सच्चा ब्राह्मण !
‘जिसमें ईश्वरप्राप्ति की उत्कंठा है, वही सच्चा ब्राह्मण है !’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
‘जिसमें ईश्वरप्राप्ति की उत्कंठा है, वही सच्चा ब्राह्मण है !’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
‘कहां पती के साथ थोडा विवाद होने पर विवाह विच्छेद करनेवाली वर्तमान पत्नियां, तो कहां पती के निधन के उपरांत उसके साथ एकरूप होने के कारण जोहार करनेवाली, अर्थात देह अग्नि में समर्पण करनेवाली पद्मावती रानी एवं उसके साथ की १६ सहस्र राजपूत स्त्रियां !’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
‘साधना करनेवाले ‘आगामी जन्म न मिले ; साधना कर इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त हो जाए’, ऐसी इच्छा रखते हैं । इसके विपरीत राष्ट्रप्रेमी एवं धर्मप्रेमी लोगों को लगता है, ‘धर्मकार्य करने हेतु पुनः-पुनः जन्म मिले ।’ यदि इसे स्वेच्छा कहेंगे, तो ‘अगला जन्म न मिले’, यह भी तो स्वेच्छा ही है !’ – सच्चिदानंद … Read more
१. प्रथम स्तर ‘ध्येय मेें से जो कुछ थोडा-बहुत भी साध्य हुआ हो, उस संदर्भ में संतोष रखें तथा गुरु एवं ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें । २. दूसरा स्तर विफलता के पीछे के कारणों को ढूंढना चाहिए । शारीरिक, मानसिक अथवा आध्यात्मिक में से वास्तविक कारण क्या है, इसका चिंतन करें । उन … Read more
‘साधना करने पर कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है । अभी तक के युगों में लाखों साधकों ने यह अनुभव किया है; परंतु साधना पर विश्वास न रखनेवाले बुद्धिप्रमाणवादी साधना किए बिना ही कहते हैं, ‘कुंडलिनी दिखाओ, नहीं तो वह है ही नहीं !’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
‘शरीर पहला वास्तु है। पहले उसकी शुद्धि का विचार करें, तदुपरांत बनाए हुए वास्तु (घर) का !’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
‘धनप्राप्ति, विवाह, रोग-व्याधि इत्यादि अनेक कारणों के लिए अनेक लोग उपाय पूछते हैं; परंतु ईश्वर प्राप्ति के लिए उपाय पूछने का कोई विचार भी नहीं करता !’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
‘किसी भी क्षेत्र में किसी को केवल उसके शैक्षिक प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी न देते हुए उसके व्यक्तिगत गुण देखकर भी चुनाव करना आवश्यक है !’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
‘संसार के अनेक विषयों में अनेक पदवियां हैं। ‘डॉक्टरेट’ जैसी अनेक उच्च स्तर की पदवियां हैं; परंतु उनसे भी सर्वश्रेष्ठ पदवी है, ‘सच्चे गुरु’ का ‘सच्चा शिष्य’ !’ – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
‘पूर्वकाल में समाज में निहित सात्त्विकता, सामंजस्य, प्रेमभाव इत्यादि गुणों के कारण समाजव्यवस्था भलीभांति बनी रहे, इसके लिए कुछ करना नहीं पडता था । आज समाज में वे घटक निर्माण होने हेतु धर्मशिक्षा ही नहीं दी जाती। इस कारण कानून की सहायता लेकर समाजव्यवस्था भलीभांति बनाए रखने के दयनीय प्रयास किए जाते हैं।’ – सच्चिदानंद … Read more