दीप अमावस्या को नाली अमावस्या कहकर टोकनेवाले धर्मद्रोही विचारों का खण्डन !

सभी हिन्दू भाईयों से निवेदन !

दीप (दीपों को धोने की) अमावस्या को कुछ विकृत लोग नाली अमावस्या कहकर हिन्दू धर्म को बदनाम कर रहे हैं । मूलतः हमारे धर्म में नाली नाम का कोई त्योहार ही नहीं है । शराबी लोगों ने इसका यह नामकरण किया है ।

आषाढ अमावस्या के दूसरे दिन से पवित्र श्रावणमास का आरंभ होने से इस मास में असंख्य लोग मांसाहार त्याग देते हैं । कुछ लोगों को आगे मासभर, तो कुछ लोगों को चातुर्मास समाप्त होनेतक मांसाहर करने न मिलने के कारण इस अमावस्या के दिन मदिरा और मांसाहार का बडी मात्रा में सेवन किया जाता है । इस कुपरंपरा का बडी मात्रा में उदात्तीकरण किया जाता है । इस अनुचित परंपरा के विरुद्ध वॉट्स एप, फेसबुक जैसे सामाजिक जालस्थलोंपर निम्नांकित जागृतिपर संदेश प्रसारित किया जा रहा है, जिसे हम हमारे पाठकों के लिए दे रहे हैं ।

आजकल इस दिन को वास्तविक हमें लज्जा प्रतीत हो; इतनी कुप्रसिद्धि नाली नाम से मिल रही है । जब अन्य पंथीय हमें नाली का अर्थ पूछते हैं, तब हमारे ही कुछ मित्र उन्हें यह बताते हैं कि इस दिन इतनी मदिरा पी जाती है कि पीकर नाली में गिरकर नालियां भर जानी चाहिएं, इस प्रकार का लज्जाहीन उत्तर देते हैं । एक-दूसरे को हमारे समाज की अच्छी परंपराएं दिखाने की इस स्पर्धा के दिनों में हम ऐसी डींग मारते हैं । वास्तव में आषाढ मास की अमावस्या को मांसाहर कर उसे गौरी के भोजनतक बंद रखा जाता था; क्योंकि

१. इस वर्षा के गिले वातावरण में मांसाहार का पाचन नहीं होता ।

२. यह काल अधिकांश पशुओं का प्रजनन काल होता है । इसी काल में यदि पशुहत्या की गई, तो उससे प्रकृतिचक्रपर विपरीत परिणाम होता है । इसी कारण प्रकृतिपुत्र मछुवारेभाई इस काल में मच्छिमारी नहीं करते और इस काल में सरकार के स्तरपर भी मच्छिमारीपर प्रतिबंध लगाया जाता है ।

३. बाहरी वातावरण के कारण पशुओं के शरीर में अथवा शरीरपर विविध घातक जीवाणु होने की संभावना होती है । उनके मांस को पकाते समय उनका संपूर्णरूप से नाश नहीं हुआ, तो उससे मांस खानेवालों को कष्ट हो सकता है ।

४. इसी काल में अत्यंत दुर्लभ और स्वास्थ्य के लिए पोषक अनेक सब्जियां उगाती हैं । शाकाहार के कारण अपनेआप ही ऐसी सब्जियों का सेवन होता है ।

१. दीप अमावस्या को उत्साह के साथ मनाकर हमारी संस्कृति को संजोएंगे !

इस त्योहार में घर के सभी दीपों को धोकर उनका पूजन किया जाता है । दीप हमारे जीवन का अंधकार दूतेर कर हमें प्रकाश देते हैं । उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का यह दिन होता है ।

अतः इस त्योहार को दीप अमावस्या ही कहा जाना चाहिए । कभी मजाक से भी उसे नाली अमावस्या न कहें । इसके विपरीत दीपपूजन कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए कहा गया है ।

आज भी इस दिन महाराष्ट्र के लाखों मराठी भाषी घरों में इसी प्रकार से मनोभाव से दीपपूजन कर बहुत ही विशेषतापूर्ण भोग लगाया जाता है । अत्यंत आनंददायक और मंगल दीपअमावस्या हम सभी उत्साह के साथ मनाएंगे और अपनी संस्कृति को संजोएंगे !

२. हिन्दुओं का आवाहन !

हिन्दुओं ! समय रहते ही सतर्क बनें; क्योंकि कल ये धर्मद्रोही कहेंगे कि धर्म ही हमें नाली अमावस्या मनाने के लिए कहता है; इसलिए इस दिन बहुत मदिरापान करना चाहिए ।

हिन्दू इस त्योहार के प्रति लोगों में जागृति लाकर आज इस त्योहार को जो विकृत स्वरूप प्राप्त हुआ है, उसे रोकने हेतु प्रयास करें । हिन्दुओं को इस माध्यम से हमारे त्योहार और संस्कृति का सम्मान करने हेतु संगठित होना चाहिए ।

– एक हिन्दू धर्माभिमानी (वाट्स एपपर प्रसारित संदेश)