ही प्राप्त होता है । देवता के तत्त्व का लाभ निरंतर प्राप्त होने के लिए, देवता की उपासना भी निरंतर करनी पडती है । ऐसी निरंतर हो पानेवाली उपासना एक ही है और वह है नामजप । कलियुग के लिए नामजप सरल एवं सर्वोत्तम उपासना है ।

श्रीकृष्ण का नामजप

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय । विशेष प्रचलित है ।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ : कलिसंतरणोपनिषद् कृष्णयजुर्वेद में यह है तथा इसे हरिनामोपनिषद् भी कहते हैं । ये सोलह शब्द जीव के जन्म से मृत्यु तक की सोलह कलाओं से (अवस्थों से) संबंधित हैं एवं यह मंत्र आत्मा पर पडे माया के आवरण का नाश करता है ।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पूजाविधि (अर्थ सहित) आगे दी हुई मार्गिका (लिंक) पर उपलब्ध है –  https://www.sanatan.org/hindi/a/972.html

 आकृतियों के अनुसार रंगोली में देवतातत्त्व आकर्षित होते हैं ।

Rangoli

अध्यात्मशास्त्रानुसार प्रत्येक देवता विशिष्ट तत्त्व है । इस आकार की रंगोली, सजावट आदि करने पर कृष्णतत्त्व का अधिकाधिक लाभ होता है ।

स्रोत : पाक्षिक सनातन प्रभात