१. १७.१०.२०२० को रवि (सूर्य) ग्रह का तुला राशि में होनेवाला प्रवेश
प्रतिकूल होने के कारण इस काल में श्री सूर्यनारायण की उपासना करें !
‘१७.१०.२०२० को सवेरे ७ बजकर ५ मिनट पर रवि ग्रह तुला राशि में प्रवेश करेगा । इसलिए सूर्योदय से सवेरे ११ बजकर ५ मिनट तक पुण्यकाल है । यह रवि ग्रह का संधिकाल है । रवि तुला राशि में १७.१०.२०२० से १६.११.२०२० तक रहेगा । कोई भी ग्रह स्थायी रूप से शुभ अथवा अशुभ फल नहीं देता । रवि ग्रह एक राशि में १ मास रहता है । इसमें प्रथम ५ दिन शुभ अथवा अशुभ फल देता है । तुला राशि में रवि ग्रह अशुभ माना गया है । इसलिए प्रथम ५ दिन प्रतिकूल होते हैं । इस काल में रोगप्रतिरोधक शक्ति एवं प्राणशक्ति न्यून (कम) होती है । इसलिए रवि ग्रह तुला राशि में प्रवेश करने के पुण्यकाल में सूर्यदेवता का ‘ॐ सूर्याय नमः’ जप करें ।
२. सूर्योपासना का महत्त्व
सूर्योपासना करना, अर्थात तेजतत्त्व की उपासना करना । सूर्य की उपासना के कारण सात्त्विकता एवं चैतन्य ग्रहण करने की क्षमता बढती है । उगते सूर्य की ओर देखकर त्राटक (सूर्य की ओर एकटक बिना पलक झपकाए) करने पर आंखों की क्षमता बढती है । सूर्योपासना के कारण सूर्यनाडी जागृत होती है । स्मरणशक्ति, तेज, ज्ञान एवं उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त होता है, तथा अनिष्ट शक्तियों का नाश होकर भय नष्ट होता है । इसीलिए हिन्दू धर्म में सूर्य की उपासना को विशेष महत्त्व है । सभी प्रतिदिन संभव हो तो (सूत्र क्र. ३ में दिए अनुसार) सूर्योपासना करें ।
३. रवि ग्रह के तुला राशि में भ्रमण करने की स्थिति में की जानेवाली उपासना

अ. सूर्यदेवता का ‘ॐ सूर्याय नमः’ जप करें ।
आ. गायत्री मंत्र का जप करें ।
गायत्री मंत्र : ‘ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो न: प्रचोदयात् ।’
अर्थ : दैदीप्यमान भगवान सविता (सूर्य) देव के उस तेज का हम ध्यान करते हैं । वह (तेज) हमारी बुद्धि को प्रेरणा दें ।
इ. नवग्रह स्तोत्र के रवि ग्रह का जप करें । जपसंख्या ७ सहस्र है ।
जपाकुसुमसङ्काशं काश्यपेयं महद्युतिम् ।
तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥ नवग्रहस्तोत्र, श्लोक १
अर्थ : रक्तवर्णीय गुडहल के फूल समान वर्णवाले, कश्यप ऋषि के पुत्र, अत्यंत तेजस्वी, अंधकार के शत्रु एवं सर्वपापनाशक दिनकर सूर्य को मैं प्रणाम करता हूं ।
ई. सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य देकर नमस्कार करें । अर्घ्य देते समय आगे दिए श्लोक का उच्चारण करें ।
‘एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते ।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर ॥
अर्थ : हे सहस्र किरणवाले, तेज की राशिवाले, जगतके स्वामी दिवाकर, मुझपर अनुकंपा (दया) कर । मेरे द्वारा श्रद्धा से दिए गए इस अर्घ्य का स्वीकार करो ।
उ. सूर्यनमस्कार करें ।
ऊ. श्रीरामरक्षा स्तोत्र का पाठ करें ।
ए. श्री सूर्य सहस्रनामावली सुनें ।
ऐ. श्री सूर्यस्तुति पढें ।’
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