सत्कार कैसे करें ?

१. आध्यात्मिक अर्थ एवं महत्त्व

‘सत्कार’ अर्थात आध्यात्मिक कार्य करनेवाले जीव की देह से प्रक्षेपित सात्त्विक तरंगों के कारण उसके आसपास बने सात्त्विक तरंगों से युक्त वायुमंडल की पूजा करना । सत्कार सगुण उपासना का ही एक भाग है ।

हिन्दू धर्म में प्रत्येक जीव का (उदा. सुहागन का) यथोचित सत्कार कर, मनःपूर्वक अर्थात कृतज्ञ भाव से चैतन्यमय वस्तुओं का उपयोग कर उसकी विदाई करना फलदायी सिद्ध होता है । इससे प्रत्येक कृत्यद्वारा हमारी साधना भावसहित हो पाती है ।

 

२. सत्कार किसका और किसे करना चाहिए ?

‘सत्कार’ का आध्यात्मिक अर्थ है, ‘सत् कार्य के लिए कारक जीव ।’

हिन्दू धर्म के अनुसार ‘जीवों की आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रयासरत जीव अर्थात समष्टि कार्य में रत जीव सत्कार का पात्र होता है ।

सत्कार करनेवाले जीव का आध्यात्मिक स्तर ४० प्रतिशत से अधिक होना चाहिए । ईश्वर के प्रति भावप्रवण जीवद्वारा सत्कार किए जाने से सत्कारस्थलपर ब्रह्मांड के देवता की कार्यरत तरंगों के आकृष्ट होने में सहायता मिलती है । साथ ही देवता का तत्त्व अल्पावधि में समष्टि के लिए कार्यरत होता है और वहां उपस्थित सर्व लोगों को ईश्वरीय चैतन्य का लाभ मिलता है ।

संदर्भ : सनातन निर्मित ग्रंथ ‘पारिवारिक धार्मिक व सामाजिक कृत्योंका अध्यात्मशास्त्रीय आधार’

 

३. सत्कार समारोह में उच्चारित श्लोक

कार्यक्रम के आरंभ में

गुरुब्र्ह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।

कार्यक्रम के मध्य में

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते ।।

कार्यक्रम के अंत में

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।
प्रणतक्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः ।।
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् ।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ।।’

 

४. सत्कार करते समय किए जानेवाले कृत्य

‘किसी कार्यक्रम में (उदा. सार्वजनिक सभा) संतों का ‘सम्मान’ तथा अन्य मान्यवरों का ‘सत्कार’ करते समय आगे दिए क्रम से कृत्य करें ।

१. चंदन का तिलक, कुमकुम तिलक अथवा हलदी-कुमकुम लगाना

१ अ. सत्कारमूर्तियों को चंदन का तिलक, कुमकुम-तिलक अथवा हलदी-कुमकुम (स्त्री हो तो हलदी-कुमकुम) लगाएं । चंदन का तिलक / कुमकुम-तिलक लगाने के लिए एक छोटी कटोरी में चंदन पाउडर अथवा कुमकुम थोडासा गीला करके रखें, तथा सत्कारमूर्तियों में स्त्री हो, तो हलदी-कुमकुम की कटोरियां रखें । (कटोरियां आरतियां उतारने की थाली में अपने दाहिनी ओर रखें ।)

१ आ. सत्कारमूर्तियों को (उदा. हिन्दुत्वनिष्ठ, मान्यवर) दाहिने हाथ की मध्यमा से (बीचवाली उंगली से) तिलक (अथवा हलदी-कुमकुम) लगाएं ।

२. शाल अथवा धोती-उपवस्त्र (अथवा अन्य वस्त्र) अर्पण करना

२ अ. अन्य सत्कारमूर्तियों को शाल अथवा धोती-उत्तरीय (सत्कारमूर्ति धोती-उपवस्त्र का उपयोग न करते हों, तो अन्य वस्त्र) अर्पण कर सकते हैं ।

२ आ. शाल अर्पण करते समय वह सत्कारमूर्ति के शरीरपर ओढाएं, अर्थात उनकी पीठ के ऊपर से कंधों के सामने लाएं । तदुपरांत उन्हें श्रीफल (नारियल) दें । श्रीफल की शिखा सत्कारमूर्ति की दिशा में हो ।

२ इ. धोती-उत्तरीय (अथवा अन्य वस्त्र) देते समय उसपर श्रीफल रखकर, वे सत्कारमूर्ति के हाथ में दें । इस समय श्रीफल की (नारियल की) शिखा सत्कारमूर्ति की दिशा में हो ।

३. हार पहनाना

सत्कारमूर्तियों को हार पहना सकते हैं अथवा पुष्पगुच्छ दे सकते हैं । हार पहनाना हो, तो वह उनकी नाभितक पहुंचे, इतना लंबा हो । (एक मतानुसार अन्य सत्कारमूर्तियों के हार की लंबाई मूलाधारचक्रतक (नाभि के चार अंगुल नीचेतक) हो ।)

४. दीप से आरती उतारना (औक्षण करना)

४ अ. आरती की थाली में मध्यभाग में सत्कारमूर्तियों के लिए तेल का दीप), दीप के पास (अपने बाई ओर) थोडी अक्षत और एक सुपारी रखें । निरांजन को चंदन और फूल चढाएं । तेल के दीप से ३ बार उतारें ।

५. आंचलभराई

सौभाग्यवती (विवाहित स्त्री की) चोलीवस्त्र (ब्लाऊजपीस), श्रीफल और साडी से आंचलभराई करें ।

६. भेंटवस्तु देना

६ अ. सत्कारमूर्तियों को राष्ट्र, धर्म अथवा अध्यात्म संबंधी ग्रंथ, दृश्यश्रव्य-चक्रिका (वीसीडी), मिठाई इत्यादि भेंटवस्तु दें ।

६ आ. सत्कारमूर्तियों को शाल अथवा धोती-उपवस्त्र (अथवा अन्य वस्त्र) न दिए हों, तो भेंटवस्तु देते समय उसपर श्रीफल (नारियल) रखें । श्रीफलपर कुमकुम लगा हो, और देते समय उसकी शिखा सत्कारमूर्ति की दिशा में हो, इसका ध्यान रखें ।

७. नमस्कार करना

‘व्यक्ति के आंतरिक देवत्व की हम शरण जा रहे हैं’, ऐसा भाव रखकर सत्कारमूर्तियों को नमस्कार करें ।

संदर्भ : सनातन निर्मित ग्रंथ ‘पारिवारिक धार्मिक व सामाजिक कृत्योंका अध्यात्मशास्त्रीय आधार’