ज्योतिषशास्त्र – वेदों का अंग !

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आकाशस्थित ज्योति-संबंधी शास्त्र, अर्थात ज्योतिषशास्त्र

 

१. समानार्थी शब्द

कालविधानशास्त्र

२. महत्त्व

ज्योतिष, वेदों का एक अंग है । कहा गया है कि ‘ज्योतिषामयनं चक्षुः’, अर्थात ज्योतिष वेदों का नेत्र है ।

३. व्युत्पत्ति और अर्थ

‘ज्योतिष’ शब्द ज्योत ± ईश से बना है । ज्योत का अर्थ है, प्रकाश और ईश का अर्थ है देव । इसलिए, ‘ज्योतिषशास्त्र’ शब्द का अर्थ हुआ, ‘दैवीय प्रकाश से युक्त शास्त्र ।’

४. ब्रह्मदेवनिर्मित शास्त्र !

विनैतदखिलं श्रौतस्मार्तं कर्म न सिद्धति ।
तस्माज्जगद्धितायेदं ब्रह्मणा रचितं पुरा ।। – नारदसंहिता

अर्थ : ज्योतिष के बिना श्रौत-स्मार्त कर्म नहीं सिद्ध होते । इसलिए, प्राचीन काल में संसार की भलाई के लिए ब्रह्मदेव ने कालज्ञान के रूप में ज्योतिषशास्त्र बनाया ।

५. चार लाख श्लोकों का शास्त्र !

‘चतुर्लक्षं तु ज्यौतिषम्’, अर्थात ज्योतिषशास्त्र में चार लाख श्लोक हैं । इस शास्त्र का उपयोग बहुधा सभी श्रद्धालु लोग अपने जीवन में करते रहते हैं और उनमें से अनेक लोगों ने इससे होनेवाले लाभ की अनुभूति भी ली है ।

 

६. ज्योतिषशास्त्र का महत्त्व

आदि मुनि नारदजी ने ज्योतिषशास्त्र का महत्त्व आगे दिए अनुसार बताया है –

सिद्धान्तसंहिताहोरारूपस्कन्धत्रयात्मकम् ।
वेदस्य निर्मलं चक्षुजर्योतिःशास्त्रमनुत्तमम् ।।

अर्थ : ज्योतिषशास्त्र श्रेष्ठ है तथा यह वेदों का निर्मलनेत्र है । इस शास्त्र का सिद्धांत, संहिता और होरा, ये तीन स्कंध हैं ।

परात्पर गुरु डॉ. आठवले

ज्योतिषशास्त्र, न केवल प्रारब्ध के अनुसार होनेवाली घटनाओं के विषय में बताता है, अपितु उसे टालने का उपाय भी बताता है । अर्थात, प्रारब्ध पर विजय पाने के लिए कौन-सा कर्म वैसे करना है, यह सिखाता है । (परात्पर गुरु) डॉ. आठवले

 

७. ज्योतिषशास्त्र को असत्य बताना, वेद को असत्य कहने जैसा !

वेदों के छह अंगों में से एक अंग ‘ज्योतिष’ है । ऋग्वेद में ज्योतिषशास्त्र के ३६, यजुर्वेद में ४४ तथा अथर्ववेद में १६२ श्लोक हैं । इससे, ज्योतिषशास्त्र का वेदों से दृढ संबंध सिद्ध होता है । इसलिए, ज्योतिषशास्त्र को झूठा कहना, वेदों को असत्य कहने जैसा है । इसी प्रकार, ज्योतिषशास्त्र पर संवैधानिक नियमों का आधार लेकर प्रतिबंध लगाना, एक प्रकार से वेदों पर प्रतिबंध लगाने समान है । लोकतंत्र से मिली धार्मिक स्वतंत्रता के कारण कोई भी सरकार हिन्दुओं के धर्मग्रंथों के विरुद्ध नियम नहीं बना सकती । इसलिए, ज्योतिषशास्त्र का विरोध करने का अर्थ है, हिन्दू धर्म का विरोध करना ! (संग्रहणीय लेख)

 

८. ज्योतिषशास्त्र असत्य होता, तो टिका होता क्या ?
– वेदमूर्ति योगेश काळेगुरुजी, सोलापुर (महाराष्ट्र)

जब कोई ज्योतिषी किसी के जीवन में घटित घटनाओं के विषय में बताता है और वे सत्य निकलतीं हैं, तब ज्योतिष सत्य कि असत्य ? लोग ज्योतिषियों पर क्यों न विश्वास करें ? आज लाखों लोगों को ज्योतिष सत्य होने का अनुभव हो रहा है, इसका विचार ज्योतिष को बकवास बतानेवाले अवश्य करें । कोई भी व्यक्ति दूसरे को सर्वदा मूर्ख नहीं बना सकता । इसी प्रकार, किसी ज्योतिषी के पास अथवा अन्य के पास लाखों लोग जाते हैं, तो इसका अर्थ ही हुआ कि उसके पास कुछ है । कालप्रवाह में अनेक बातें नष्ट हो गईं, किंतु ज्योतिषशास्त्र सहस्त्रों वर्ष से टिका हुआ है; क्योंकि ज्योतिषशास्त्र में तथ्य है, यह बात ध्यान में रखनी चाहिए । (मार्च २००७)

 

९. ज्योतिषशास्त्र त्रिकालज्ञानी ऋषियों की रचना !

ज्योतिषशास्त्र बतानेवाले सब ऋषि त्रिकालज्ञानी थे । अंनिस (अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति)वाले वेद (धर्मशास्त्र) को समझने से पहले ज्योतिषशास्त्र का अभ्यास करने का प्रयत्न नहीं करते; इसीलिए उन्हें यह शास्त्र पाखंड लगता है । ज्योतिषशास्त्र के प्रवर्तक ब्रह्मा, सूर्य, वसिष्ठ, अत्रि, मनु, सोम, लोमश, मरीचि, अंगिरा, व्यास, नारद, शौनक, भृगु, च्यवन, यवन, गर्ग, कश्यप और पराशर, इन अठारह लोगों के नाम बताए जाते हैं । ऐसे ज्योतिषशास्त्र को नकारने का अर्थ होगा, इन अठारह महात्माओं को पाखंडी कहना ! (संग्राह्य लेख)

 

१०. ज्योतिष, शास्त्र ही है !

प्रसिद्ध सेवानिवृत्त शास्त्रज्ञ, राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला (एन.सी.एल) के पू. (डॉ.) रघुनाथ शुक्ल कहते हैं, ‘मैं अपने ३५ वर्ष के शोध के पश्चात छाती ठोक कर कह सकता हूं कि ज्योतिष, शास्त्र ही है । यह केवल विज्ञान नहीं है; क्योंकि विज्ञान की एक सीमा है । मुझे यह बताते हुए अभिमान हो रहा है कि मैंने जिन-जिन ज्येष्ठ शास्त्रज्ञों को ज्योतिष विषय समझाया है, उन्हें उस पर विश्वास हुआ है । मैंने नोबल पुरस्कारप्राप्त १२ वैज्ञानिकों से संपर्क कर उनसे पूछा था कि आपको नोबल पुरस्कार कैसे मिला ? तब उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी आंखों के सामने कुछ अक्षर दिखे अथवा कुछ सुनाई दिया । तब उस विषय में उन्होंने प्रयोगशाला में कुछ प्रयोग किए । वे प्रयोग सफल होने पर उसके लिए उन्हें नोबल पुरस्कार मिला ।

 

११. भारतीय संविधान का ज्योतिष को विज्ञान कहना !

कुछ मुट्ठीभर वैज्ञानिकों के विरोध के कारण विज्ञानयुग में ज्योतिष को पाखंड नहीं ठहराया जा सकता, यह बात सर्वोच्च न्यायालय ने भी कही है । इस प्रकार, जब हमारे संविधान ने ही एक प्रकार से ज्योतिष को विज्ञान कह दिया है, तब अब भारत का कोई भी प्रदेश अथवा व्यक्ति ज्योतिष को पाखंड न कहे !

प्रख्यात ज्योतिषी श्री.श्री. भट, डोंबिवली, ठाणे.

 

१२. प्रारब्धभोग की तीव्रता घटानेवाला अनुभूति का शास्त्र !

ज्योतिषशास्त्र, एक प्रकार से समय का प्रबंधन करना सिखाता है । इससे मनुष्य को अपने भविष्य की व्यवस्था करने में सहायता होती है । फिर भी, ज्योतिषशास्त्र के विषय में लगातार दुष्प्रचार कर उसपर आघात किया जा रहा है । इस दुष्प्रचार का तर्कसम्मत प्रतिवाद कर हमें अपने प्राचीन शास्त्रों और प्रमाणित विद्याओं की रक्षा करना बहुत आवश्यक हो गया है । हमारे शास्त्र, शाश्वत सत्य हैं । हमें इन शास्त्रों का ज्ञान कितना है ? हमे इनसे अधिकाधिक लाभ लेने का प्रयत्न करना चाहिए । ज्योतिष केवल गणितीय विज्ञान नहीं, अपितु अनुभूति का भी शास्त्र है । ज्योतिषी जन्मकुंडली देखकर, पूर्वजन्मों में हुए पापकर्मों के अनुसार इस जन्म में भोगे जानेवाले दुःखों की तीव्रता कम करने के लिए कुछ धार्मिक अनुष्ठान बताते हैं । इन अनुष्ठानों से प्रारब्धभोग घटकर सहनेयोग्य हो सकता है । (संग्राह्य लेख)

 

१३. बिना अभ्यास के ज्योतिष को पाखंड कहना, विज्ञान के भी नियम में नहीं बैठता !

विज्ञान ने ज्योतिष विषय में कुछ नहीं किया है; क्योंकि उसका यह क्षेत्र ही नहीं है । वैज्ञानिकों को कहने दीजिए कि यह हमारा विषय है । यदि वे ज्योतिष का अभ्यास करना चाहें, तो अवश्य करें । क्या वास्तुशास्त्र विषय वास्तुविशारद (आर्किटेक्चर) का है ? वे उसका शास्त्र की भांति अभ्यास करें, पश्चात ही निष्कर्ष निकालें । बिना अभ्यास के ही ज्योतिष को पाखंड बताना, विज्ञान के भी नियम में नहीं बैठता ।

प्रख्यात ज्योतिषी श्री.श्री. भट, डोंबिवली, ठाणे

 

१४. ग्रहों का प्रभाव बतानेवाले शास्त्र

ज्योतिषशास्त्र, धर्म और अध्यात्म का एक स्तंभ है । परंतु, आजकल के कुछ तथाकथित धर्मशास्त्री ही ज्योतिषशास्त्र को अंधश्रद्धा ठहरा रहे हैं ।  वेदों में यह कहा गया है कि अनेक शास्त्रों का विरोध हो सकता है; परंतु चिकित्साशास्त्र, मंत्रशास्त्र और ज्योतिषशास्त्र पग-पग पर विश्वास करनेयोग्य शास्त्र हैं । ‘यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे ।’ इसका अर्थ है, जो ब्रह्मांड में है, वह सब पिंड में अर्थात मनुष्य के शरीर में भी है । केवल मानव नहीं, अपितु संपूर्ण प्रकृति पर भी ग्रहों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है; उदा. भूकंप होते हैं, चंद्रमा की कला के ही कारण समुद्र में ज्वार-भाटा आते हैं । ग्रहों से ब्रह्मांड की ऊर्जा सकारात्मक अथवा नकारात्मक रूप में प्रवाहित होती रही है । इसका मानवीय मन और मस्तिष्क पर प्रभाव पडता है और यही ऊर्जा सफलता-विफलता का कारण बनती है । ग्रहों का यही प्रभाव ज्योतिषशास्त्र बताता है ।

-ज्योतिषाचार्य राजेंद्र शर्मा, मुंबई, महाराष्ट्र

 

१५. मुहूर्त निकालने के लिए शास्त्र की अनिवार्यता

कोई भी शुभकार्य करने के लिए प्रत्येक श्रद्धालु व्यक्ति ज्योतिषशास्त्र का उपयोग करता है । उसका उपयोग न करने पर, शुभ मुहूर्त पर होनेवाला गृहारंभ, गृहप्रवेश, मूर्तिप्रतिष्ठा, मौजिबंधन (यज्ञोपवीत संस्कार), विवाह, बरही (जन्म के बारहवें दिन किया जानेवाला उत्सव) आदि कर्म (अज्ञानतावश) अशुभ समय पर होंगे । अच्छे दिन, अच्छे मुहूर्त अथवा योग पर किए गए शुभ कर्मों के अच्छे फल मिलते हैं, यह धारणा भारत में वेदकाल से दृढ है । अच्छे और बुरे दिन के विषय में वैदिकों के कुछ अनुमान हैं । कन्यादान किसी भी नक्षत्र पर करने के विषय में एक मंत्र है । कौन-सा नक्षत्र अच्छा है और दिन का कौन भाग शुभ है, इस विषय में भी वेदों में मार्गदर्शन किया गया है ।

-कु. प्रियांका लोटलीकर, गोवा.

 

१६. भारतीय शास्त्र समृद्ध भारत के प्राचीन
धरोहर हैं, यह बात भारत शासन के प्रतिज्ञापत्र से स्पष्ट !

वर्ष २००४ से २००६ के मध्य कुछ भारतीय उच्च न्यायालयों में और पश्चात सर्वोच्च न्यायालय में भी ज्योतिषशास्त्र, वास्तुशास्त्र, रत्नशास्त्र आदि शास्त्रों को अवैज्ञानिक घोषित करने के लिए जनहित याचिकाएं डाली गई थीं; परंतु सब याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया । इन सब विद्याओं और शास्त्रों को भारत शासन प्राचीन शास्त्र मानता है । मुंबई उच्च न्यायालय में डाली गई एक जनहित याचिका में भी भारत शासन ने प्रतिज्ञापत्र के द्वारा कहा कि सब शास्त्र समृद्ध भारत की धरोहर हैं । भारत शासन इन सब शास्त्रों को ग्राह्य मानता है । इसके पश्चात, इन सब शास्त्रों के विरुद्ध की इन जनहित याचिकाओं को मुंबई उच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया । (संग्राह्य लेख)

 

१७. मनुष्य के अज्ञान के कारण यदि कोई शास्त्र
प्रमाणित नहीं हो सकता, तो इसमें चूक शास्त्र की नहीं !

ज्योतिषशास्त्र हमारे धर्मरक्षा कार्य में संजीवनी की भांति कार्य करता है; क्योंकि जन्म से मृत्यु तक के सब कार्य ज्योतिषशास्त्र की कक्षा में आते हैं । आधुनिक युग में भौतिकता की पराकाष्ठा हो रही है, तो विश्व के मापदंड भी बदल रहे हैं । सत्य की स्थापना होने में थोडा समय लगता है । परंतु, किसी विद्या अथवा शास्त्र का प्रमाण समझने का संयम लोगों में नहीं होता । ज्योतिषशास्त्र ग्रहों की गति पर आधारित है और गति कर्म का द्योतक है । ऐसे में, कर्म को श्रेष्ठ माननेवाला विज्ञान अंधश्रद्धा का प्रतीक कैसे बन सकता है ? किसी व्यक्ति को १ किमी. दूर स्थित वस्तु नहीं दिखाई देती; इसलिए क्या उस वस्तु का अस्तित्व ही नहीं है ? मनुष्य का ज्ञान अल्प है; इसलिए शास्त्रों की प्रामाणिकता को चुनौती नहीं दी जा सकती । हिन्दू धर्म के किसी भी शास्त्र के विषय में किसी का अज्ञान उस शास्त्र के महत्त्व को कभी भी कम नहीं कर सकता ।

ज्योतिषचार्य राजेंद्र शर्मा, मुंबई, महाराष्ट्र.
संदर्भ : दैनिक सनातन प्रभात

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