भगवान कार्तिकेय के स्वरूपवाला तेजस्वी नक्षत्र : कृत्तिका !

भारतीय कालगणना में चैत्रादी मास के नाम खगोल शास्त्र पर आधारित है । कार्तिक मास में सूर्यास्त होने पर कृत्तिका नक्षत्र पूर्वक्षितिज पर उदय होता है; साथ ही कार्तिक मास में पूर्णिमा तिथि के समय चंद्र कृत्तिका नक्षत्र में होता है ।

सत्संग ७ : सत्संग का महत्व

सत्संग क्या होता है ?, सत् का संग होता है । सत् का अर्थ ईश्वर अथवा ब्रह्मतत्त्व और संग का अर्थ है सान्निध्य ! हमें प्रत्यक्षरूप से ईश्वर का सान्निध्य मिलना असंभव है; इसलिए संत, जिन्हें ईश्वर का सगुण रूप कहा जाता है; उनका सान्निध्य सर्वश्रेष्ठ सत्संग होता है ।

वर्ष २०२१ में आनेवाले गुरुपुष्यामृत योग की विशेषताएं !

गुरुवार को पुष्य नक्षत्र आने से ‘गुरुपुष्यामृत योग’ होता है । इस दिन ‘सुवर्ण खरीदना और शुभकार्य करना’, ऐसा करने की प्रथा है । सर्व लौकिक अथवा व्यवहारिक कार्य के लिए यह योग शुभ माना जाता है । यह योग एक वर्ष में लगभग ३ अथवा ४ बार आता है ।

सत्संग ६ : नामजप में संख्यात्मक एवं गुणात्मक वृद्धि करने हेतु आवश्यक प्रयास

नामजप अथवा कोई भी सत्कर्म करते समय, महत्त्वपूर्ण पहलू है ईश्वर से प्रार्थना करना ! प्रार्थना करने के कारण हममें याचकवृत्ति उत्पन्न होकर हमारा अहंकार अल्प होने में सहायता मिलती है ।

सत्संग ५ : नामजप करने की पद्धतियां

कलियुग में नामस्मरण ही सर्वश्रेष्ठ साधना मानी गई है । नामजप करने की विविध पद्धतियां होती हैं जैसे लिखित नामजप, वैखरी नामजप । नामजप की वैखरी वाणी के साथ मध्यमा, पश्यंती और परा ये वाणियां भी हैं ।

सनातन संस्‍था और हिन्‍दू जनजागृति समिति की ओर से नगरविकास मंत्री एकनाथ शिंदे को ‘सनातन पंचांग २०२१’ भेंट

राज्य के नगरविकास मंत्री और ठाणे जिले के पालक मंत्री, साथ ही शिवसेना के नेता एकनाथ शिंदे को सनातन संस्था और हिन्दू जनजागृति समिति की ओर से ‘सनातन पंचांग २०२१’ भेंटस्वरूप दिए गए ।

सत्संग ४ : नामजप से मिलनेवाले लाभ 

कलियुग में नामस्मरण ही सर्वश्रेष्ठ साधना मानी गई है । हममें से अनेक जिज्ञासुओं ने नामजप करना आरंभ किया होगा अथवा कुछ लोग पहले से नामजप करते होंगे । हममें से कुछ लोगों को नामजप करने से कोई अनुभव भी हुआ होगा । नामजप साधना का एक महत्त्वपूर्ण चरण है ।

सत्संग ३ : साधना में होनेवाली चूकें

सामान्यरूप से साधनामार्ग में कार्यरत व्यक्तियों से ४ प्रकार की चूकें होती हैं – अपने मन से साधना करना, सांप्रदायिक साधना में फंस जाना, गुरु बनाना और स्वयं को साधक समझना ! इन चूकों के कारण अनेक वर्ष साधना करने का प्रयास करने पर भी अपेक्षित आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती ।

सत्संग २ : साधना के सिद्धांत एवं तत्त्व (भाग २)

साधना का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है, स्तर के अनुसार साधना ! स्तर अर्थात अधिकार ‘अधिकार शब्द को यहां व्यावहारिक दृष्टिकोण से नहीं, अपितु आध्यात्मिक अर्थ से हमें समझना है । संत तुकाराम महाराजजी ने कहा है, ‘जैसा अधिकार वैसा उपदेश’ ।

सत्‍संग १ : साधना के सिद्धांत एवं तत्त्व (भाग १)

साधना का महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है ‘जितने व्‍यक्‍ति, उतनी प्रकृतियां और उतने साधनामार्ग !’ ज्ञानयोग, कर्मयोग, ध्‍यानयोग, भक्‍तियोग जैसे साधना के अनेक मार्ग हैं । प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति की प्रकृति के अनुसार उसके मोक्षप्राप्‍ति के मार्ग भी अलग होते हैं ।