महाराष्ट्र के नाथ स्थल (महाराष्ट्र : नवनाथों की भूमि)

श्री. मिलिंद सदाशिव चवंडके

महायोगी गुरु श्रीगोरक्षनाथ शोध पीठ एवं दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्‍वविद्यालय द्वारा २० से २२ मार्च २०२१ के बीच गोरखपुर में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में, नाथभूमि, अहमदनगर के वक्ता – पत्रकार एवं इतिहास शोधकर्ता श्री. मिलिंद चवंडके द्वारा  किया जानेवाला शोधनिबंध यहां दे रहे हैं ।

यह श्रीगुरुगोक्षनाथजी ही कृपा है कि आज हम सब महायोगी श्रीगुरुगोरक्षनाथजी के चिरंजीव वास्तव्य और आशीर्वाद से पावन हुई इस गोरखपुर की भूमि पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हेतु एकत्र हुए हैं । श्री रविशंकर सिंहजी ने मुझे राज्य स्तरीय समीक्षात्मक विषय ‘महाराष्ट्र के नाथ स्थल’ पर शोध पत्र देने के लिए आमंत्रित किया । इसके लिए मैं उनका ऋणी हूं ।

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नियोजित नवनारायण अर्थात नवनाथों की ख्याति आज भी विश्‍व में आस्था का विषय है । सामान्य भक्तों से लेकर विद्वानों तक सभी को नाथ के कार्य से आनंद मिलता है । हम सभी की उपस्थिति में संपन्न हो रहा यह सम्मेलन उसी का प्रतीक है। भारत के सभी प्रांतों में नवनाथों के चरण कमलों का स्पर्श हुआ है । इसीलिए सारे प्रांतवासियों को नवनाथ अपने लगते हैं । महाराष्ट्र के संदर्भ में, पहली शताब्दी ईस्वी से दसवीं शताब्दी ईस्वी तक नाथ-लीला प्रकट हुई । महाराष्ट्र में मठों, मंदिरों, अखाडों, आस्तानों, गद्दी स्थानों, तपस्थलों, समाधिस्थलों के दर्शन मात्र से नाथ चेतना के स्पंदन नाथपंथी अनुभव करते हैं । नाथ सम्प्रदाय में ज्ञान, धर्म, कर्म और भक्ति सभी आकर मिल जाते हैं । इसी आधार पर साधक सिद्ध बनता है । नाथ सम्प्रदाय की उत्पत्ति बंगाल, श्रीशैलम् या महाराष्ट्र में हुई, इसके बारे में विभिन्न मत व्यक्त किए जाते हैं ।

श्रीगुरुगोरक्षनाथजी के गुरु श्रीगुरुमच्छिन्द्रनाथजी मध्य प्रदेश से महाराष्ट्र के सतपुडा पर्वत पर आए । तब वहां भील राजा का शासन था । श्रीगुरुमछिन्द्रनाथजी की कृपा से इस निःसंतान राजा को एक पुत्र हुआ । उस आनंद में राजा ने यहां झील में श्रीगुरुमच्छिन्द्रनाथजी का मंदिर बनवाया । श्रीगुरुगोरक्षनाथजी भी इस झील पर आए । आज भी हर भक्त को यहां श्रीगुरुगोरक्षनाथजी के अस्तित्व का अनुभव होता है । श्रीगुरुमच्छिन्द्रनाथजी तोरणमल (आज का जिला नंदुरबार) आए, जो सतपुडा पर्वत का एक हिस्सा है । उनकी स्मृति में वहां श्रीमच्छिन्द्रनाथजी की गद्दी है । तोरणमल में झील के किनारे पर श्रीगुरुगोरक्षनाथजी का मंदिर है और गर्भगृह में पद्मासन में बैठे हुए श्रीगुरुगोरक्षनाथजी की मूर्ति है।

महाशिवरात्रि पर यहां यात्रा निकलती है । मंदिर के सामने, एक धूनी जलाई जाती है और सवा मन का एक रोट पकाया जाता है । यह प्रसाद के रूप में उपस्थित लोगों में वितरित किया जाता है । भक्तों का मानना है कि श्रीगुरुगोरक्षनाथजी यहां जीव-ब्रह्म-सेवा अभी भी कर रहे हैं । तोरणमल में श्रीगुरुमच्छिन्द्रनाथजी की गद्दी है । वहां के पुराने अभिलेखों में विक्रम संवत ९२९ (ईस्वी ८७२) से उस स्थान के बारे में जानकारी मिलती है ।

 

महायोगी गुरु गोरखनाथजी, गोरक्षनाथ मंदिर, गोरखपुर

तोरणमल के आसपास के क्षेत्र में पाई जानेवाली मूर्तियों को वन डाक बंगला और हॉलिडे कैंप में रखा गया है । माना जाता है कि यह ७ वीं – ८ वीं शताब्दी की है । तोरणमल के जंगलों में श्रीगुरुमच्छिन्द्रनाथजी और श्रीगुरुगोरक्षनाथजी की गुफाएं हैं । श्रीगुरुमच्छिन्द्रनाथजी की गुफा में लगभग २० फुट झुककर ही जाना पडता है । अंदर दो स्तंभों के पीछे मूर्ति हैं। गोरक्ष गुफा में एक शिवलिंग है । श्रीगुरुमच्छिंद्रनाथजी तोरणमल से खानदेश में जलगांव जिले के वढोदा गांव के उत्तर की ओर जंगल में आए । यहां की घनी झाडियों के बीच श्रीहनुमंतजी का जागृत स्थान श्रीगुरुमछिन्द्रनाथजी को पसंद आया, इसलिए वे लंबे समय तक यहां रहे । यहां के नवनाथ मंदिर में, मूर्ति के रूप में पत्थर हैं और इसके पीछे एक नाग की प्रतिकृति है । मंदिर के पास एक धूनी, एक त्रिशूल और चिमटा है । नवरात्रि यहां उत्साह के साथ मनाई जाती है । महाराष्ट्र में यह नवनाथ का पहला मंदिर है ।

सतपुडा पर्वत पर जोधनखेडे से ७-८ मील की दूरी पर देवदरी है । महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की वन सीमा पर स्थित, यह गुफा ‘श्रीगोरक्ष की गुफा’ के नाम से जानी जाती है । श्रीगुरुगोरक्षनाथजी मध्य प्रदेश से महाराष्ट्र आए थे, यह बतानेवाला पहला ऐतिहासिक संकेत यह गुफा है । गुफा की तलहटी पर एक ताजा पानी का झरना है, जिसमें गूलर के पेड हैं । भक्त इस स्थान पर अभी भी श्रीगुरुगोरक्षनाथजी का अस्तित्व अनुभव कर सकते हैं । गुफा की ऊपरी मंज़िल पर, श्रीगुरुगोरक्षनाथजी के खडाऊं, आकर्षक मछली के आकार के पत्थर पर उकेरे गए हैं । खडाऊं में उत्तर भारत की बनावट है । तीसरी मंजिल पर एक स्तंभ (पत्थर का खंड) है । पडोस में एक चिमटा भी है । गुफा से आगे कुछ दूरी पर श्रीगुरुगोरक्षनाथजी का मंदिर है । नासिक जिले के त्र्यंबकेश्‍वर में श्रीगुरुगोरक्षनाथजी का एक पुराना मठ है । मठ की स्थापना विक्रम संवत ९२३, वर्ष ८६६ ईस्वी में हुई है । इस मठ की स्थापना तब हुई होगी जब उत्तर भारत में कार्य पूर्ण होने पर महाराष्ट्र में कार्य आरंभ हुआ होगा । नासिक के कुंभ मेले में आए नाथपंथी साधू मच्छिन्द्र गढ पर अवश्य आते हैं । यह गढ सांगली जिले के वालवा तालुका में स्थित है । सांगली जिले में बत्तीस शिराले में श्रीगोरक्षनाथजी का मंदिर है और यहां नागपंचमी बडी धूमधाम से मनाई जाती है। इस त्योहार का मुख्य आकर्षण है जीवित नाग पूजा ।

यादव काल के दौरान अंबेजोगाई नाथपंथ का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था । शक १०६६ (ईस्वी ११४४) के आसपास, चांगा वटेश्‍वर और चांगा केशवदास नामक सिद्धपुरुष खानदेश में वरणगांव के पास पयोष्णे के तट पर थे । अहमदनगर जिले में, गर्भगिरी पर्वत के आसपास के क्षेत्र में, अनेक नाथपंथी पवित्र स्थान हैं । अहमदनगर शहर से २४ कि.मी. दूर डोंगरगण में एक ‘श्रीगोरक्ष पहाडी’ है । यहां के प्राचीन मंदिर को गोरखपुर मठ की मदद से पुनर्निर्मित किया गया है । मंदिर में श्रीगुरुगोरक्षनाथजी की एक सुंदर खडी मूर्ति है । संगमनेर तालुका के मीरपुर-लोहारे में, श्रीकानिफनाथजी के एक बाल शिष्य आवजीनाथ की संजीवनी समाधि है । विश्‍वप्रसिद्ध गांव शिरडी में श्रीकानिफनाथजी कुछ समय तक रहे, जो कि यहां से कुछ ही दूरी पर है । किंवदंती है कि श्रीसाईनाथ ने स्वयं श्री कानिफनाथजी की सेवा की थी । श्रीसाईबाबा को भक्त ‘श्रीसाईनाथ’ कहते हैं । क्योंकि श्रीसाईबाबा के पास हमेशा झोली, खपरी, चिमटा, उदी, धूनी, प्रसाद होते हैं, जो नाथपंथ के विशेष प्रतीक हैं ।

नगर-शिरडी मार्ग पर गुहा गांव में श्रीकानिफनाथजी का मंदिर भी है । शिरडी के पास राहाता गांव में श्रीगुरुमच्छिन्द्रनाथजी और कानिफनाथजी के मंदिर हैं । संगमनेर गांव में भी श्रीकानिफनाथजी का मंदिर है । नगर-सोलापुर राजमार्ग के पास तांदली-वडगांव श्रीगुरुगोरक्षनाथजी के शिष्य धर्मनाथ के वास्तव्य से पावन हुआ । यहां श्री धर्मनाथजी का प्राचीन मंदिर है ।

महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश की सीमा पर ‘बासर’ नामक एक गांव में, देवी सरस्वती के मंदिर में कवि धुंडिसुत नरहरि मालू अपनी दैनिक साधना कर रहे थे । ‘गोरक्ष किमयागार’ ग्रंथ के आधार पर उन्होंने ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा, शक १७४१, ईस्वी सन १८१९-२० के दरम्यान प्रासादिक ग्रंथ ‘श्रीनाथनाथ भक्तिसार’ का लेखन पूरा किया । यह ग्रंथ महाराष्ट्र में व्यापक रूप में पाया जाता है । इस ग्रंथ के अंत में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि नवनाथों के अवतार कार्य का समापन नगर जिले के ‘वृद्धेश्‍वर’ नामक स्थल पर संपन्न हुआ था । यहां भगवान शंकर एक बूढे व्यक्ति के रूप में आए । तब से ‘वृद्धेश्‍वर’ स्थल भगवान शिव के भक्तों के लिए एक महान पूजास्थल बन गया। यहां से केवल ९ कि.मी. की दूरी पर श्री क्षेत्र मढी स्थित है । यहां श्रीकानिफनाथजी ने दसवीं शताब्दी में चैत्र कृष्ण पंचमी को संजीवनी समाधि ली। श्रीकानिफनाथजी अपने ७०० शिष्यों के साथ यहां रहते थे । महारानी येसूबाई ने बादशाह औरंगजेब की कैद से छत्रपति शाहू महाराज को मुक्त करने के लिए श्रीकानिफनाथजी की समाधि के सामने एक व्रत लिया था । जैसे ही राजाओं को रिहा किया गया, श्रीकानिफनाथजी मंदिर का निर्माण सरदार पिलाजी गायकवाड और कार्यवाहक चिमाजी सावंत के माध्यम से आरंभ कर वचन पूर्ति की गई । छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना के आरमार प्रमुख कान्होजी आंग्रे के पिता ने वंश की प्राप्ति के लिए मन्नत मांगी थी । उन्होंने इसकी याद में बच्चे का नाम ‘कान्होजी’ रखा था । श्री क्षेत्र मढी से केवल ५ कि.मी. की दूरी पर श्रीगुरुमच्छिन्द्रनाथजी का ‘मायंबा’ नामक संजीवनी समाधि स्थान है । गर्भगिरी पर्वत पर, नगर – बीड जिले की सीमा पर यह स्थल है । उन्होंने माघ अमावस्या पर समाधि ली । इस दिन, लाखों भक्तों की उपस्थिति में छबीना समारोह आयोजित किया जाता है । समाधि के पीछे साधनागृह में एक धूनीकुंड है। त्रिशूल, चिमटा, सतका (छडी) और शंख भी यहां देखे जाते हैं । चैत्र अमावस्या पर समाधि की महापूजा होती है । उस समय बडा मेला लगता है । श्रीगुरुजालिंदरनाथजी की संजीवनी समाधि, बाला घाट पर्वत श्रृंखला में श्रीक्षेत्र येवलवाडी में स्थित है, जो कि बीड जिले के पाटोदा तालुका में रायमोहा गांव के दक्षिण में ५ से ६ कि.मी. की दूरी पर है । ऋषि पंचमी पर यहां गुरु-शिष्य मिलन समारोह आयोजित किया जाता है । इस समय, श्रीकानिफनाथजी की पालकी श्रीक्षेत्र मी से श्रीगुरुजालिंदरनाथजी के दर्शन के लिए आती है । श्रीगुरुजालिंदरनाथजी के समाधि स्थल से १५ कि.मी. दूर चिंचोली गांव में श्रीगुरुगोरक्षनाथजी के शिष्य, श्रीगहिनीनाथजी की संजीवनी समाधि है ।

भर्तृहरिनाथ की संजीवनी समाधि, श्रीक्षेत्र हरंगुल गांव में, १२ ज्योतिर्लिंगों में से परली वैजनाथ शिव क्षेत्र से २५ कि.मी. की दूरी पर स्थित है । परली-गंगाखेड राजमार्ग पर वडगांव मोड पर उतरकर भी यहां पहुंचा जा सकता है । शेगांव के पास डव्हा में एक प्राचीन नाथपंथी शिव मंदिर है । यहां नंदी के पास संकल्प का गोटा (पत्थर), महंत का ओटा (चबूतरा) और धूनी है । मंदिर के सभामंडप की हेमाडपंथी शैली को देखकर लगता है कि यह दसवीं शताब्दी का होना चाहिए । यहां गुप्त लिपि (क्रिप्टोग्राफी) में एक शिलालेख भी है । वटसिद्ध नागनाथजी यहां समाधि लेने का नाटक कर गायब हो गए और लातूर-नांदेड मार्ग पर धरणी गांव से ३ मील उत्तर में ‘वडवल’ में उन्होंने संजीवनी समाधि ले ली । यहां प्रतिदिन रुद्राभिषेक किया जाता है । महाशिवरात्रि और पूरे कार्तिक महीने में यहां उत्सव मनाया जाता है । इस स्थान से ३ कि.मी. की दूरी पर संजीवनी वनौषधि का द्वीप है । श्रीरेवणनाथजी की संजीवनी समाधि सांगली जिले के विटा गांव के पास रेणावी स्थल पर है । यहां प्राचीन वास्तुकला का सुंदर प्रदर्शन होता है । मंदिर के गर्भगृह में श्रीरेवणनाथजी की एक सुंदर मूर्ति है । पुणे जिले में आळंदी से ३ कि.मी. की दूरी पर डुडुलगांव में श्रीअडबंगनाथजी का तपस्या स्थल है । बारह वर्षों तक एक पैर पर खडे रहकर की गई तपस्या के साक्षीरूप यहां नाथ के पैरों के निशान हैं । पास में ही शिवलिंग, धूनी, त्रिशूल, चिमटा है ।

मनमाड से पांच मील की दूरी पर अंकाई नामक गांव है और गांव से सो तीन मील की दूरी पर पहाडियों में श्रीगुरुगोरक्षनाथजी, श्रीचौरंगीनाथजी और श्रीकानिफनाथजी की तीन गुफाएं हैं । श्रीचौरंगीनाथजी की गुफा में एक आसन पर एक मूर्ति विराजमान है । कहा जाता है कि उन्होंने यहां तपस्या की थी। सामने एक पानी की टंकी है और ऊपर एक बहुत बडी चट्टान है। तीनों गुफाएं एक ही ऊंचाई पर हैं। इसके सामने की पहाडी पर राजा गोपीचंद की गुफा है । पास ही अगस्त्य ऋषि का एक आश्रम भी है । मनमाड से केवल छह मील की दूरी पर मनमाड-विसापुर मार्ग पर नाथपंथी शिव मंदिर है । मंदिर में श्रीगुरुगोरक्षनाथजी की खडी मूर्ति है । सामने के मंदिर में श्रीचौरंगीनाथजी की विराजमान मूर्ति है । यह वह मंदिर है जिसमें श्रीमच्छिन्द्रनाथजी का पार्थिव शरीर रखा गया था । पहले यह क्षेत्र राजा त्रिविक्रम का था। जब श्रीगुरुगोरक्षनाथजी अपने गुरु के पार्थिव शरीर को लेने के लिए स्वर्ग गए, तो उन्होंने मंदिर मेंश्रीगुरुमच्छिन्द्रनाथजी के शरीर की जिम्मेदारी श्रीचौरंगीनाथजी को सौंपी थी । इसलिए श्रीचौरंगीनाथजी की बैठी मूर्ति यहां उपलब्ध है । भक्तों का कहना है कि श्रीगुरुमच्छिन्द्रनाथजी के शव को श्रीगुरुगोरक्षनाथजी ने खडा पहरा और श्रीचौरंगीनाथजी ने बैठा पहरा दिया था ।

श्रीगुरुमछिन्द्रनाथजी ने कोंकण में कुडाल प्रांत का भी दौरा किया था । कोल्हापुर, सातारा, कराड, श्रीवर्धन, ठाणे, कोंकण, विदर्भ, खानदेश, मराठवाडा में भी नाथ-स्थल हैं । पुणे जिले के सासवड के पास बोपगांव श्रीकानिफनाथजी की तपोभूमि है । नाथपंथ की विरासत श्रीगहिनीनाथजी को श्रीनिवृत्तिनाथजी से और श्रीनिवृत्तिनाथजी से श्रीज्ञानेश्‍वरजी अर्थात श्रीज्ञाननाथजी को मिली थी । श्रीगहिनीनाथजी ने श्रीनिवृत्तिनाथजी को ‘विठ्ठल’ नाम का मंत्र देकर वैष्णव भागवत संप्रदाय का प्रसार करने का आदेश दिया । नाथपंथ के कारण महाराष्ट्र में विष्णुमय संतों की परंपरा समृद्ध हुई है । नाथपंथ ने महिलाओं को बडा सम्मान दिया । श्रीज्ञाननाथजी की सिद्ध परंपरा की एक महिला श्रीगुप्तनाथजी ने नाथपंथ की असामान्यता को प्रमाणित किया है । नगर जिले के राशिन की गंगाबाई ही गुप्तनाथजी थीं ।

नवनारायण अर्थात नवनाथों ने दसवीं शताब्दी में संजीवनी समाधि लेकर अपने अवतार कार्य का समापन किया । यह सत्य है कि आज भी भक्तों को नवनाथों के अस्तित्व की अनुभूति होती है । नवनाथों ने भगवान श्रीगुरुदत्तात्रेय अर्थात ब्रह्मा-विष्णु-महेश की आराधना की । तीन प्रकार की साधनाओं का त्रिवेणी संगम नाथ संप्रदाय में दिखाई देता है – शिव की योग साधना, ब्रह्मा की वैदिक कर्मसाधना और विष्णु की जीव-ब्रह्म-सेवा साधना । प्रत्येक नाथ ने बारह वर्षों तक तपस्या की । इसमें उनकी समाधि योग साधना भी सम्मिलित है । केवल भारत में ही नहीं, बल्कि भारत के बाहर के देशों में, नाथों के तपस्या स्थल, साधना स्थल, समाधि स्थल, गद्दी स्थल के साथ-साथ नाथपंथी मठ-मंदिर एवं अखाडों में संरक्षित पांडुलिपियां, पोथियां, शिलालेख, शिल्पाकृति, पूजा पद्धति, पारंपरिक अनुष्ठान पद्धति, रीति-रिवाज, नाथपंथी मठों और मंदिरों में संपन्न होनेवाले उत्सव-यात्रा आदि का गहन अध्ययन किया जाए, तो नाथ संप्रदाय का गौरवशाली इतिहास प्रकाश में आएगा । महायोगी गुरु श्रीगोरक्षनाथ शोध पीठ तथा दीन दयाल उपाध्याय युनिवर्सिटी गोरखपुर द्वारा यदि वित्तीय योगदान उपलब्ध कराया जाता है, तो मेरे जैसे साहित्य के शोधकर्ता को नाथ सेवा से जीवन कृतार्थ होने का परमानंद प्राप्त होगा । नाथ सम्प्रदाय की नींव के साथ इस ‘अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन’ के आयोजन की यह पहल सराहनीय है और सभी को नाथ कार्य करने के लिए प्रेरित करती है । मुझे इस सम्मेलन में सहभागी होने का अवसर प्रदान किया गया, इसके लिए मैं पुनः एक बार आभार व्यक्त करता हूं और नाथ के चरणों में अपनी वाणी को समर्पित करता हूं ।

– श्री. मिलिंद सदाशिव चवंडके
(संदर्भग्रंथ – अलख निरंजन, दीपावली विशेषांक, १९७५ से १९७९)

॥ जय आदेश श्रीगुरुगोरक्षनाथा ॥

1 thought on “महाराष्ट्र के नाथ स्थल (महाराष्ट्र : नवनाथों की भूमि)”

  1. आपके द्वारा दी गई ये जानकारी बहुत उपयोगी है आभार

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