हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हेतु धर्मयुद्ध के कालानुसार आयुध तथा कालमाहात्म्यानुसार साधकों को होनेवाले कष्ट

१. वर्ष २०१३ तक : ‘सनातन संस्था द्वारा बताई गई साधना भक्तियोग के नामजप से आरंभ होती है । उसमें कर्मकांड में भक्तियोग की पूजा, धर्मग्रंथों का पठन, विधि, तिथिनुसार उपासना, यज्ञयाग, इत्यादि कुछ नहीं था । इतने वर्ष सूक्ष्म का महायुद्ध आरंभ था । इस युद्ध के आयुध थे नामजप, ध्यान, संतों के संकल्प, … Read more

भाजपा शासन को यह बात ध्यान में रखना आवश्यक है कि महाविद्यालय में रामायण, महाभारत तथा गीता पढाने के साथ ही छात्रों द्वारा साधना भी करवाना आवश्यक

‘१०.९.२०१५ को केंद्र के भाजपा शासन के सांस्कृतिक राज्यमंत्री महेश शर्मा ने यह वक्तव्य दिया कि, ‘‘महाविद्यालय में रामायण, महाभारत तथा गीता पढाएंगे !’’ किंतु उन्हें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि ये विषय केवल तात्त्विकदृष्टि से पढाने की अपेक्षा छात्रों द्वारा जिस प्रकार कसरत (व्यायाम) करवाते हैं, उसी प्रकार साधना भी करवाना आवश्यक … Read more

‘विज्ञान केवल स्थूल पंचज्ञानेंद्रियों के संदर्भ में ही संशोधन करता…

‘विज्ञान केवल स्थूल पंचज्ञानेंद्रियों के संदर्भ में ही संशोधन करता है, किंतु अध्यात्म केवल स्थूल एवं सूक्ष्म ही नहीं, अपितु सूक्ष्मतर एवं सूक्ष्मतम का भी विचार करता है !’ -(परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

‘राजनेता तथा आरक्षणकर्ता स्वार्थ सिखाते हैं, तो गुरु केवल स्वार्थत्याग…

‘राजनेता तथा आरक्षणकर्ता स्वार्थ सिखाते हैं, तो गुरु केवल स्वार्थत्याग ही नहीं, अपितु सर्वस्व का त्याग करना सिखाते हैं !’ -(परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

भक्तियोग में होनेवाली समष्टि साधना !

अत्यधिक लोगों को ऐसा प्रतीत होता है कि, भक्तियोग में केवल व्यष्टि साधना होती है । परंतु प्रत्यक्ष में वैसा नहीं है, अपितु भक्त की ओर अन्य लोग आकर्षित होते हैं एवं उनके मार्गदर्शनानुसार साधना करने लगते हैं । इसलिए उनकी समष्टि साधना भी होती है । – (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन काे कलियुग में प्राधान्य रहेगा !

स्वभावदोष एवं अहं का निर्मूलन करने पर किसी भी साधनामार्ग से साधना कर शीघ्र उन्नति करना संभव होता है । पूर्व के युग में स्वभावदोष एवं अहं का प्रमाण अधिक न होने से स्वभावदोष एवं अहं का निर्मूलन करने की आवश्यकता नहीं थी, वे अपने आप नष्ट होते थे । – (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत … Read more

संत जन्म-मृत्यु के फेरे से मुक्त करते हैं !

डॉक्टर केवल अस्वस्थता को न्यून करते हैं; परंतु मृत्यु को नहीं टाल सकते । इसके विपरीत संत जन्म-मृत्यु के फेरे से मुक्त करते हैं ! – (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

साधना के संदर्भ में मार्गदर्शन करने का अधिकार किस व्यक्ति को है ?

जिस व्यक्ति को साधना के दृष्टिकोण अच्छी तरह से परिचित है, जिसकी कुछ भी अपने पास रखने की अपेक्षा दूसरे को ज्ञान देने की निरपेक्ष वृत्ति है तथा मार्गदर्शक सूत्रों के अनुसार जो प्रथम स्वयं अच्छी तरह से साधना करता है, उस व्यक्ति को ही अन्य लोगों को साधना के संदर्भ में मार्गदर्शन करने का अधिकार है । अतएवं … Read more

संत सदैव आनंदी होते हैं !

अपने बच्चे का आगे क्या होगा ?, ऐसी चिंता उसके मां-बाप को होती है । इसके विपरीत राष्ट्र के सभी अपने बच्चे ही हैं, ऐसे व्यापक भाव के कारण संत सदैव आनंदी होते हैं । -(परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

बुद्धि से अध्ययन करने पर, उसकी गहराई समझ में नहीं आतीं

सागर को केवल देखने अथवा उसके विषय में बुद्धि से अध्ययन करने पर, उसकी गहराई एवं वहां की बातें समझ में नहीं आतीं । उसी प्रकार, स्थूल विषय का बुद्धि से अध्ययन करने पर, उसमें विद्यमान सूक्ष्म आध्यात्मिक जगत् समझ में नहीं आता । – (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले