महर्षि अरविंद का भारतीय स्वतंत्रता के क्रांतिकार्य में सहयोग !

महर्षि अरविंद

१.  इंग्लंड के वास्तव्य में इंडियन मजलीस नामक भारतीय छात्रों की संस्था में महर्षि अरविंद भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता के संबंध में किए जानेवाले विचारविमर्श में सम्मिलित होते थे ।

२. कमल तथा कट्यार इन सशस्त्र क्रांति की गुप्त संगठन के भी वे सदस्य थे ।

३. उन्होंने क्रांतिकार्य करते समय देशसेवकों का संगठन स्थापन किया ।

४. सशस्त्र क्रांति का ध्येय साध्य करने हेतु उन्होेंने लष्करी शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपने मित्र को भेजा ।

५. जब वे प्राचार्य थे, उस समय उन्होंने अपनी शिक्षण संस्था के आधार पर अस्त्रशस्त्र कार्य आरंभ किया ।

६. उदयपुर के एक सरदार द्वारा निर्माण की गई गुप्त संगठन के महाराष्ट्र विभाग में वे सम्मिलित हुए थे ।

७. क्रांतिकार्य करना सहज हो, इसलिए उन्होंने प्राचार्यपद का त्याग दिया ।

८. समर्थ रामदास स्वामी, जोसेफ मॅझिनी, स्वतंत्रतावीर सावरकर ने युवा राष्ट्रसेवकों के संगठन की निर्मिती जिस प्रकार से की थी, उसी प्रकार अरविंद ने भवानी मंदिर इस संगठन के विचार-आचार-राष्ट्रकार्य हेतु एक संहिता निर्माण की ।

९. कोलकात्त्या के माणिकतोळाबाग में क्रांतिकारक तथा राष्ट्रोद्धारक युवकों का केंद्र निर्माण किया ।

१०. संपूर्ण भारत में इसी प्रकार के अनेक केंद्र निर्माण करने की योजना थी; किंतु खुदीराम बोस इस क्रांतिकारक द्वारा किए विस्फोट के कारण सर्व क्रांतिकारक बंदी बनाए गए । उनमें अरविंद भी होने के कारण उन्हें भी बंदी बनाकर अन्यों के साथ अलीपुर के कारागृह में एक वर्ष तक बंदी बनाया गया ।

११. अलीपुर के कारागृह में बंदी होते हुए भी गीता-उपनिषदों का गहरा अध्ययन कर साधना द्वारा वासुदेव दर्शन करना : ६ फीट लंबाई तथा ४ फीट ऊंचाई की अलीपुर की कोठरी थी । नजीक केवल फटी हुई वाकळ थी । जाली के द्वार से बारिश, वादळ, कुडा कोठरी में निरंतर आता था । पानी पीने का एक ही बर्तन, कीटक, मिठ्ठीमिश्रित चावल, गवत-पर्ण मिश्रित सब्जी, सपक सार यही उनका भोजन था । गर्मी में कोठरी ही ज्वाला समान प्रतीत होती थी । उसी कोठरी में उन्होंने गीता-उपनिषदों का सखोल अध्ययन किया तथा साधना द्वारा वासुदेवदर्शन किया ।

१२. दैवी आदेशा नुसार राष्ट्रकार्य करने की अरविंदजी की इच्छा थी : अलीपुर के सभागृह से मुक्त होने के पश्चात् कोलकात्ता के उत्तरपाडा में १० सहस्त्र श्रोताओं के सामने भाषण करते समय उन्होंने यह स्पष्ट किया कि,‘हम दैवी आदेशानुसार राष्ट्रकार्य करेंगे ।’ उसी आदेशानुसार किसी भी प्रकार की पूर्वसिद्धता अथवा आगे की प्रबंध न होते हुए भी वे प्रथम चंद्रनगर में तथा पश्चात् पांडेचरी में गए । स्मशान के निकट की एक ही कमरा, उसमें एक ही दिया ऐसी परिस्थिती में वे तथा उनके ६ सहकारी वहां निवास करते थे । केवल चार आणे (२५ पैसे) शेष रहें, इतनी सीमा तक का द्रारिद्य उन्होंने सहन किया। उनके कथनानुसार भारत की स्वतंत्रता तथा उन्नति के लिए उन्होंने योगसाधना में जितनी आपत्तियों का सामना किया, उतना पूर्व के किसी भी योगीपुरुष के भाग्य में नहीं आया होगा तथा भविष्य में भी कदाचित नहीं आएगा । १५ अगस्त को भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, यह वास्तव उनकी योगसाधना का ही दैवी फल है । अरविंद के संपूर्ण जीवन की ओर देखते हुए विद्वान लोग आज भी यह कहते हैं कि, ‘उन्होंने राष्ट्र कार्य का त्याग कर योगधर्म का स्वीकार किया।’ कुछ सुशिक्षित लोगों को अरविंद कौन थे, इसका भी पता नहीं है तथा कुछ लोगों को वे हिमालय के कोई योगीपुरुष प्रतीत होते हैं ।

 

महर्षि अरविंद के संदर्भ में लोकमान्य टिळक ने यह उद्गार व्यक्त किए !

लोकमान्य टिळक के उदगार इस प्रकार है, ‘अरिंवंद पूरीतरह से त्यागी तपस्वी हैं । अरविंद ने शतावधी युवकों में सर्वस्व त्याग की प्रेरणा निर्माण की । अरविंद ज्ञानोपासना, ध्येयनिष्ठा तथा त्याग में अद्वितीय सर्वश्रेष्ठ हैं । ’

लेखक : श्री. प्रभाकर पुजारी (मासिक धर्मभास्कर)

 

महर्षि अरविंद का क्षात्रधर्म !

१. सूक्ष्म में क्षात्रधर्म का अध्याय पढानेवाले महर्षि अरविंद : दूसरे महायुद्ध के समय भारतविरोधी शक्तियों से देश की सुरक्षा करने हेतु महर्षि अरविंद स्वयं सूक्ष्म में युद्ध लडे थे । महर्षि अरविंद ने उनके शिष्य को इस सूक्ष्म के महायुद्ध का भान करवाते समय यह प्रतिपादित किया कि, ‘कुछ राष्ट्रों का अन्यों के विरुद्ध युद्ध अथवा भारतविरुद्ध युद्ध इस दृष्टि से तुम युद्ध की ओर न देखें । उस संघर्ष के पीछे होनेवाली शक्तियों के साथ हमें लडना है । इस कार्य के लिए लडनेवाले ईश्वर के पक्ष में तथा असुरों के संभाव्य सत्ता के विरोध में लड रहे हैं ।’

२. महर्षि अरविंद द्वारा किया गया क्षात्रधर्म : दूसरे महायुद्ध के समय महर्षि अरविंद ने साधना के बल पर क्षात्रधर्म किया । जर्मनी का हुकुमशहा हिटलर तथा इटली का हुकुमशहा स्टॅलिन के वायटल बॉडी पर सूक्ष्म रूप में असुर ने बलपूर्वक अपने अधिकार में लिया था । हिटलर का अर्थात् उसमें अंतर्भूत असुर का भारत पर अधिकार प्राप्त करने का विचार था । उस समय महर्षि अरविंद ने सूक्ष्म में महायुद्ध का सामना कर आसुरी शक्ति को भारत के विरोध में युद्ध करने का निर्णय परिवर्तित करने के लिए बाध्य किया था ।

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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