आहार एवं रुचि-अरुचि

शरीर में किसी रस की न्यूनता होने पर उस
रस से युक्त व्यंजन खाने की अथवा पीने की इच्छा होना

‘कभी-कभी कोई विशेष पदार्थ खाने का तीव्रता से स्मरण होता है । जब हमें तीखा, मीठा, खट्टा आदि में से कोई पदार्थ खाने का मन करता है, तब शरीर को उस घटक की आवश्यकता होती है । जिस प्रकार शरीर में पानी घटने पर प्यास लगती है अर्थात हमें पानी पीने की इच्छा होती है उसी प्रकार शरीर में किसी रस की न्यूनता होने पर उस रस का व्यंजन खाने की अथवा पीने की इच्छा होती है ।’ – एक अज्ञात शक्ति (श्रीमती रंजना गडेकर के माध्यम से, १.४.२०१०, दोपहर १.४५)

अ. ऋतुनुसार पदार्थ खाने की इच्छा होना

अ. १. वर्षाऋतु में तीखा पदार्थ खाने की इच्छा क्यों होती है ?

‘वर्षाऋतु में ठंड वातावरण के कारण शरीर के घटे हुए तापमान को समुचित करने हेतु अपनेआप ही तीखा पदार्थ खाने की इच्छा होती है । तीखे पदार्थ तेजतत्त्वयुक्त होते हैं । वर्षाऋतु में शरीर पर होनेवाले वातावरण के परिणाम के कारण शरीर में तेजतत्त्व घट जाता है । (शरीर पंचतत्त्वों से बना है । प्रत्येक की प्रकृतिनुसार पंचतत्त्वों की मात्रा भिन्न होती है । प्रकृति सूक्ष्मदेह का स्थूल प्रकटीकरण है । सूक्ष्मदेह उसमें विद्यमान त्रिगुणों के अनुसार होती है ।) तीखे पदार्थ से शरीर में उष्णता उत्पन्न होती है । उससे शरीर का तापमान बनाए रखने में सहायता होती है ।

अ. २. गर्मी में मीठा पदार्थ खाने की इच्छा क्यों होती है ?

मीठा पदार्थ आपतत्त्वयुक्त होता है । गर्मी के दिनों में शरीर पर होनेवाला उष्णता का दुष्परिणाम तीखे पदार्थ की अपेक्षा मीठे पदार्थ में पाए जानेवाले आपतत्त्व से मिट जाता है । इसलिए मीठा पदार्थ खाना हितकारी है ।’
– एक अज्ञात शक्ति (श्रीमती रंजना गडेकर के माध्यम से, ५.६.२००९, साय ७.२३)

आ. खाने की रुचि-अरुचि पर विजय प्राप्त करने के कुछ उपाय

१. सर्व पदार्थ एकत्रित कर खाना ।

२. अन्न को ‘प्रसाद’ समझकर खाना ।

३. नामजप करते हुए भोजन करना । मन नाम में रत हो जाए, तो हम क्या खा रहे हैं, इस पर ध्यान नहीं जाता ।

स्वाद पर विजय प्राप्त किए बिना संपूर्ण आध्यात्मिक प्रगति नहीं होती । यह सबसे अंत में होता है ।

केवल जीभ की रुचि-अरुचि की पूर्ति करना तथा रसों के स्वाद में फंसना, विदेशी संस्कृति है । यह संस्कृति शील भ्रष्ट करती है । आहार यदि तमोगुणी हो, तो तमोगुणी विचारों की उत्पत्ति से मन एवं बुद्धि का संतुलन बिगडता है तथा जीव नीतिविहीन बनता है । विदेशी आहार के माध्यम से देह में विकारों का संग्रह होता है । इससे मनुष्य दुर्गुणों की खाई में गिर जाता है । इसलिए जीवन पूर्णतः भ्रष्ट हो जाता है । इससे बाहर निकलना अत्यंत कठिन होता है । – ‘एक विद्वान’ (सद्गुरु) श्रीमती अंजली गाडगीळ के माध्यम से, १९.४.२०१०, दोपहर १.४९़

अन्न का मनुष्य पर परिणाम होता है, तो साधक भिक्षाटन वृत्ति से कैसे रहे ?

भिक्षा मांगते समय मनुष्य की श्रेष्ठ-अनिष्ट की परीक्षा न होने से अन्न का परिणाम साधक पर नहीं होगा क्या, यह प्रश्न उत्पन्न होता है । इस प्रश्न का उत्तर आगे दिए अनुसार है ।

१. भिक्षा में अनिष्ट और श्रेष्ठ का मिश्रण होने के कारण अनिष्ट परिणाम होना कठिन होता है ।

२. दूसरों पर अन्न का दुष्परिणाम न हो इस हेतु परमेश्वर दुर्जन व्यक्तियों में भिक्षा देने और दान करने की इच्छा उत्पन्न नहीं होने देते ।

३. अन्न खाने से पूर्व साधक उसके तीन भाग कर भूत आदि के लिए एक और अतिथियों के लिए दूसरा भाग देकर, इस प्रकार  प्रायश्चित से अन्न शुद्ध करे ।

४. अपने भाग का अन्न ग्रहण करने से पूर्व उसे ईश्वर को अर्पित कर प्रसादस्वरूप ग्रहण करना चाहिए । इससे भिक्षा के अन्न का अनिष्ट परिणाम नहीं होता ।

संदर्भ :  सनातन-निर्मित ग्रंथ “आधुनिक आहारसे हानि”