संकटकाल के घेरे में

कोरोना का संकट आनेपर संकटकालीन स्थिति उत्पन्न होने की चर्चा आरंभ हो गई । एक सूक्ष्म विषाणु ने देखते ही देखते संपूर्ण विश्‍व का परिवहन (यातायात) ठप्प कर दिया । पिछले ५ महिनों से इस कोरोना संकट ही चर्चा में है । कोरोना के इस झटके से उबरने से पहले ही यातायात बंदी से उत्पन्न आर्थिक मंदी की भी चर्चा आरंभ हो गई । यह आर्थिक संकट इतना भयंकर होगा कि इसके दंश से कोई भी व्यक्ति अछूता नहीं रहेगा । एक ओर यह भीषण संकट, तो दूसरी ओर चक्रवात, लू-लपट (गर्म हवा) टिड्डीदल का आक्रमण जैसी आपत्तियों ने भी अपना रौद्ररूप दिखाना आरंभ कर दिया । पिछले सप्ताह बंगाल एवं ओडिशा राज्यों में ‘अम्फान’ चक्रवात ने उत्पात मचाया । इस चक्रवात की पूर्वसूचना मिलने से प्रशासन ने लगभग ६ लाख नागरिकों को स्थानांतरित किया । उसके कारण भले ही मनुष्यहानि को रोकने में कुछ मात्रा में सफलता मिली हो; परंतु इस चक्रवात से आर्थिक हानि बहुत हुई । कुछ समय पूर्व राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र राज्यों में टिड्डीदल ने हाहाकार मचाया । इससे संतरा, मोसंबी, सब्जी और अन्य फसलों को भारी क्षति हुई । टिड्डीदल को रोकने हेतु कुछ स्थानों पर औषधि की फुहार, वाद्य बजाना जैसे उपाय किए गए; परंतु जो हानि होनी थी वह होकर ही रही । इसके साथ ही नागरिकों को गर्मी के प्रकोप का सामना करना पडा । महाराष्ट्र के नागपुर में हाल ही में ४६.७ अंश सेल्सियस तापमान प्रविष्ट किया गया । इस अवधि में विश्‍व में प्रविष्ट पहले १० गर्म शहरों में भारत के पिलानी, चुरु, नागपुर एवं चंद्रपुर, ये ४ नगर अंतर्भूत थे ।

एक ओर कोरोना और अन्य संकट, तो दूसरी ओर विश्‍व तीव्रगति से तीसरे महायुद्ध की ओर बढ रहा है । भारत इस युद्ध से अछूता नहीं रह सकता । लद्दाख सीमा पर चीन और भारत में तनाव है, तो नेपाल भी भारत को आंखें दिखा रहा है । पाकिस्तान नामक सिरदर्द तो हमेशा से ही बना हुआ है । हाल ही में पुलिसबल और सेना ने जम्मू-कश्मीर में जिहादियों का पुलवामा के षडयंत्र को कुचल दिया था । पाक अधिकृत कश्मीर के विषय पर पाकिस्तान विषवमन कर ही रहा है, तो दूसरी ओर देश में साधु-संतों पर प्राणघातक आक्रमणों की घटनाओं में वृद्धि हुई है । कोरोना की पृष्ठभूमिपर शासन-प्रशासन में समन्वय का अभाव, प्रशासनिक ढिलाई और दायित्वशून्यता के कारण नागरिकों में असंतोष का वातावरण है । इन सभी घटनाओं को अलग-अलग न देखते हुए यदि इन घटनाओं की श्रृंंखला जोड दी जाए, तो ध्यान में आता है कि संकटकाल का केवल आरंभ ही नहीं हुआ है, अपितु विश्‍व प्रतिक्षण तीव्रगति से घोर संकटकाल की ओर अग्रसर हो रहा है ।

 

साधना अनिवार्य

 

यह संकटकाल एकाएक नहीं आया है । अनेक द्रष्टा संत और भविष्यवेत्ताओं ने बहुत पहले ही कहा था कि वर्ष २०२० से २०२३ तक का काल भयानक संकटकाल होगा । इस काल में केवल साधना ही तारनहार होगी । संतों की भविष्यवाणी के अनुसार ‘आगामी तीसरा महायुद्ध इतना महाभीषण होगा कि उसके सामने पहला और दूसरा महायुद्ध खेल-खेल में की जानेवाली लडाई की भांति प्रतीत होंगे ।’ इससे इस संकटकाल की तीव्रता ध्यान में आती है । अत: ऐसे में कोरोना हो अथवा अन्य कोई संकट; वे आएंगे और चले जाएंगे और तत्पश्‍चात जनजीवन पुनः पटरी पर आ जाएगा, ऐसा मानना संभवत: स्वप्न की भांति हो । अतः इस संकटकाल से पार होना हो, तो संतों द्वारा बताए अनुसार साधना करना अनिवार्य है । संकटकाल में अधिकोषों में रखे हुए पैसे नहीं, अपितु साधना की पूंजी ही उपयोगी होगी । साधना के पथ पर अग्रसर अनेक साधकों ने कोरोना संकटकाल में इसकी प्रतीति ली है । ‘सर सलामत, तो पगडी पचास !’ आजकल अस्तित्व के लिए जो संघर्ष चल रहा है, उसे केवल चिकित्सकीय अथवा सामाजिक स्तर पर लडना काफी नहीं, अपितु उसे आध्यात्मिक स्तर पर भी लडना होेगा ।

साधक का सामर्थ्य ही संकट में स्थिर रहकर उसका सामना करने का धैर्य देता है; परंतु यह आध्यात्मिक सामर्थ्य यदि अपर्याप्त हो, तो स्थिति नियंत्रण में नहीं रहती है । आजकल इंटरनेट, बिजली और अन्य सुविधाएं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं; परंतु आगामी काल में जब वे भी ठप्प हो जाएंगी, तब व्यक्ति की मानसिक स्थिति कैसी होगी ? जब चिकित्सा के लिए आधुनिक वैद्य भी अपर्याप्त होंगे अथवा औषधियों की किल्लत होगी, तब क्या होगा ? ये केवल कल्पनाएं अथवा संभावनाएं नहीं हैं । भविष्यवाणी के अनुसार आनेवाले समय में यह सब घटित होने की संभावना को अस्वीकार नहीं किया जा सकता । कोरोना के कारण लागू की गई यातायात बंदी के ४ चरण समाप्त होने को हैं । इसके आगे और कितने चरण होंगे, यह पता नहीं है । अतः नागरिकों को भ्रम में न रहकर स्वयं का आध्यात्मिक बल बढाने के साथ ही स्वरक्षा, प्राथमिक चिकित्सा और अग्निशमन का प्रशिक्षण लेना, रोगनिर्मूलन हेतु केवल एलोपैथी पर निर्भर न रहकर विविध चिकित्सापद्धतियों का अध्ययन करना तथा उपलब्धता के अनुसार औषधीय वनस्पतियों की बागवानी को प्रधानता देना आवश्यक है ।

कालचक्र ही इस संकटकाल का कारण है । आध्यात्मिक भाषा में बताना हो, तो जब पृथ्वी पर अधर्म प्रबल हो जाता है, तब संकटकाल आता है और उसके समाप्त होने पर पुनः अच्छे काल का आरंभ होता है । आजकल विश्‍व तीव्रगति से संकटकाल के घेरे में प्रवेश कर रहा है; परंतु ऐसा होते हुए भी साधनारूपी नौका इस घेरे में भी हमारा दिशादर्शन करेगी । जिसप्रकार मध्यरात्रि के उपरांत सूर्योदय होता है, उसी प्रकार संकटकाल से बाहर निकलने पर पुनः संपत्काल का उषाकाल देखना संभव हो सकेगा; परंतु उसके लिए राजा और प्रजा, दोनों के लिए साधना करना आवश्यक है !

स्त्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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