श्रीक्षेत्र राक्षसभुवन का आदि दत्तपीठ : वरद दत्तात्रेय मंदिर !

श्री. नितीन (योगिराज महाराज) डोळे

सती अनसूया के सतीत्व की परीक्षा लेने के लिए ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्‍वर भूतल पर आए; परंतु सती अनसूया के तपोबल से उनका अवतरण तीन छोटे बालकों में हुआ । इनमें से जिस बालक में श्रीविष्णु का अवतरण हुआ, वे हैं श्रीगुरु दत्तात्रेय !

यह घटना जहां घटी, वह स्थान है श्रीक्षेत्र रक्षोभुवन ! महाराष्ट्र के बीड जनपद के गेवराई तहसील में गोदावरी नदी के दक्षिण तट पर बसा एक पवित्र दत्तपीठ !! जो अब ‘श्री राक्षसभुवन’ के नाम से जाना जाता है ।

 

१. श्री राक्षसभुवन को ‘आदि दत्तपीठ’ क्यों कहते हैैं ?

श्री दत्तगुरु के अन्य पीठ, उदा. कारंजा, माणगांव, नृसिंहवाडी इत्यादि पीठ मानवीय देहावतारी पीठ हैं । ये पीठ श्री दत्तात्रेय के उन विशिष्ट अवतारों के नाम से विख्यात हैं; परंतु राक्षसभुवन में प्रत्यक्ष दत्तात्रेय भगवान का जन्म हुआ । इसलिए यह तत्त्वरूपी दत्तपीठ है । इसीलिए इस स्थान को ‘आदि दत्तपीठ’ भी कहा जाता है । यहां पर ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश ने माता अनसूया को वर प्रदान किया, इसलिए यह ‘वरद दत्तात्रेय मंदिर’ के नाम से विख्यात है । निर्गुण पीठ होने से यहां मंदिर पर कलश नहीं है ।

 

२. दत्तमंदिर में प्रतिष्ठापित दत्तप्रभु की विलोभनीय एकमुखी मूर्ति

मंदिर में प्रतिष्ठापित एकमुखी श्री दत्तमूर्ति
श्री दत्त पादुकाएं

दत्त मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने पर सामने बालुकाश्म से निर्मित पूर्वाभिमुख एवं सुंदर एकमुखी दत्तमूर्ति दिखाई देती है । मूर्ति पर नागदेवता का फन है । इस मूर्ति का दायां चरण आगे उठा हुआ है । दत्तात्रेय भगवान के ऊपर के दोनों हाथों में शंख एवं चक्र, बीच के दो हाथों में डमरू एवं त्रिशूल तथा नीचे के दो हाथों में जपमाला एवं कमंडलु है । इस प्रकार दत्तप्रभु की यह विलोभनीय मूर्ति है ।

 

३. दत्तयंत्र

निर्गुण दत्ततत्त्व आकृष्ट करनेवाला दुर्लभ दत्तयंत्र

दत्त मंदिर के ऊपर ही दत्तयंत्र है । यंत्र निर्गुण से संबंधित होता है । इस दत्तयंत्र की सहायता से वातावरण में विद्यमान दत्ततत्त्व आकर्षित होता है । यह अत्यंत दुर्लभ दत्तयंत्र है । इस यंत्र की रचना तीन भागों में की है । ऊपर के भाग में ‘दत्तयंत्र’ लिखा है । बीच के भाग में ‘श्री गुरवे नमः ।’ लिखा है तथा अंतिम भाग पर ‘श्री वरद दत्तात्रेय’ लिखा है । यह यंत्र पाषाण का बना है । इस यंत्र की रचना अष्टकमलदलाकृति है । दत्तमूर्ति के शिरोभाग पर यंत्र से युक्त ऐसी रचना अन्यत्र कहीं भी देखने नहीं मिलती । दत्त मंदिर के उपरी भाग में स्थित दत्तयंत्र, ऐसा पूरे भारत में यह एकमात्र स्थान है ।

 

४. सर्व आयुधों सहित अन्नपूर्णामाता की मूर्ति

सगुण रूप में श्री अन्नपूर्णामाता

जहां दत्तकार्य होता है, वहां अन्नपूर्णामाता होती ही हैं । इसलिए यहां मां अन्नपूर्णा सगुण रूप में निवास करती है । अन्यत्र अन्नपूर्णामाता की मूर्ति के हाथ में आचमनी होती है; परंतु यहां वे सगुण रूप में होने से वे सर्व आयुधों सहित हैं ।

 

५. मंदिर में होनेवाली अन्नपूर्णामाता की आराधना

प्रत्येक माह की पूर्णिमा को महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती, ऐसा उल्लेख कर उसे पुरणपोळी (चने की भिगोई हुई दाल और गुड का मिश्रण (पुरण) भरकर बनाई राटी और युक्त थाली का नैवेद्य निवेदित किया जाता है । उसका जोगवा मांगा जाता है (भारतीय संस्कृतिकोश में जोगवा का अर्थ है देवी के उपासक कौडियों की माला पहनकर, माथे पर हल्दी लगाकर, भिक्षा का पात्र हाथ में लेकर देवी के नाम से भिक्षा मांगते हैं) एवं उसकी आराधना की जाती है । आज भी भक्तगण माता की सेवा कर उनके सगुण रूप में दर्शन की अनुभूति ले सकते हैं ।

 

६. दत्तमहाराज की सवारी निकलने पर साधक एवं श्रद्धालुओं को होनेवाली अनुभूतियां

आज भी दत्त महाराज के आशीर्वाद तथा अन्नपूर्णामाता का अस्तित्व हम अनुभव कर सकते हैं । जब दत्त महाराज की सवारी निकलती है, तब चमेली व गुलाब की सुगंध सर्वत्र फैलती है । कभी-कभी साधक अथवा श्रद्धालुओं को स्नान संध्या करते समय आचमनी-फूलपात्र की मंजुल ध्वनि सुनाई पडती है । इस प्रकार यह जागृत स्थान है ।

 

७. नितीन उपाख्य योगीराज महाराज डोळे के कुल के दत्तभक्तों की जानकारी

मैं (श्री. नितीन उपाख्य योगिराज महाराज डोळे) प.पू. भाऊस्वामी का ग्यारहवां वंशज हूं । दत्तमूर्ति के चरणों में हमारे मूल पुरुष, अर्थात सद्गुरु भाऊ महाराज उपाख्य दत्तास्वामी डोळे की समाधि है । प.पू. भाऊस्वामी का जन्म अयोनीसम्भव था । इसलिए गऊबाई एवं गोपालस्वामी, उनके सांसारिक माता एवं पिता थे । वे अजानुबाहू (जिनके हाथ घुटने तक) थे । उनकी कनपटियां कंधे तक थीं । भाऊसाहेब महाराज, अन्तोबादादा, अवधूतबुवा, केशवबुवा, ऋषिकेशस्वामी इत्यादि सात पीढियों तक अजानुबाहू परंपरा थी । आठवीं, नौवीं तथा दसवीं पीढी में इसमें परिवर्तन हुआ । हमारी परंपरागत गद्दी पर एक पुत्र एवं दो कन्याएं, ऐसी परंपरा थी । एक ही पुत्र होने से, अर्थात शक १६०० से अर्थात भाऊमहाराज से हमारे गुरु तक परंपरा अखंड थी । उस काल में संतानसंख्या अधिक रहती थी । तब भी हमारे पास एक ही पुत्र रहता था । परंतु मेरे दो बंधु हैं । अब हमारा वंशवृक्ष खिल उठेगा । पीठ पर विराजमान महाराज ने अन्नदान, गुरुमंत्र, शिष्य संप्रदाय, कुलधर्म आदि साधना की । इससे इस स्थान की पवित्रता बढती गई ।

दत्त मंदिर की बाईं ओर, अर्थात अपनी दाईं ओर डोळे कुल की दूसरी पीढी के दत्तभक्त, अर्थात प.पू. भाऊस्वामी के सुपुत्र बाबास्वामी उपाख्य केशवस्वामी की समाधि है । इस समाधि के ऊपरी भाग में एक शिवलिंग है । इस समाधि मंदिर पर एक शिलालेख है । इसी मंदिर के बाईं ओर एक गुम्बज दिखता है । इस गुम्बज से प.पू. बाबास्वामी की समाधि की ओर जाने का गुप्त मार्ग है ।

दत्तपीठ के भगवे रंगोंवाली पांच समाधियां डोळे कुल के भक्तों की हैं । भगवा रंग वैराग्य का प्रतीक है । प.पू. भाऊस्वामी एवं प.पू. बाबास्वामी सहित कुल सात समाधियां यहां हैं । इनके पश्‍चात की पीढियों को आदेश न होने से उनकी सामधियां यहां नहीं हैं ।

 

८. भारत का एकमात्र शिवमंदिर जहां नंदी नहीं हैं !

प.पू. बाबास्वामी डोळे की समाधि की ओर ले जानेवाले गुम्बज की एक ओर सोमेश्‍वर महादेव का मंदिर है । अत्रिऋषि की पत्नी अनसूया सती जाने के पहले भगवान शिव यहां नंदी के बिना ही आए थे । इसलिए यह भारत का ऐसा एकमात्र मंदिर है, जहां नंदी नहीं है ।

 

९. दत्तभक्त श्री नितीन उपाख्य योगीराज महाराज डोळे का आध्यात्मिक कार्य

९ अ. सद्गुरु की आज्ञा से चिकित्सा व्यवसाय बंद कर आध्यात्मिक क्षेत्र में कार्य करना

मेरे पिता एवं सद्गुरु एक ही हैं ! वर्ष २००८ में उन्होंने मुझे आज्ञा की, ‘‘और कितने काल तक चिकित्सा व्यवसाय करोगे ?’’ मैंने १६ वर्ष रोगियों की सेवा की थी । ‘कोई भी पिता अपने पुत्र को व्यवसाय बंद करो’, ऐसा नहीं कहेगा । परंतु मेरे ध्यान में आया कि, ‘यह मेरे पिता की नहीं, अपितु गुरु की आज्ञा है ।’ तदुपरांत मैंने धीरे-धीरे व्यवसाय कम किया और आध्यात्मिक क्षेत्र में कार्य आरंभ किया । संस्थान का कार्य बढाया । एक वर्ष में मेरे पिता कालवश हुए । तब मेरे ध्यान में आया कि, ‘एक वर्ष पहले उन्होंने मुझे इस क्षेत्र में आने का सुझाव क्यों दिया था ?’

९ आ. आदि पीठ का महत्त्व जानने हेतु अध्ययन करना

वर्ष २००९ से संस्थान का संपूर्ण दायित्व मेरे पास आया । उस समय मैंने चिकित्सा व्यवसाय न्यून किया था । मैं विज्ञानशाखा का विद्यार्थी होने से मुझमें जिज्ञासा अधिक थी । मैंने निश्‍चय किया, ‘दत्त का जो आद्यपीठ है, वह केवल मेरे दादा-पिता इत्यादि कहते है; इसलिए नहीं, किंतु ‘आद्यपीठ क्या होता है?’ इसका मैं शोध करूंगा’ । इसलिए मैंने वाचन, लेखन एवं अध्ययन आरंभ किया ।

९ इ. ‘महान विभूतियों के कारण किसी स्थान को महत्त्व प्राप्त होता है’, यह ध्यान में आना

मैंने पूरे भारत में यात्रा की । नेपाल से कन्याकुमारी तक सर्व दत्तक्षेत्रों को भेंट दी । मैं कारंजा, गाणगापुर, पिठापुर, नरसोबाची वाडी एवं माहूर गया । अपनी क्षमतानुसार साधना की । तब ध्यान में आया कि अक्कलकोट में स्वामी समर्थ, शेगांव में गजानन महाराज, नरसोबा की वाडी में नृसिंह सरस्वती तथा कुरवपुर को श्रीपाद श्रीवल्लभ के कारण महत्त्व प्राप्त हुआ है ।

अर्वाचीन काल में प.प  (परमहंस परिव्राजकाचार्य) टेंम्ब्येस्वामीजी ने कारंजा, कुरवपुर एवं पिठापुर का शोध किया तथा उनका प्रसार प्रचार किया । उससे पहले कोई भी यह नहीं जानता था कि, ‘पिठापुर श्रीपाद श्रीवल्लभ का जन्मस्थान है ।’ प.प. टेंम्ब्येस्वामीजी ने उसका प्रचार किया; इसलिए आज वह ‘दत्तस्थान’ के रूप में विख्यात हुआ ।

 

१०. दत्तास्वामी ने राक्षसभुवन क्षेत्र के दत्तस्थान का शोध करना

इसके भी पहले शक १६०० में नृसिंह सरस्वतीजी के ३०० वर्ष पूर्व हमारे मूलपुरुष दत्तास्वामी ने राक्षसभुवन क्षेत्र के दत्तस्थान का शोध किया । वहां जाकर स्वयं साधना की । उन्होंने दत्तजन्म का उत्सव आरंभ किया, जो आज भी अखंडरूप में चल रहा है । यह सब दत्तप्रभु की इच्छा के कारण ही हो रहा है । हमारा कर्तृत्त्व यहां शून्य है ।’

दत्तभक्त श्री नितीन उपाख्य योगीराज महाराज डोळे, राक्षसभुवन, गेवराई, जनपद बीड, महाराष्ट्र.

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