सत्संग ५ : नामजप करने की पद्धतियां

कलियुग में नामस्मरण ही सर्वश्रेष्ठ साधना मानी गई है । नामजप करने की विविध पद्धतियां होती हैं जैसे लिखित नामजप, वैखरी नामजप । नामजप की वैखरी वाणी के साथ मध्यमा, पश्यंती और परा ये वाणियां भी हैं ।

सनातन संस्‍था और हिन्‍दू जनजागृति समिति की ओर से नगरविकास मंत्री एकनाथ शिंदे को ‘सनातन पंचांग २०२१’ भेंट

राज्य के नगरविकास मंत्री और ठाणे जिले के पालक मंत्री, साथ ही शिवसेना के नेता एकनाथ शिंदे को सनातन संस्था और हिन्दू जनजागृति समिति की ओर से ‘सनातन पंचांग २०२१’ भेंटस्वरूप दिए गए ।

सत्संग ४ : नामजप से मिलनेवाले लाभ 

कलियुग में नामस्मरण ही सर्वश्रेष्ठ साधना मानी गई है । हममें से अनेक जिज्ञासुओं ने नामजप करना आरंभ किया होगा अथवा कुछ लोग पहले से नामजप करते होंगे । हममें से कुछ लोगों को नामजप करने से कोई अनुभव भी हुआ होगा । नामजप साधना का एक महत्त्वपूर्ण चरण है ।

सत्संग ३ : साधना में होनेवाली चूकें

सामान्यरूप से साधनामार्ग में कार्यरत व्यक्तियों से ४ प्रकार की चूकें होती हैं – अपने मन से साधना करना, सांप्रदायिक साधना में फंस जाना, गुरु बनाना और स्वयं को साधक समझना ! इन चूकों के कारण अनेक वर्ष साधना करने का प्रयास करने पर भी अपेक्षित आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती ।

सत्संग २ : साधना के सिद्धांत एवं तत्त्व (भाग २)

साधना का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है, स्तर के अनुसार साधना ! स्तर अर्थात अधिकार ‘अधिकार शब्द को यहां व्यावहारिक दृष्टिकोण से नहीं, अपितु आध्यात्मिक अर्थ से हमें समझना है । संत तुकाराम महाराजजी ने कहा है, ‘जैसा अधिकार वैसा उपदेश’ ।

सत्‍संग १ : साधना के सिद्धांत एवं तत्त्व (भाग १)

साधना का महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है ‘जितने व्‍यक्‍ति, उतनी प्रकृतियां और उतने साधनामार्ग !’ ज्ञानयोग, कर्मयोग, ध्‍यानयोग, भक्‍तियोग जैसे साधना के अनेक मार्ग हैं । प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति की प्रकृति के अनुसार उसके मोक्षप्राप्‍ति के मार्ग भी अलग होते हैं ।

प्रवचन ३

नामजप और साधना केवल आध्‍यात्मिक उन्‍नति और मनःशांति के लिए ही नहीं की जाती, अपितु साधना का हमारे व्‍यावहारिक जीवन पर भी अच्‍छा परिणाम होता है । साधना करने से व्‍यक्‍तित्‍व आदर्श बनने में सहायता होती है ।

मा.गो. वैद्य के निधन से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचारों की हानि ! 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चिंतक माधव गोविंद उपाख्य बाबूराव वैद्य के निधन से ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के विचारों की हानि हुई है ।

आपातकाल की तैयारी स्‍वरूप वर्षा ऋतु में प्राकृतिक रूप से उगी हुई औषधीय वनस्‍पतियां संग्रहित करें ! (भाग २)

लेख के इस भाग में हम गरखा और छकुंड (चक्रमर्द) इन २ वनस्‍पतियों की जानकारी समझते हैं ।

आपातकाल की तैयारी स्‍वरूप वर्षा ऋतु में प्राकृतिक रूप से उगी हुई औषधीय वनस्‍पतियां संग्रहित करें ! (भाग १)

भावी भीषण विश्‍वयुद्ध के काल में डॉक्‍टर, वैद्य, बाजार में औषधियां आदि उपलब्‍ध नहीं होंगी । ऐसे समय हमें आयुर्वेद का ही आधार रहेगा । क्रमशः प्रकाशित होनेवाले लेख के इस भाग में ‘प्राकृतिक वनस्‍पतियों का संग्रह कैसे करना चाहिए’, इससे संबंधित जानकारी