शर्करा एवं चाय-कॉफी के दुष्परिणाम 

शर्करा का अधिक उपयोग और उसका दुष्परिणाम

अ. अनेक रोगों की खान चॉकलेट

हमारी संस्कृति में जिसका कोई स्थान नहीं, ऐसी चॉकलेट अनेक रोगों विशेषतः दांतों के अनेक रोगों की खान है । उसमें प्रयुक्त सैक्रीन का शरीर पर उससे भी अधिक भयंकर परिणाम होता है ! ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ने भी ‘सैक्रीन’को स्वास्थ्य के लिए, हानिकारक और घातक बताया है । सैक्रीन के कारण कर्करोग भी हो सकता है । स्वास्थ्य बनाए रखना हो, तो सैक्रीन जैसे पदार्थों से बनाए गए चॉकलेट से दूर रहना ही अच्छा ।’
– वैद्य सुविनय दामले

आ. चाय-कॉफी के दुष्परिणाम

 

चाय और कॉफी में दस प्रकार के विष होते हैं ।

१. ‘ टैनिन’ नामक विष १८ प्रतिशत होता है । यह पेट में छिद्र और वायु उत्पन्न करता है ।

२. ‘थिन’ नामक विष ३ प्रतिशत होता है । इसके कारण मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं तथा यह विष फेफडों और मस्तिष्क में जडता की निर्मिति करता है ।

३. ‘कैफिन’ नामक विष २.७५ प्रतिशत होता है । यह गुरदों को (किडनियों को) दुर्बल बनाता है ।

४. ‘वॉलाटाइल’ नामक विष आंतों को हानि पहुंचाता है ।

५. ‘कार्बोनिक अम्ल’से आम्लपित्त (एसिडिटी) बढता है ।

६. ‘पॅमिन’ पाचनशक्ति को दुर्बल करता है ।

७. ‘एरोमोलीक’का आंतों पर हानिकारक प्रभाव पडता है ।

८. ‘सायनोजन’ अनिद्रा और पक्षाघात जैसे भयंकर रोग उत्पन्न करता है ।

९. ‘ऑक्सेलिक अम्ल’ शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक होता है ।

१०. ‘स्टिनॉयल’ रक्तविकार और नपुंसकता उत्पन्न करता है ।

इसीलिए चाय अथवा कॉफी का सेवन कभी नहीं करना चाहिए ।

सात्त्विक पदार्थ स्वादिष्ट होता है तथा वह थोडा-सा खाने पर भी तृप्ति प्रदान करता है, परंतु राजसिक एवं तामसिक पदार्थ इच्छा जागृत करते हैं तथा तत्संबंधी विचार मन में पुनः-पुनः आते हैं ।

इ. कृत्रिम शीतपेयों के दुष्परिणाम

१. ‘कृत्रिम शीतपेयों का ‘पी एच्’ सामान्यतः ३.४ होता है । इस कारण दांत और अस्थियां दुर्बल बनती हैं । मानवीय आयुष्य के लगभग ३० वर्ष पूर्ण होने के उपरांत हमारे शरीर में अस्थियों की निर्माण-प्रक्रिया थम जाती है । उसके उपरांत खाद्यपदार्थों में विद्यमान अम्लता के कारण अस्थियां दुर्बल होने लगती हैं ।

२. शारीरिक तापमान और पेय पदार्थों के तापमान में विषमता के कारण व्यक्ति की पाचनशक्ति पर विपरीत परिणाम होना : स्वास्थ्य की दृष्टि से देखा जाए, तो इन पेयपदार्थों में जीवनसत्त्व अथवा खनिज तत्त्वों का अंशमात्र भी नहीं होता । इनमें शर्करा, कार्बोलिक अम्ल तथा अन्य रसायनों का ही अंश होता है । हमारे शरीर का सामान्य तापमान ३७ अंश (डिग्री) तापांश (सेल्सियस ) होता है, तो किसी शीतपेय पदार्थ का तापमान इसकी अपेक्षा अत्यल्प, अर्थात शून्य अंश (डिग्री) तापांश (सेल्सियस ) तक भी होता है । शरीर के तापमान और पेय पदार्थों के तापमान में यह विषमता, व्यक्ति की पाचनशक्ति पर विपरीत प्रभाव डालती है । परिणामस्वरूप व्यक्ति द्वारा खाया हुआ भोजन नहीं पचता । इससे वायु और दुर्गंध उत्पन्न होकर दांतों में फैलती है, जो अनेक रोगों को जन्म देती है ।’ (१३)

३. प्रयोग का निष्कर्ष : ‘एक प्रयोग में एक टूटे हुए दांत को एक शीतपेय की बोतल में डालकर उसका मुंह बंद कर दिया गया था । १० दिन पश्चात इस दांत को बाहर निकालने के लिए जब बोतल का निरीक्षण किया गया तो वहां दांत था ही नहीं; अर्थात, वह दांत शीतपेय में घुल गया था । हानिकारक पेय पदार्थों के दुष्प्रभाव से जब इतना कठोर दांत भी घुलकर नष्ट हो जाता है, तो ये शीतपेय पचने के लिए जहां अनेक घंटे पडे रहते हैं, उस स्थान की कोमल आंतों की क्या स्थिति होती होगी ?’ (हिन्दवी, ११.४.२०१०)

४. ‘दिन में शीतपेय की ४-५ बोतल पीनेवाले बच्चों में से १५ प्रतिशत बालकों का स्वभाव हिंस्र और आक्रामक बनता है !’ – दै. सामना, २७.३.२०१२

फलों का रस पीने से लाभ

१. फल में भूमाता से पृथ्वीतत्त्व, सूर्य प्रकाश से तेजतत्त्व तथा मूलद्वारा ग्रहण होनेवाले पानी से आपतत्त्व ग्रहण होता है । फल प्राकृतिक होते हैं, इसलिए उसमें चैतन्य ग्रहण करने की क्षमता होती है ।

२. हाथ से फलों का रस निकालते समय निचोडने की क्रिया से फल में निहित शक्ति कार्यरत होती है ।

३. रस की सात्त्विकता फल के प्रकार पर निर्भर होती है ।

४. यदि फल असात्त्विक स्थान पर रखे हों, तो उन फलों पर वातावरण की कष्टदायक शक्तियों का आक्रमण होता है ।

५. फल के रस में प्राणशक्ति के कण होते हैं, इसलिए रस पीनेवाले व्यक्ति को प्राणशक्ति मिलती है तथा उसका शरीर पुष्ट होता है ।’

– (पू.) श्रीमती योया वाले, महर्षि अध्यात्म विद्यालय

५. आधुनिक आहार के कारण हुई मानवजाति की हानि

आधुनिक आहारपद्धति से अपने परिवार को बचाएं !

खाने-पीने की परिवर्तित आधुुनिक शैली, नवरूढि (फैशनबाजी) और असावधानी आदि स्वास्थ्य के लिए भयसूचक हैं । हमारा धर्मशास्त्र भी कहता है, ‘जैसा अन्न वैसा मन’। इसीलिए अपवित्र वस्तुओं से और अपवित्र वातावरण में बननेवाले ‘फास्ट फूड’ इत्यादि से अपने परिवार को बचाएं ।’

।। श्री अन्नपूर्णादेव्यै नमः ।।

यह लेख पढकर, दुःखी बनें जिज्ञासु । जिज्ञासु बनें मुमुक्षु । मुमुक्षु बनें साधक । और साधक प्राप्त करें मोक्ष ।। ऐसी भगवान श्रीकृष्णजी के चरणों में प्रार्थना है ! – डॉ. जयंत आठवले

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ “आधुनिक आहारसे हानि”