कृत्रिम शीतपेयों के दुष्परिणाम

 

१.हड्डियों का दुर्बल होना

कृत्रिम शीतपेयों का ‘पी एच’ सामान्यतः ३.४ होता है । इससे दांत और हड्डियां दुर्बल बनती हैं । मानवी आयुष्य के लगभग ३० वर्ष पूर्ण होने के उपरांत अपने शरीर की हड्डियों की निर्मिति की प्रक्रिया बंद हो जाती है । तदुपरांत खाद्यपदार्थों में आम्लता के प्रमाण के अनुसार हड्डियां दुर्बल होना प्रारंभ होती हैं ।

 

२. शरीर के तापमान और पेय पदार्थों का तापमान इसमें
विषमता के कारण व्यक्ति की पचनशक्ति पर विपरीत परिणाम होना

स्वास्थ्य की दृष्टि से देखें, तो इन पेयपदार्थों में जीवनसत्त्व अथवा खनिज तत्त्वों का नामोनिशान भी नहीं रहता है । इसमें शक्कर, कार्बोलिक आम्ल और अन्य रसायनों का ही भाग होता है । अपने शरीर का सामान्य तापमान ३७ अंश (डिग्री) तापांश (सेल्सिअस) होता है, तो किसी-किसी शीतपेय पदार्थ का तापमान इससे बहुत कम, अर्थात शून्य अंश (डिग्री) तापांश (सेल्सिअस) तक भी होता है । शरीर का तापमान और पेय पदार्थों के तापमान में विषमता व्यक्ति की पचनशक्ति पर विपरीत प्रभाव डालता है । इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति द्वारा ग्रहण किए भोजन का अपचन होता है । इससे वायु और दुर्गंध निर्माण होकर दांतों में फैलती है और अनेक रोगों को जन्म होता है ।’

 

३. प्रयोग के निष्कर्ष

‘एक प्रयोग में एक टूटे हुए दांत को एक पेय की बोतल में डालकर बंद कर दिया । १० दिनों उपरांत दांत निरीक्षण के लिए निकालना था; परंतु तब वह दांत उसमें था ही नहीं, अर्थात वह उस पेय में घुल गया था । ध्यान देनेवाली बात है कि इतना मजबूत दांत भी हानिकारक पेय पदार्थ के दुष्प्रभाव से घुलकर नष्ट हो जाता है, तो यह पदार्थ पचन के लिए जहां अनेक घंटों पडा रहता है, उन कोमल आंतों की क्या दुर्दशा होती होगी ?’

 

४. बच्चों का स्वभाव हिंस्र और आक्रमक होना

‘दिन में शीतपेयों की ४-५ बोतलें पीनेवाले बच्चों में से १५ प्रतिशत बच्चों का स्वभाव हिंस्र और आक्रमक होता है !’

(संदर्भ : आधुनिक वैद्य (डॉ.) प्रकाश प्रभू, एम.डी., हिन्दवी, ११.४.२०१० और दै. सामना, २७.३.२०१२)