ग्रंथ-विमोचन

‘विमोचन’ अर्थात देवता के कृपाशीर्वाद से उस विशिष्ट घटक में व्याप्त प्रकाश के निर्मितिस्रोत को दिशा अथवा मार्ग दिखाकर उसे समष्टि के लिए कार्यरत करना ।

 

संस्कृत श्लोकों के उच्चारणका महत्त्व

‘श्लोक ईश्वरकी स्तुति एवं उनसे आर्त प्रार्थना के लिए होेते हैं । श्लोक के उच्चारण से हममें लीनता आती है । ईशस्तवन कर हम अपनी व्यथा, वेदना एवं आकांक्षाका श्रद्धायुक्त भाव से ईश्वर के समक्ष कथन करते हैं । श्लोकों में पवित्रताका सामर्थ्य है । उनका उच्चारण करनेवाले के भाव से देवता भूलोककी ओर आकर्षित होते हैं और हमें इष्टफल देते हैं । श्लोकों के माध्यम से आत्मनिवेदन करनेपर मन हलका होता है तथा मनःशांति प्राप्त होती है । इसीलिए हिन्दू संस्कृतिने श्लोकोंको उपासनाका एक श्रेष्ठ साधन माना है । श्लोकोंका यह महत्त्व तो है ही; साथ ही श्लोकों के संस्कृत भाषा में होने से उस भाषाकी सात्त्विकताका अतिरिक्त योग भी प्राप्त हुआ है । संस्कृत वैदिक भाषा अर्थात देवभाषा है; अतः संस्कृत श्लोकों में चैतन्य है ।

किसी भी कार्यक्रम के आरंभ, मध्य एवं अंत में श्लोक-उच्चारण से वातावरण के चैतन्यमय बनने में, भावजागृति होने में एवं अनिष्ट शक्तियों से पीडा के निवारण में सहायता मिलती है और कार्यक्रमका हम आध्यात्मिक लाभ उठा सकते हैं ।

१. कार्यक्रम के आरंभ में

वंदे सरस्वतीं देवीं वीणापुस्तकधारिणीम् ।
पद्मासनां शुभ्रवस्त्रां कलाविद्याप्रदायिनीम् ।।

अर्थ : जो पद्मासनपर (कमलपर) बैठी हैं, शुभ्रवस्त्र पहने हैं, जिन्होंने ग्रंथ एवं वीणा धारण की है । जो विद्या, कला प्रदान करती हैं, उन सरस्वतीदेवी को मैं नमस्कार करता हूं ।

२. कार्यक्रम के मध्य में

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता ।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशज्र्रप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता ।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ।।

अर्थ : जो कुंदा के पुष्प, चंद्रमा की चांदनी, मोतियों के हार की भांति शुभ्रवर्ण की हैं, जिन्होंने शुभ्रवस्त्र धारण किए हैं, श्रेष्ठ वीणा धारण करने से जिनके हाथ शोभित हैं, जो श्वेत कमलासन पर विराजमान हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश इत्यादि देवता जिन्हें सदैव वंदन करते हैं, ऐसी भगवती सरस्वतीदेवी हमारी बुद्धि का जाड्य (अंधःकार), जडता, मतिमंदता दूर कर, हमारी रक्षा करें ।

३. कार्यक्रम के अंत में

गुरुब्र्ह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।’

 

‘ग्रंथ-विमोचन की विधि

१. सर्वप्रथम श्री महागणपति की शरण जाकर उनका आवाहन कर, प्रकट होने हेतु प्रार्थना करें ।

२. ग्रंथरूपी श्री गणपति के चरणों की गंध, कुमकुम, पुष्प एवं अक्षत से पूजा करें ।

३. ग्रंथ का एकाध परिच्छेद पढें ।

 

ग्रंथ विमोचन इस प्रकार न करें ?

ग्रंथ को फीता बांधकर, तदुपरांत उसे खोलकर विमोचन न करें ।’ – एक विद्वान (सद्गुरु) श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से, ५.९.२००५, दिन १०.३५़

संदर्भ : सनातन निर्मित ग्रंथ ‘पारिवारिक धार्मिक व सामाजिक कृत्योंका अध्यात्मशास्त्रीय आधार’