चातुर्मास का महत्त्व

 

स्वास्थ्य बनाए रखने, साधना करने तथा वातावरण को सात्त्विक बनाए रखने हेतु धर्मशास्त्र में बताए नियमों का पालन सर्वथा उचित है । मानवजीवन से संबंधित इतना गहन अध्ययन केवल हिन्दू धर्म में ही किया गया है । यही इसकी महानता है ।

चातुर्मास को उपासना एवं साधना हेतु पुण्यकारक एवं फलदायी काल माना जाता है । आषाढ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक अथवा आषाढ पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक चार महीने के काल को चातुर्मास कहते हैं । यह एक पर्वकाल है ।

ऐसी मान्यता है कि चातुर्मास का काल देवताओं के शयन का काल है । इसलिए चातुर्मास के आरंभ में जो एकादशी आती है, उसे शयनी अथवा देवशयनी एकादशी कहते हैं । तथा चातुर्मास के समापन पर जो एकादशी आती है, उसे देवोत्थानी अथवा प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं । परमार्थ के लिए पोषक बातों की विधियां और सांसारिक जीवन के लिए हानिकारक विषयों का निषेध, यह चातुर्मास की विशेषता है ।

चातुर्मास के काल में अधिकाधिक व्रतविधि होने का कारण चातुर्मास का काल; व्रतविधियों का काल भी जाना जाता है । चातुर्मास के काल में सूर्य की किरणें तथा खुली हवा अन्य दिनों के समान पृथ्वी पर नहीं पहुंच पाती । विविध जंतु तथा कष्टदायी तरंगों की मात्रा बढ कर रोग फैलते हैं । आलस्य का अनुभव होता है । आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें, तो चातुर्मास के काल में पृथ्वी के वातावरण में तमोगुण की प्रबलता बढ जाती है । ऐसे में हमारी सात्त्विकता बढाना आवश्यक होता है । चातुर्मास में किए जानेवाले विविध व्रतों की सहायता से विविध देवताओं की उपासना की जाती है और उनका आवाहन किया जाता है । व्रतविधि के कारण हमारा सत्त्वगुण बढता है और हम सर्व स्तरों पर सक्षम बनते हैं । प्रबल तमोगुणी वातावरण में सात्त्विकता बढाने हेतु दिए गए व्रतविधि हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों की देन है ।

१. एक पर्वकाल है, चातुर्मास

आनंदप्राप्ति अर्थात ईश्वरप्राप्ति, यह मनुष्य जीवनका एकमात्र उद्देश्य है । अतः मनुष्यके लिए निरंतर ईश्वरका सूक्ष्म-सान्निध्य अत्यावश्यक होता है । ईश्वरसे सदैव हमारा संधान बना रहे, इसलिए हमारे ऋषिमुनियोंने विविध माध्यम उपलब्ध करवाए हैं । इनके अंतर्गत कालानुसार उपासना भी बताई गई है । विशिष्ट कालमें विशिष्ट उपासना करनेसे उपासकको उस कालसे संबंधित देवतातत्त्वोंका अत्यधिक लाभ मिलता है । देवतातत्त्वोंके चैतन्यसे प्राप्त अंतःप्रेरणासे मनुष्य अध्यात्मके पथपर चलकर आगे ईश्वरसे एकरूप हो जाता है ।

२. चातुर्मास देवताओंका शयनकाल है

मनुष्यका एक वर्ष देवताओंकी एक अहोरात्र है । रात्रि काल सामान्यतः १२ घंटेका माना जाता है । तो एक पूर्ण दिन एवं पूर्ण रात्रि मिलाकर अहोरात्र होती है । मकर संक्रांतिसे कर्क संक्रांतितक उत्तरायण होता है एवं कर्क संक्रांतिसे मकर संक्रांति तक दक्षिणायन होता है । उत्तरायण देवताओंका दिन होता है, तो दक्षिणायन देवताओंकी रात । कर्क संक्रांतिपर उत्तरायण पूर्ण होकर दक्षिणायन प्रारंभ होता है, अर्थात देवताओंकी रात आरंभ होती है । कर्क संक्रांति आषाढ महीनेमें आती है; इसलिए आषाढ शुक्ल एकादशीको शयनी एकादशी कहते हैं । ऐसी मान्यता है कि उस दिन देवता शयन करते हैं, अर्थात सो जाते हैं । कार्तिक शुक्ल एकादशीपर देवता नींदसे जागते हैं, इसलिए इसे ‘देवोत्थान’ अथवा ‘प्रबोधिनी एकादशी’ कहते हैं । वस्तुतः दक्षिणायन छः महीनेका होनेके कारण देवताओंकी रात्रि भी तत्समान होनी चाहिए; परंतु प्रबोधिनी एकादशी तक चार महीने पूर्ण होते हैं । इसका अर्थ यह है कि एक तृतीयांश रात शेष होते हुए देवता जागकर अपना व्यवहार करने लगते हैं ।’

३. चातुर्मास भगवान श्रीविष्णुका शयनकाल है

 

चातुर्मासमें ‘ब्रह्मदेव द्वारा नई सृष्टिकी रचनाका कार्य जारी रहता है एवं पालनकर्ता श्री विष्णु निष्क्रिय रहते हैं; इसलिए चातुर्मासको विष्णु शयनकाल भी कहते हैं । ऐसी मान्यता है कि उस समय विष्णु क्षीरसागरमें शयन करते हैं । इसके संदर्भमें एक पौराणिक कथा है – वामनावतारमें श्री विष्णुने असुरोंके राजा बली से त्रिपादभूमि दानमें मांग ली । श्री विष्णुने एक पदमें पृथ्वी, दूसरे पदमें संपूर्ण ब्रह्मांड माप लिया तथा तीसरी बार श्री विष्णुने बलीराजाकी प्रार्थनाके अनुसार उनके सरपर पद रखकर उन्हें पातालमें भेज दिया । बलीराजाने भगवान श्रीविष्णुकी भक्तिमें अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया । इसपर प्रसन्न होकर भगवान श्रीविष्णुने बलीराजाके निकट रहना मान्य किया । तबसे श्रीविष्णु क्षीरसागरमें शयन करने लगे । वास्तवमें चातुर्मासके इस कालमें श्रीविष्णु शेष शय्यापर योगनिद्राका लाभ लेते हैं ।

४. श्रीविष्णु-शयनके संदर्भमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण

चातुर्मासमें जगत पालनकर्ता श्री विष्णु क्षीरसागरमें शयन करते हैं । ऐसेमें किसीके मनमें यह प्रश्न उभर सकता है कि इस कालमें सृष्टिका कार्य कैसे होता होगा ? इसलिए इसे वैज्ञानिक दृष्टिसे समझ लेना भी उपयुक्त होगा । श्री विष्णुका एक नाम है, हरि । हरि शब्दके अर्थ हैं, सूर्य, चंद्र, वायु इत्यादि । चातुर्मासमें परमेश्वरकी ये शक्तियां भी क्षीण होती हैं, इस बातको कोई अमान्य नहीं कर सकता । चातुर्मासमें अति वर्षाके कारण हमें सूर्य, चंद्रके दर्शन नहीं होते । तथा वायुके क्षीण होनेके उपरांतही वर्षा होती है । यह क्रिया अन्य ऋतुओंमें नहीं होती । इस दृष्टिसे चातुर्मास सूर्य, चंद्र, वायु, अर्थात श्रीविष्णुका शयनकाल होता है ।

 ५. चातुर्मासमें किए गए दान, पुण्य, तप, व्रत इत्यादि अधिक फलदायी होते हैं

चातुर्मासमें तीर्थक्षेत्रमें नदीस्नान करना

चातुर्मासमें की जानेवाली तीर्थयात्रा, दान, पुण्य, तप, व्रत इत्यादि श्री विष्णुके चरणोंमें अर्पित होते हैं । जो मनुष्य चातुर्मासमें तीर्थक्षेत्रमें नदीस्नान करता है, उसके अनेक पापोंका नाश होता है । क्योंकि वर्षाका जल विभिन्न स्थानोंसे मिट्टीके माध्यमसे प्राकृतिक शक्तिको अपने साथ बहाकर समुद्रकी ओर ले जाता है । यहां चातुर्मासमें श्री विष्णुका जलमें शयन करनेका अर्थ है, जलमें उनके तेज एवं शक्तिका अंश विद्यमान होना । इस तेजयुक्त जलसे स्नान करना सर्व तीर्थयात्राओंकी तुलनामें अधिक फलदायी है । इससे इस कालमें व्रतोंकी अधिक संख्याका कारण स्पष्ट होता है । इसके अतिरिक्त इस कालमें अधिकाधिक व्रतविधि करनेके अन्य कारण भी हैं ।

६. विविध रोगोंका प्रतिकार करनेके लिए स्वयंको सक्षम बनाना

वर्षाॠतुमें हमारे एवं सूर्यके बीच मेघका एक पट्टा बनता होता है । इसलिए सूर्यकी किरणें अर्थात तेजतत्त्व तथा आकाशतत्त्व अन्य दिनोंके समान पृथ्वीपर नहीं पहुंच पाते, जिसके कारण वातावरणमें पृथ्वी एवं आपतत्त्व प्रबल होते हैं । विविध जंतु, रज-तम तथा काली शक्तिका विघटन नहीं हो पाता; इसलिए रोग पैलते हैं । आलसका अनुभव होता है । शिकागो मेडिकल स्कूलके स्त्री रोग-विशेषज्ञ, प्रोफेसर डॉ. डब्ल्यू.एस. कोगरद्वारा किए गए शोधमें पाया गया कि जुलाई, अगस्त, सितंबर एवं अक्टूबरके चार महीनोंमें, विशेषकर भारतमें स्त्रियोंको गर्भाशय संबंधी रोग होते हैं, बढते हैं ।

व्रत विधि, उपवास करना, सात्त्विक आहार तथा नामजपके कारण हमारा सत्त्वगुण बढता है । इससे हम शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक दृष्टिसे इन रोगोंका अर्थात रज-तमका प्रतिकार करनेमें सक्षम बनते हैं ।

७. असुरोंकी प्रबलता अर्थात रज-तम अल्प करना

धर्मशास्त्रके अनुसार आषाढ शुक्ल एकादशीसे कार्तिक शुक्ल एकादशीतक अर्थात देवताओंके निद्राकालमें असुर प्रबल होते हैं एवं वे मनुष्यको कष्ट पहुंचाते हैं । चौमासेमें पृथ्वीपर प्रवाहित तरंगोंमें तमोगुण प्रबल तरंगोंकी मात्रा अधिक रहती है । उनका सामना कर पानेके लिए सात्त्विकता बढाना आवश्यक है । व्रतोंके पालनसे सात्त्विकतामें वृद्धि होती है तथा रज-तमकी मात्रा अल्प होती है । इसी कारण चातुर्मासमें अधिकाधिक व्रत होते हैं । असुरोंसे अपना संरक्षण करनेके लिए इस कालमें प्रत्येक व्यक्तिको कोई न कोई व्रत अवश्य रखना चाहिए । मनुष्य स्वस्थ, निरोगी, दीर्घायु तथा अध्यात्म पथपर अग्रेसर हो, ये दोनों हेतु साध्य करनेके लिए हमारे ऋषिमुनियोंने चातुर्मासमें विविध व्रतोंका विधान बताया है । इन ऋषिमुनियों तथा हिंदु धर्मकी महानताके सामने हम नतमस्तक हैं ।

८. चातुर्मासकी परिकल्पना

भागवतमें मुनिश्रेष्ठ नारदजीने महर्षि व्यासजीको अपना चरित्र बताया । वे कहते हैं,

अहं पुरातीतभवेऽभवं मुने दास्यास्तु कस्याश्चन वेदवादिनाम् ।
निरूपितो बालक एव योगिनां शुश्रूषणे प्रावृषि निर्विविक्षताम् ।।

– श्रीमद्भागवत महापुराण १-५-२३

अर्थ : हे मुनिवर, पिछले जन्ममें मैं वेद विषयक विवाद करनेवाले एक योगीकी दासीका पुत्र था । जब मैं बालक ही था, तब ये योगी वर्षाकालमें एक स्थानपर चातुर्मास व्रत कर रहे थे । उस समय उनकी सेवा मुझे सौंपी गई थी । इसीप्रकार भागवतमें नारदमुनिने धर्मराज युधिष्ठिरको प्रवृत्त एवं निवृत्त कर्मोंके बारेमें बताते हुए चातुर्मासका उल्लेख किया है । इससे बोध मिलता है कि, चातुर्मास व्रत अनादि कालसे परंपरागत रूपमें चला आ रहा है ।

९. चातुर्माससे संबंधित व्रत

सामान्य लोग चातुर्मासमें कोई तो एक व्रत रखते ही हैं । उसके अंतर्गत भोजन नियम बनाते हैं, जैसे पर्णभोजन अर्थात पत्तेपर भोजन करना, एक समय भोजन करना, अयाचित अर्थात मांगे बिना जितना मिले उतना ही ग्रहण करना, मिश्रभोजन अर्थात सर्व पदार्थ एक साथ परोसकर, उसका कलेवा बनाकर अर्थात मिलाकर कर भोजन करना इत्यादि । अनेक स्त्रियां चातुर्मासमें एक दिन भोजन एवं अगले दिन उपवास इस प्रकारका व्रत रखती हैं । कुछ स्त्रियां चातुर्मासमें एक अथवा दो अनाजोंपर ही निर्वाह करती हैं । उनमेंसे कुछ पंचामृतका त्याग करती हैं, तो कुछ एकभुक्त रहती हैं । इसके साथही चातुर्मासमें कुछ अन्य व्रत भी रखे जाते हैं,

अ. चातुर्मासमें भोजनमें तेल, घी या मीठा पदार्थ वर्ज्य करना

आ. जूते-चप्पल पहने बिना चलना

इ. अपक्व अर्थात न पकाया हुआ भोजन ग्रहण करना

ई. प्रतिदिन भगवान श्री विष्णुके देवालयमें जाकर सौ परिक्रमाएं करना

ई. भूमिपर या दर्भपर सोना इत्यादि

१०. चातुर्मासमें वर्ज्य बातें कौनसी है ?

अ. कंद, मूली, बैंगन, प्याज, लहसुन, इमली, मसूर, चवली अर्थात लोबिया, अचार, तरबूज अर्थात सत्दह, बहुबीज या निर्बीज फल, बेर, मांस इत्यादि पदार्थोंका सेवन नहीं करना चाहिए ।

आ. वैश्वेदेव किया गया अन्न अर्थात देवताओंको अग्निद्वारा दी गई आहुति

इ. मंच अर्थात खाट, पलंग अदि पर शयन नहीं करना चाहिए ।

ई. केशवपन अर्थात केश काटना वर्जित है ।

उ. विवाह एवं तत्सम अन्य कार्य भी वर्जित हैं ।

ऐसेमें यह प्रश्न अवश्य खडा होता है, कि चातुर्मासमें किन पदार्थोंका सेवन करना चाहिए ? चातुर्मासमें हविष्यान्न अर्थात हवनके लिए उपयुक्त सात्त्विक अन्न, जैसे चावल, जौ, तिल, गेहूं, गायका दूध, दही, घी, नारियल, केला इत्यादिका सेवन बताया गया है । चातुर्मासमें वर्जित पदार्थ रज-तमोगुण युक्त होते हैं, तो सेवनके लिए ग्राह्य माने गए हविष्यान्न सत्त्वगुणप्रधान होते हैं ।

११. चातुर्मासमें व्रत रखनेके लाभ

११ अ. आसुरी शक्तियोंके आक्रमणकी तीव्रता घट जाना

वर्षाऋतुमें तेजतत्त्व रूपी सूर्यकी किरणें पृथ्वीपर अल्प मात्रामें आती हैं । इस कारण आसुरी शक्तियोंके आक्रमण भी अधिक मात्रामें होते हैं ।  चातुर्मासमें किए जानेवाले व्रतोंके कारण व्यक्तिके साथ साथ वायुमंडलकी सात्त्विकता भी बढती है । इस सात्त्विकताके प्रभावसे आसुरी शक्तियोंके आक्रमणकी तीव्रता घट जाती है । इसी कारण हिंदुधर्मने चातुर्मास व्रतोंकी विधि बनाई है ।

११ आ. सूर्यनाडी कार्यरत होकर पेशियोंकी प्रतिकारक्षमता बढना

व्रतपालनसे आपतत्त्वके बलपर तेजतत्त्व प्रवाही बनता है । इससे व्रतीकी सूर्यनाडी कार्यरत होकर उसकी पेशियोंकी प्रतिकार क्षमता बढती है । परिणामस्वरूप व्रतीकी स्थूल देहसे संबंधित रोग, तथा सूक्ष्म अर्थात आसुरी शक्तियोंके आक्रमणके कारण होनेवाले कष्ट, इन दोनोंसे रक्षण होता है ।

११ इ. पातालसे प्रक्षेपित कष्टदायी तरंगोंसे रक्षण होना

चातुर्मासमें किए जानेवाले विविध व्रतोंकी सहायतासे विविध देवताओंकी उपासना की जाती है । इसके द्वारा उन देवताओंकी तत्त्वतरंगोंका आवाहन किया जाता है । ये तत्त्वतरंगें भूमिके पृष्ठभागपर घनीभूत होती हैं । परिणाम स्वरूप पातालसे प्रक्षेपित तेजतत्त्वरूपी कष्टदायी तरंगोंसे पृथ्वीपर रहनेवाले जीवोंका रक्षण होता है ।

११ ई. देवताओंकी कृपादृष्टि होना

चातुर्मासमें भूलोकमें सूर्य किरणोंसे मिलनेवाले तेजतत्त्वकी मात्रा घटती है, जो व्रतोंके माध्यमसे प्राप्त तेजतत्त्वसे बढाई जाती है । यह तेजतत्त्व वायुमंडलमें विद्यमान पृथ्वी एवं आप कणोंकी सहायतासे व्यक्तिकी देहमें एकत्रित होता है, जिसके कारण साधारण व्यक्तिको इससे कष्ट नहीं होता ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘त्यौहार, धार्मिक उत्सव एवं व्रत’