नमस्‍कार कैसे करें ?

जब किसी देवता के दर्शन होते हैं या किसी ज्येष्ठ अथवा पूज्य व्यक्तित्व का साक्षात्कार होता है, तब हमारे हाथ सहज रूप से जुड़ जाते हैं। यह केवल एक सांस्कृतिक व्यवहार नहीं, अपितु हमारे चित्त पर अंकित एक सात्त्विक संस्कार होता है। ‘नमस्कार’— यह क्रिया केवल बाह्य विनम्रता नहीं, बल्कि हिंदू संस्कृति की आध्यात्मिक परंपरा का एक जीवंत प्रतीक है। यह क्रिया भक्तिभाव, प्रेम, आदर, आत्मसमर्पण और नम्रता जैसे दैवी गुणों की अभिव्यक्ति करती है और साधक को ईश्वरीय ऊर्जा से संपन्न करती है।

आज के समय में, जब पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा है, तब अनेक बार हस्तांदोलन (हैंडशेक) जैसी पाश्चात्य पद्धतियों को अपनाया जाता है। नमस्कार भी जब किया जाता है, तो केवल एक सामाजिक औपचारिकता के रूप में। किंतु जब किसी धार्मिक क्रिया में श्रद्धा और भावनात्मक समर्पण नहीं होता, तब उसका आध्यात्मिक लाभ अत्यंत सीमित होता है। धार्मिक क्रिया तभी फलदायी होती है, जब वह आध्यात्मशास्त्र के अनुसार, श्रद्धा सहित, आंतरिक भावनाओं से पूरित होकर की जाती है। केवल तब ही साधक उस कृती से पूर्ण आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकता है।

भगवान को हाथ जोडकर नमस्‍कार कैसे करें ?

भगवान को साष्‍टांग नमस्‍कार करना संभव न हो, तब हाथ जोडकर नमस्‍कार करें । इसे धीमी गति के साथ कुछ विशेष चरणों में करना होता है । हाथ जोडकर नमस्‍कार करने की कृति २ चित्रों की सहायता से बताई गई है । आप भी आज से ही बताए अनुसार नमस्‍कार करना प्रारंभ करें और उस माध्‍यम से ईश्‍वरीय चैतन्‍य प्राप्‍त करें !

कृति

अ. देवता को नमस्‍कार करते समय, सर्वप्रथम दोनों हथेलियों को छाती के सामने एक-दूसरे से जोडें ।
१. हाथों को जोडते समय उंगलियां ढीली रखें ।
२. हाथों की दो उंगलियों के मध्‍य अं‍तर न रख, उन्‍हें सटाए रखें ।
३. हाथों की उंगलियों को अंगूठे से दूर रखें ।
४. प्राथमिक स्‍तर के साधक एवं सामान्य व्‍यक्‍ति नमस्‍कार करते समय हथेलियां एक-दूसरे से सटाकर रखें । उनके मध्‍य रिक्‍त स्‍थान न छोडें । साधना प्रारंभ किए पांच-छः वर्ष होनेपर आगे के स्‍तर के साधकों को नमस्‍कार करते समय दोनों हथेलियों के मध्‍य रिक्‍त स्‍थान रखें ।

आ. हाथ जोडकर पीठ से आगे की ओर थोडा झुकें ।

इ. उसी समय सिर को कुछ झुकाकर भ्रूमध्‍य को (भौहों के मध्‍यभाग को) दोनों हाथों के अंगूठों से स्‍पर्श कर, अपने मन को देवता के चरणों में एकाग्र करने का प्रयास करें ।

ई. तदुपरांत हाथ सीधे नीचे न लाकर, जोडे हुए हाथों के अंगूठे छाती के मध्‍य भागपर कुछ समयतक टिकाकर रखें । तत्‍पश्‍चात नीचे लाएं ।

देवता को साष्‍टांग नमस्‍कार कैसे करें ?

उरसा शिरसादृष्‍ट्या मनसा वचसा तथा पद़्‍भ्‍यां कराभ्‍यां जानुभ्‍यां प्रणामोऽष्‍टांगमुच्‍यते ।

अर्थ : १. वक्षस्‍थल (छाती), २. सिर (मस्‍तक), ३. दृष्‍टि (नेत्रों से नमस्‍कार), ४. मन (मन से नमस्‍कार), ५. वाचा (‘मुख से’ नमस्‍कार कहना), ६. पैर, ७. हाथ एवं ८. जानु (घुटने), इन आठ अंगों से नमस्‍कार करना अर्थात साष्‍टांग नमस्‍कार ।
‘इस पद्धति से नमस्‍कार करने को ही ‘विधिवत नमस्‍कार’ कहते हैं । इसमें कायिक, वाचिक एवं मानसिक पद्धति से देवताओं की शरण जाकर, उनका आवाहन करते हैं ।

अ. दूसरी व्‍याख्‍या
षड‍रिपु, मन एवं बुद्धि, इन आठों अंगों से ईश्‍वर की शरण में जाना अर्थात साष्‍टांग नमस्‍कार । षड्‍रिपु सूक्ष्ममन से संबंधित हैं । उपरोक्‍त व्‍याख्‍या में मन एवं बुद्धि के ये दोनों घटक, क्रमशः स्‍थूल मन तथा स्‍थूल बुद्धि के लिए प्रयुक्‍त हैं ।’ – (श्रीचित्‌शक्‍ति) श्रीमती अंजली मुकुल गाडगीळजी, ८.७.२००५, दोपहर १.३४

(चित्त पर अंकित जन्‍म-जन्‍मांतर के संस्‍कारों को षड्‍रिपु कहते हैं । संस्‍कारों का संबं‍‍ध चित्त से अर्थात अंतर्मन से होता है एवं बाह्यमन की अपेक्षा अं‍तर्मन सूक्ष्म है । इसलिए यहां उल्‍लेख किया गया है कि षड्‍रिपु सूक्ष्ममन से संबंधित होते हैं । सामान्‍यतः जिसे हम विचार करनेवाला मन (बाह्यमन) तथा विचार करनेवाली बुद्धि कहते हैं, उन्हीं को यहां क्रमशः स्‍थूलमन एवं स्‍थूलबुद्धि संबोधित किया गया है । – संकलनकर्ता)

आ. योग्‍य कृति
१. साष्‍टांग नमस्‍कार करते समय प्रथम दोनों हाथ जोडकर अनाहतचक्र (छाती) पर रखें तथा कटि से (कमर से) झुकें । तत्‍पश्‍चात पूर्ण झुककर दोनों हाथ भूमिपर टिकाएं ।
२. पहले दायां, तत्‍पश्‍चात बायां पैर पीछे की ओर सीधे तानकर लं‍बा करें ।
३. इस प्रकार लेटें कि हाथ की कोहनी मोडकर सिर, छाती, हथेलियां, घुटने तथा पैरों की उंगलियां भूमि पर टिकी हों तथा नेत्र बंद हों ।
४. मन से नमस्‍कार करते हुए मुख से ‘नमस्‍कार’ शब्‍द का उच्‍चारण करें ।
५. अब खडे होकर दोनों हाथ जोडकर छाती पर रखें एवं भावपूर्वक नमस्‍कार करें ।

इ. साष्‍टांग नमस्‍कार करते समय कंधों से लेकर उंगलियों तक संपूर्ण हाथ भूमि पर टिकाना अनुचित : बहुत से लोग साष्‍टांग नमस्‍कार करते समय कंधों से लेकर उंगलियों तक संपूर्ण हाथ भूमि पर टेक देते हैं । इस पद्धति में जननेंद्रिय का भूमि को स्‍पर्श होता है । धर्मशास्‍त्र के अनुसार जननेंद्रिय का भूमि से स्‍पर्श होना उचित नहीं है । इस कारण इसप्रकार किया हुआ नमस्‍कार अनुचित होता है ।

देवालय में देवता को नमस्‍कार करना

यथासंभव पुरुष देवता को साष्‍टांग नमस्‍कार करें;जबकि स्‍त्रियां देवता को साष्‍टांग नमस्‍कार न करें ।

अ. मंदिर में प्रवेश करते समय सीढियों को नमस्‍कार करें

अ १. कृति : मंदिर अथवा गर्भगृह की प्रथम सीढी को दोनों हाथ लगाकर तदुपरांत हाथ मस्‍तक पर से फेरें । सीढी को एक हाथ से नमस्‍कार न करें ।

अ २. शास्‍त्र : मंदिर के प्रांगण में देवताओं की तरंगों के संचार के कारण सात्त्विकता अधिक होती है । परिसर में फैले चैतन्‍य से सीढियों को भी देवत्‍व प्राप्‍त होता है; इसलिए सीढी को दोनों हाथ लगाकर, हाथों को सिरपर फेरने की प्रथा है । इससे ध्‍यान में आता है कि ‘सीढियों की धूल भी चैतन्‍यमय होती है; हमें उसका भी सम्‍मान करना चाहिए एवं धूल में विद्यमान चैतन्‍य का भी लाभ लेना चाहिए ।’ नमस्‍कार करते समय यदि ऐसा भाव रहे कि ‘सीढी में समाहित देवता का चैतन्‍य हाथ से सं‍पूर्ण शरीर में प्रवेश कर रहा है’, तो इससे जीव को अधिक लाभ मिलता है; परंतु इस समय जीव में अहं भी अल्‍प हो, तो नमस्‍कार से सर्वाधिक फल मिलता है । ‘स्‍व’को त्‍याग कर की गई कोई भी कृति अकर्म कर्म हो जाती है ।

अ ३. कुछ कारण से सीढी को हाथ लगाकर नमस्‍कार न कर सकें, तो क्‍या करना चाहिए ? : यदि किसी व्यक्ति के लिए वृद्धावस्था अथवा बीमारीवश सीढी को हाथ लगाकर नमस्‍कार करना संभव न हो, तो उसेे देवता से क्षमा मांगकर सीढियां भावपूर्ण चढनी चाहिए । इससे भी उसे चैतन्‍य का लाभ होगा ।’ – (श्रीचित्‌शक्‍ति) श्रीमती अंजली गाडगीळजी, ८.७.२००५, दोपहर ३.१५

अ ४. शिवालय में नं‍दी के पास तथा अन्‍य मंदिरों में कछुए की प्रतिकृति के पास खडे होकर देवता को नमस्‍कार क्‍यों करना चाहिए ? : शिवालय में नंदी के पास तथा अन्‍य मंदिरों में कछुए की प्रतिकृति के पास खडे होकर देवता को नमस्‍कार करने पर देवता से प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगों से हमें पीडा नहीं होती एवं आवश्‍यकतानुसार हम उन्‍हें ग्रहण कर पाते हैं ।

नमस्कारकी विविध पद्धतियोंको अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे उचित कैसे करना चाहिए, इसके साथ ही त्योहार एवं उत्सवके गूढार्थ एवं शास्त्रका बोध इसकी जानकारी के लिए….

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संतों को नमस्‍कार करना

संतों के चरणों पर मस्‍तक रखकर नमस्‍कार करना

अ. पुरुषों द्वारा संतों को नमस्‍कार :संतों को नमस्‍कार करते समय पुरुष साष्‍टांग नमस्‍कार करें । यह भगवान को साष्‍टांग नमस्‍कार करने की कृति समान ही है । स्‍त्रियां संतों को साष्‍टांग नमस्‍कार न करें ।

आ. पुरुष एवं स्‍त्री द्वारा संतों के चरणों पर मस्‍तक रखकर नमस्‍कार करना : यदि साष्‍टांग नमस्‍कार करना संभव न हो, तो पुरुष एवं स्‍त्री निम्‍नांकित पद्धति से नमस्‍कार कर सकते हैं ।

आ १. चरणों पर मस्‍तक का कौन-सा भाग रखें : हम ब्रह्मरं‍ध्र से सर्वाधिक चैतन्‍य ग्रहण कर सकते हैं । संतों के चरणों पर ब्रह्मरंध्र नहीं टिका सकते; इसलिए जहां माथे का भाग समाप्‍त होकर सिर का भाग आरंभ होता है, उस भाग को संतों के चरणों पर रखें । इसके फलस्‍वरूप संत-चरणों से प्रक्षेपित चैतन्‍य अधिकाधिक ग्रहण करना संभव होता है ।

आ २. चरणों पर मस्‍तक रखने का उचित स्‍थान : संतों के चरणों के अंगूठों से सर्वाधिक चैतन्‍य प्रक्षेपित होता है; अतः मस्‍तक को चरणों के मध्‍यभाग में न रख, अंगूठे पर रखना चाहिए । संत के दोनों अंगूठे सम्‍मुख हों, तो दाहिने चरण के अंगूठे पर मस्‍तक रखें ।

आ ३ चरणों पर मस्‍तक रखते समय हाथों की स्‍थिति : हथेलियां संत के चरणों पर रखें ।

(पुरुष एवं स्‍त्री को ब्रह्मचारी, संन्‍यासी एवं अनुष्‍ठान कर रहे संतों को नमस्‍कार करते समय उन्‍हें स्‍पर्श नहीं करना चाहिए ।’ – संकलनकर्ता)

वयोवृद्धों (बडे-बूढों) को सदैव नमस्‍कार क्‍यों करना चाहिए ?

ऊर्ध्‍वं प्राणा ह्युत्‍क्रामन्‍ति यूनः स्‍थविर आयति ।
प्रत्‍युत्‍थानाभिवादाभ्‍यां पुनस्‍तान्‍प्रतिपद्यते ॥
– मनुस्‍मृति २.१२०; महाभारत, उद्योग. ३८.१, अनु. १०४, ६४-६५.

अर्थ : वृद्ध पुरुष के आगमन पर, युवा व्‍यक्‍ति के प्राणों का गमन ऊर्ध्‍व दिशा में होने लगता है और उठकर नमस्‍कार करने पर, उसके प्राण पूर्वस्‍थिति में आ जाते हैं ।

अ. विदेश जाते समय एवं स्‍वदेश आगमन के उपरांत घर के वयोवृद्धों को नमस्‍कार क्‍यों करना चाहिए ?
घर के बडे-बूढों को नमस्‍कार करने का अर्थ है, एक प्रकार से उनमें विद्यमान देवत्‍व की शरण जाना । जब कोई जीव झुककर लीनभाव से ज्‍येष्‍ठ व्‍यक्‍ति के देवत्‍व की शरण जाता है, तब उसकी देह में करुणरस की (भाव के नवरसों में से एक) निर्मिति होती है । यह करुणरस उसकी सूक्ष्मदेह तक रिसता है और उसकी मनःशक्‍ति कार्यरत होकर, मणिपुरचक्र में स्‍थित पंचप्राणों को कार्यरत करता है । पंचप्राणों के शारीरिक वहन के कारण जीव की आत्‍मशक्‍ति जागृत होती है । आत्‍मशक्‍ति के बलपर सुषुम्‍नानाडी कार्यरत होती है जो जीव की व्‍यक्‍त-भावऊर्जा का रूपांतर अव्‍यक्‍त भावऊर्जा में करती है । अव्‍यक्‍त भावऊर्जा के बल पर, ज्‍येष्‍ठ व्‍यक्‍तियों के माध्‍यम से, जीव को आवश्‍यक देवता का तत्त्व ब्रह्माण्‍ड से मिलता है ।

इसीलिए घर से निकलते समय व्यक्ति को घर में अपने से बडे-बूढों को नमस्‍कार कर, उनसे प्राप्‍त सात्त्विक तरंगों के बल पर वायुमंडल के पीडादायक स्‍पंदनों से अपनी रक्षा करनी चाहिए । लौटने पर भी तुरंत बडों को नमस्‍कार कर, उनमें विद्यमान देवत्‍व को प्रकट कर, अपने साथ बाहर से आए रज-तम कणों के वायुमंडल का विघटन करना चाहिए – (श्रीचित्‌शक्‍ति) श्रीमती अंजली मुकुल गाडगीळजी, २०.५.२००५, दोपहर २.५७

विवाहोपरांत पति एवं पत्नी को एक साथ नमस्‍कार क्‍यों करना चाहिए ?

शिवरूपी पति एवं शक्‍तिरूपी पत्नी के तत्त्वों का संगम है विवाह ! शिवरूपी सगुण क्रियाशक्‍ति (प्रत्‍यक्ष कार्य) एवं उसे गति प्रदान करनेवाली तथा अधिकाधिक निर्गुण संंबंधी शक्‍ति, इन दोनों के योग से प्रत्‍येक कर्म पूर्ण होता है । विवाहोपरांत दोनों जीव गृहस्‍थाश्रम में प्रवेश करते हैं । गृहस्‍थाश्रम में एक-दूसरे के लिए पूरक बनकर संसारसागर-संबंधी कर्म करना एवं उनकी पूर्ति हेतु एक साथ घर के बडे-बूढों का आशीर्वाद प्राप्‍त करना महत्त्वपूर्ण है ।

इसप्रकार नमस्‍कार करने से ब्रह्माण्‍ड की शिव-शक्‍तिरूपी तरंगें कार्यरत होती हैं तथा जीवों में लीनभाव का संवर्धन होता है । गृहस्‍थाश्रम में परिपूर्ण कर्म होकर, उनसे उचित फलप्राप्‍ति होती है । जिससे लेन-देन के निर्माण होने की संभावना कम से कम हो जाती है । इसलिए विवाहोपरांत दोनों को प्रत्‍येक कर्म के लिए पूरक बनकर, नमस्‍कार जैसी कृति द्वारा भी एक-दूसरे को अनुमोदन देना ही इसका उद्देश्‍य है ।

पति व पत्नी का आध्‍यात्‍मिक स्‍तर अथवा ईश्‍वर के प्रति उनका भाव ५० प्रतिशत से अधिक हो, तब वे भले ही एकत्रित नमस्‍कार करें, अकेले नमस्‍कार करें अथवा मानस नमस्‍कार करें, इन तीनों प्रकार से समान फलप्राप्‍ति होती है । प्रत्‍यक्ष कर्म की अपेक्षा, ईश्‍वर के प्रति भाव का महत्त्व अनन्‍य है ।

(‘पति-पत्नी में से यदि कोई एक ही उपस्‍थित हो, तो अकेले ही नमस्‍कार करना चाहिए ।’ – संकलनकर्ता)

नमस्कार करने के लाभ

‘नमस्‍कार करने का प्रमुख उद्देश्‍य यह है कि जिसे हम नमस्‍कार करते हैं, उससे हम आध्‍यात्मिक एवं व्‍यावहारिक लाभ प्राप्‍त कर सकें ।

अ. व्‍यावहारिक लाभ :देवता अथवा संतों को नमस्‍कार करने से अनजाने में ही उनके गुणों और उनके चरित्र का आदर्श हमारे सम्मुख आ जाता है । उसके अनुसार हम भी स्‍वयं में सुधार करने लगते हैं ।

आ. आध्‍यात्मिक लाभ :
१. नम्रता बढना तथा अहं न्‍यून होना : नमस्‍कार करते समय ऐेसे विचार होते हैं ‘आप श्रेष्‍ठ हैं तथा मैं कनिष्‍ठ हूं; अज्ञानी हूं, आप सर्वज्ञ हैं’, इत्यादि । इससे हममें नम्रता बढने लगती है और अहं कम होने में सहायता होती है ।

२. शरणागति एवं कृतज्ञता का भाव बढना : नमस्‍कार करते समय ‘मुझे कुछ भी नहीं आता, आप ही सबकुछ करें, मुझे आपके श्रीचरणों में स्‍थान दें’, ऐसा विचार होनेपर शरणागति एवं कृतज्ञता का भाव वृद्धिंगत होने में सहायता मिलती है ।

३. सात्त्विकता मिलना एवं आध्‍यात्मिक उन्‍नति शीघ्र होना
अ. नमस्‍कार की मुद्रा से हमें सात्त्विकता अधिक मात्रा में मिलती है ।
आ. देवता अथवा संतों को नमस्‍कार करने से उनसे प्रक्षेपित सूक्ष्म तरंगें, उदा. सत्त्व तरंगें अथवा आनंद तरंगें हमें मिलती हैं ।
इ. देवता अथवा संतों को नमस्‍कार करने से हमें उनके आशीर्वाद भी मिलते हैं । इससे हमारी आध्‍यात्मिक उन्‍नति शीघ्र होती है ।
– कु. मधुरा भिकाजी भोसले, २.१२.२००४, सायं. ७.१५

नमस्कार संबंधी कुछ महत्त्वपूर्ण बातें !

दोनों हाथ जोडकर नतमस्‍तक होना अर्थात ईश्‍वर अथवा सामने उपस्‍थित व्‍यक्‍ति में विद्यमान देवत्‍व को प्रणाम करना । अपने में ही अंतर्यामी ईश्‍वर के दर्शन हों, इसलिए ईश्‍वर अथवा आदरणीय व्‍यक्‍ति को वंदन करते समय नेत्र बंद रखें

– कु. मधुरा भोसले, २.१२.२००४, सायं. ७.२८

सोपानत्‍कश्‍चाशनासनशयनाभिवादननमस्‍कारन् वर्जयत् ।

– गौतमस्‍मृति ९

अर्थ : बैठते समय, भोजन करते समय, सोते समय, गुरुजनोंका अभिवादन करते समय एवं (अन्‍य श्रेष्‍ठ व्‍यक्‍तियोंको) नमस्‍कार करते समय, पादत्राण (जूते-चप्‍पल) नहीं पहनने चाहिए ।

जन्‍मप्रभृति यत्‍किञ्‍चित्‍सुकृतं समुपार्जितम् ।

तत्‍सर्वं निष्‍फलं याति एकहस्‍ताभिवादनात् ॥

– व्‍याघ्रपादस्‍मृति ३६७

अर्थ : जो एक हाथ से नमस्‍कार करता है, उसके जीवनभर का पुण्‍य निष्‍फल हो जाता है ।

 

१. नमस्‍कार करते समय हाथ में कोई वस्‍तु होने पर उंगलियां एवं उंगलियों के सिरे सीधे न होकर, मुड जाते हैं । इसलिए सामने से प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगें मुडी हुई उंगलियों से एवं उंगलियों के सिरों से प्रवेश नहीं कर पातीं ।

२. सामने से प्रक्षेपित सत्त्व-तरंगें हाथ में पकडी हुई वस्‍तु से टकराकर लौट जाती हैं । कभी-कभी वह वस्‍तु भी अपने में सत्त्व-तरंगों को खींच लेती है ।

३. हाथ में पकडी वस्‍तु यदि राजसिक अथवा तामसिक हो, तो नमस्‍कार करते समय वस्‍तु को माथे अथवा छाती से लगाने पर, उससे प्रक्षेपित रज-तम तरंगें नमस्‍कार करनेवाले के शरीर में प्रवेश करती हैं ।

– (श्रीचित्‌शक्‍ति) श्रीमती अंजली मुकुल गाडगीळजी, ३.१२.२००४, दोपहर १.३२

न सोपानद्वेष्‍टितशिरा अवहितपाणिर्वाभिवादयीत ।

– आपस्‍तम्‍ब धर्मसूत्र १/४/१४/१९

अर्थ : पादत्राण पहनकर, सिर ढककर अथवा हाथ में कोई वस्‍तु लेकर नमस्‍कार नहीं करना चाहिए । (स्‍त्रियों को आंचल से सिर ढककर ही नमस्‍कार करना चाहिए ।)

– (श्रीचित्‌शक्‍ति) श्रीमती अंजली मुकुल गाडगीळजी, २८.५.२००५

परिक्रमा, नमस्‍कार, पूजा, हवन एवं जप करते समय तथा गुरु एवं देवता के दर्शन के समय गले में वस्‍त्र नहीं लपेटना चाहिए । गले में वस्‍त्र लपेटने से व्‍यक्‍ति का विशुद्धचक्र जागृत नहीं होता; जिससे व्‍यक्‍ति को सात्त्विकता का लाभ अल्‍प मिलता है ।

१. हस्तांदोलन करते समय हाथ के माध्‍यम से दूसरे में रोग के कीटाणु संक्रमित हो सकते हैं । कुछ व्‍यक्‍ति खाने के उपरांत अथवा बाहर से आने के पश्‍चात हाथ नहीं धोते । ऐसी स्‍थिति में हस्‍तां‍दोलन स्‍वास्‍थ्‍यके लिए हानिकारक हो सकता है ।

२. ‘ हस्तांदोलन करना अर्थात स्‍वयं में लीनता का लय कर, तामसिक वृत्ति का संवर्धन करना । जब दो जीव हस्तांदोलन करते हैं, तब उनके हाथों से प्रक्षेपित रज-तमात्‍मक तरंगें दोनों हथेलियों की अंजुलि में संपुटित (एकत्र) हो जाती हैं । इस प्रक्रिया से उत्‍पन्‍न घर्षणात्‍मक ऊर्जा हाथ से जीवों की देह में प्रक्षेपित होती है । इस ऊर्जा से उडनेवाले कणों के माध्‍यम से जीव का बाह्य वायुमंडल तामसिक बन जाता है; परिणामस्‍वरूप वातावरण भी अशुद्ध बन जाता है । शरीर में इन रज-तमात्‍मक तरंगों के वहन के कारण सूर्यनाडी कार्यरत होती है तथा तमकणों का वेगपूर्ण वहन आरंभ होता है । इसका परिणाम मनोमय कोष पर होता है । इस कोष में तमकणों की प्रबलता बढती है तथा जीव चिडचिडा होने लगता है ।

इसलिए हस्तांदोलन जैसी तामसिक कृति न कर, जीव में सात्त्विकता का संवर्धन कर, जीव को लीनभाव सिखानेवाले नमस्‍कार जैसी कृति को आचरण में लाएं । इससे जीव को विशिष्‍ट कर्म हेतु ईश्‍वर का चैतन्‍यमय बल मिलता है । साथ ही उसे ईश्‍वर की आशीर्वादरूपी संकल्‍पशक्‍ति प्राप्‍त होने में सहायता मिलती है । उसकी कृति साधना बनकर अल्‍पावधिमें पूर्णत्‍व को प्राप्‍त होती है ।’

– (श्रीचित्‌शक्‍ति) श्रीमती अंजली मुकुल गाडगीळजी, २८.५.२००५

३. हस्तांदोलन करना पश्‍चिमी संस्‍कृति है । हस्तांदोलन करना अर्थात पश्‍चिमी संस्‍कृति का समर्थन और नमस्‍कार अर्थात भारतीय संस्‍कृति का समर्थन ! स्‍वयं भारतीय संस्‍कृति का समर्थन कर, भारतीयों को यह सीख भावी पीढी को भी देनी चाहिए ।

नमस्कार संबंधी वीडियो देखें

संदर्भ ग्रंथ

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