सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र निर्माण करनेवाली वैदिक शिक्षापद्धति !


प्राचीनकाल में हमारे देश में वैदिक शिक्षणपद्धति थी । इसलिए, उस समय भारत सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र था । कहा जाता है कि तब यह देश इतना समृद्ध था कि यहां की भूमि से सोने का धुआं निकलता था । इस वैदिक शिक्षापद्धति की नींव आध्यात्मिक थी । इसी प्रकार, वैदिक शिक्षा कालातीत एवं हितकारी थी, इसलिए ऐसी शिक्षापानेवाले विद्यार्थी राष्ट्र को उन्नति के उच्च शिखर पर पहुंचाते थे । ऐसे उत्तम गुरुकुल भारत में थे; इसीलिए सहस्रों वर्ष बीतने पर भी, उनका स्थान ध्रुवसमान अचल है । यह वैदिक शिक्षापद्धति कैसी थी, इस विषय में जानकारी देनेवाला श्री प्र.दी. कुलकर्णी का मराठी लेख ‘केसरी गर्जने’ में प्रकाशित हुआ था । उसका हिन्दीरूप हम अपने पाठकों के लिए यहां दे रहे हैं ।

१. श्रीगुरु का महत्त्वपूर्ण स्थान

वैदिक शिक्षापद्धति में श्रीगुरु का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है । अथर्ववेद में श्रीगुरु को शिष्य का आध्यात्मिक पिता कहा गया है । परमेश्‍वरीय तत्त्वज्ञान पाने की जिसकी इच्छा हो, उसे श्रोत्रीय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना चाहिए, यह भारतीय संस्कृति कहती है ।

२. बुद्धि और मन से शुद्ध तथा प्रामाणिक गुरु !

वैदिककाल के गुरु की महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि वे बुद्धि और मन से शुद्ध तथा प्रामाणिक होते थे । उनमें ज्ञान का दंभ तनिक भी नहीं था । गोपथ ब्राह्मण ग्रंथ में एक बहुत रोचक कथा है । मौद्गल्य और मैत्रेय नाम के दो आचार्य थे । एक बार उनमें शास्त्रार्थ हुआ, जिसमें आचार्य मैत्रेय हार गए और अपनी पाठशाला बंद कर मौद्गल्य के शिष्य बन गए । विख्यात मीमांसक मंडनमिश्र और आदि शंकराचार्य में शास्त्रार्थ के समय मंडनमिश्र की धर्मपत्नी भारती न्यायकर्ता थी । मेरा पति शास्त्रार्थ में हार गया, यह कहने में उन्हें संकोच नहीं हुआ । इतना ही नहीं, मंडनमिश्र ने शंकराचार्य से संन्यास की दीक्षा ली और उनके शिष्य बन गए । इस घटना से क्या सीख मिलती है ? शाहजहां के शासनकाल में दक्षिण हिन्दुस्थान में अप्पय्या दीक्षित नाम के प्रतिभाशाली पंडित थे । वे द्वैतवाद के अनुयायी थे । शृंगेरी मठ के अद्वैतवादी पंडित से शास्त्रार्थ हुआ, जिसमें दीक्षित हार गए । तब, उन्होंने तुरंत संन्यास लिया और जीवनभर अद्वैतवाद का प्रचार किया । ये और ऐसे अनेक उदाहरणों से सिद्ध होता है कि विद्या और बुद्धि के क्षेत्र में प्रामाणिकता की परंपरा वेदकाल से यवनों के काल तक निरंतर चलती रही ।

३. समर्थ शिष्य को ही गुरु का आशीर्वाद !

प्रामाणिकता से विद्यादान करते हुए गुरु, शिष्य को अपना संपूर्ण ज्ञान दे देते थे । इसीलिए शिष्य, गुरु का वाक्य प्रमाण मानते थे । उस काल में आजकल के समान शिक्षक थोडे और विद्यार्थी अनगिनत, ऐसी स्थिति नहीं थी । अध्ययन समाप्त होने तक विद्यार्थियों को गुरु के घर पर ही रहना पडता था । इसलिए, गुरु को प्रत्येक विद्यार्थी पर ध्यान देना सरल होता था । सब एक स्थान पर रहते थे, तो आपस में विभिन्न विषयों पर चर्चा भी होती थी । ऐसे प्रतिभाशाली गुरु और जिज्ञासु शिष्यों के प्रश्‍नोत्तर सुनते समय सबके लिए ज्ञान का भंडार खुलता था । इसीलिए, अध्ययन पूरा होने पर स्नातकों को आशीर्वाद देते समय गुरु कहते थे, ‘तुम्हें बहुत विद्यार्थी मिलें । गुरु का यह आशीर्वाद केवल शाब्दिक नहीं होता था । जब उन्हें विश्‍वास हो जाता था कि आश्रम से सीखकर निकलनेवाला यह स्नातक विद्यादान की परंपरा आगे बढाने में सक्षम है, तभी उसे यह आशीर्वाद देते थे ।

४. गुरुकुल में योग्यता के अनुसार शिष्यों को शिक्षा !

विविध आश्रमों में प्रवेश देते समय गुरु शिष्यों की पात्रता जांचते थे । वैदिककाल में शिक्षा देने का कार्य करनेवालों ने अपना विशिष्ट वर्ग बनाकर, वह व्यवसाय अपने अधिकार में कर लिया था, यह कहना कृतघ्नता का लक्षण है । उस काल में शिक्षा निःशुल्क थी, अतः उससे आर्थिक लाभ की कोई अपेक्षा नहीं की जाती थी । इसके विपरीत, अनेक पराक्रमी और धनवान राजा, सेनापति आश्रम की अपनी ओर से आर्थिक सहायता करते थे । वास्तविक, विद्याप्राप्ति के पश्‍चात शिष्य से मिलनेवाली गुरुदक्षिणा ही गुरु का धन होती थी । गुरुदक्षिणा देना आवश्यक ही है, ऐसा नियम नहीं था और वैसी कोई शर्त भी नहींथी । ऐसा करनेवाले गुरु की धर्मग्रंथों में निंदा की गई है । इस संबंध में महाकवि कालिदास एक स्थान पर कहते हैं,  यस्यागमः केवल जीविकायै तं ज्ञानपव्यं वणिजं वदन्ति। जो केवल आजीविका (रोजीरोटी) की विद्या देता है, वह ब्राह्मण नहीं, ज्ञान की दुकान चलानेवाला बनिया है !

५. गुरुकुल में सब वर्णों के विद्यार्थियों का समान आदर !

सदाचारी और विषय में रुचि आवश्यकता होती थी उसमें, किसी भी वर्ण के बुद्धिमान विद्यार्थी को प्रवेश दिया जाता था । वेद के अतिरिक्त, सब विद्याएं समाज के सभी वर्गों को सिखाई जाती थीं । , त्रिवर्णिकों के प्रति विशेष प्रेम और अन्यों से द्वेष, ऐसी भावना नहीं थी । ऐसा विश्‍वास था कि वेद मंत्र हैं । उनके उच्चारण से मनुष्य का जीवन, कल्पना और विश्‍व जुडा है । इसलिए उनका उच्चारण शास्त्रानुसार ही होना चाहिए । वेद के अतिरिक्त, जिन विद्याआें का संबंध विशुद्ध उच्चारण से नहीं था, वे सभी विद्यार्थियों को सिखाई जाती थीं । एकबार विद्यार्थी आश्रम में आने के पश्‍चात, वह सदाचारी और विनयसंपन्न हुआ है कि नहीं, यह जानने के लिए एक वर्ष तक उसकी अनेक प्रकार से परीक्षा ली जाती थी । कूर्मपुराण में लिखा है,

संवत्सरोषिते शिष्ये गुरुर्ज्ञानमनिर्दिशन् ।
हरते दुष्कृतं तस्य शिष्यस्य वसतो गुरुः ॥

शिष्य एक वर्ष गुरु के घर रहे और तब भी गुरु उसे न सिखाएं, तब उस शिष्य का सब पाप गुरु को लगता है । स्मृतिकौस्तुभ में एक वचन है, विद्यार्थियों को तत्परता से न पढानेवाला गुरु, अगले जन्म में आम का वृक्ष बनता है ।

इतना पढाने के पश्‍चात, अध्यापक को भी भोजन की आवश्यकता होती ही है । इसके लिए शास्त्रकारों ने शिष्यों के मन में गुरु के प्रति कृतज्ञता भाव उत्पन्न करने हेतु, गुरुदक्षिणा की परंपरा आरंभ की । यह गुरुदक्षिणा शिक्षा पूर्ण होने पर ही दी जाए, पहले नहीं; ऐसा वचन है । असमर्थ गरीब शिष्य भी गुरुदक्षिणा दे सके, इसके लिए उस समय का समाज आवश्यक धनराशि जुटाने में उसकी सहायता करता था । महाभारतकाल की एक घटना है कि उत्तंक नाम के निर्धन (गरीब) शिष्य के पास गुरुदक्षिणा देने के लिए धन नहीं था । यह पता चलने पर, एक राजा ने अपनी रानी के कान से सोने के कुंडल निकालकर उस शिष्य को दिए ।

६. शिष्य का संपूर्ण जीवन अच्छा बनानेको पहला कर्तव्य माननेवाले गुरु !

आश्रम में रहनेवाले शिष्य का ध्यान, गुरु उनके माता-पिता से भी अधिक रखते थे । शिष्य भी गुरु से सर्वाधिक प्रेम करते थे । गुरु यह नहीं मानते थे कि केवल विद्या देना मेरा काम है । वे, शिष्य का संपूर्ण जीवन उत्तम बनाना अपना कर्तव्य समझते थे । गुरु के घर में रहते समय शिष्य अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा की चिंता छोडकर, सब काम करते थे । भगवान श्रीकृष्ण अपने गुरु सांदीपनी के आश्रम में सब प्रकार के काम करते थे । गोपथ ब्राह्मण ग्रंथ में वर्णन मिलता है कि गुरु के घर उत्साह से काम करते समय शिष्यों के शरीर से पसीने की धाराएं निकलती थीं । शिष्य को काम बताते समय गुरु भी इस बात का ध्यान रखते थे कि उसके अभ्यास की हानि न हो । ऐसा काम करते समय यदि किसी शिष्य की मृत्यु हो जाती थी, तब गुरु को कठोरतम प्रायश्‍चित करना पडता था । शिष्य जब आश्रम का अनुशासन नहीं मानता था, तब गुरु उसे ठंडे पानी से स्नान, उपवास और गुरुगृह छोडने का दंड देते थे । परंतु जब शिष्य एक सीमा से अधिक उद्दंडता करने लगे, तब गुरु उसकी पीठ पर छडी से प्रहार कर सकता है, ऐसा मनु और गौतम ऋषि ने ग्रंथ में लिखा है । ऐसा दंड देते समय राजपुत्र और रंक में भेदभाव नहीं किया जाता था । बौद्धजातक कथा में वर्णन मिलता है कि वाराणसी के राजपुत्र की चोरी की लत छुडाने के लिए गुरु ने उसे छडी से बहुत पीटा । धर्मसूत्र और मनुस्मृति पढने से पता चलता है कि वैदिककाल में केवल राजा नहीं, ऋषि भी न्याय करने में निष्ठुर होते थे ।

७. विद्यालयों पर राजा का नहीं, विद्वानों और तपस्वियों का ही पूरा नियंत्रण !

उस काल में साहित्य की पढाई के साथ-साथ अन्य विविध प्रकार के शास्त्रों और व्यवसायों की भी शिक्षा दी जाती थी । वैदिक साहित्य में इसका उल्लेख है । वेदविद्या, छंदशास्त्र, इतिहास, पुराण, याज्ञिक कर्म, भूमिति, ज्योतिष, सैनिक शिक्षा, गायन, कला, गूढ विद्या, तैराकी, शिल्पशास्त्र, धनुर्विद्या, रथकर्म, गरुडविद्या, पशुपालन, अश्‍व-सारथ्य, लौह-विद्या, खनिज विद्या, सर्पविद्या, वैद्यक जैसे अनेक विषय पढाए जाते थे । आजकल पुस्तकीय ज्ञान के साथ व्यावसायिक शिक्षा देने का जो प्रयत्न चल रहा है, उसकी जड वैदिक शिक्षापद्धति में है । अनेक शिक्षा-समितियों के सुझावों को पूर्णतः लागू न करने के कारण आज का विद्यार्थी केवल परीक्षार्थी बनकर रह गया है । स्नातक तक शिक्षाप्राप्त विद्यार्थी जब समाज में जाए, तब वह आर्थिक दृष्टि से अपने पैरों पर खडा हो सके, इसके लिए वैदिककाल में पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ व्यावसायिक शिक्षा दी जाती थी । पहले की शिक्षापद्धति की सबसे बडी विशेषता यह थी कि विद्यालय राजसत्ता के दास नहीं थे; उनपर विद्वानों और तपस्वियों का नियंत्रण रहता था । आजकल की भांति उस समय शिक्षाक्षेत्र में ऐसे अधिकारियों और मंत्रियों का हस्तक्षेप नहीं होता था, जिनका संबंध शिक्षा से नहीं होता था । राजा भी गुरुकुल में विनम्रता और सभ्यता से प्रवेश करे, ऐसीपरिपाटी थी । एक श्रेष्ठ राष्ट्र का निर्माण वैदिक शिक्षापद्धति से हो सकी, इसका कारण यही था कि वह कभी राजसत्ता के अधीन नहीं थी । इसके विपरीत, राजसत्ता पर ऋषियों का पूरा नियंत्रण रहता था ।

८. सार्वकालिक और हितकारी वैदिक शिक्षापद्धति !

वैदिक शिक्षापद्धति के इस रूप में, युगपरिवर्तन के पश्‍चात भी, कुछ अपवादों को छोड दें, तो मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ । प्रत्येक कालखंड में उपयोगी शिक्षापद्धति, वैदिक शिक्षापद्धति ही है । परंतु, पिछले सौ-डेढसौ वर्ष की परतंत्रता के कारण तथा वर्तमान में हुए अनुचित संस्कारों के कारण भारत के बौद्धिक क्षेत्र में विदेशियों की वैचारिक दासता उत्पन्न हुई ।

इस दासता के कारण राष्ट्र के विविध क्षेत्रों पर जो कुछ दुष्परिणाम हुआ है, उसमें सबसे अधिक हानि ‘भारतीय शिक्षापद्धति’ की हुई है । इसमें पाश्‍चात्य शिक्षापद्धति का अनुकरण हो रहा है । इसके दोष ही हमारी शिक्षापद्धति में प्रमुखरूप से दिखाई देते हैं । दूसरे शब्दों में कहें, तो हमने उनके दोषों को ही अपनाया है और उनके गुणों से हमारा विशेष संबंध नहीं हुआ । इसलिए, इसमें आध्यात्मिक दृष्टिकोण का पूर्णतः अभाव और विलक्षण ध्येयशून्यता है । इन दोषों के कारण शिक्षाक्षेत्र और मंदिरों पर राजसत्ता का अधिकार हो गया । इससे शिक्षा को व्यापारिक रूप मिला । शिक्षकों का उच्च नैतिक भाव नष्ट हुआ और वे द्रव्य देनेवालों के सेवक बन गए।

९. उत्तम संस्कार देनेवाली वैदिक शिक्षापद्धति !

गुरुकुल में वैदिक शिक्षा के उत्तम संस्कारों की भट्टी में तपकर आदर्श बने विद्यार्थियों को राष्ट्र के लिए समर्पित करते समय आचार्य उन्हें जो उपदेश करते थे, उसका स्मरण हुए बिना नहीं रहा जा सकता । आचार्य कहते थे, ‘सत्य बोलना, अपना कर्तव्य ठीक से समझकर धर्म का आचरण करना, सिखाई हुई विद्या प्रमाद में पडकर नहीं भूलना, प्रजा की एकता तोडने का कार्य नहीं करना, धर्म की उपेक्षा नहीं करना, अपने कल्याणमार्ग को नहीं छोडना, माता-पिता का ध्यान रखना, आचार्य का सम्मान करना, अतिथि का सम्मान करना, धर्म के बताए हुए देवकार्य और पितृकार्य नहीं भूलना, बुरी बातों का अनुकरण न करना, धर्म और ईश्‍वर से डरना तथा उनका अनादर हो, ऐसा आचरण नहीं करना । श्रेष्ठ और गुरुतुल्य जनों का अनुकरण कर, जीवन को सफल बनाना । दान, विचारपूर्वक परंतु श्रद्धासहित करना ।

– श्री प्र.दी. कुलकर्णी (मराठी पत्र, ‘केसरी गर्जने’, १ नवंबर ९२/२)