दशहरा (विजयादशमी)

सारिणी

१. दशहरा अर्थात विजयादशमी

२. दशहरेका इतिहास

३. विजयादशमीका महत्त्व

४. दशमीको `दशहरा’ अथवा `विजयादशमी’ के नामसे संबोधित करनेका शास्त्रीय आधार

५. दशहरेका त्यौहार मनानेकी पद्धति

५ अ. सीमोल्लंघन

५ आ. शमीपूजन अथवा अश्मंतक वृक्षका पूजन

५ इ. अपराजितादेवीका पूजन

६. दशहरेके दिन एकदूसरेको अश्मंतकके पत्ते सोनेके रूपमें देनेका कारण

७. दशहरेके दिन शस्त्रपूजन करनेके परिणाम


 

श्रीराम

 

१. दशहरा अर्थात विजयादशमी

`दश’ का अर्थ है दस और हरा अर्थात हार गया या पराजित हुआ । आश्विन शुक्ल दशमीकी तिथिपर दशहरा मनाते हैं । दशहरेके पूर्वके नौ दिनोंमें अर्थात नवरात्रिकालमें दसों दिशाएं देवीमांकी शक्तिसे आवेशित होती हैं । दशमीकी तिथिपर ये दिशाएं देवीमांके नियंत्रणमें आ जाती हैं अर्थात् दिशाओं पर विजय प्राप्त होती है । इसी कारण इसे `दशहरा’ कहते हैं । दशमीके दिन विजयप्राप्ति होनेके कारण इस दिनको `विजयादशमी’ के नामसे भी जानते हैं । विजयादशमी साढेतीन मुहूर्तोंमेंसे एक है । इस दिन कोई भी कर्म शुभफलदायी होता है ।

 

दशहरा दृश्यपट (Dussehra : 3 Videos)

 

२. दशहरेका इतिहास

भगवान श्रीरामके पूर्वज अयोध्याके राजा रघुने विश्वजीत यज्ञ किया । सर्व संपत्ति दान कर वे एक पर्णकुटीमें रहने लगे । वहां कौत्स नामका एक ब्राह्मणपुत्र आया । उसने राजा रघुको बताया कि, उसे अपने गुरुको गुरुदक्षिणा देनेके लिए १४ करोड स्वर्ण मुद्राओंकी आवश्यकता है । तब राजा रघु कुबेरपर आक्रमण करनेके लिए सिद्ध हो गए । कुबेर राजा रघुकी शरणमें आए और उन्होंने अश्मंतक अर्थात कोविदार अथवा कचनार अर्थात ऑरकिड ट्री (Orchid Tree) एवं शमी के अर्थात जांटी अथवा खेजडा वृक्षोंपर स्वर्णमुद्राकी वर्षा की । उनमेंसे कौत्सने केवल १४ करोड स्वर्णमुद्राएं लीं । जो स्वर्णमुद्राएं कौत्सने नहीं लीं, वह सर्व राजा रघुने बांट दीं । तभीसे दशहरेके दिन एकदूसरेको सोनेके रूपमें ‘अश्मंतक’के पत्ते लोग देते हैं । 

त्रेतायुगमें प्रभु श्रीरामने दशहरेके दिन बलशाली रावणका वध कर सीतामाताको असुरोंके बंधनसे मुक्त किया था । प्रभु श्रीराम ने दशहरेके दिन ही रावण वध किया था । द्वापारयुगमें अज्ञातवास समाप्त होते ही, पांडवोंने शक्तिपूजन कर शमी वृक्षकी कोटरमें रखे अपने शस्त्र पुन: हाथोंमें लिए एवं राजा विराटकी गायोंको चुरानेवाली कौरवसेनापर आक्रमण कर विजयश्री प्राप्त की । वह दिन भी दशहरेका ही था । 

 

३. विजयादशमीका महत्त्व

विजयादशमीके दिन सरस्वतीतत्त्व प्रथम सगुण अवस्था प्राप्त कर, तदुपरांत सुप्तावस्थामें जाता है अर्थात अप्रकट अवस्था धारण करता है । इस कारण दशमीके दिन सरस्वतीका पूजन एवं विसर्जन करते हैं । इससे पूजकमें देवीके मूर्त स्वरूपके प्रति आकर्षण बढता है । विजयादशमी साढेतीन मुहूर्तोंमेंसे एक है । इस दिन कोई भी कार्य शुभफलदायी होता है । 

 

४. दशमीको `दशहरा’ अथवा `विजयादशमी’ के नामसे संबोधित करनेका शास्त्रीय आधार

सातवें पातालकी बलवान अनिष्ट शक्तियां निर्गुण स्तरकी होती हैं । उन्हें पराजित करनेके लिए ईश्वर निर्गुण स्तरकी शक्तिका उपयोग न कर आनंदका उपयोग करते हैं । इसीलिए भी यह दिन `दशहरा’ कहलाता है । 

दशहरेके दिन वातावरणमें शीतलता प्रतीत होती है । ब्रह्मांडमें निर्गुण स्तरकी विष्णुतत्त्वकी आनंदतरंगें कार्यरत होती हैं । आनंदका स्तर शक्तिके स्तरसे सूक्ष्मतर है । इसलिए सातवें पातालकी बलवान आसुरी शक्तियोंको युद्ध करनेके लिए उनकी निर्गुण स्तरकी काली शक्तिका उपयोग करना पडता है । इस प्रक्रियामें उनकी शक्तिका व्यय अधिक मात्रामें होता है । परिणामस्वरूप असुरोंका नाश कर, देवता विजयी होते हैं । यही कारण है कि, इस दिनको `विजयादशमी’ कहते हैं । 

इस दिन विष्णुतत्त्वका निर्गुण स्तरका कार्य अधिक मात्रामें होता है । इसलिए त्रेतायुगमें प्रभु श्रीरामजीने इसी दिन बलशाली रावणका नाश कर सीतामाताको अर्थात श्रीविष्णुजीकी शक्तिको असुरोंके बंधनसे मुक्त किया । 

 

५. दशहरेका त्यौहार मनानेकी पद्धति

इस दिन सीमोल्लंघन, शमीपूजन, अपराजितापूजन एवं शस्त्रपूजन, ये चार धार्मिक कृतियां की जाती हैं । 

 

५ अ. सीमोल्लंघन

परंपराके अनुसार ग्रामदेवता को पालकीमे बिठाकर अपराह्न काल अर्थात दिनके तीसरे प्रहरमें दोपहर ४ के उपरांत गांवकी सीमाके बाहर ईशान्य दिशाकी ओर जाते हैं । जहां शमी और अश्मंतकका वृक्ष होता है, वहां रुक जाते हैं । 

 

५ आ. शमीपूजन अथवा अश्मंतक वृक्षका पूजन

शमीवृक्ष यदि उपलब्ध हो, तो उसका और शमीवृक्ष यदि उपलब्ध न हो, तो अश्मंतक वृक्ष का पूजन करते हैं और शमी वृक्षसे प्रार्थना करते हैं । 

 

शमी शमयते पापं शमी लोहितकण्टका ।

धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी ।।

करिष्यमाणयात्रायां यथाकाल सुखं मया ।

तत्र निर्विघ्नकर्त्री त्वं भव श्रीरामपूजिते ।। 

अर्थ : शमी पापोंका शमन करती है । शमीके कांटे तांबेके रंगके अर्थात लाल होते हैं । शमी रामकी स्तुति करती है तथा अर्जुनके बाणोंको भी धारण करती हैं । हे शमी, रामने आपकी पूजा की है । मैं यथाकाल विजययात्रापर निकलूंगा । आप मेरी यात्राको निर्विघ्न एवं सुखमय बनाइए । 

 

प्रार्थनाके उपरांत वृक्षका पूजन करते हैं । अश्मंतक वृक्ष हो, तो उसका पूजन करते समय प्रार्थना करते हैं । 

 

अश्मन्तक महावृक्ष महादोषनिवारण ।

इष्टानां दर्शनं देहि कुरु शत्रुविनाशनम् ।। 

अर्थात हे अश्मंतक महावृक्ष, आप महादोषोंका निवारण करते हैं । मुझे मेरे मित्रोंका दर्शन करवाइए और मेरे शत्रुका नाश कीजिए । मेरी शत्रुताका विनाश किजिए तथा मेरा और मेरे शुभचिंतकोंको कल्याण किजिए । 

 

इस प्रकार प्रार्थनाके उपरांत वृक्षके नीचे चावल, पूगीफल अर्थात सुपारी एवं स्वर्ण अथवा तांबेकी मुद्रा अथवा सिक्के रखते हैं । तदुपरांत वृक्षकी परिक्रमा करते हैं । 

 

५ इ. अपराजितादेवीका पूजन

अ. पूजास्थलपर अष्टदलकी आकृति बनाते हैं ।

इस अष्टदलका मध्यबिंदु `भूगर्भबिंदु’ अर्थात देवीके `अपराजिता’ रूपकी उत्पत्तिबिंदु का प्रतीक है, तथा अष्टदलके आठबिंदु, अष्टपाल देवताओंका प्रतीक है । 

आ. इस अष्टदलके मध्यबिंदुपर `अपराजिता’ देवीकी मूर्तिकी स्थापना कर उसका पूजन करते हैं ।

‘अपराजिता’ श्री दुर्गादेवीका मारक रूप है । पूजन करनेसे देवीका यह रूप पृथ्वीतत्त्वके आधारसे भूगर्भसे प्रकट होकर, पृथ्वीके जीवोंके लिए कार्य करता है । अष्टदलपर आरूढ हुआ यह त्रिशूलधारी रूप शिवके संयोगसे, दिक्पाल एवं ग्रामदेवताकी सहायतासे आसुरी शक्तियोंका नाश करता है । 

इ. पूजनके उपरांत इस मंत्रका उच्चारण कर शत्रुनाश एवं सबके कल्याणके लिए प्रार्थना करते हैं ।

 

हारेण तु विचित्रेण भास्वत्कनकमेखला ।

अपराजिता भद्ररता करोतु विजयं मम ।।

 

अर्थ : गलेमें विचित्र हार एवं कमरपर जगमगाती स्वर्ण करधनी अर्थात मेखला धारण करनेवाली, भक्तोंके कल्याणके लिए सदैव तत्पर रहनेवाली, हे अपराजितादेवी ! मुझे विजयी कीजिए । 

कुछ स्थानोंपर अपराजितादेवीका पूजन सीमोल्लंघनके लिए जानेसे पूर्व भी करते हैं । शमीपत्र तेजका उत्तम संवर्धक है । इसलिए शमी वृक्षके निकट अपराजितादेवीका पूजन करनेसे शमीपत्रमें पूजनद्वारा प्रकट हुई शक्ति संजोई रहती है । शक्तितत्त्वसे शमीपत्रको घरमें रखनेसे इन तरंगोंका लाभ पूरे वर्ष प्राप्त करना जीवोंके लिए संभव होता है । कुछ स्थानोंपर नवरात्रीकालमें रामलिलाका आयोजन किया जाता है । जिसमें प्रभु रामजीके जीवनपर आधारीत लोकनाट्य प्रस्तुत किया जाता है । दशहरेकी दिन तथा लोकनाट्यके अंतमें रावण एवं कुंभकर्णकी पटाखोंसे बनी बडी बडी प्रतिमाओंका दहन किया जाता है ।

 

 

६. दशहरेके दिन एकदूसरेको अश्मंतकके पत्ते सोनेके रूपमें देनेका कारण

अश्मंतकका पत्ता

विजयादशमीके दिन अश्मंतकके पत्ते सोनेके रूपमें देवताको अर्पित करते हैं । आपसी प्रेमभाव निर्माण करनेके लिए अश्मंतकके पत्ते शुभचिंतकोंको सोनेके रूपमें देकर उनके कल्याणकी प्रार्थना करते हैं । तदुपरांत ज्येष्ठोंको नमस्कार कर उनके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं । अश्मंतकके पत्तोंमें ईश्वरीय तत्त्व आकृष्ट करनेकी क्षमता अधिक होती है । इन पत्तोंमें १० प्रतिशत रामतत्त्व एवं शिवतत्त्व भी विद्यमान होता है । ये पत्ते देनेसे पत्तोंद्वारा व्यक्तिको शिवकी शक्ति भी प्राप्त होती है । ये पत्ते व्यक्तिमें तेजतत्त्वकी सहायतासे क्षात्रवृत्तिका भी संवर्धन करते हैं ।

 

दशहरेके दिन एकदूसरेको अश्मंतकके पत्ते सोनेके रूपमें देनेका परिणाम

अ. `अपराजिता’ शक्तितत्त्वकी उत्पत्ति पृथ्वीके भूगर्भबिंदु से होती है । 

आ. अपराजिता देवीसे प्रार्थना कर देवीका आवाहन करनेपर भक्तकी प्रार्थनानुसार अष्टदलके मध्यमें स्थित भूगर्भबिंदुमें देवीतत्त्व कार्यरत होता है । 

इ. उस समय उनके स्वागतके लिए अष्टपाल देवताओंका भी उस स्थानपर आगमन होता है । अपराजिताकी उत्पत्तिसे मारक तरंगें प्रक्षेपित होती हैं । 

ई. अष्टपालों द्वारा अष्टदलकी आठबिंदुओंसे लालिमायुक्त प्रकाश-तरंगोंके माध्यमसे ये मारक तरंगें अष्टदिशाओंमें प्रक्षेपित होती हैं । 

सर्व आठों बिंदुओंसे शक्तिकी मारक तरंगोंका प्रक्षेपण होता है । ये तरंगें विशिष्ट कोनोंमें एकत्रित होकर, रज-तमात्मक शक्तिका नाश करती हैं । पृथ्वीपर सर्व जीव निर्विघ्न रूपसे जीवन जी सकें, इस हेतु वायुमंडलकी शुद्धि भी करती हैं । पूजनके उपरांत शमी अथवा अश्मंतक वृक्षोंके मूलके समीपकी कुछ मिट्टी एवं उन वृक्षोंके पत्ते घर लाते हैं ।

 

७. दशहरेके दिन शस्त्रपूजन करनेके परिणाम 

शस्त्रे आणि उपकरणे यांचे पूजन

 

दशहरा व्यक्तिमें क्षात्रभावका संवर्धन करता है । शस्त्रोंका पूजन क्षात्रतेज जागृत करनेके प्रतीकस्वरूप किया जाता है इस दिन शस्त्रपूजन कर देवताओंकी मारक शक्तिका आवाहन किया जाता है । पूजनमें रखे शस्त्रोंद्वारा वायुमंडलमें क्षात्रतेजका प्रक्षेपण होकर व्यक्तिका क्षात्रभाव जागृत होता है । इस दिन प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवनमें नित्य उपयोगमे लाई जानेवाली वस्तुओंका शस्त्रके रूपमें पूजन करता है ।

 

संदर्भ – सनातनका ग्रंथ ‘त्यौहार, धार्मिक उत्सव एवं व्रत’

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