भारत में दिखाई देनेवाला सूर्यग्रहण, उस अवधि में पालन करने हेतु नियम तथा राशि के अनुसार उनका फल !

 

१. सूर्यग्रहण

‘आषाढ अमावस्या, २१.६.२०२०, रविवार को भारत के राजस्थान, पंजाब, हरियाणा एवं उत्तराखंड के कुछ प्रदेशों में सवेरे लगभग १० बजे ‘कंकणाकृति’ सूर्यग्रहण दिखाई देगा तथा शेष संपूर्ण भारत में यह सूर्यग्रहण ‘खंडग्रास’ दिखाई देगा ।’

सूर्य व पृथ्वी के मध्य भाग में चंद्रमा आने से चंद्र की छाया पृथ्वी पर पडती है । वह जिस भाग में पडती है, वहां से उतने समय तक चंद्रबिंब के कारण सूर्यबिंब ढंका हुआ दिखाई देता है । सूर्यबिंब पूर्ण रूप में ओझल होने पर ‘खग्रास सूर्यग्रहण’ तथा सूर्यबिंब आंशिक रूप से ढंक गया, तो वह ‘खंडग्रास सूर्यग्रहण’ होता है । सूर्यबिंब कंगन के (स्त्रियों के कंगन की भांति) आकार में ढंक गया, तो दिखाई देनेवाले ग्रहण को ‘कंकणाकृति ग्रहण’ कहते हैं । कंकणाकृति सूर्यग्रहण में सूर्य पूर्ण रूप से ढंका हुआ नहीं दिखाई देता; किंतु सूर्य के बाहर का भाग कंगन की भांति चमकता है । सूर्यग्रहण केवल अमावस्या को ही पडता है । ‘महर्षि अत्रि’ ग्रहण के संबंध में ज्ञान देनेवाले पहले शिक्षक थे ।

 

२. भारत में सर्वत्र दिखाई देनेवाले सूर्यग्रहण के समय

‘यह ग्रहण भारत सहित संपूर्ण एशिया उपमहाद्वीप, दक्षिणी यूरोप के कुछ प्रदेश तथा ऑस्ट्रेलिया के उत्तर के प्रदेशों में दिखेगा । साथ में दिए गए भारत के मानचित्र में समाहित छायांकित किए राजस्थान, पंजाब, हरियाणा एवं उत्तराखंड के कुछ प्रदेशों में कंकणाकृति स्थिति देखने को मिलेगी । शेष संपूर्ण भारत में यह ग्रहण ‘खंडग्रास ग्रहण’ दिखाई देगा । यह ग्रहण २१.६.२०२० के सवेरे १०.०१ से लेकर दोपहर १.२८ बजे तक है ।’ (संदर्भ : दाते पंचांग)

२ अ. सूर्यग्रहण के समय (निम्नांकित समय मुंबई के हैं ।)

२ अ १. स्पर्श (आरंभ) : २१.६.२०२० को सवेरे १०.०१ बजे

२ अ २. मध्य : २१.६.२०२० को सवेरे ११.३८ बजे

२ अ ३. मोक्ष (अंत) : २१.६.२०२० को दोपहर १.२८ बजे

२ अ ४. ग्रहणपर्व (टिप्पणी १) (ग्रहण आरंभ से अंत तक की अवधि) : ३ घंटे २७ मिनट

टिप्पणी १ – पर्व का अर्थ पुण्यकाल है । ग्रहणस्पर्श से ग्रहणमोक्ष तक का काल पुण्यकाल है । शास्त्रों में बताया गया है कि ‘इस समय ईश्‍वर के आंतरिक सान्निध्य में रहने से आध्यात्मिक लाभ मिलता है ।’

२ आ. ग्रहण का सूतक लगना

२ आ १. अर्थ : सूर्यग्रहण से पूर्व सूर्य चंद्र की छाया में आने लगता है । उससे धीरे-धीरे उसका प्रकाश क्षीण होना आरंभ होता है । इसी को ‘ग्रहण का सूतक लगना’ कहते हैं ।

२ आ २. अवधि : ‘यह सूर्यग्रहण दिखाई देने के समय दूसरा प्रहर (टिप्पणी २) होने से शनिवार २०.६.२०२० को रात के १० बजे से ग्रहणमोक्ष तक अर्थात २१.६.२०२० को दोपहर १.२८ बजे तक सूतक का पालन करें ।’ (संदर्भ : दाते पंचांग)

टिप्पणी २ – एक प्रहर ३ घंटे का होता है । दिन के ४ और रात के ४ प्रहर मिलकर दिन में कुल ८ प्रहर होते हैं ।

 

३. सूर्यग्रहण की अवधि में पालन करने हेतु नियम

सूतककाल में स्नान, देवतापूजन, नित्यकर्म, जपजाप्य एवं श्राद्धकर्म किए जा सकेंगे सूतककाल में भोजन करना निषिद्ध है; इसलिए अन्नपदार्थ न खाएं; परंतु आवश्यक पानी पीना, मल-मूत्रोत्सर्ग एवं विश्राम करना जैसे कर्म किए जा सकते हैं । ग्रहणपर्व काल में (सवेरे १०.०१ से दोपहर १.२८ की अवधि में) पानी पीना, मल-मूत्रोत्सर्ग तथा सोना, ये कर्म निषिद्ध होने से वह न करें । बच्चे, निर्बल और बीमार व्यक्ति, तथा गर्भवती महिलाएं २१.६.२०२० को प्रातः ४.४५ बजे से लेकर ग्रहणमोक्ष तक सूतक का पालन करें ।’ (संदर्भ : दाते पंचांग)

३ अ. स्वास्थ्य की दृष्टि से सूतकनियम पालन का महत्त्व !

श्रीमती प्राजक्ता जोशी, महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय.
३ अ १. शारीरिक एवं भौतिक स्तर

सूतककाल में जीवाणुओं के बढने से अन्न शीघ्र दूषित होता है । जिस प्रकार रात का अन्न दूसरे दिन बासी हो जाता है, उस प्रकार ग्रहण के पूर्व का अन्न ग्रहण के पश्‍चात बासी हो जाता है । केवल दूध और पानी के लिए यह नियम लागू नहीं है । ग्रहण से पूर्व के दूध और पानी का उपयोग ग्रहण समाप्त होने के उपरांत भी किया जा सकता है ।

३ अ २. मानसिक स्तर

सूतककाल में मानसिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है । इससे ‘कुछ व्यक्तियों में निराशा आना, तनाव बढना आदि मानसिक कष्ट होते हैं’, ऐसा मनोविकार विशेषज्ञ बताते हैं ।

ग्रहणकाल में की गई साधना का फल सहस्रों गुना मिलता है । इसलिए ग्रहणकाल में साधना को प्रधानता देना महत्त्वपूर्ण है । सूतकारंभ से लेकर ग्रहण समाप्त होने तक नामजप, स्तोत्रपरायन, ध्यानधारणा आदि धार्मिक कार्यों में मन को संलिप्त रखने से उसका लाभ मिलता है ।

 

४. ग्रहणकाल में वर्ज्यावर्ज्य कृत्य

४ अ. वर्ज्य कृत्य

‘ग्रहणकाल में (पर्वकाल में) ‘नींद लेना, मल-मूत्रविसर्जन, साभ्यंग (संपूर्ण शरीर को गुनगुना तेल लगाकर शरीर में उसके रिसने तक मर्दन करना), भोजन, खाना-पीना और काम संबंधी सेवन जैसे कर्म नहीं करने चाहिए ।

४ आ. कौन से कर्म करने चाहिए ?

१. ग्रहणस्पर्श होते ही स्नान करना चाहिए ।

२. पर्वकाल में देवतापूजन, तर्पण, श्राद्ध, जाप, होम एवं दान दें ।

३. पहले कुछ कारणवश खंडित हुए मंत्र के पुरश्‍चरण का आरंभ इस अवधि में करने से उसका अनंत गुना लाभ मिलता है ।

४. ग्रहणमोक्ष के पश्‍चात स्नान करना चाहिए ।

किसी व्यक्ति के लिए अशौच हो, तो ग्रहणकाल में ग्रहण से संबंधित स्नान एवं दान देने तक शुद्धि होती है ।

 

५. राशियों के अनुरूप ग्रहण का फल

५ अ. शुभ फल : मेष, सिंह, कन्या एवं मकर

५ आ. अशुभ फल : मिथुन, कर्क, वृश्‍चिक एवं मीन

५ इ. मिश्र फल : वृषभ, तुला, धनु एवं कुंभ

जिन राशियों के लिए अशुभ फल है, वे और गर्भवती महिलाएं यह सूर्यग्रहण न देखें ।’(संदर्भ : दाते पंचांग)

 

६. सूर्यग्रहण देखते समय बरती जानेवाली आवश्यक सावधानी

‘कंकणाकृति एवं खंडग्रास सूर्यग्रहण देखते समय ग्रहण देखने के लिए तैयार किए गए विशेष उपनेत्र अथवा कालिख से विलेपित काले कांच तथा ‘सूर्य की प्रखर किरण आंखों तक न पहुंचे’; इसके लिए उपलब्ध साधनों का उपयोग कर ही ग्रहण देखें । किसी भी स्थिति में खुली आंखों से सूर्य की ओर न देखें । ग्रहण का छायाचित्र खींचनेवाले विशिष्ट फिल्टर का उपयोग कर ही छायाचित्र खींचें, अन्यथा उससे आंखों को हानि पहुंच सकती है ।

इस ग्रहण की कंकणाकृति स्थिति ४० सेकेंड तक दिखाई देगी; इसलिए इस अवधि में आंखों पर ग्रहण देखने का उपनेत्र लगाकर ही रखें । उसके पश्‍चात पुनः २१.५.२०३१ को दक्षिण भारत में कंकणाकृति सूर्यग्रहण होगा । इससे पूर्व १५.१.२०१० तथा २६.१२.२०१९ को भारत के कुछ दक्षिणी प्रदेशों में कंकणाकृति सूर्यग्रहण दिखाई दिया था । इस वर्ष ज्येष्ठ अमावास्या, २१.६.२०२०, रविवार को सवेरे लगभग १० बजे भारत के उत्तरी प्रदेशों में कंकणाकृति सूर्यग्रहण दिखाई देगा, तो शेष संपूर्ण भारत में यह सूर्यग्रहण खंडग्रास दिखाई देगा । जिन नगरों में कंकणाकृति सूर्यग्रहण दिखाई देनेवाला है, उनकी सूची स्वतंत्ररूप से दी गई है तथा जहां खंडग्रास ग्रहण दिखाई देनेवाला है, ऐसे नगरों की सूची अलग से दी गई है ।’ (संदर्भ : दाते पंचांग)

 

७. ग्रहण में स्नान के संदर्भ में जानकारी

‘ग्रहण में समस्त उदक गंगासमान है; परंतु तब भी उष्णोदक की अपेक्षा शीतोदक पुण्यकारक, पानी ऊपर निकालकर किए गए स्नान की अपेक्षा बहता पानी, सरोवर, नदी, महानदी, गंगा एवं समुद्र का स्नान उत्तरोत्तण श्रेष्ठ एवं पुण्यकारक है । सूर्यग्रहण में नर्मदास्नान का विशेष महत्त्व बताया गया है । नर्मदास्नान संभव न हो, तो स्नान के समय नर्मदा का स्मरण करें ।’ (संदर्भ : दाते पंचांग)

 

८. सूर्यग्रहण में साधना का महत्त्व

ग्रहणकाल के विशेष वातावरण का परिणाम प्रत्येक सजीव पर होता है । चंद्रग्रहण की अपेक्षा सूर्यग्रहण का काल साधना के लिए अधिक पोषक होता है । ज्योतिषीय, धार्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से ग्रहणकाल महत्त्वपूर्ण माना गया है । ग्रहणकाल संधिकाल होने से इस काल में की जानेवाली साधना का परिणाम तुरंत प्रतीत होता है । ग्रहणकाल में जप और दान का महत्त्व अनंतगुना है । इसके लिए ग्रहणमोक्ष के पश्‍चात अपनी क्षमता के अनुसार दान करें । सूर्यग्रहण में नया मंत्र लेने तथा मंत्र का पुरश्‍चरण करने के लिए सूर्यग्रहण एक मुख्य काल है । पहले लिए गए मंत्र का पुरश्‍चरण ग्रहण पर्वकाल में करने से मंत्र सिद्ध होता है । सूर्यग्रहण में अनन्यभाव से श्री गुरुदेवजी का स्मरण कर संपूर्ण श्रद्धा एवं एकाग्र मन से किए जप से शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक कष्ट नष्ट हो जाते हैं । सभी कार्यों में सफलता मिलती है । ग्रहणकाल में जप करने हेतु माला की आवश्यकता नहीं पडती । ग्रहणस्पर्श से लेकर मोक्ष तक का संपूर्ण समय अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है ।’

– श्रीमती प्राजक्ता जोशी, ज्योतिष फलित विशारद, महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय, ज्योतिष विभाग प्रमुख, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा. (२१.४.२०२०)
स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात