योगः कर्मसु कौशलम् । इस वचन की
प्रतीति देनेवाले सनातन के रामनाथी आश्रम के
साधकों की परिपूर्ण सेवाभाव से साकार हुई कलाकृतियां !
कला ईश्वरप्राप्ति का एक माध्यम है । उस कला के स्वरूप की अपेक्षा उसे करते समय आनंद अनुभव करना अधिक महत्त्वपूर्ण है । योग्य साधना करने के कारण प्रत्येक कृत्य परिपूर्ण होता है और उस परिपूर्णता से ही सुंदर कला की उत्पत्ति होती है । आइए देखते हैं ऐसी ही कुछ कलाकृतियों के उदाहरण …

१. सनातन के रामनाथी आश्रम में छोटी सेवाआें में भी कला दिखाई देती है, उदा. पेडों की सिंचाई हेतु उपयोग में आनेवाले पाइप को इस प्रकार लपेटा गया है, जिसे देखकर मन को अत्यधिक आनंद मिलता है ।

२. आश्रम के प्रवेशद्वार पर हरसिंगार का वृक्ष है । रात्रि के समय इसके ढेरों पुष्प मार्ग पर बिखर जाते हैं । इन पुष्पों को साधकों के पैरों तले कुचलने से रोकने के लिए कु. वैभवी झरकर (आयु ११ वर्ष) ने इन पुष्पों को एकत्र किया तथा वृक्ष की जड के पास इन पुष्पों की रचना की, जिसे देखकर चैतन्य अनुभव होता है ।

३. पूजा का दीपक जलाने के लिए प.पू. डॉक्टरजी (परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी) माचिस की तीली का उपयोग करते हैं । उनके कक्ष में सेवा करनेवाली साधिका कु. रोहिणी गुरव जली हुई तीलियां फेंकने से पूर्व उन्हें विविध प्रकार से रचती है । उन रचनाआें से साधकों को साधना हेतु संदेश मिलता है । इस छायाचित्र में कु. रोहिणी ने भगवान कृष्ण की कलाकृति बनाई है । इससे भगवान श्रीकृष्ण के प्रति उसके मन के उत्कट भाव की झलक स्पष्ट दिखाई देती है ।

४. श्रीमती पार्वती जनार्दन और कु. स्वाती गायकवाड कपडे सुखाने के लिए उपयोग में की जानेवाली चिमटियों को विविध ढंग से रचती हैं । उस प्रत्येक रचना का एक आध्यात्मिक अर्थ होता है । उनकी कलाकृतियों में दिखाया गया है कि नीले रंग की चिमटी भगवान कृष्ण हैं तथा विविध रंगों की चिमटियां गोपियां हैं । वे भगवान कृष्ण के आसपास रासलीला कर रही हैं । यहां दिए गए छायाचित्र में दिखाया गया है ये गोपियां प्रसार हेतु समष्टि में जा रही हैं । इससे व्यष्टि और समष्टि साधना का संदेश मिलता है ।
साधकों द्वारा सिद्ध ऐसी अनेक छोटी छोटी कृतियों से साधक परिपूर्ण सेवाभाव से कला साकार करते हैं तथा प्रत्येक क्षण आनंद का अनुभव करते हैं । इससे उनका प्रत्येक कर्म योगः कर्मसु कौशलम् होता है । (अर्थात समत्वरूप योग ही कर्म का कौशल्य है अर्थात कर्मबंधनों से मुक्त होने का उपाय है ।)
– कु. प्रियांका लोटलीकर, महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय, गोवा. (३.१.२०१६)
स्रोत : पाक्षिक सनातन प्रभात
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